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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 199, कुल 368 में से

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पृष्ठ 199

१७६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
विमानावरणान्तर्गुहाशये स्थापयेत् सुधी ।
विद्युद्वेगोपसंहारदर्पणेन यथाविधि ॥ १६ ॥
शलाकान् षट् बाहुमात्रानष्टौ कुर्याद् दृढ यथा ।
अष्टदिक्षु स्थापयेत् तद्विमानावरकोपरि ॥ १७ ॥
विधिवत् स्थापयेत् पश्चाद् दम्भोलिलोहनिर्मितान् ।
कीलीचकान् पञ्चमुखानन्योन्याश्रयसंयुक्तान् ॥१८॥
विमानावरकस्यादौ मध्येचान्ते यथाक्रमम् ।
बध्नीयादावर्तसूक्ष्मशङ्कुभिस्सुदृढ यथा ॥१९॥
पौण्ड्रकादिमणीना तु पञ्जर सूक्ष्मतन्त्रिभि ।
पृथक् पृथक् कल्पयित्वा तन्त्रद्यग्राणि यथाक्रमम् ॥२०॥
विद्युत् के वेग का उपसंहार करनेवाले दर्पण के साथ यथाविधि विमानावरण के अन्तर्गत
गुहाशय—गुहा में रहने वाले यन्त्र को बुद्धिमान् स्थापित करे ६ भुज माप में ८ शलाकाओं को भी ८
दिशाओं में दृढ स्थापित करे उस विमानावरण के ऊपर विधिवत् दम्भोलि लोहे—वज्रलोहे से बने एक
दूसरे से आश्रित मिले हुए पांच मुखवाले कीलबक स्थापित करे, विमानावरण विमान को ढकनेवाले
साधन के आदि में मध्य में और अन्त में यथाक्रम घूमनेवाले सूक्ष्म शङ्कुओं से बान्ध दे, पौण्ड्रक
आदि मणियों का पिञ्जरा सूक्ष्म तारों से पृथक् पृथक् बनाकर तारों के अग्रभागों को यथाक्रम-॥१६-२०॥
एकैककीलमूलाग्रे सम्यक् सन्धारयेत् क्रमात् ।
भवेत् पञ्जरतन्त्रीणा चतुर्णामेककीलक ॥ २१ ॥
पश्चात्सम्भ्रामयेन्मूलकीली वेगाद् यथाविधि ।
पञ्जरैस्सह भ्राम्यन्ति मणयो द्वादश क्रमात् ॥ २२ ॥
तेनावरणकोशाना विकासो भवति ध्रुवम् ।
तेभ्य (१?)पटघनान्तस्थविद्युद्वेगोपहारिणी ॥ २३ ॥
शक्तिर्विजृम्भते सम्यक् प्रतिकोशे विशेषत ।
पूर्वोक्त विद्युत्किरणसञ्जाताज(जि?) गराभिधम् ॥२४॥
शक्ति तन्मणय पश्चात् समाकृष्यातपान्तरात् ।
किरणेभ्य पृथक् कृत्वा तद्वेग सन्निरुध्य च ॥ २५ ॥
एक एक कीली के मूल के आगे लगावे। पिञ्जरे के चार तारों का एक कील—पेंच हो पश्चात्
वेग से मूलकीली को घुमावे तो पिञ्जरों के साथ १२ मणिया घूमती हैं उस से निश्चय आवरण कोशों का
विकास होता है, उन कोशों से पटघन के अन्दर स्थित विद्युत् के वेग को लेने वाली शक्ति प्रत्येक कोश
में सम्यक् विकसित होती है—फैलती है। पूर्वोक्त विद्युत् किरण से उत्पन्न अजिगरा शक्ति को वे मणियां
आतप के अन्दर से खींचकर किरणों से पृथक् करके उसके वेग को रोक कर—॥ २१—२५ ॥