बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
१५४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
गुहागर्भादर्शयन्त्रमेवमुक्त्वा यथाविधि ।
अथेदानीं प्रवक्ष्यामि तमोयन्त्रस्य निर्णयम् ॥ ६६ ॥
गुहागर्भादर्श यन्त्र इस प्रकार यथाविधि कह कर अब तमोयन्त्र का निर्णय कहूँगा ॥ ६६ ॥
उक्तं हि यन्त्रसर्वस्वे—यन्त्रसर्वस्व में कहा है—
रौहिणीविषसम्बद्ध (न्ध ?) चूर्णांधूमादिभिस्तथा ।
क्रकचारिमणेर्दीप्तप्रभाविषसमूलत ॥ ७० ॥
विमाननाशनार्थाय प्रयोगः क्रियते यदा ।
तदा तद्विनाशाय स्वयन्त्रत्राणाय च ॥ ७१ ॥
शत्रुयन्त्रं सुविज्ञाय शास्त्रोक्तेनैव वर्त्मना ।
तमोयन्त्रं स्थापयेद् विमानवायव्यकेन्द्रके ॥ ७२ ॥ इत्यादि ॥
रौहिणी विषसम्बन्धी चूर्ण के धूप आदि से तथा क्रकचारि मणि ? (क्रकच – आरा के शत्रु-
रूपमणि) की प्रभा विषसमूल से विमाननाश के लिये जब प्रयोग किया जाता है तब उसके विनाश
के लिये अपने विमान के रक्षण के लिए शत्रु का रहस्य जान कर शास्त्रोक्त मार्ग से तमोयन्त्र—अन्धकार
फैलाने वाला यन्त्र विमान के वायव्य केन्द्र में स्थापित करे ॥ ७०-७२ ॥
तदुक्तं क्रियासारे—वह कहा है क्रियासार ग्रन्थ में—
विषधूमप्रकाशादिप्रयोगाच्छत्रुणा यदा ।
विनाशो व्योमयानस्य सम्भवेद् यदि तत्क्षणात् ॥ ७३ ॥
संस्थापयेत् तमोयन्त्रमतिवेगाद् विचक्षणः ।
यदि प्रमादं कुर्वीत स्वयानं नाशमेधते ॥ ७४ ॥
शत्रुओं का विषधूम प्रकाश आदि प्रयोग से जब विमान के विनाश की सम्भावना हो तो
तत्क्षण बुद्धिमान् वेग से तमोयन्त्र लगा वे, यदि प्रमाद किया तो अपना विमान नाश को प्राप्त हो
जाता है ॥ ७३-७४ ॥
द्वात्रिंशदुत्तरशततमोयन्त्रेषु शास्त्रतः ।
द्वियष्टितमसंख्याकयन्त्र एव गरीयसी* ॥ ७५ ॥
विषधूमप्रकाशादिसंहारे सुप्रशस्तकः ।
इति प्रोच्यते (ति ?) सम्यग्यन्त्रशास्त्रविशारदैः (दे ?) ॥७६॥
१३२ तमोयन्त्रों में शास्त्र से ६२ वीं संख्या वाला यन्त्र श्रेष्ठ है क्योंकि विषधूम प्रकाश आदि
के संहार करने में ठीक यन्त्र शास्त्र के विद्वानों द्वारा अच्छा प्रशस्त कहा जाता है ॥ ७५-७६ ॥
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- लिङ्गव्यत्ययः ।
हस्तलेख कापी संख्या ११-
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे-वह यह 'यन्त्रसर्वस्व' में कहा है-
कृष्णसीस चाञ्जनिक वज्रतुण्ड समांशत ।
संयोज्य मत्स्यमूषाया काकव्यासटिकान्तरे ॥ १ ॥
विन्यस्य शतकक्षोष्णवेगात् संगालयेत् तत ।
तद्रस यन्त्रमध्यास्ये निषिञ्चेद् विधिवच्छनै ॥ २ ॥
भवेत् तमोगर्भलोहस्सूक्ष्मश्शुद्धो लघुर्दृढ ।
एतल्लोहेनैव कार्यं तमोयन्त्र न चान्यथा ॥ ३ ॥
वितस्तित्रयमायाम वितस्त्यर्धोन्नति क्रमात् ।
चतुरस्रं वर्तुलं वा पीठं कुर्याद् यथाविधि ॥ ४ ॥
तन्मध्ये स्थापयेच्छङ्कु तत्पुरोभागतस्तथा ।
निशाटद्रावकस्थान कल्पयित्वा तथैव हि ॥ ५ ॥
काला सीसा, सुरमा, वज्रतुण्ड-थूहर। ये तीनों समानरूप में मिलाकर मत्स्यमूषानामक बोतल
में डाल कर काकव्यासटिका नामक कुण्ड के अन्दर रख कर १०० दर्जे की उष्णता के वेग से
गलावे फिर उस पिघले रस को यन्त्रमध्य के मुख में धीरे से विधिवत् भर दे, वह तमोगर्भ लोह सूक्ष्म
शुद्ध लघु दृढ हो जावे । इस लोहे से ही तमोयन्त्र करना चाहिये अन्यथा नहीं । ३ बालिश्त लम्बा आधा
बालिश्त ऊंचाई चौकोण या गोल पीठ यथाविधि करे, उसके मध्य में तथा सामने शंकु स्थापित करे ।
निशाटद्रावक-गूगल के द्रावक का स्थान बना कर तथा--॥ १-५ ॥
तमो*द्रेकादर्शक केन्द्रस्थान तत्पश्चिमे क्रमात् ।
रश्म्याकर्षणनालस्य स्थान प्राच्या प्रकल्पयेत् ॥ ६ ॥
तदूर्ध्वं नालसन्धिस्थान प्रकल्प्य तत परम् ।
तन्त्रीसन्धानचक्रस्य स्थान मध्यकेन्द्रके ॥ ७ ॥
कीलोचालनचक्रस्य स्थान तद्दक्षिणे न्यसेत् ।
एव यन्त्रस्य रचनाक्रममुक्त्वा समासतः ॥ ८ ॥
- तम उद्रेकात्-तमोद्रेक इति सन्धिराषं ।
१५६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
तत्प्रयोगक्रमं वक्ष्ये सङ्ग्रहेण यथामति ।
आदौ सञ्चालयेत् कीलीं चक्राग्नेयस्थितां क्रमात् ।।६।।
तेन नालस्थद्विमुखीदर्पणाभ्रामणं भवेत् ।
किरणाकर्षणं भानोर्भवेन्नालस्थदर्पणात् ।। १० ।।
अन्धकार को उभारने वाला आदर्श का केन्द्रस्थान उसके पश्चिम, किरणाकर्षणनाल का स्थान
पूर्व में बनावे उनके ऊपर की नाल का सन्धिस्थान बना कर फिर तन्त्रोसन्धान चक्र—तार जिसमें लगे
ऐसे चक्र का स्थान मध्यकेन्द्र में, कीली - पेंचों को चलाने वाले चक्र का स्थान उसके दक्षिण में रखे ।
इस प्रकार यन्त्र का रचनाक्रम संक्षेप से यथामति कह कर उसका प्रयोग क्रम कहूंगा, आग्नेय चक्र में
स्थित कील को चलावे उससे नाल में स्थित दो मुखवाले दर्पण का घुमाना हो जावे उस नालस्थ दर्पण से
सूर्यकिरणों का आकर्षण हो जावे - हो जावेगा ।। ६-१० ।।
पश्चाद् वायव्यकेन्द्रस्थकीलीं सञ्चालयेद् दृढम् ।
निशाद्रवपात्रस्थस्थापनं तस्माद् भवेत् स्वतः ।। ११ ।।
ऐशान्यकेन्द्रस्थकीलीं चालयेदिति सूक्ष्मतः ।
तेजोपकर्षणमणिस्तन्त्रीमुखात् स्वयम् ।। १२ ।।
निशाद्रवपात्रस्य मध्ये संस्थापितं भवेत् ।
तथा पश्चिमकेन्द्रस्थकीलसीञ्चालनाद् दृढम् ।। १३ ।।
स्वस्थाने स्थाप्यते सम्यक् तमोद्रेकाख्यदर्पणं ।
मध्यकीलीचालनेन नालमध्यस्थदर्पणात् ।। १४ ।।
आकृष्टासूर्यकिरणाः मणिमावृत्य वेगतः ।
स्थास्यन्ति मणिसंयोगात्सम्यक् चलनवर्जिताः ।। १५ ।।
पश्चात् वायव्य केन्द्रस्थ कीली को चलावे, गूग़लद्रवपात्रस्थ में स्थापन स्वत हो जावे, ईशान
केन्द्रस्थ कीली को अतिसूक्ष्मरूप से चलावे तो तेज को खींचने वाली मणि तन्त्रीमुख से स्वयं गूगल द्रव-
पात्र के मध्य में स्थापित हो जावे तथा पश्चिम केन्द्रस्थ कीली के सम्यक् चलाने से स्वस्थान में अन्धकार
को उभारने वाला दर्पण स्थापित किया जाता है, मध्यकील चलाने से नाल के मध्यस्थ दर्पण से सूर्य-
किरण आकृष्ट हुई हुई वेग से मणि को घेर कर मणि संयोग सम्यक् चलनरहित ठहर जावेंगी ।।११--१५।।
भ्रामयेदतिवेगेन मूलकीलकमत् परम् ।
ततोत्यन्ततमोद्रेकः प्रभवेन्नात्र संशयः ।। १६ ।।
तेनादृश्यं भवेत् व्योमयानं पश्चात् स्ववेगतः ।
विषधूमप्रकाशादीन् निश्शेषं नाशयेत् क्रमात् ।। १७ ।।
ततस्तद्दर्शनादेव शत्रूणां बुद्धिविप्लवः ।
भवेन्मेघोविनाशं च तत्क्षणान्नात्र संशयः ।। १८ ।।
पञ्चवातस्कन्धनालयन्त्र ] [ १५७
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन तमोयन्त्रं यथाविधि ।
विमानवायव्यकेन्द्रे स्थापयेत् सुदृढं यथा ॥ १६ ॥ इत्यादि ॥
फिर अतिवेग से मूलकील को घुमावे तो अत्यन्तवेग से निस्संशय अन्धकार का उत्थान हो
जावे । उससे विमान अदृश्य हो जावे फिर अपने वेग से विषधूम प्रकाश आदि को क्रम से सर्वथा नष्ट
करदे । फिर उसके दर्शन से ही शत्रुओं की बुद्धि का विचलन हो जावे और धारणाशक्ति का नाश तुरन्त
हो जावे इसमें कुछ भी संशय नहीं । अतः सर्वप्रयत्न से यथाविधि तमोयन्त्र को विमान के वायव्य केन्द्र
में सुदृढ़ स्थापित करे ॥१६—१६॥
अथ पञ्चवातस्कन्धनालयन्त्र - अथ पञ्चवातस्कन्धनालयन्त्र कहते हैं—
एवमुक्त्वा तमोयन्त्रं सङ्ग्रहेण यथामति ।
पञ्चवातस्कन्धनालयन्त्रमथ प्रचक्षते ॥२०॥
वृष्ण्यादिवातावरणमण्डलानि त्रयोदश ।
पक्तिराधसकेन्द्रस्थशक्तिसम्पर्कतं क्रमात् ॥२१॥
परस्परं स्वभावेन संलग्नानि भवन्ति हि ।
तस्मान्मण्डलमध्यस्थवातयोरुभयोरपि ॥२२॥
परस्परं भवेद् युद्धं घर्षणाद्यैर्विशेषतः ।
तस्मात् तत्र प्रजायन्तेत्यन्तघोरविषात्मका ॥२३॥
शक्तय पञ्चातिवेगात् शोषिणका (शोधिएका?) द्यास्स्वभावत ।
तत्सम्पर्काद् व्योमयानविनाशो भवति क्रमात् ॥२४॥
तद्विज्ञायातिशीघ्रेण यानपश्चिमकेन्द्रके ।
पञ्चवातस्कन्धयन्त्रं सस्थापयेत् सुधी ॥२५॥
तस्माच्छो(रो?)ष्यादय पञ्च शक्तयस्तत्क्षणात् स्वतः ।
विनाशं यान्स्यत खेटयानसंरक्षणं भवेत् ॥२६॥ इति खेटविलास ॥
इस प्रकार तमोयन्त्र सङ्क्षेप से यथामति कहकर अथ पञ्चवातस्कन्ध नाल यन्त्र कहते हैं ।
वृष्णि आदि १३ वातावरण मण्डल हैं पंक्तिराधस ?-पंक्तियों के साधककेन्द्र में स्थित शक्ति के सम्पर्क
से क्रम से परस्पर स्वभाव से वे वातावरण मण्डल मिले हुए होते हैं अत मण्डल मध्यस्थ दोनों वायुओं
में भी घर्षण आदि से विशेष परस्पर युद्ध हो जावे अत' वहां घोर विषरूप पांच शोषिएक आदि
शक्तियां स्वभाव से प्रकट होजाती है उनके सम्पर्क से विमान का क्रम से नाश हो जाता है उसे जानकर
अति शीघ्र यान के पश्चिम केन्द्र में पञ्चवात स्कन्ध यन्त्र बुद्धिमान् स्थापित करे अतः शोषिण आदि
पांच शक्तियां तुरन्त स्वतः नाश को प्राप्त हो जाती हैं इससे खेटयान—विमान का संरक्षण हो जाता है ।
यह खेटविलास में कहा है—
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—यह यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में कहा है—
पञ्चवातस्कन्धनालयन्त्रस्य रचनाक्रमम् ।
यानसंरक्षणार्थाय कथ्यतेस्मान् यथाविधि ॥२७॥
"?
Look at the characters in L9:
च्छ-तो-ष्णै-क-द्व्य-ती-त-प्र-मा-णात्
Wait, look at the letters:
च्छ (ccha)
तो (to)
ष्ण (ṣṇa) with what? It has a virama? No, ष्ण with 'द्व'?
Wait! Could it be:
"क्रमाच्छतोष्णैकद्व्यतीतप्रमाणात्" -> wait, does it have 11 syllables?
च्छ-तो-ष्णै-क-द्व्य-ती-त-प्र-मा-णात्:
- छतो (2)
- ष्णैक (2)
- द्व्यतीत (3)
- प्रमाणात् (3)
Total = 2 + 2 + 3 + 3 = 10 syllables. If "शतोष्णैकद्व्यतीतप्रमाणात्":
श (1) तो (2) ष्णै (3) क (4) द्व्य (5) ती (6) त (7) प्र (8) मा (9) णात् (10).
Wait, what if the letter after क is NOT द्व्य?
Look at the image of L9 very carefully:
क्रमाच्छतोष्णैकद्व्यतीतप्रमाणात् ।
Let's look at the letters between ष्ण and प्र: - क
- द्व्य
- ती
- त
Wait, is it "कद्व
रौद्रीदर्पणयन्त्र ] [ १५६
५ नालों को संस्थापित करके पूर्वोक्त विषवायुओं के केन्द्र के सम्मुख गोल शुद्ध कील सहित दृढ़ भस्त्राओं भस्त्रामुखवाले को-॥३१-३७॥
नालानामेकैकमूले एकैकं सुदृढं यथा ।
धावर्तकीलकं सम्यक् स्थिरीकुर्याद् यथाविधि ॥३८॥
पश्चादेकं कभस्त्रास्यकीलकानतिवेगतः ।
चालयेदनुलोमेन यथाशास्त्रं पृथक् पृथक् ॥३९॥
भवेत् तस्मात् पञ्चविषशक्तीनामपकर्षणम् ।
भस्त्रिकास्ये पञ्चनालमुखेष्वत्यन्तवेगत ॥४०॥
प्रविश्याथ बहिर्यान्ति पञ्चधा विषशक्तय ।
पश्चाद् विनाशमायान्ति शो(रौ?)ष्णिकाद्यास्स्वत ॥४१॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन यन्त्रमेतद् यथाविधि ।
विमाने स्थापयेत् सम्यगिति शास्त्रविनिर्णय ॥४२॥ इत्यादि ॥
नालों में से एक एक नाल को एक एक मूल में घूमनेवाली कीलों के साथ स्थिर करे, पश्चात् एक एक भस्त्रास्य की कीलों को अतिवेग से सीधे यथाशास्त्र पृथक् पृथक् चलावे तो उससे पाँच विष-
शक्तियों का खींचना हो जावे, पांच विषशक्तियां भस्त्रिकास्यों से अत्यन्त वेग से पञ्चनालमुखों में प्रविष्ट होकर बाहिर चली जाती हैं। फिर शौष्णिक आदि विनाश को स्वतः प्राप्त हो जाती हैं अतः
समस्त प्रयत्न से इस यन्त्र को विमान में सम्यक् संस्थापित करें यह शास्त्र का निर्णय है ॥३८-४२॥
अथ रौद्रीदर्पणयन्त्रनिर्णय —अब रौद्रीदर्पण यन्त्र का निर्णय देते हैं—
एवमुक्त्वा पञ्चवातस्कन्धनालमतं परम् ।
रौद्रोदर्पणयन्त्रस्वरूपमथ निरूप्यते ॥ ४३ ॥
इस प्रकार पञ्चवातस्कन्धनालयन्त्र को कहकर इस से आगे रौद्रीदर्पण यन्त्र का स्वरूप अब निरूपित किया जाता है ॥४३॥
तदुक्तं क्रियासारे-वह कहा है क्रियासार ग्रन्थ में—
ईषादण्डस्य नैऋत्यकेन्द्रमार्गो विशेषत ।
ये सूर्यकिरणास्सम्यक् प्रसरन्ति विशेषत ॥ ४४ ॥
ते सर्वे ऋतुभेदेन शक्त्यावर्ते पतन्ति हि ।
तत्तत्यशक्तिसंयोगात् किरणेषु विशेषत ॥ ४५ ॥
आविर्भवन्ति वेगेन ज्वालास्त(तृ स?)वंविदाहका ।
तज्ज्वालासन्धिकेन्द्रेषु विमानस्सञ्चरेद् यदि ॥ ४६ ॥
तत्क्षणादेव तद्गोद् भस्मीभवति नान्यथा ।
अतस्तत्परिहाराय रौद्रीदर्पणयन्त्रकम् ॥ ४७ ॥
१६० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
यानस्याथ केन्द्रदेशे स्थापयेद् विधिवत् क्रमात् ।
तस्माद् विमानसंरक्षण भवेदिति निर्णयतम् ॥ ४८ ॥ इत्यादि ।
ईषादण्ड-पृथिवी और सूर्य की दृष्ट समान गति रेखा के निऋतिकोणवाले केन्द्र मागों से
बिशेषतः जो सूर्यकिरण सम्यक् प्रसार करती हैं वे सब ऋतु के भेद से शक्त्यावर्त-शक्ति के घुमेर में
गिरती हैं वहां के शक्तिसंयोग से किरणों में विशेषत. वेग से सर्वविदाहक ज्वालाएं प्रकट हो जाती हैं
उन ज्वालाओं के सन्धिकेन्द्रों में यदि विमान सञ्चार करे तो तुरन्त उनके वेग से भस्म हो जावे अत
उसके परिहार के लिये रौद्रीदर्पणयन्त्र विमान के नीचले केन्द्रदेश में विधिवत् स्थापित करे उस से
विमान का संरक्षण हो जावे यह निर्णय है ॥ ४४-४८ ॥
यन्त्रसर्वस्वेऽपि - यन्त्रसर्वस्व में भी कहा है-
वसन्तग्रीष्मयोर्मध्यरेखाप्रान्तेषु भूरिश ।
आवृत्तशक्तिष्वंशूना प्रवेशो भवति यदा ॥ ४६ ॥
तदा सञ्जायते कोलाहलज्वालावती स्वत ।
आकाशपञ्चमकक्ष्ये विमानस्सञ्चरेद् यदि ॥ ५० ॥
तत्र कोलाहलज्वालावेगाद् भस्मीकृत भवेत् ।
तस्मात् तत्परिहाराय रौद्रीदर्पणयन्त्रकम् ॥ ५१ ॥
विमाने स्थापयेत् तस्मात् तत्स्वरूपं विविच्यते ।
यन्त्रकोलाहलज्वालाविनाशार्थं यथाविधि ॥ ५२ ॥
कुर्याद् रौद्रीदर्पणेनैवेति शास्त्रविनिर्णय ।
अन्यथा यदि कुर्वीत प्रमादस्स्यान्न संशय ॥ ५३ ॥
वसन्त और ग्रीष्म की मध्यरेखा के सिरों में अत्यधिक घूमती हुई शक्तियों में जब किरणों का
प्रवेश होता है तो कोलाहल-गूंजनेवाली ज्वालामाला स्वत प्रकट हो जाती है, आकाश के पांचवें स्तर
में विमान यदि सञ्चार कर रहा हो तो वहां कोलाहल ज्वाला के वेग से भस्म हो जावे अत उसके परि-
हार के लिये रौद्रीदर्पण यन्त्र विमान में स्थापित करे अत उसके स्वरूप का विवेचन करते हैं। कोलाहल
ज्वालाके विनाशार्थ यथाविधि यन्त्र रौद्रीदर्पण से ही करे ऐसा शास्त्र का निर्णय है अन्यथा करे तो हानि
हो इसमें संशय नहीं ॥ ४६-५३ ॥
लोहासव चुम्बकवीरटङ्कणान् पञ्चानन शून्यमयूरसज्जकान् ।
माध्वीकचञ्चुमुखसूर्यवर्चुलान् रुक्मालिकाशार्करपञ्चपादुकांन् ॥ ५४ ॥
एतान् त्रिसंशोधितशुद्धवस्तून संगृह्य सन्तोल्य समाशत क्रमात् ।
पद्मास्यमूषामुखमध्यरन्ध्रे सम्पूर्य विश्वोदरकुण्डमध्ये ॥ ५५ ॥
संस्थाप्य पश्चाद् विंशतोष्णकक्ष्यप्रमाणतो भस्त्रामुखाद् यथाविधि ।
सगाल्य नेत्रान्तमत पर शनैस्सङ्गृह्य तद्यन्त्रमुखान्तराले ॥ ५६ ॥
रौद्रीदर्पणयन्त्र ] [ १६१
सम्पूरित चेत् सुदृढ सुसूक्ष्म वृष्ण विशुद्ध ज्वलान्तक लघु ।
अन्तःप्रकाश विमल मनोहर भवेद् रौद्रीदर्पणमद्भुत हि ॥ ५७ ॥
लोहास्त्र-लोहद्राव या लोहे का मार, चुम्बक, वोर-लोहा, सुहागा, पञ्चाननलोहा, शून्य-अभ्रक,
मयूरसञ्जक ?, माक्षीक-मधुद्राव, चञ्चू-चञ्चु-रक्तएरण्ड, मुख-वडइल, सौञ्चल नमक, रुक्म-स्वर्ण
या लोहा, अलिक-भ्रमर ?, शार्क-लोध, पद्म-कड़वा परवल, पादुक ? । तीन बार शोधी हुई इन
वस्तुओं को लेकर समान तोलकर पद्मास्य बोतल के मुखमध्यछिद्र में भरकर विश्वोदर कुण्ड के मध्य में
रख कर पश्चात् २० या १२० दर्जे माप की भस्त्रामुख से यथाविधि नेत्रपर्यन्त गलाकर धीरे से लेकर
उस यन्त्रमुख के अन्दर यदि भर दे तो सुदृढ अति सूक्ष्म वृष्ण विशुद्ध ज्वलनान्तक हल्का अन्दर प्रकाश
मान विमल मनोहर अद्भुत रौद्रीदर्पण हो जावे ॥ ५४-५७ ॥
एतद्रौद्रीदर्पणेन सुसूक्ष्मेण यथाविधि ।
वितस्तिषोडशायाम पीठ कुर्यात् सुवर्तुलम् ॥ ५८ ॥
यावद्वानप्रमाणस्यात् तावन्मात्र यथाविधि ।
पञ्चविंशत्यङ्गुलप्रमाणगात्र दृढ लघु ॥ ५९ ॥
कृत्वा दण्ड पीठमध्यकेन्द्रे संस्थापयेद् दृढम् ।
सङ्कोचनप्रसारणकीलकद्वयमद्भुतम् ॥ ६० ॥
अनुलोमविलोमाभ्या दण्डाग्रे स्थापयेत् क्रमात् ।
तदधश्शलाकावरणचक्र सन्धारयेत् क्रमात् ॥ ६१ ॥
यथा यानस्यावरक समग्र स्यात् तथैव हि ।
शलाकाद्वयमध्ये पञ्चाशदङ्गु लमन्तरम् ॥ ६२ ॥
कृत्वा शलाकान् परितश्चक्रे सन्धारयेत् क्रमात् ।
अकसीद्रोणसौरम्भभण्टिकातैलसंस्कृतम् ॥ ६३ ॥
इस अति सूक्ष्म रौद्रीदर्पण से यथाविधि १६ बालिश्त लम्बा गोल पीठ विमान के प्रमाणा-
नुसार बनावे, २५ अङ्गुल मोटा बनाकर दण्ड को पीठ के मध्य केन्द्र में संस्थापित करे, फिर सङ्कोचन
और प्रसारण के साधनभूत दो पेंचों को सीधे और उलटे ढंग से दण्ड के अग्रभाग पर लगावे । उसके
नीचे शलाकाओं को घेरने ढकने वाला चक्र लगावे जिस से समग्र विमान का आवरक-ढकने वाला हो
जावे । दो शलाकाओं के मध्य में १५ अङ्गुल का अन्तर दे कर शलाकाओं को सब ओर चक्र में लगावे
"अकसी-अलसी द्रोण-हरिचन्दन या द्रोणपुष्पी ? सौरम्भ-सौरभ-राल या शिलारस ? भण्टिका-
मजीठ" इन के तैल से संस्कृत-शुद्ध शोभायमान बनाया हुआ-॥ ५८-६३ ॥
रौद्रीदर्पणसंसिद्धपत्रायण्य पृथक् पृथक् ।
शलाकोपरि सन्धार्य बध्नीयात् सूक्ष्मकीलकै ॥ ६४ ॥
रौद्रीदर्पणसंसिद्धमणीन् पञ्चमुखान् तथा ।
सन्धारयेत् तैलशुद्धान् शलाकाग्रे पृथक् पृथक् ॥६५॥
१६२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र ]
तथैव पद्मपत्राकारपत्राणि यथाक्रमम् ।
शलाकाद्वयमध्येष्टादश संख्याप्रकारतः । ॥ ६६ ॥
भ्रामणीकीलकैर्युक्तान्यथाशास्त्रं नियोजयेत् ।
छत्रीवद्वर्तुलाकारं कुर्याद् यन्त्रं सुशोभनम् ॥ ६७ ॥
तत्र पत्रण्यथ दण्डाग्रे बध्नीयात् कीलकाष्टकैः ।
विमानाभिमुखं यावज्ज्वालाशक्तिर्भवेत् स्वतः ॥ ६८ ॥
तद्विज्ञायादर्शयन्त्रसामग्र्याद्यैर्विचक्षणः ।
तावत् प्रसारणीकीलं भ्रामयेदतिशीघ्रतः ॥ ६९ ॥
छत्रीवत् प्रभवेत् तेन यानस्यावरकं क्रमात् ।
आमुलाग्रं स्वभावेन यु(या ?)गपत्सर्वतोमुखम् ॥ ७० ॥
रौद्रीदर्पण से सिद्ध यन्त्र पृथक् पृथक् शलाकाओं के ऊपर लगा कर सूक्ष्म कीलों से बांध दे,
रौद्रीदर्पण से सिद्ध किये तैल से शुद्ध पद्ममुख मणियों को शलाका के अग्रभाग में पृथक् पृथक् लगावे,
तथा पद्माकार पत्रों को यथाक्रम दो शलाकाओं के मध्य में १८ संख्या की भ्रामणी कीलों से युक्त यथा-
शास्त्र लगावे, छत्री के समान गोलाकार सुन्दर यन्त्र बनावे वहां दण्ड के अग्रभाग में ८ कीलों से पत्रों को
बांधे जब तक विमान के सम्मुख ज्वालाशक्ति स्वतः होवे उसे आदर्शयन्त्र सामग्री आदि से बुद्धिमान्
जान कर-ज्ञान न ले तब तक प्रसारणी कील अति शीघ्र घुमावे, विमान का आवरक-आवरण करने-
वाला रक्षासाधन यन्त्र छत्री की भांति मूल से अग्र भाग तक स्वभाव से एक साथ-तुरन्त सर्वत्र फैल
जावे ॥ ६४-७० ॥
पद्मपत्रैश्च मणिभिस्तथावरणपत्रकैः ।
पूर्वोक्तशक्तिनिशेष तत्क्षणान्नाशमेधते ॥ ७१ ॥
पश्चात् सम्भ्रामयेत् सङ्कोचनकीलबिनिबन्धनम् ।
तेन सङ्कुचितं यानावरकं तत्क्षणाद् भवेत् ॥ ७२ ॥
सुरक्षितं भवेद् व्योमयानं पश्चात् स्वभावतः ।
तस्मादेतद्यन्त्रमत्र सङ्ग्रहेण निरूपितम् ॥ ७३ ॥ इत्यादि ॥
पद्मपत्रों मणियों और आवरणपत्रों से पूर्वोक्त शक्ति तुरन्त सर्वथा नाश को प्राप्त हो जाती है,
पश्चात् सङ्कोच कराने वाले पेंच के बन्धन को घुमावे उससे विमान का आवरक तुरन्त संकुचित हो जावे,
फिर विमान स्वभावतः सुरक्षित हो जावे अतः यह यन्त्र यहां संक्षेप से निरूपित किया है ॥ ७१-७३ ॥
अथ वातस्कन्धनालकीलकयन्त्रः-अथ वातस्कन्धनालकीलक यन्त्र कहते हैं-
एवमुक्त्वा सङ्ग्रहेण रौद्रीदर्पणयन्त्रकम् ।
अथेदानीं वातस्कन्धनालयन्त्रं विविच्यते ॥ ७४ ॥
इस प्रकार रौद्रीदर्पण यन्त्र संक्षेप से कह कर अब इस समय वातस्कन्धनाल यन्त्र का विवेचन
करते हैं ॥ ७४ ॥
वातस्कम्भनालकीलक्यन्त्र ] [ १६३
तदुक्तं गतिनिर्णयाध्याये – वह कहा है गतिनिर्णय के अध्याय में—
आवहादिमहावातमण्डलेषु स्वभावत ।
द्वाविशदुत्तरशतप्रभेदेन यथाक्रमम् ॥ ७५ ॥
पवमानगतिश्चित्रविचित्रत्वेन वर्णिता ।
तेष्वेकोनाशीतितमगतिर्वातायनाभिधा ॥ ७६ ॥
तद्गतिस्स्याद् विशेषेण वायौग्रीष्मऋतौ क्रमात् ।
चतुर्यकक्ष्यगगने यानसञ्चरते यदा ॥ ७७ ॥
तदा वातायनगतिवेगाद् बायोविशेषत ।
विमानस्य भवेद् वक्रगतिस्तस्मात् परस्परम् ॥ ७८ ॥
यन्त्रूणा प्रभवेत् कष्टमत्यन्तं सुदुस्सहं क्रमात् ।
अतस्तत्परिहाराय यानाथ. पार्श्वकेन्द्रके ॥ ७६ ॥
वातस्तम्भनालकीलकयन्त्र स्थापयेत् सुधी ।
तेनापायनिवृत्तिस्स्याद् यन्त्रृणा सुखद भवेत् ॥ ८० ॥ इत्यादि ॥
आवह आदि महावायुमण्डलों में स्वभावतः १२२ भेद से यथाक्रम वायुगति चित्रविचित्ररूप
से वर्णन की है, उन में ७६वीं गति वातायन नामक है, उस वायु की गतिविशेष करके ग्रीष्मऋतु में क्रम
से हो तो चतुर्थ कक्ष्यावाले गगनमण्डल में विमान सञ्चार करता है । तब वातायनगति वेगसे वायु का
विशेषत विमान को परस्पर वक्रगति हो जावे उस से चालक यात्रियों को अत्यन्त दुःसह कष्ट हो जावे,
अत उसके हटाने के लिये विमान के नीचे पार्श्वकेन्द्र में बुद्धिमान् जन वातस्तम्भनालकील यन्त्र स्थापित
करे उस से अनिष्ट की निवृत्ति तथा यात्रियों को सुखद हो ॥ ७५–८० ॥
उक्तं हि यन्त्रसर्वस्वे—कहा है यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में—
विमानवक्रगमनपरिहाराय केवलम् ।
वातस्कन्धनालकीलक यन्त्रमथ प्रचक्षते ॥ ८१ ॥
वातस्तम्भनलोहेनैव तद्यन्त्र प्रकल्पयेत् ।
अन्यथा निष्फलमिति प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ८२ ॥
विमान के वक्रगमन के दूर करने को वातस्कन्धनालकीलयन्त्र अब कहते हैं । वातस्तम्भन लोहे
से ही उस यन्त्र को बनावे अन्यथा निष्फल है ऐसा मनीषी (Thinker) कहते हैं ॥ ८१–८२ ॥
तदुक्तं लोहतत्त्वप्रकरणे—वह कहा है लोहतत्त्व प्रकरण में—
विशावर सुवर्चल मयूरलोहपञ्चकम् ।
भ्रु०शुण्डिक सुरक्षिक वराहकान्तिलोहकम् ॥
विरोहिण कुबेरक मुरारिकान्घ्रि रञ्जजम् ।
सुहसनेत्रजः दल वरालिक मुनालिकम् ॥ ८३ ॥
१६४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
सुशोधितान् यथाविधि यथाप्रतोलितान् समं समम् ।
मत्स्यमूषमध्यमास्यपूरितान् समग्रकम् ॥
संस्थाप्य माधिमारुयकुण्डमध्ये दृढ यथा ।
विजृम्भणाख्यभस्त्रिकामुखेन सन्धमनेत् क्रमात् ॥८४॥
विगालय चाथ तद्रस सुयन्त्रमध्यनालके ।
कटुष्णत प्रपूरयेच्छनैश्शनैर्यथाक्रमम् ॥
एवकृतेतिसूक्ष्मरूपक विशुद्धमच्युतम् ।
सुवातस्तम्भलाहक भवेत् सुवर्चल लघु ॥ ८५ ॥ इत्यादि ॥
विशावर ?-विशाकर-दन्ती, सुवर्चल-सौवर्चलनमक, मयूर-गन्धक,-लोहपञ्चक-लोहेपञ्चप्रकार के,-मुसु-
ण्डिक ?, सुरञ्जिक-सुरञ्जी श्वेतकाकमाची या रञ्जक-हिङ्गुल-शिंगरक, वराहांघ्रि लोहा ?, विरोहिण-
रोहिण-कायफल, कुबेरक-इन्द्रवृक्ष, मुरारिकांघ्रिलोहा ? सुहृ'सनेत्रक ?, दल-तेजपत्र ?, वरालिका-वरा-
टिका-कौडी, मृणालिक-मृणालिक-मृणाल-सुगन्धतृण या अश्वगन्ध । सुशोधित समान भाग तोलकर
मत्स्यबोतल के मध्यमुख में भरकर माधिम ? माध्यमिकारूय कुण्डमध्य में रखकर विजृम्भणाख्य भास्त्रका
मुख से धमन करे गलाकर रस को यन्त्रमध्यनाल में थोड़ा गरम धीरे धीरे भर दे ऐसा करने पर सूक्ष्म
शुद्ध अटूट वातस्तम्भलोहा सुन्दर बन जावे ॥ ८३-८५ ॥
वितस्तीना पञ्चदशप्रमाणेन सुवर्तुलम् ।
नालष्टक विस्तृतस्यामादौ कृत्वा यथाविधि ॥ ८६ ॥
अन्तश्छिद्र प्रमाणेन वितस्तोना दश स्मृतम् ।
विमानमूलमध्याग्रप्रदेशेषु यथाक्रमम् ॥ ८७ ॥
पूर्वं पश्चिमताश्चैव दक्षिणोत्तरतस्तथा ।
सन्धारयेल्लोहकृतपट्टिकान् भारवर्जितान् ॥ ८८ ॥
पूर्वोक्तनालान् सङ्गृह्य पट्टिकासु यथाक्रमम् ।
नालास्यानामाभिमुख्यं चतुर्दिक्षु यथा भवेत् ॥ ८९ ॥
तथा सन्धारयित्वाथबध्नीयात् कोलकादिभि ।
पश्चादेकैकनालास्ये वातपामणिमुत्तमम् ॥ ९० ॥
१५ बालिश्त माप से गोलाकार ६ नालें बड़े मुखवाली प्रथम यथाविधि करके अन्दर जिनके
छिद्र हो १० बालिश्त कहे हैं, विमान के मूल मध्य और अग्रप्रदेश में यथाक्रम पूर्व पश्चिम की ओर
और दक्षिण उत्तर की ओर भी लोहे से बनी भाररहित पट्टिकाओं को लगावे, नालों के मुखों का साम्मुख्य
चारों दिशाओं में जिस से हो वैसे लगा कर कीलों से बान्धे पश्चात् एक एक नाल के मुख में उत्तम
वातपामणि- ॥ ८६-९० ॥
एकैक योजयेत् तन्त्रीमूलकात् सुदृढ यथा ।
वातायनीवातवेगापकर्षणपटून् तत. ॥ ९१ ॥
वातस्कन्धनालकील यन्त्र ] [ १६५
पताकान् रोलिकपटनिर्मितान् नालसन्धिषु ;
सन्धारयेत् सूत्रबद्धान् पञ्चसंस्कारसंस्कृतान् ॥ ६२ ॥
वातस्तम्भलोहकृतचक्रान् तत्तद्ध्वजाग्रत ।
एकैकं स्थापयेत् पश्चात् तन्त्री सर्वत्र योजयेत् ॥ ६३ ॥
वातायनीवातवेगप्रवाहोत्यन्तवेगत ।
पताकाभिमुखो भूत्वा व्याप्यते सर्वत क्रमात् ॥ ६४ ॥
तद्वे गमपहृत्यथ पताकाश (न्? श)ब्दपूर्वकम् ।
प्रचलन्त्यतिवेगेन सर्वतोमुलत क्रमात् ॥ ६५ ॥
एक एक तार के मूल से दृढ़ लगावे फिर वातायनी नामक वायु के वेग को खींचनेवाले पञ्च-
संस्कारयुक्त रोलिक ?-तौलिक रूई से बने फूलने वाले थैलों पताकाओं को नालों की सन्धियों में सूत्रों से
बान्धकर लगावे । वातस्तम्भ लोहे से बने चक्रों को उस उस ध्वजा के अग्र भाग में एक एक को स्थापित
करे फिर सर्वत्र तार लगावे । वातायनीनामक वायु के वेग का प्रवाह अत्यन्त वेग से पताका के सामने
होकर सर्वत्र व्याप जाता है । उस के वेग को हटाकर पताकाए शब्दपूर्वक सब ओर चलती हैं ॥६१-६५॥
पश्चात् तन्मूलकीलस्थचक्राण्यपि यथाक्रमम् ।
प्रतिवेगेन भ्राम्यन्ति तद्वे गान्मणयस्तथा ॥ ६६ ॥
वातायनीवातवेग पताका. प्रथम क्रमात् ।
समाहरन्ति वेगेन पश्चाच्चक्राणि वेगत ॥ ६७ ॥
समाहृत्य प्रेषयन्ति मणीन् प्रति विशेषत ।
मणयस्त समाकृष्टा नालास्ये योजयन्ति हि ॥ ६८ ॥
तन्नालान्तश्छिद्रमुखादागत्यान्यमुखान्तरात् ।
बाह्याकाशेथ विलय यान्ति नास्त्यत्र सशय ॥ ६६ ॥
पश्चादृजुगतिस्तेन विमानस्य भवेत् क्रमात् ॥१००॥
अतो वातस्कन्धनालकीयन्त्र यथाविधि ।
विमाने स्थापयेत् सम्यगिति शास्त्रविनिर्णय ॥१०१॥
फिर उनके मूलों की कीलों में स्थित चक्र भी यथाक्रम अतिवेग से घूमते हैं उनके वेग से
मणियां भी घूमती हैं । प्रथम पताकाएं वातायनीनामक वायु के वेग को शीघ्र लेती हैं पश्चात् चक्रों को
वेग से लेकर मणियों के प्रति विशेषत प्रेरित करते हैं, मणियां आकृष्ट हुईं उसे नालों के मुख में युक्त
करती हैं, उन नालों के भीतरी छिद्रमुख से आकर अन्य मुख के अन्दर से बाहरी आकाश में विलय
को प्राप्त हो जाती है इसमें संशय नहीं पश्चात् उस से विमान की सरलगति क्रम से हो जाती है, अत
वातस्कन्धनाल के कीलयन्त्र को यथाविधि विमान में सम्यक् स्थापित करे यह शास्त्र का निर्णय
है ॥ ६६-१०१ ॥
अथ विशुङ्र्पणयन्त्रः—अब विशुङ्र्पण यन्त्र कहते हैं—
? No, just an apostrophe/single quote: ' उक्तं हि सौदामिनीकलायाम्orउक्तं हि. It's just an ink artifact or apostrophe. Let's write उक्तं हि`.
-
Verse 103-107:
तडित्सङ्कलनं वर्ष ऋतौ मेघेषु पञ्चधा ।
वारुण्यग्निमुखादण्डमहारावशिका इति ॥१०३॥
तेषु वारुण्यग्निमुखविद्युतावतिवेगत ।
मुहुर्मुहु प्रचलतस्स्वतो मेघेषु वार्षिके ॥१०४॥
पश्चाद् यानस्थरौद्रादिदर्पणैस्तावभावपि ।
आकृष्येते स्वभावेन पश्चात् सम्मेलनं तयो. ॥१०५॥
परस्पर भवेत् तस्मान्महानग्नि प्रजायते ।
तेन दग्धो भवेद् व्योमयानस्तत्क्षणात् क्रमात् ॥१०६॥
अतस्तत्परिहारार्थं मुखदक्षिणकेन्द्रयो ।
विमाने स्थापयेद् विद्युद्यन्त्र सम्यग्यथाविधि ॥१०७॥ इत्यादि ॥ -
Hindi translation:
`वर्षा ऋतु में मेघों में विद्युत् का सङ्कलन पांच प्रकार का होता है, जो कि वारुणि
विद्युद्दर्पणयन्त्र ] [ १६७
कुरङ्ग-अकर्करा, पञ्चास्य ?-लोहभेद ?, विरञ्चि ?, शोणज-शोणसम्भव-पिप्पलीमूल या शोण-
सिन्दूर, सुशर्कर-सुन्दर रेत, स्फटिक-स्फटिकमणि-बिल्लौर, कुट्म ?-कुट-शिलाचूर्ण, नीरज-नीरज-मोती,
सुएहालिक ?-हस्तीशुण्डावृक्ष ?, पारद-पारा, क्षार-सज्जी क्षार, टङ्कण-सुहागा, विडौज-विड़लवण
का सत्त्व, पिङ्ग ?-हरिताल, अभ्र-नीलाथोथा, वराटिका-कौड़ी, कर्बुर-स्वर्ण ?, या आमाहल्दी या गन्ध-
पलाशी' । १०, १ ?, ४, ३, १२, २, ३, ७, ११, ७ ?, १४, ३, २२, १८, ५, ११, भाग, क्रमशः शोधित-
।।१०६-११०।।
सङ्गृह्य सन्तोल्य पृथक् पृथक् क्रमात् सम्पूर्य पञ्चास्यकमूषमध्ये ।
विश्वोदरव्यासटिकान्तरे दृढम् । विन्यस्य पञ्चाननभस्त्रिकामुखात् ।।
[L
१६८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
तडिद्दर्पण से यह यन्त्र यथाविधि करना चाहिए, अन्यथा करे तो निश्चित विनाश होजाता
है । २० बालिश्त लम्बा एक बालिश्त ऊंचा चौरस या गोल पीठ बनावे पूर्व-पश्चिम से और दक्षिणोत्तर
अर्धाकृतिवाले दर्पण से बनाई चार नालों को तथा तारमय पांच मुखवाले पिञ्जरे को दृढ स्थापित करे
एकैकमुख केन्द्र में शक्तिकीलों को लगावे एक एक कील स्थान में विद्युद्दर्पण से बने घड़े लोटे जैसे यन्त्रों
को तथा सात अर्रों वाले नालयुक्त आठ मुखवाले दश कोणवाले विद्युद्दर्पणकृत गोपुर—गोल गवाक्षचक्र
यन्त्र दृढ स्थापित करे, अतः कीलो चलाने से गोपुर स्वयं घूमता है ॥११५-१२०॥
तद्वेगो विद्युदुत्पन्नवह्निवेग समग्रत ।
समाकृष्यातिवेगेन स्वयं पिबति तत्क्षणात् ॥१२१॥
पश्चान्मार्तण्डकिरणशक्तयस्स्वीयतेजसा ।
तच्छक्तिं च समाहृत्य गोपुरस्था सुदारुणाम् ॥१२२॥
महामाण्डलिकाख्ये वातमण्डलेम्बरान्तरे ।
तत्क्षणात् प्रविलाप्यन्ति तद्विनाशो भवेत् तत ॥१२३॥
पश्चाद्धिमवदत्यन्त शीतल प्रभवेत् क्रमात् ।
तेन यानस्थयन्तॄणा भवेदाप्यायन तत ॥१२४॥
सुरक्षित भवेद् व्योमयान चापि विशेषत ।
तस्मात् सस्थापयेद् व्योमयाने शास्त्रविधानत. ॥१२५॥
एतद् विद्युद्दर्पणाख्ययन्त्रमद्भुतमव्ययम् ।
नोचेद विमाननाशस्स्यादप्रमादी भवेद्यत ॥१२६॥ इत्यादि ॥
उस 'गोपुर यन्त्र' का वेग विद्युत् से उत्पन्न अग्नि के वेग को पूर्णरूप से अति वेग से खींच
कर स्वयं पी लेता है पश्चात् सूर्यकिरणशक्तियां अपने तेज से गोपुरस्थ दारुण उस शक्ति को लेकर
महामाण्डलिक वातमण्डल में आकाश के अन्दर तुरन्त प्रविलीन कर देती है पुन उस शक्ति का विनाश
हो जाता है । पश्चात् वह हिम (बर्फ) की भांति अत्यन्त शीतल हो जावे, उससे विमान यान में बैठे
चालक यात्रियों का प्रफुल्लितत्व—सन्तोष सुख हो जावे और विमान भी सुरक्षित हो जावे । अतः विमान
में शास्त्र-विधि से इस अद्भुत स्थिर विद्युद्दर्पण नामक यन्त्र को संस्थापित करे नहीं तो विमान का
नाश हो जावे अतः इस विषय में अप्रमादी होवे—प्रमादरहित रहे ॥१२१-१२६॥
अथ शब्दकेन्द्रमुखयन्त्रः-अब शब्दकेन्द्रमुख यन्त्र कहते हैं—
एवमुक्त्वा सग्रहेण विद्युद्दर्पणायन्त्रकम् ।
अथेदानी शब्दकेन्द्रमुखयन्त्र प्रचक्षते ॥१२७॥
इस प्रकार संक्षेप से विद्युद्दर्पणयन्त्र कहकर अब शब्दकेन्द्रमुखयन्त्र कहते हैं ॥१२७॥
तदुक्त क्रियासारे—यह क्रियासार में कहा है—
शब्दोत्पत्तिस्थानभेदाच्छब्दकेन्द्रा इतीरिता ।
तेभ्य प्रसारण यत् स्याच्छब्दादीना दिशप्रभेदत ॥१२८॥
प्रविलाप्यन्ति आर्षप्रयोग ।
शब्दकेन्द्रमुखयन्त्र ] [ १६६
तदेव तच्छब्दकेन्द्रमुखस्थानमितीयते ।
तत्रत्यशब्दोपसंहारार्थं तस्मिन् प्रतिष्ठितम् ॥१२६॥
यन्त्र यत्तच्छब्दकेन्द्रमुखयन्त्रमितीरितम् ।
चतुरुत्तरत्रिशतशब्दभेदेषु यथाक्रमम् ॥१३०॥
वारुणीवाताशनीनां शब्दास्तीव्रतरास्स्मृता ।
आकाशस्याष्टमे कक्ष्ये एतच्छब्दयन्त्र क्रमात् ॥१३१॥
एकीभूय स्वभावेन माघफाल्गुनमासयो ।
भवेन्महाघनरवस्तीक्ष्णश्श्रोत्रविदारक ॥१३२॥
तस्य श्रवणमात्रेण बाधिर्यं यन्तॄणां भवेत् ।
अतस्तत्परिहाराय शब्दकेन्द्रमुखाभिधम् ॥१३३॥
यन्त्र संस्थापयेद् यानवामभागे यथाविधि । इत्यादि ॥
शब्द की उत्पत्ति के स्थानभेद शब्दकेन्द्र कहे गए हैं, उनसे वहां से दिशाभेद से शब्द
आदि का प्रसारण—फैलाव जो होता है वह ही शब्द केन्द्रमुख स्थान कहा जाता है । वहां के शब्दोप-
संहारार्थ उसमें स्थिर हुआ यन्त्र जो है वह शब्द केन्द्रमुखयन्त्र कहा जाता है । ३०४ शब्दभेदों में यथा-
क्रम मेघगर्ज, वायु, विद्युत् की कड़क के शब्द तीव्र कहे हैं, आकाश के आठवें स्तर में यह शब्दयन्त्र
स्वभाव से मिलकर यहां घन शब्द तीक्ष्ण कानों का विदारण करने वाला होता है ? उसके श्रवणमात्र
से बहिरापन यात्रियों का हो जाता है, अतः उसके प्रतीकारार्थ शब्दकेन्द्रमुखनामक यन्त्र यथाविधि
विमान के वामभाग में संस्थापित करे ॥१२८-१३३॥
महाघनरवमुक्तं शब्दनिबन्धने--महाघनरव कहा है शब्दनिबन्धन ग्रन्थ में—
बिन्दुवाताग्न्यम्बराणां क्रमात् साङ्केतकास्स्मृताः ॥ १३४ ॥
बिन्दु—अणु या जलकण—जलधूम—अभ्र, वायु, अग्नि, गगनमण्डल के साङ्केत—नाम
सङ्केत क्रम से कहे हैं ॥ १३४॥
तदुक्तं नामार्थकल्पसूत्रे--वह कहा है नामार्थकल्पसूत्र ग्रन्थ में—
अथ शब्दस्वरूपं व्याख्यास्यामो*शब्दविसर्गाणां सम्मेलननाच्छब्द इत्याचक्षते ।
तत्र शकारो बिन्दुर्बकारोवह्निर्दकारो वायुर्विसर्गश्चाकाश इति निर्णिता भवन्ति॥
स्थावरे जङ्गमे व एतेषां यथाभाग यत्र यत्र शक्तयस्सम्मिलिता भवन्ति तत्र
तत्र चतुरुत्तरत्रिशतशब्दभेदा प्रभवन्ति । चतुरुत्तरत्रिशतशब्दा इति हि
ब्राह्मणम्† ॥
चतुरुत्तरत्रिशतशब्दानां नामनिर्णयं ।
यथोक्तं घुण्डिनायेन सर्वशब्दनिबन्धने ॥ १३५ ॥
- एतादृश स्वल्पपाठ आर्षो बहुत्रानोपलभ्यते ।
† लुप्तब्राह्मणम् ।
१७० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
तस्मात् सङ्गृह्य नामानि प्रसङ्गत्यात्र कानिचित् ।
स्फोटादिमहाघनरवान्तान्यत्र प्रकीर्त्यन्ते ॥ १३६ ॥
स्फोटा रवोत्यन्तसूक्ष्मो मन्दोतिमन्दक ।
प्रतितीव्रो तीव्रतरो मध्यश्चातिमध्यम ॥ १३७ ॥
महारवो घनरवो महाघनरवस्तथा ॥ इत्यादि ॥
अब शब्द के स्वरूप का व्याख्यान करेंगे । श, ब, द, बिसर्ग ( : ) के मेल से 'शब्द' कहते
हैं । उनमें 'श' बिन्दु - अणु - जलकण - अभ्र, 'ब' अग्नि, 'द' वायु, विसर्ग ( : ) आकाश यह
यह निर्णय है । स्थावर में या जङ्गम में इनका यथाभाग- भागानुरूप जहा जहा शक्तिया सम्मिलित हैं
वहां वहा ३०४ शब्द भेद होते हैं, ३०४ शब्द हैं यह ब्राह्मण में भी कहा है । ३०४ शब्दों का निर्णय है ।
जैसा कि धुण्डिनाथ ने 'सर्वशब्दनिबन्धन, में कहा है । वहा से लेकर प्रसङ्गत कुछ नाम स्फोट आदि
महाघनरवपर्यन्त यहा कहे जाते हैं । वे स्फोट, रव, अत्यन्त सूक्ष्म, मन्द, अतिमन्दक, अतितीव्र, तीव्रतर,
मध्यम, अतिमध्यम, महारव, घनरव, महाघनरव हैं ॥ १३५-१३७ ॥
यन्त्रसर्वस्वेपि - यन्त्रसर्वस्व में भी कहा है-
वारुणीवाताशनीना शब्दसम्मेलनात् स्वत ।
आकाशाष्टमपरिधिकेन्द्रे त्यन्तभयावहू ॥ १३८ ॥
भवेन्महाघनरवश्श्रोत्रेन्द्रियविदारक ।
तस्मिन् यानप्रवेशस्स्याद् यदि यानस्थयन्तॄणाम् ॥ १३६ ॥
क्षणमात्रेण बाधिर्यं भवेत् तच्छब्दवेगत ।
तस्मात् तत्परिहाराय शब्दकेन्द्रमुखाभिधम् ॥ १४० ॥
व्योमयाने स्थापनाथं सग्रहेण निरूप्यते ।
आाकाशपरिधिमण्डलस्य यथाक्रमम् ॥ १४१ ॥
सप्तोत्तरत्रिशत्केन्द्रा इत्युच्यते बुधै ।
तेषु सप्ततिमात् केन्द्रात् समायात्यतिभीषणम् ॥ १४२ ॥
वारुणीशक्तिसम्भूतशब्दोत्यन्त भयावह ।
तथैवावातसम्भूतशब्दश्चात्यन्तघोषक ॥ १४३ ॥
द्वादशोत्तरत्रिशतकेन्द्रादागच्छति क्रमात् ।
तथैवाशनिशब्दश्च द्वयशीतिमकेन्द्रत ॥ १४४ ॥
एतच्छब्दत्रय सम्यग् मिलित्वाथ परस्परम् ।
भवेन्महाघनरवस्सर्व श्रोत्रविदारकः ॥ १४५ ॥
तेन यानप्रयातॄणा बाधिर्यं प्रभवेद्गत ।
एकैकशब्दकेन्द्राभिमुखतस्सुदृढ यथा ॥ १४६ ॥
‡ वचनव्यत्यय ।
शब्दकेन्द्रमुखयन्त्र ] [ १७१
सन्धारयेच्छब्दोपसंहारयन्त्रान्यथाविधि ।
तेन तच्छब्दोपसहारो भवेन्नात्र संशय ॥ १४७ ॥
वारुणी-जलधारा, वायु, विद्युतपतन के शब्दों के सम्मेलन से स्वत आकाश की आठवीं परिधि
के केन्द्र में अत्यन्त भयावह कान इन्द्रिय को फोड़ने वाला महाघनरव हो जावे-हो जाता है, उसमें
विमान का प्रवेश यदि हो जावे तो विमान में स्थित यात्रियों का उस शब्द के वेग से क्षणमात्र में बहिरा-
पन हो जावे, अत उसके परिहार के लिए शब्दकेन्द्रमुख नामक यन्त्र विमान में स्थापनार्थ संक्षेप से
निरूपित किया जाता है । आकाशपरिघिमण्डल के यथाक्रम ३०७ केन्द्र हैं ऐसा बुधजन कहते हैं, उन
केन्द्रों में ७० वें केन्द्र से अति भीषण वारुणो शक्ति-अभ्रप्रवाह शक्ति से उत्पन्न अत्यन्त भयावह शब्द
तथा वायु से उत्पन्न अत्यन्त घोष करने वाला शब्द ३१२वें केन्द्र से आता है वैसे ही विद्युत् शब्द ८२वें
केन्द्र से आता है, इस प्रकार तीनों शब्द सम्यक् मिल कर परस्पर महाघन रव शब्द कान का फोडने
वाला हो जाता है उससे विमान के यात्रियों का बहिरापन हो जावेगा एक एक शब्द केन्द्र के सामने
सुदृढ शब्दोपसहार यन्त्र यथाविधि लगावे उससे शब्द का उपसहार हो जावे-हो जावेगा, इसमें संशय
नहो ॥ १३८-१४७ ॥
अथ यन्त्रोपकरणानि-अथ यन्त्र को उपयुक्त करने वाले साधन-
जम्बाल शणकोश च क्रौञ्चिक वारिपिष्टकम् ।
गव्यारिक पञ्चनखचर्मसंशोधित तथा ॥ १४८ ॥
रुण्डाकमामिष शुण्ड वग चेति दश क्रमात् ।
सगृह्यं तान्यथाशास्त्रमादो शुद्धि प्रकल्पयेत् ॥ १४६ ॥
कपिचर्मविना सर्ववस्तुनिर्या सयन्त्रके ।
सम्पूर्य महिषीपित्ता(त्थ ?) त्पाचयेत् त्रिदिन क्रमात् ॥१५०॥
समत्वेनैव वस्तूना मेलन कारयेत् क्रमात् ।
पश्चात् सगृह्य निर्यास रक्तवर्णं सुशोभनम् ॥ १५१ ॥
लेपयेत् पञ्चनखचर्मण्यस्सप्तधा सुधी ।
कृत्वा सूर्यपुट पश्चाद् घुण्डिकन्दरसात् तया ॥ १५२ ॥
शब्दोपसहारशक्तिरेतत्सस्कारत क्रमात् ।
स्वतस्सञ्जायते सम्यक् कपिचर्मण्यथाबलम् ॥ १५३ ॥
जम्बाल-शैवाल-काई, शणकोश-मशकोश, कौञ्चिक - नाम का कृत्रिम लोहा या पद्मबीज
कमल गट्टा, वारिपिष्टक ?-वारिपर्शी-वारिपर्णी ?-जलकुम्भी, गव्यारिक ?, पञ्चनखचर्म ?-व्याघ्रचर्म शोधित
बाघ, ऊंट, रीछ, गोह, कच्छुआ के चर्म ?, रुण्डाक ?--रुण्डक- अगर काष्ठ ?, आमिष ?-दही ?,
शुण्ड ?--शुण्डा-हाथी शुण्ड-हाथी शुण्ड वृक्ष, वंग-रांगा धातु । इन १० वस्तुओं को लेकर यथाशास्त्र
आदि में शुद्धि करे, कपिचर्म-बन्दर के चाम छोड कर सब वस्तुओं को निर्यासयन्त्र-काढा बनाने
वाले यन्त्र में भर कर भैंस के पित्त-भैंस के रोचन से ३ दिन पकावे समान भाग वस्तुएं ले फिर
निर्यास-काढा लाल रंग का हो जावे उसे पञ्चनख चर्म पर लेप करे सात बार फिर सूर्यपुट-धूप देकर
१७२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
धुण्डिड कन्द ? के रस से भी सूर्यपुट-धूप देकर रखे । इस प्रकार संस्कार करने से शब्दोपसंहार शक्ति
स्वतः कपिचर्म में आ जाती है ॥ १४८-१५३ ॥
वितस्तिद्वयमायामं विस्त्ये (त ?) कोन्नतिं क्रमात् ।
बधिराख्येन लोहेन पेटिकां कारयेद् दृढम् ॥१५४॥
तन्मध्ये बधिरलोहनालद्वयमतः परम् ।
वक्रास्यं स्थापयेत् पश्चादूर्ध्वं शास्त्रमानतः ॥१५५॥
शब्दपादर्पणकृतच्छत्रिं सन्धारयेत् ततः ।
तन्मणिं च सुसंस्कृत्य तुलसीबीजतैलकैः ॥१५६॥
कपिचर्मणि सम्धार्य बल्व्याक्तात् सन्नियोजयेत् ।
दो बालिश्त लम्बा एक बालिश्त ऊंचा बधिर नामक लोहे से पेटिका-छोटा बक्स बनवाए,
उसके मध्य में बधिरलोह की दो नालें बगुले के मुखाकारवाली स्थापित करे पश्चात् शास्त्रीति से ऊपर
शब्द या दर्पण से बनी छत्री लगावे और तुलसी बीजों से संस्कृत उस मणि को भी कपिचर्म-बन्दर या
लंगूर के चर्म में रखकर लपेटकर बल्व्याक्त-गेण्डे के सींग के चेप या कांटे से युक्त करे ॥१५४-१५६॥
बल्व्याको नाम खङ्गशुल्यनिर्यास - इत्युक्तः गेण्ड के सींग का निर्यास-चेप या
पक्व काढा ।
पेटिकामध्यकेन्द्रस्थदक्षनालान्तरे दृढम् ॥१५७॥
पूर्वोक्तचर्मसहितमणिं सन्धारयेत् तथा ।
वामनाले पञ्चनखचर्ममात्रं नियोजयेत् ॥१५८॥
सूक्ष्मतन्त्रीन् सुसंयोज्य परस्परमतः परम् ।
बध्नीयात् तत्संवतस्सम्यक् सूक्ष्मकीलकशङ्कुभिः ॥१५६॥
पेटिकावरणादूर्ध्वं सिंहास्याकारतः क्रमात् ।
कृत्वा तच्चर्मणा तस्य मूलनालान्तरे तत ॥१६०॥
छिद्रं कृत्वातिसूक्ष्मेण तन्त्रीनालाद् यथाविधि ।
पेटिकान्तरनालस्थमणिं संयोजयेद् दृढम् ॥१६१॥
पेटिकस्योर्ध्वावरणाभागमाच्छाद्य बन्धयेत् ।
पेटिका के मध्यकेन्द्र में स्थित दक्ष-दक्षिण नाल के अन्दर पूर्वोक्त चर्मसहित मणि को
लगावे, वाम नाल में पञ्चनखचर्ममात्र नियुक्त करे। सूक्ष्म तारों को परस्पर लगाकर सूक्ष्मकील शंकुओं
से बान्ध दे, पेटिकावरण से उपर सिंहास्याकार से बनाकर उस चर्म से उसके मूल के अन्दर करके अति
सूक्ष्म छिद्र करके उसमें से तार की नाल से पेटिका के अन्दर नाल में स्थित मणि में संयुक्त करके
पेटिका ऊपरी आवरण भाग को ढककर बान्ध दे ॥१५७-१६१॥
बधिरलोहमुक्तं लोहतन्त्रप्रकरणे—बधिरलोहा कहा है लोहतन्त्रप्रकरण में —
† यहाँ से १६८ श्लोकपर्यन्त पाठ पूनाफोटो में अधिक मिला।
शब्दकेन्द्रमुखयन्त्र ] [ १७३
जम्भीर लगुड विरञ्चि ऋषिक मालूरपञ्चाननम् ।
लुण्टाक वरसिंहिक कुरवक सर्पास्यकुन्दावरम् ।
वाकूल मुरज मुडाङ्करटको संगृह्य सर्वं समम् ।
सम्पूर्य त्र्युटिमूषमध्यमविले कुण्डे सुसंस्थाप्य च ॥१६२॥
यन्त्रास्ये द्रुततद्रस सुरुचिर सम्पूरयेच्छीघ्रत ।
एतेन प्रभवेद् विशुद्धममलं शैत्य सुसूक्ष्म दृढम् ।
श्याम शब्दहन च भाररहित शक्त्या समाच्छादितम् ॥१६३॥
रक्तस्तम्भनपाटव घनरवे योद्धाङ्गशल्यापहम् ।
भ (ज ?) ष्मामारुतशब्दनाशनपटु सर्वव्रणोच्छेदकम् ॥१६४॥ इत्यादि ॥
जम्भीर=जम्भीरीनिम्बू, लगुड=कनेयर, विरञ्चि=असवर्ग ?, ऋषिक=सियाडिलता, मालूरु-
मालूर=कैथ या विल्व, पञ्चानन=लोहाविशेष ?, लुण्टाक=लुण्टक=शाकविशेष सम्भवत खट्टाशाकलोणी ?,
वरसिंहिक=बड़ी कटेरी, कुरवक=श्वेत आक=सफेद फूल का आख, सर्पास्य ?=सर्पाख्य ?=नागकेसर
या सर्पास्य=सर्पदन्ती ?=नागदन्ती कुन्दावर=कुन्दुरु=बाळभककोडा, वाकुल=मोलमरी बीज, मुरज-
कटहल, मुडाङ्ग=मृगाङ्क=कपूर ? या सुडङ्गण=सुगन्धवाला ?, रटक ?=रण्डक=अफलबृक्ष ? या रण्डा-
मूषकणी ? सबको समान लेकर त्र्यटिमूषमध्य-तीन पत्री-तीन परतवाली बोतल छिद्रबाले कुण्ड में रख
कर ३०० दर्जे की उष्णता से पांचमुखवाली भस्त्रामुख से गलाकर यन्त्र के मुख में पिघलारस शीघ्र भरवे
इससे विशुद्ध निर्मल शीत-ठण्डा अतिसूक्ष्म दृढ श्याम रंगवाला शब्दनाशक भाररहित शक्ति से प्रपूर्ण
रक्तस्तम्भन में कुशल-योग्य घन रण में योद्धा के अङ्गों से शल्य का निकालनेवाला भष्मावात शब्द
के नाश में योग्य सब घावों को नष्ट करनेवाला हो जाता है ॥१६२-१६४॥
पूर्वोक्तोत्यन्तभयद महाघनरवे क्रमात् ।
सिंहास्यभस्त्रिकात्पश्चात् समाकृष्यति वेगत ॥१६५॥
पेटिकान्तर्नालस्थमणी संयोजयेदथ ।
कपिचर्मस्वशक्त्या तच्छब्दमाकृष्य वेगत ॥१६६॥
निश्शब्दं कुरुते स्वस्मिन्नुपसंहृत्य तत्क्षणात् ।
तेन यानस्थयन्त्राणामत्यन्तसुखदं भवेत् ॥१६७॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन शब्दकेन्द्रमुखभिधम् ।
यन्त्रं संस्थापयेद् व्योमयाने सम्यग्यथाविधि ॥१६८॥ इत्यादि ॥
पूर्वोक्त अत्यन्त भय देनेवाले महाघनरव को क्रम से अतिवेग से सिंहास्य भस्त्रिका से अतिवेग
से खींचकर पेटिका के अन्दर नाल में स्थित मणि में युक्त करदे, कपिचर्म अपनी शक्ति से उस शब्द
को वेग से खींचकर अपने में लीन करके तुरन्त शब्दरहितता कर देता है अतः सर्वप्रयत्नसे शब्दकेन्द्रमुख
नामक यन्त्र को विमान में सम्यक् यथाविधि संस्थापित करे ॥१६५-१६८॥