बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
पृष्ठ 201, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ें[ १७८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र ]
गरुडारिसुजम्बालिककुशकुड्मलरुक्मान् ॥
शुद्धान् वरषड्विंशतिवस्तूनि परिगृह्य ।
सम्पूर्य विराजमानमूषामुखमध्ये ॥ ३५ ॥
पद्माकरकुण्डान्तरमध्ये वरमूषाम् ।
संस्थाप्य मृगेन्द्राकृतिभस्त्रामुखरन्ध्रै ॥
अतिवेगान् सगल्योष्णैककथ्यत्रिशताशाद् ।
यन्त्रास्येथ निसिञ्चेद्रसमाहृत्य विधानात् ॥ ३६ ॥
अतिमृदुल सुदृढस्फटिकशुद्धतरञ्च
तद्विद्युद्गेहर वरमुकुर प्रभवेद्वि ॥ इत्यादि ॥
शुण्डालक-शुण्डाल कृत्रिम लोहविशेष ? या शुण्डालक-शुण्डी-हाथी शुण्डी वृत्त ?, मण्डूक ?,
अन्तक-कचनार, घनोदर ? इनके सत्त्व । बुण्डिल ?, अकर-अकरा-अमली ?, विष-वत्सनाभ, भृङ्ग-भृङ्ग-
राज-भृङ्गराज बूटा या भृङ्ग-कमल ?, कुटिलशङ्ख ?, उरग-नागकेसर, नाग-सीसा धातु या हाथी दान्त
या नागवल्ली ?, सिकता- शुद्ध रेत ?, वर-सैन्धव नमक, गरद-संख्याविष ?, घन-अभ्रक, गरला-मधु-
मक्खी, मुख-कठल बदल, शृङ्ग-शृङ्गोदर ? या अगरकाष्ठ, स्फटिक-स्फटिक मणि ? या फिटकरी,
अवर-अवरदारुक-पत्र विष ? मुक्ताफल-कपूर ? या मोती या वरमुक्ताफल-बडा मोती, वर-गूगल,
कान्त-अयस्कान्त या वरकान्त-श्रेष्ठ अयस्कान्त, कुरङ्ग ?-करञ्ज-करञ्जवा, क्षारत्रय-सज्जीक्षार यवक्षार
सुहागा, राँय-चाम्बा, कञ्चुक-सर्प की केंचुली, चुलक ?, उदुर ?, बन्ध्या-बांझककोडा या ह्रीवेर,
गरुड-पोनामाखो, अरि-खदिरपत्रिका, सुजाम्बलिक-अकळो जाम्बालिक-जम्बाल-गन्धतृण या
केतकी-केवडा, कुश-कुशातृण, कुड्मल-पुष्पकोरक, रुक्म-तीक्ष्ण लोह । शुद्ध की हुई २६ वस्तुओं को
लेकर विराजमान मूषामुख मध्य में भर कर पद्माकर कुण्ड के अन्दर बीच में बडी मूषा-बोतल को रख
कर सिंहाकृति वाले भस्त्रिकामुख छिद्रों से अतिवेग से गला कर ३०० दर्जे की उष्णता से गला कर यन्त्र
के मुख में पिघले रस को सीञ्च दे, अति मृदुल दृढ स्फटिक अति शुद्ध विद्युद्गेग को हरने वाला श्रेष्ठ
दर्पण हो जावे ॥ ३४-३६ ॥
दम्भोलीलोहमुक्तं लोहतन्त्रप्रकरणे-दम्भोली लोहा कहा है लोहतन्त्रप्रकरण में -
उर्वारक कारविक कुरङ्ग शुण्डालक चन्द्रमुख विरिश्चिम् ।
क्रान्तोदर जा(या ?) लिकसिंहवक्त्री ज्योत्स्नाकर द्विरुडपद्ममौक्तिकी ।
एतान् समाहृत्य विशुद्धलोहान् सन्तोल्य पश्चात् समभागत क्रमात् ॥ ३७ ॥
मण्डूकमूषोदरमध्यास्ये सम्पूर्य चञ्चुमुखकुण्डमध्ये ।
संस्थाप्य पञ्चाननभस्त्रिकामुखात् सञ्जालयेत् पञ्चशतोष्णैककथ्यत ॥ ३८ ॥
दम्भोलीलोह प्रभवेद् विशुद्धमेव कृते शास्त्रविधानत क्रमात् ॥ इत्यादि ॥
उर्वारक, कारविक, कुरङ्ग, शुण्डालक, चन्द्रमुख, विरिञ्च, कान्तोदर, जालिक, सिंहवक्त्र, ज्योत्स्ना-
कर, द्विरुङ्गि, पद्ममौक्तिक । इन विशुद्ध लोहों को लेकर समानभाग तोल कर मण्डूक मूषोदर मध्यम के
मुख में भर कर पञ्चमुख कुण्ड के मध्य में संस्थापित करके पांचमुख वाली भस्त्रिका से ५०० दर्जे की