बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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विद्युद्द्वादशकयन्त्र ] [ १७५
\ स्फुलिङ्गवमनो गण्डो दीर्घजिह्वो दुरोणक ।
सर्पास्यश्चेति विद्युन्नेत्रोल्का द्वादशधा स्मृता ॥७॥ इत्यादि ॥
महाकाल, महाभास, महाज्वालामुख, विस्फुलिङ्मुख, दीर्घवाल, खब्ज, महोर्मि, स्फुलिङ्गवमन,
गण्ड, दीर्घजिह्व, दुरोणक, सर्पास्य ये १२ प्रकार के विद्युन्नेत्र उल्काएं कही हैं ॥६-७॥
तेषा विद्युत्सम्मोहास्तु शरद्वासन्तयो क्रमात् ।
भवन्त्यादित्यकिरणेष्वन्तर्भू तास्स्वभावत ॥८॥
किरणोल्कस्थशक्तीना परस्परविमेलनात् ।
भवेदज (जि?) गरानाम काचिच्छक्ति र्भयङ्करा ॥९॥
खस्थद्वाविंशतिमकेन्द्रमुखमध्ये यदा क्रमात् ।
व्योमयान समायाति तदाज (जि?) गरसञ्ज्ञिका ॥१०॥
शक्तिर्यान्स्तम्भन स्ववेगात् तत्र