बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहस्तलेख कारी संख्या १२—
अथ विद्युद्द्वादशकयन्त्र —अब विद्युद्द्वादशकयन्त्र कहते हैं —
एवमुक्त्वा शब्दकेन्द्रमुख्ययन्त्रं यथाविधि ।
विद्युद्द्वादशकयन्त्रमिदानीं सम्प्रचक्षते ॥१॥
इस प्रकार शब्दकेन्द्रमुख्ययन्त्र यथाविधि कहकर विद्युद्द्वादशकयन्त्र अब कहते हैं ॥१॥
तदुक्तं क्रियासारे—यह कहा है क्रियासार ग्रन्थ में—
वाणस्थधूमकेतूनां मण्डलस्याष्टमेन्तरे ।
त्रिकोटिसप्तलक्षत्रिसहस्रद्विशतोपरि ॥२॥
एकविंशतिसंख्याका वर्तन्ते धूमकेतव ।
विद्युद्गर्भास्तेषु धूमकेतूष्टसहस्रका ॥३॥
महाकालादयो रौद्रा विद्युद्द्वादशलोचनाः ।
तेषु द्वादशसंख्याका प्रशस्ता धूमकेतवः ॥४॥
वाण ? में स्थित धूमकेतुओं के अष्टम मण्डल के अन्दर धूमकेतुओं या पुच्छलतारों के मण्डल
के आठवें अन्तर—सिरे पर ३०७०३२२१ इतनी संख्या वाले धूमकेतु रहते हैं, उनमें विद्युद्गर्भ
८००० महाकाल आदि हैं उनमें रौद्र विद्युद्द्वादश लोचन हैं, १२ संख्यावाले धूमकेतु अच्छे हैं ॥२-४॥
विद्युद्द्वादशकमुक्तं शक्तितन्त्रे —विद्युद्द्वादशकयन्त्र शक्तितन्त्र ग्रन्थ में कहा है—
रोचिषी दाहका सिंही पतङ्गा कालनेमिका ।
लता वृन्दा रटा चण्डी महोर्मि पार्वारिण मृडा ॥५॥
उल्कानेत्रस्थिता ह्येते विद्युतो द्वादश क्रमात् । इति ॥
रोचिषी, दाहका, सिंही, पतङ्गा, कालनेमिका, लता, वृन्दा, रटा, चण्डी, महोर्मि, पार्वारिण, मृडा
ये १२ विद्युत् उल्कानेत्र-उल्काएं जिनकी नायक हैं अर्थात् उल्कारूप हैं ॥५॥
धूमकेतव (वो?) उक्ताः खेटसर्वस्वे—धूमकेतु कहे हैं खेटसर्वस्व ग्रन्थ में—
महाकाली महाग्रामो महाज्वालामुखस्तथा ।
विस्फुलिङ्गमुखो दीर्घवातो लङ्को महोर्मिकः ॥६॥