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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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१८० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
क्रियासारेपि--क्रियासार में भी-
क्रमाद् विद्युद्वातधूमशक्तीना सप्रमाणत ।
तत्कालानुसारेण चोदनादिक्रियादिषु ॥४७॥
नियामक़ार्थं तन्नानप्राणकुण्डलीकेन्द्रे ।
मूलस्थाने स्थाप्यते यद् यन्त्रशास्त्रविशारदै ॥४८॥
प्राणकुण्डलिनोयन्त्रमिति तत्सम्प्रचक्षते ।
क्रम से विद्यु त् वायु धूमशक्तियों का प्रमाणसहित उस उसके अनुसार प्रेरणा आदि क्रियाओं
में नियमकार्थ—नियन्त्रण के लिये विमान के प्राणकुण्डलीकेन्द्र वाले मूलस्थान मे जो यन्त्रशास्त्रज्ञ
विद्वानों द्वारा स्थापिन किया जाता है उसे प्राणकुण्डलिनी यन्त्र कहते है ॥४७-४८॥
यन्त्रसर्वस्वेपि—यन्त्रसर्वस्व में भी कहा है—
विमाने धूमविद्युद्वातशक्तीना यथाविधि ।
प्रसारणे चालने च चोदने स्तम्भनेपि च ॥४६॥
विचित्रगमने तद्वत् तिर्यग्गमनकर्मणि ।
नियम्य सप्रमाणेन तत्तन्नालमुखान्तरात् ॥५०॥
प्रेरणार्थ सग़्रहेण यथाशास्त्र यथामति ।
प्राणकुण्डलिनोयन्त्र शास्त्रे स्मिनूसम्प्रकीर्त्यते ॥५१॥
चतुरश्र र्वर्तुल वा केन्द्राष्टकविराजितम् ।
वितस्तित्रयमायाम वितस्तित्रयमुन्नतम् ॥५२॥
कुर्याद् वृपललोहेन पीठमादौ यथाविधि ।
एकैककेन्द्रस्थानेथ चक्रद्वयविराजितम् ॥५३॥
प्रदक्षिणावर्तकीलस्थापनार्थं यथाविधि ।
रन्ध्रत्रयसमायुक्तान् चतुर्दन्तविराजितान् ॥५४।
शङ्कुत्रयसमाविष्टान् सूक्ष्मपीठान् दृढ यथा ।
सन्धारयेत् ततस्तेषा मध्ये शङ्कुमपि क्रमात् ॥५५॥
विमान में धूम विद्युत् वायु शक्तियो के यथाविधि प्रसारण चालन प्रेरणा स्तम्भन में विचित्र-
गमन तथा तिर्यग्गमनकर्म में सप्रमाण नियन्त्रित करके उस उस नालके मुखके अन्दरसे प्रेरणार्थ संक्षेपसे
यथाशास्त्र यथामति प्राणकुण्डलिनी यन्त्र इस शास्त्र में कहा जाता है । प्रथम चौकोन या गोल आठकेन्द्रों
में विराजित ३ बालिस्त लम्बा ३ बालिख्त ऊं'चा वृपल लोहे से पीठ करे । एक एक केन्द्रस्थान में दो
चक्रविराजित हों घूमनेवाली कील के स्थापनार्थ यथाविधि तीन छिद्रों से युक्त चार दान्तों के सहित तीन
शंकुओं से सम्बन्धित—घिरे हुए सूक्ष्मपीठों को लगावे उनके मध्य में शंकु भी लगावे ॥४६—५५॥
उक्तविद्युद्घूमवातपयनालमुलावधि ।
प्रकाशनतिरोधानहस्तचकैर्विराजितम् ॥५६॥