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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 200, कुल 368 में से

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विद्युद्द्वावशक्यन्त्र ] [ १७७
तत्रत्याष्टशलाकेषु योजयन्ति स्वशक्तितः ।
परिगृह्य शलाकास्तच्छक्तिं पश्चात् स्वतेजसा ॥ २६ ॥
पूर्वोत्क्तावरणान्तस्स्थप्रतिकोशमुखान्तरे ।
सयोजयन्ति वेगेन तत्कोशास्तदनन्तरम् ॥ २७ ॥
तच्छक्तिं प्रेषयेद् वेगाद् द्रावकाभिमुखं यथा ।
ततस्सञ्चालयेन्मध्यकीलीमावरणास्थिताम् ॥ २८ ॥
विमानावरकान्तस्स्थद्रवात् तेनातिवेगतः ।
विद्युत्कुठारिका नाम शक्तिरुर्ध्वमुखीस्वत । ॥ २६ ॥
समुत्थाय स्वभावेन कोशस्थाजिगराभिधाम् ।
समाहृत्य स्वशक्त्याथ द्रावणे सन्निरुन्ध्यति ॥ ३० ॥
वहा की आठ शलाकाओं में स्वशक्ति से जोड देती है, पश्चात् शलाकाएं स्वबल से इस शक्ति
को पकड कर पूर्व कहे आवरण के अन्दर स्थित प्रत्येक कोशमुख के अन्दर वेग से संयुक्त कर देते हैं,
उसके अनन्तर वह कोश वेग से उस शक्ति को द्रावक की ओर प्रेरित कर देती है फिर आवरणस्थित
मध्य कीली को चलावे तो विमान के आवरण के अन्दर स्थित द्रावक से अतिवेग से विद्युत्कुठारिका
ऊर्ध्वमुखी शक्ति स्वतः उठकर स्वभाव से कोशस्थ अजगरा नामक शक्ति को अपनी शक्ति से लेकर —
समेटकर द्रावक में रोक लेती है ॥ २६—३० ॥
पश्चादावरणान्तस्स्थान्त्यकीलीप्रचालनात् ।
द्रवस्थाजिगरा शक्ति स्वय पटघनान्तरे ॥ ३१ ॥
भवेद् विलीन सर्वत्र ततो वायुस्स्ववेगतः ।
तत्रस्थाजिगराशक्तिं समाहृत्य पिबेत् क्रमात् ॥ ३२ ॥
तस्मात् तत्क्षणातो व्योमयानबन्धविमोचनम् ।
भवेत् ततो विमानस्थयन्तॄणां सुखद भवेत् ॥ ३३ ॥
पश्चात् आवरण के अन्दर स्थित अन्तिम कीली के चलाने से द्रव में स्थित अजगरा शक्ति
स्वयं पटघन के अन्दर सर्वत्र विलीन हो जावे, फिर वायु अपने वेग से वहा की अजगरा शक्ति को समेट
कर पीले—पीलेता है, इससे तुरन्त विमान के बन्धन का विमोचन-छुटकारा हो जाता है फिर विमानस्थ
यात्रियों को सुख होता है ॥ ३१—३३ ॥
विद्युद्वेगोपसंहारदर्पणमुक्तं दर्पणप्रकरणे—विद्युद्वेगोपसंहार यन्त्र दर्पणप्रकरण में कहा है—
शुण्डालकमुडकान्तकसुघनोदरसत्त्वान् ।
बुडिलाकरविषपङ्कजकुटिलोरगनागान् ॥
सिकतावरगरदाघनगरलामुखभृङ्गान् ।
स्फटिकावरमुक्ताफलवरकान्तकुञ्जरान् ॥ ३४ ॥
क्षारत्रयरविकञ्चुकचुलकोडुपबन्ध्यान् ।