बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चवातस्कन्धनालयन्त्र ] [ १५७
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन तमोयन्त्रं यथाविधि ।
विमानवायव्यकेन्द्रे स्थापयेत् सुदृढं यथा ॥ १६ ॥ इत्यादि ॥
फिर अतिवेग से मूलकील को घुमावे तो अत्यन्तवेग से निस्संशय अन्धकार का उत्थान हो
जावे । उससे विमान अदृश्य हो जावे फिर अपने वेग से विषधूम प्रकाश आदि को क्रम से सर्वथा नष्ट
करदे । फिर उसके दर्शन से ही शत्रुओं की बुद्धि का विचलन हो जावे और धारणाशक्ति का नाश तुरन्त
हो जावे इसमें कुछ भी संशय नहीं । अतः सर्वप्रयत्न से यथाविधि तमोयन्त्र को विमान के वायव्य केन्द्र
में सुदृढ़ स्थापित करे ॥१६—१६॥
अथ पञ्चवातस्कन्धनालयन्त्र - अथ पञ्चवातस्कन्धनालयन्त्र कहते हैं—
एवमुक्त्वा तमोयन्त्रं सङ्ग्रहेण यथामति ।
पञ्चवातस्कन्धनालयन्त्रमथ प्रचक्षते ॥२०॥
वृष्ण्यादिवातावरणमण्डलानि त्रयोदश ।
पक्तिराधसकेन्द्रस्थशक्तिसम्पर्कतं क्रमात् ॥२१॥
परस्परं स्वभावेन संलग्नानि भवन्ति हि ।
तस्मान्मण्डलमध्यस्थवातयोरुभयोरपि ॥२२॥
परस्परं भवेद् युद्धं घर्षणाद्यैर्विशेषतः ।
तस्मात् तत्र प्रजायन्तेत्यन्तघोरविषात्मका ॥२३॥
शक्तय पञ्चातिवेगात् शोषिणका (शोधिएका?) द्यास्स्वभावत ।
तत्सम्पर्काद् व्योमयानविनाशो भवति क्रमात् ॥२४॥
तद्विज्ञायातिशीघ्रेण यानपश्चिमकेन्द्रके ।
पञ्चवातस्कन्धयन्त्रं सस्थापयेत् सुधी ॥२५॥
तस्माच्छो(रो?)ष्यादय पञ्च शक्तयस्तत्क्षणात् स्वतः ।
विनाशं यान्स्यत खेटयानसंरक्षणं भवेत् ॥२६॥ इति खेटविलास ॥
इस प्रकार तमोयन्त्र सङ्क्षेप से यथामति कहकर अथ पञ्चवातस्कन्ध नाल यन्त्र कहते हैं ।
वृष्णि आदि १३ वातावरण मण्डल हैं पंक्तिराधस ?-पंक्तियों के साधककेन्द्र में स्थित शक्ति के सम्पर्क
से क्रम से परस्पर स्वभाव से वे वातावरण मण्डल मिले हुए होते हैं अत मण्डल मध्यस्थ दोनों वायुओं
में भी घर्षण आदि से विशेष परस्पर युद्ध हो जावे अत' वहां घोर विषरूप पांच शोषिएक आदि
शक्तियां स्वभाव से प्रकट होजाती है उनके सम्पर्क से विमान का क्रम से नाश हो जाता है उसे जानकर
अति शीघ्र यान के पश्चिम केन्द्र में पञ्चवात स्कन्ध यन्त्र बुद्धिमान् स्थापित करे अतः शोषिण आदि
पांच शक्तियां तुरन्त स्वतः नाश को प्राप्त हो जाती हैं इससे खेटयान—विमान का संरक्षण हो जाता है ।
यह खेटविलास में कहा है—
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—यह यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में कहा है—
पञ्चवातस्कन्धनालयन्त्रस्य रचनाक्रमम् ।
यानसंरक्षणार्थाय कथ्यतेस्मान् यथाविधि ॥२७॥