बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दकेन्द्रमुखयन्त्र ] [ १७१
सन्धारयेच्छब्दोपसंहारयन्त्रान्यथाविधि ।
तेन तच्छब्दोपसहारो भवेन्नात्र संशय ॥ १४७ ॥
वारुणी-जलधारा, वायु, विद्युतपतन के शब्दों के सम्मेलन से स्वत आकाश की आठवीं परिधि
के केन्द्र में अत्यन्त भयावह कान इन्द्रिय को फोड़ने वाला महाघनरव हो जावे-हो जाता है, उसमें
विमान का प्रवेश यदि हो जावे तो विमान में स्थित यात्रियों का उस शब्द के वेग से क्षणमात्र में बहिरा-
पन हो जावे, अत उसके परिहार के लिए शब्दकेन्द्रमुख नामक यन्त्र विमान में स्थापनार्थ संक्षेप से
निरूपित किया जाता है । आकाशपरिघिमण्डल के यथाक्रम ३०७ केन्द्र हैं ऐसा बुधजन कहते हैं, उन
केन्द्रों में ७० वें केन्द्र से अति भीषण वारुणो शक्ति-अभ्रप्रवाह शक्ति से उत्पन्न अत्यन्त भयावह शब्द
तथा वायु से उत्पन्न अत्यन्त घोष करने वाला शब्द ३१२वें केन्द्र से आता है वैसे ही विद्युत् शब्द ८२वें
केन्द्र से आता है, इस प्रकार तीनों शब्द सम्यक् मिल कर परस्पर महाघन रव शब्द कान का फोडने
वाला हो जाता है उससे विमान के यात्रियों का बहिरापन हो जावेगा एक एक शब्द केन्द्र के सामने
सुदृढ शब्दोपसहार यन्त्र यथाविधि लगावे उससे शब्द का उपसहार हो जावे-हो जावेगा, इसमें संशय
नहो ॥ १३८-१४७ ॥
अथ यन्त्रोपकरणानि-अथ यन्त्र को उपयुक्त करने वाले साधन-
जम्बाल शणकोश च क्रौञ्चिक वारिपिष्टकम् ।
गव्यारिक पञ्चनखचर्मसंशोधित तथा ॥ १४८ ॥
रुण्डाकमामिष शुण्ड वग चेति दश क्रमात् ।
सगृह्यं तान्यथाशास्त्रमादो शुद्धि प्रकल्पयेत् ॥ १४६ ॥
कपिचर्मविना सर्ववस्तुनिर्या सयन्त्रके ।
सम्पूर्य महिषीपित्ता(त्थ ?) त्पाचयेत् त्रिदिन क्रमात् ॥१५०॥
समत्वेनैव वस्तूना मेलन कारयेत् क्रमात् ।
पश्चात् सगृह्य निर्यास रक्तवर्णं सुशोभनम् ॥ १५१ ॥
लेपयेत् पञ्चनखचर्मण्यस्सप्तधा सुधी ।
कृत्वा सूर्यपुट पश्चाद् घुण्डिकन्दरसात् तया ॥ १५२ ॥
शब्दोपसहारशक्तिरेतत्सस्कारत क्रमात् ।
स्वतस्सञ्जायते सम्यक् कपिचर्मण्यथाबलम् ॥ १५३ ॥
जम्बाल-शैवाल-काई, शणकोश-मशकोश, कौञ्चिक - नाम का कृत्रिम लोहा या पद्मबीज
कमल गट्टा, वारिपिष्टक ?-वारिपर्शी-वारिपर्णी ?-जलकुम्भी, गव्यारिक ?, पञ्चनखचर्म ?-व्याघ्रचर्म शोधित
बाघ, ऊंट, रीछ, गोह, कच्छुआ के चर्म ?, रुण्डाक ?--रुण्डक- अगर काष्ठ ?, आमिष ?-दही ?,
शुण्ड ?--शुण्डा-हाथी शुण्ड-हाथी शुण्ड वृक्ष, वंग-रांगा धातु । इन १० वस्तुओं को लेकर यथाशास्त्र
आदि में शुद्धि करे, कपिचर्म-बन्दर के चाम छोड कर सब वस्तुओं को निर्यासयन्त्र-काढा बनाने
वाले यन्त्र में भर कर भैंस के पित्त-भैंस के रोचन से ३ दिन पकावे समान भाग वस्तुएं ले फिर
निर्यास-काढा लाल रंग का हो जावे उसे पञ्चनख चर्म पर लेप करे सात बार फिर सूर्यपुट-धूप देकर