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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 179, कुल 368 में से

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पृष्ठ 179

१५६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
तत्प्रयोगक्रमं वक्ष्ये सङ्ग्रहेण यथामति ।
आदौ सञ्चालयेत् कीलीं चक्राग्नेयस्थितां क्रमात् ।।६।।
तेन नालस्थद्विमुखीदर्पणाभ्रामणं भवेत् ।
किरणाकर्षणं भानोर्भवेन्नालस्थदर्पणात् ।। १० ।।
अन्धकार को उभारने वाला आदर्श का केन्द्रस्थान उसके पश्चिम, किरणाकर्षणनाल का स्थान
पूर्व में बनावे उनके ऊपर की नाल का सन्धिस्थान बना कर फिर तन्त्रोसन्धान चक्र—तार जिसमें लगे
ऐसे चक्र का स्थान मध्यकेन्द्र में, कीली - पेंचों को चलाने वाले चक्र का स्थान उसके दक्षिण में रखे ।
इस प्रकार यन्त्र का रचनाक्रम संक्षेप से यथामति कह कर उसका प्रयोग क्रम कहूंगा, आग्नेय चक्र में
स्थित कील को चलावे उससे नाल में स्थित दो मुखवाले दर्पण का घुमाना हो जावे उस नालस्थ दर्पण से
सूर्यकिरणों का आकर्षण हो जावे - हो जावेगा ।। ६-१० ।।
पश्चाद् वायव्यकेन्द्रस्थकीलीं सञ्चालयेद् दृढम् ।
निशाद्रवपात्रस्थस्थापनं तस्माद् भवेत् स्वतः ।। ११ ।।
ऐशान्यकेन्द्रस्थकीलीं चालयेदिति सूक्ष्मतः ।
तेजोपकर्षणमणिस्तन्त्रीमुखात् स्वयम् ।। १२ ।।
निशाद्रवपात्रस्य मध्ये संस्थापितं भवेत् ।
तथा पश्चिमकेन्द्रस्थकीलसीञ्चालनाद् दृढम् ।। १३ ।।
स्वस्थाने स्थाप्यते सम्यक् तमोद्रेकाख्यदर्पणं ।
मध्यकीलीचालनेन नालमध्यस्थदर्पणात् ।। १४ ।।
आकृष्टासूर्यकिरणाः मणिमावृत्य वेगतः ।
स्थास्यन्ति मणिसंयोगात्सम्यक् चलनवर्जिताः ।। १५ ।।
पश्चात् वायव्य केन्द्रस्थ कीली को चलावे, गूग़लद्रवपात्रस्थ में स्थापन स्वत हो जावे, ईशान
केन्द्रस्थ कीली को अतिसूक्ष्मरूप से चलावे तो तेज को खींचने वाली मणि तन्त्रीमुख से स्वयं गूगल द्रव-
पात्र के मध्य में स्थापित हो जावे तथा पश्चिम केन्द्रस्थ कीली के सम्यक् चलाने से स्वस्थान में अन्धकार
को उभारने वाला दर्पण स्थापित किया जाता है, मध्यकील चलाने से नाल के मध्यस्थ दर्पण से सूर्य-
किरण आकृष्ट हुई हुई वेग से मणि को घेर कर मणि संयोग सम्यक् चलनरहित ठहर जावेंगी ।।११--१५।।
भ्रामयेदतिवेगेन मूलकीलकमत् परम् ।
ततोत्यन्ततमोद्रेकः प्रभवेन्नात्र संशयः ।। १६ ।।
तेनादृश्यं भवेत् व्योमयानं पश्चात् स्ववेगतः ।
विषधूमप्रकाशादीन् निश्शेषं नाशयेत् क्रमात् ।। १७ ।।
ततस्तद्दर्शनादेव शत्रूणां बुद्धिविप्लवः ।
भवेन्मेघोविनाशं च तत्क्षणान्नात्र संशयः ।। १८ ।।