बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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गुहागर्भादर्शयन्त्रमेवमुक्त्वा यथाविधि ।
अथेदानीं प्रवक्ष्यामि तमोयन्त्रस्य निर्णयम् ॥ ६६ ॥
गुहागर्भादर्श यन्त्र इस प्रकार यथाविधि कह कर अब तमोयन्त्र का निर्णय कहूँगा ॥ ६६ ॥
उक्तं हि यन्त्रसर्वस्वे—यन्त्रसर्वस्व में कहा है—
रौहिणीविषसम्बद्ध (न्ध ?) चूर्णांधूमादिभिस्तथा ।
क्रकचारिमणेर्दीप्तप्रभाविषसमूलत ॥ ७० ॥
विमाननाशनार्थाय प्रयोगः क्रियते यदा ।
तदा तद्विनाशाय स्वयन्त्रत्राणाय च ॥ ७१ ॥
शत्रुयन्त्रं सुविज्ञाय शास्त्रोक्तेनैव वर्त्मना ।
तमोयन्त्रं स्थापयेद् विमानवायव्यकेन्द्रके ॥ ७२ ॥ इत्यादि ॥
रौहिणी विषसम्बन्धी चूर्ण के धूप आदि से तथा क्रकचारि मणि ? (क्रकच – आरा के शत्रु-
रूपमणि) की प्रभा विषसमूल से विमाननाश के लिये जब प्रयोग किया जाता है तब उसके विनाश
के लिये अपने विमान के रक्षण के लिए शत्रु का रहस्य जान कर शास्त्रोक्त मार्ग से तमोयन्त्र—अन्धकार
फैलाने वाला यन्त्र विमान के वायव्य केन्द्र में स्थापित करे ॥ ७०-७२ ॥
तदुक्तं क्रियासारे—वह कहा है क्रियासार ग्रन्थ में—
विषधूमप्रकाशादिप्रयोगाच्छत्रुणा यदा ।
विनाशो व्योमयानस्य सम्भवेद् यदि तत्क्षणात् ॥ ७३ ॥
संस्थापयेत् तमोयन्त्रमतिवेगाद् विचक्षणः ।
यदि प्रमादं कुर्वीत स्वयानं नाशमेधते ॥ ७४ ॥
शत्रुओं का विषधूम प्रकाश आदि प्रयोग से जब विमान के विनाश की सम्भावना हो तो
तत्क्षण बुद्धिमान् वेग से तमोयन्त्र लगा वे, यदि प्रमाद किया तो अपना विमान नाश को प्राप्त हो
जाता है ॥ ७३-७४ ॥
द्वात्रिंशदुत्तरशततमोयन्त्रेषु शास्त्रतः ।
द्वियष्टितमसंख्याकयन्त्र एव गरीयसी* ॥ ७५ ॥
विषधूमप्रकाशादिसंहारे सुप्रशस्तकः ।
इति प्रोच्यते (ति ?) सम्यग्यन्त्रशास्त्रविशारदैः (दे ?) ॥७६॥
१३२ तमोयन्त्रों में शास्त्र से ६२ वीं संख्या वाला यन्त्र श्रेष्ठ है क्योंकि विषधूम प्रकाश आदि
के संहार करने में ठीक यन्त्र शास्त्र के विद्वानों द्वारा अच्छा प्रशस्त कहा जाता है ॥ ७५-७६ ॥
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- लिङ्गव्यत्ययः ।