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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 186

वातस्कम्भनालकीलक्यन्त्र ] [ १६३
तदुक्तं गतिनिर्णयाध्याये – वह कहा है गतिनिर्णय के अध्याय में—
आवहादिमहावातमण्डलेषु स्वभावत ।
द्वाविशदुत्तरशतप्रभेदेन यथाक्रमम् ॥ ७५ ॥
पवमानगतिश्चित्रविचित्रत्वेन वर्णिता ।
तेष्वेकोनाशीतितमगतिर्वातायनाभिधा ॥ ७६ ॥
तद्गतिस्स्याद् विशेषेण वायौग्रीष्मऋतौ क्रमात् ।
चतुर्यकक्ष्यगगने यानसञ्चरते यदा ॥ ७७ ॥
तदा वातायनगतिवेगाद् बायोविशेषत ।
विमानस्य भवेद् वक्रगतिस्तस्मात् परस्परम् ॥ ७८ ॥
यन्त्रूणा प्रभवेत् कष्टमत्यन्तं सुदुस्सहं क्रमात् ।
अतस्तत्परिहाराय यानाथ. पार्श्वकेन्द्रके ॥ ७६ ॥
वातस्तम्भनालकीलकयन्त्र स्थापयेत् सुधी ।
तेनापायनिवृत्तिस्स्याद् यन्त्रृणा सुखद भवेत् ॥ ८० ॥ इत्यादि ॥
आवह आदि महावायुमण्डलों में स्वभावतः १२२ भेद से यथाक्रम वायुगति चित्रविचित्ररूप
से वर्णन की है, उन में ७६वीं गति वातायन नामक है, उस वायु की गतिविशेष करके ग्रीष्मऋतु में क्रम
से हो तो चतुर्थ कक्ष्यावाले गगनमण्डल में विमान सञ्चार करता है । तब वातायनगति वेगसे वायु का
विशेषत विमान को परस्पर वक्रगति हो जावे उस से चालक यात्रियों को अत्यन्त दुःसह कष्ट हो जावे,
अत उसके हटाने के लिये विमान के नीचे पार्श्वकेन्द्र में बुद्धिमान् जन वातस्तम्भनालकील यन्त्र स्थापित
करे उस से अनिष्ट की निवृत्ति तथा यात्रियों को सुखद हो ॥ ७५–८० ॥
उक्तं हि यन्त्रसर्वस्वे—कहा है यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में—
विमानवक्रगमनपरिहाराय केवलम् ।
वातस्कन्धनालकीलक यन्त्रमथ प्रचक्षते ॥ ८१ ॥
वातस्तम्भनलोहेनैव तद्यन्त्र प्रकल्पयेत् ।
अन्यथा निष्फलमिति प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ८२ ॥
विमान के वक्रगमन के दूर करने को वातस्कन्धनालकीलयन्त्र अब कहते हैं । वातस्तम्भन लोहे
से ही उस यन्त्र को बनावे अन्यथा निष्फल है ऐसा मनीषी (Thinker) कहते हैं ॥ ८१–८२ ॥
तदुक्तं लोहतत्त्वप्रकरणे—वह कहा है लोहतत्त्व प्रकरण में—
विशावर सुवर्चल मयूरलोहपञ्चकम् ।
भ्रु०शुण्डिक सुरक्षिक वराहकान्तिलोहकम् ॥
विरोहिण कुबेरक मुरारिकान्घ्रि रञ्जजम् ।
सुहसनेत्रजः दल वरालिक मुनालिकम् ॥ ८३ ॥