बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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तडिद्दर्पण से यह यन्त्र यथाविधि करना चाहिए, अन्यथा करे तो निश्चित विनाश होजाता
है । २० बालिश्त लम्बा एक बालिश्त ऊंचा चौरस या गोल पीठ बनावे पूर्व-पश्चिम से और दक्षिणोत्तर
अर्धाकृतिवाले दर्पण से बनाई चार नालों को तथा तारमय पांच मुखवाले पिञ्जरे को दृढ स्थापित करे
एकैकमुख केन्द्र में शक्तिकीलों को लगावे एक एक कील स्थान में विद्युद्दर्पण से बने घड़े लोटे जैसे यन्त्रों
को तथा सात अर्रों वाले नालयुक्त आठ मुखवाले दश कोणवाले विद्युद्दर्पणकृत गोपुर—गोल गवाक्षचक्र
यन्त्र दृढ स्थापित करे, अतः कीलो चलाने से गोपुर स्वयं घूमता है ॥११५-१२०॥
तद्वेगो विद्युदुत्पन्नवह्निवेग समग्रत ।
समाकृष्यातिवेगेन स्वयं पिबति तत्क्षणात् ॥१२१॥
पश्चान्मार्तण्डकिरणशक्तयस्स्वीयतेजसा ।
तच्छक्तिं च समाहृत्य गोपुरस्था सुदारुणाम् ॥१२२॥
महामाण्डलिकाख्ये वातमण्डलेम्बरान्तरे ।
तत्क्षणात् प्रविलाप्यन्ति तद्विनाशो भवेत् तत ॥१२३॥
पश्चाद्धिमवदत्यन्त शीतल प्रभवेत् क्रमात् ।
तेन यानस्थयन्तॄणा भवेदाप्यायन तत ॥१२४॥
सुरक्षित भवेद् व्योमयान चापि विशेषत ।
तस्मात् सस्थापयेद् व्योमयाने शास्त्रविधानत. ॥१२५॥
एतद् विद्युद्दर्पणाख्ययन्त्रमद्भुतमव्ययम् ।
नोचेद विमाननाशस्स्यादप्रमादी भवेद्यत ॥१२६॥ इत्यादि ॥
उस 'गोपुर यन्त्र' का वेग विद्युत् से उत्पन्न अग्नि के वेग को पूर्णरूप से अति वेग से खींच
कर स्वयं पी लेता है पश्चात् सूर्यकिरणशक्तियां अपने तेज से गोपुरस्थ दारुण उस शक्ति को लेकर
महामाण्डलिक वातमण्डल में आकाश के अन्दर तुरन्त प्रविलीन कर देती है पुन उस शक्ति का विनाश
हो जाता है । पश्चात् वह हिम (बर्फ) की भांति अत्यन्त शीतल हो जावे, उससे विमान यान में बैठे
चालक यात्रियों का प्रफुल्लितत्व—सन्तोष सुख हो जावे और विमान भी सुरक्षित हो जावे । अतः विमान
में शास्त्र-विधि से इस अद्भुत स्थिर विद्युद्दर्पण नामक यन्त्र को संस्थापित करे नहीं तो विमान का
नाश हो जावे अतः इस विषय में अप्रमादी होवे—प्रमादरहित रहे ॥१२१-१२६॥
अथ शब्दकेन्द्रमुखयन्त्रः-अब शब्दकेन्द्रमुख यन्त्र कहते हैं—
एवमुक्त्वा सग्रहेण विद्युद्दर्पणायन्त्रकम् ।
अथेदानी शब्दकेन्द्रमुखयन्त्र प्रचक्षते ॥१२७॥
इस प्रकार संक्षेप से विद्युद्दर्पणयन्त्र कहकर अब शब्दकेन्द्रमुखयन्त्र कहते हैं ॥१२७॥
तदुक्त क्रियासारे—यह क्रियासार में कहा है—
शब्दोत्पत्तिस्थानभेदाच्छब्दकेन्द्रा इतीरिता ।
तेभ्य प्रसारण यत् स्याच्छब्दादीना दिशप्रभेदत ॥१२८॥
प्रविलाप्यन्ति आर्षप्रयोग ।