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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 368 में से

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पृष्ठ 187

१६४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र

सुशोधितान् यथाविधि यथाप्रतोलितान् समं समम् ।
मत्स्यमूषमध्यमास्यपूरितान् समग्रकम् ॥
संस्थाप्य माधिमारुयकुण्डमध्ये दृढ यथा ।
विजृम्भणाख्यभस्त्रिकामुखेन सन्धमनेत् क्रमात् ॥८४॥
विगालय चाथ तद्रस सुयन्त्रमध्यनालके ।
कटुष्णत प्रपूरयेच्छनैश्शनैर्यथाक्रमम् ॥
एवकृतेतिसूक्ष्मरूपक विशुद्धमच्युतम् ।
सुवातस्तम्भलाहक भवेत् सुवर्चल लघु ॥ ८५ ॥ इत्यादि ॥

विशावर ?-विशाकर-दन्ती, सुवर्चल-सौवर्चलनमक, मयूर-गन्धक,-लोहपञ्चक-लोहेपञ्चप्रकार के,-मुसु-
ण्डिक ?, सुरञ्जिक-सुरञ्जी श्वेतकाकमाची या रञ्जक-हिङ्गुल-शिंगरक, वराहांघ्रि लोहा ?, विरोहिण-
रोहिण-कायफल, कुबेरक-इन्द्रवृक्ष, मुरारिकांघ्रिलोहा ? सुहृ'सनेत्रक ?, दल-तेजपत्र ?, वरालिका-वरा-
टिका-कौडी, मृणालिक-मृणालिक-मृणाल-सुगन्धतृण या अश्वगन्ध । सुशोधित समान भाग तोलकर
मत्स्यबोतल के मध्यमुख में भरकर माधिम ? माध्यमिकारूय कुण्डमध्य में रखकर विजृम्भणाख्य भास्त्रका
मुख से धमन करे गलाकर रस को यन्त्रमध्यनाल में थोड़ा गरम धीरे धीरे भर दे ऐसा करने पर सूक्ष्म
शुद्ध अटूट वातस्तम्भलोहा सुन्दर बन जावे ॥ ८३-८५ ॥

वितस्तीना पञ्चदशप्रमाणेन सुवर्तुलम् ।
नालष्टक विस्तृतस्यामादौ कृत्वा यथाविधि ॥ ८६ ॥
अन्तश्छिद्र प्रमाणेन वितस्तोना दश स्मृतम् ।
विमानमूलमध्याग्रप्रदेशेषु यथाक्रमम् ॥ ८७ ॥
पूर्वं पश्चिमताश्चैव दक्षिणोत्तरतस्तथा ।
सन्धारयेल्लोहकृतपट्टिकान् भारवर्जितान् ॥ ८८ ॥
पूर्वोक्तनालान् सङ्गृह्य पट्टिकासु यथाक्रमम् ।
नालास्यानामाभिमुख्यं चतुर्दिक्षु यथा भवेत् ॥ ८९ ॥
तथा सन्धारयित्वाथबध्नीयात् कोलकादिभि ।
पश्चादेकैकनालास्ये वातपामणिमुत्तमम् ॥ ९० ॥

१५ बालिश्त माप से गोलाकार ६ नालें बड़े मुखवाली प्रथम यथाविधि करके अन्दर जिनके
छिद्र हो १० बालिश्त कहे हैं, विमान के मूल मध्य और अग्रप्रदेश में यथाक्रम पूर्व पश्चिम की ओर
और दक्षिण उत्तर की ओर भी लोहे से बनी भाररहित पट्टिकाओं को लगावे, नालों के मुखों का साम्मुख्य
चारों दिशाओं में जिस से हो वैसे लगा कर कीलों से बान्धे पश्चात् एक एक नाल के मुख में उत्तम
वातपामणि- ॥ ८६-९० ॥

एकैक योजयेत् तन्त्रीमूलकात् सुदृढ यथा ।
वातायनीवातवेगापकर्षणपटून् तत. ॥ ९१ ॥