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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 368 में से

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पृष्ठ 196

शब्दकेन्द्रमुखयन्त्र ] [ १७३
जम्भीर लगुड विरञ्चि ऋषिक मालूरपञ्चाननम् ।
लुण्टाक वरसिंहिक कुरवक सर्पास्यकुन्दावरम् ।
वाकूल मुरज मुडाङ्करटको संगृह्य सर्वं समम् ।
सम्पूर्य त्र्युटिमूषमध्यमविले कुण्डे सुसंस्थाप्य च ॥१६२॥
यन्त्रास्ये द्रुततद्रस सुरुचिर सम्पूरयेच्छीघ्रत ।
एतेन प्रभवेद् विशुद्धममलं शैत्य सुसूक्ष्म दृढम् ।
श्याम शब्दहन च भाररहित शक्त्या समाच्छादितम् ॥१६३॥
रक्तस्तम्भनपाटव घनरवे योद्धाङ्गशल्यापहम् ।
भ (ज ?) ष्मामारुतशब्दनाशनपटु सर्वव्रणोच्छेदकम् ॥१६४॥ इत्यादि ॥
जम्भीर=जम्भीरीनिम्बू, लगुड=कनेयर, विरञ्चि=असवर्ग ?, ऋषिक=सियाडिलता, मालूरु-
मालूर=कैथ या विल्व, पञ्चानन=लोहाविशेष ?, लुण्टाक=लुण्टक=शाकविशेष सम्भवत खट्टाशाकलोणी ?,
वरसिंहिक=बड़ी कटेरी, कुरवक=श्वेत आक=सफेद फूल का आख, सर्पास्य ?=सर्पाख्य ?=नागकेसर
या सर्पास्य=सर्पदन्ती ?=नागदन्ती कुन्दावर=कुन्दुरु=बाळभककोडा, वाकुल=मोलमरी बीज, मुरज-
कटहल, मुडाङ्ग=मृगाङ्क=कपूर ? या सुडङ्गण=सुगन्धवाला ?, रटक ?=रण्डक=अफलबृक्ष ? या रण्डा-
मूषकणी ? सबको समान लेकर त्र्यटिमूषमध्य-तीन पत्री-तीन परतवाली बोतल छिद्रबाले कुण्ड में रख
कर ३०० दर्जे की उष्णता से पांचमुखवाली भस्त्रामुख से गलाकर यन्त्र के मुख में पिघलारस शीघ्र भरवे
इससे विशुद्ध निर्मल शीत-ठण्डा अतिसूक्ष्म दृढ श्याम रंगवाला शब्दनाशक भाररहित शक्ति से प्रपूर्ण
रक्तस्तम्भन में कुशल-योग्य घन रण में योद्धा के अङ्गों से शल्य का निकालनेवाला भष्मावात शब्द
के नाश में योग्य सब घावों को नष्ट करनेवाला हो जाता है ॥१६२-१६४॥
पूर्वोक्तोत्यन्तभयद महाघनरवे क्रमात् ।
सिंहास्यभस्त्रिकात्पश्चात् समाकृष्यति वेगत ॥१६५॥
पेटिकान्तर्नालस्थमणी संयोजयेदथ ।
कपिचर्मस्वशक्त्या तच्छब्दमाकृष्य वेगत ॥१६६॥
निश्शब्दं कुरुते स्वस्मिन्नुपसंहृत्य तत्क्षणात् ।
तेन यानस्थयन्त्राणामत्यन्तसुखदं भवेत् ॥१६७॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन शब्दकेन्द्रमुखभिधम् ।
यन्त्रं संस्थापयेद् व्योमयाने सम्यग्यथाविधि ॥१६८॥ इत्यादि ॥
पूर्वोक्त अत्यन्त भय देनेवाले महाघनरव को क्रम से अतिवेग से सिंहास्य भस्त्रिका से अतिवेग
से खींचकर पेटिका के अन्दर नाल में स्थित मणि में युक्त करदे, कपिचर्म अपनी शक्ति से उस शब्द
को वेग से खींचकर अपने में लीन करके तुरन्त शब्दरहितता कर देता है अतः सर्वप्रयत्नसे शब्दकेन्द्रमुख
नामक यन्त्र को विमान में सम्यक् यथाविधि संस्थापित करे ॥१६५-१६८॥