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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 188

वातस्कन्धनालकील यन्त्र ] [ १६५
पताकान् रोलिकपटनिर्मितान् नालसन्धिषु ;
सन्धारयेत् सूत्रबद्धान् पञ्चसंस्कारसंस्कृतान् ॥ ६२ ॥
वातस्तम्भलोहकृतचक्रान् तत्तद्ध्वजाग्रत ।
एकैकं स्थापयेत् पश्चात् तन्त्री सर्वत्र योजयेत् ॥ ६३ ॥
वातायनीवातवेगप्रवाहोत्यन्तवेगत ।
पताकाभिमुखो भूत्वा व्याप्यते सर्वत क्रमात् ॥ ६४ ॥
तद्वे गमपहृत्यथ पताकाश (न्? श)ब्दपूर्वकम् ।
प्रचलन्त्यतिवेगेन सर्वतोमुलत क्रमात् ॥ ६५ ॥
एक एक तार के मूल से दृढ़ लगावे फिर वातायनी नामक वायु के वेग को खींचनेवाले पञ्च-
संस्कारयुक्त रोलिक ?-तौलिक रूई से बने फूलने वाले थैलों पताकाओं को नालों की सन्धियों में सूत्रों से
बान्धकर लगावे । वातस्तम्भ लोहे से बने चक्रों को उस उस ध्वजा के अग्र भाग में एक एक को स्थापित
करे फिर सर्वत्र तार लगावे । वातायनीनामक वायु के वेग का प्रवाह अत्यन्त वेग से पताका के सामने
होकर सर्वत्र व्याप जाता है । उस के वेग को हटाकर पताकाए शब्दपूर्वक सब ओर चलती हैं ॥६१-६५॥
पश्चात् तन्मूलकीलस्थचक्राण्यपि यथाक्रमम् ।
प्रतिवेगेन भ्राम्यन्ति तद्वे गान्मणयस्तथा ॥ ६६ ॥
वातायनीवातवेग पताका. प्रथम क्रमात् ।
समाहरन्ति वेगेन पश्चाच्चक्राणि वेगत ॥ ६७ ॥
समाहृत्य प्रेषयन्ति मणीन् प्रति विशेषत ।
मणयस्त समाकृष्टा नालास्ये योजयन्ति हि ॥ ६८ ॥
तन्नालान्तश्छिद्रमुखादागत्यान्यमुखान्तरात् ।
बाह्याकाशेथ विलय यान्ति नास्त्यत्र सशय ॥ ६६ ॥
पश्चादृजुगतिस्तेन विमानस्य भवेत् क्रमात् ॥१००॥
अतो वातस्कन्धनालकीयन्त्र यथाविधि ।
विमाने स्थापयेत् सम्यगिति शास्त्रविनिर्णय ॥१०१॥
फिर उनके मूलों की कीलों में स्थित चक्र भी यथाक्रम अतिवेग से घूमते हैं उनके वेग से
मणियां भी घूमती हैं । प्रथम पताकाएं वातायनीनामक वायु के वेग को शीघ्र लेती हैं पश्चात् चक्रों को
वेग से लेकर मणियों के प्रति विशेषत प्रेरित करते हैं, मणियां आकृष्ट हुईं उसे नालों के मुख में युक्त
करती हैं, उन नालों के भीतरी छिद्रमुख से आकर अन्य मुख के अन्दर से बाहरी आकाश में विलय
को प्राप्त हो जाती है इसमें संशय नहीं पश्चात् उस से विमान की सरलगति क्रम से हो जाती है, अत
वातस्कन्धनाल के कीलयन्त्र को यथाविधि विमान में सम्यक् स्थापित करे यह शास्त्र का निर्णय
है ॥ ६६-१०१ ॥
अथ विशुङ्र्पणयन्त्रः—अब विशुङ्र्पण यन्त्र कहते हैं—