बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरौद्रीदर्पणयन्त्र ] [ १५६
५ नालों को संस्थापित करके पूर्वोक्त विषवायुओं के केन्द्र के सम्मुख गोल शुद्ध कील सहित दृढ़ भस्त्राओं भस्त्रामुखवाले को-॥३१-३७॥
नालानामेकैकमूले एकैकं सुदृढं यथा ।
धावर्तकीलकं सम्यक् स्थिरीकुर्याद् यथाविधि ॥३८॥
पश्चादेकं कभस्त्रास्यकीलकानतिवेगतः ।
चालयेदनुलोमेन यथाशास्त्रं पृथक् पृथक् ॥३९॥
भवेत् तस्मात् पञ्चविषशक्तीनामपकर्षणम् ।
भस्त्रिकास्ये पञ्चनालमुखेष्वत्यन्तवेगत ॥४०॥
प्रविश्याथ बहिर्यान्ति पञ्चधा विषशक्तय ।
पश्चाद् विनाशमायान्ति शो(रौ?)ष्णिकाद्यास्स्वत ॥४१॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन यन्त्रमेतद् यथाविधि ।
विमाने स्थापयेत् सम्यगिति शास्त्रविनिर्णय ॥४२॥ इत्यादि ॥
नालों में से एक एक नाल को एक एक मूल में घूमनेवाली कीलों के साथ स्थिर करे, पश्चात् एक एक भस्त्रास्य की कीलों को अतिवेग से सीधे यथाशास्त्र पृथक् पृथक् चलावे तो उससे पाँच विष-
शक्तियों का खींचना हो जावे, पांच विषशक्तियां भस्त्रिकास्यों से अत्यन्त वेग से पञ्चनालमुखों में प्रविष्ट होकर बाहिर चली जाती हैं। फिर शौष्णिक आदि विनाश को स्वतः प्राप्त हो जाती हैं अतः
समस्त प्रयत्न से इस यन्त्र को विमान में सम्यक् संस्थापित करें यह शास्त्र का निर्णय है ॥३८-४२॥
अथ रौद्रीदर्पणयन्त्रनिर्णय —अब रौद्रीदर्पण यन्त्र का निर्णय देते हैं—
एवमुक्त्वा पञ्चवातस्कन्धनालमतं परम् ।
रौद्रोदर्पणयन्त्रस्वरूपमथ निरूप्यते ॥ ४३ ॥
इस प्रकार पञ्चवातस्कन्धनालयन्त्र को कहकर इस से आगे रौद्रीदर्पण यन्त्र का स्वरूप अब निरूपित किया जाता है ॥४३॥
तदुक्तं क्रियासारे-वह कहा है क्रियासार ग्रन्थ में—
ईषादण्डस्य नैऋत्यकेन्द्रमार्गो विशेषत ।
ये सूर्यकिरणास्सम्यक् प्रसरन्ति विशेषत ॥ ४४ ॥
ते सर्वे ऋतुभेदेन शक्त्यावर्ते पतन्ति हि ।
तत्तत्यशक्तिसंयोगात् किरणेषु विशेषत ॥ ४५ ॥
आविर्भवन्ति वेगेन ज्वालास्त(तृ स?)वंविदाहका ।
तज्ज्वालासन्धिकेन्द्रेषु विमानस्सञ्चरेद् यदि ॥ ४६ ॥
तत्क्षणादेव तद्गोद् भस्मीभवति नान्यथा ।
अतस्तत्परिहाराय रौद्रीदर्पणयन्त्रकम् ॥ ४७ ॥