बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहस्तलेख कापी संख्या ११-
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे-वह यह 'यन्त्रसर्वस्व' में कहा है-
कृष्णसीस चाञ्जनिक वज्रतुण्ड समांशत ।
संयोज्य मत्स्यमूषाया काकव्यासटिकान्तरे ॥ १ ॥
विन्यस्य शतकक्षोष्णवेगात् संगालयेत् तत ।
तद्रस यन्त्रमध्यास्ये निषिञ्चेद् विधिवच्छनै ॥ २ ॥
भवेत् तमोगर्भलोहस्सूक्ष्मश्शुद्धो लघुर्दृढ ।
एतल्लोहेनैव कार्यं तमोयन्त्र न चान्यथा ॥ ३ ॥
वितस्तित्रयमायाम वितस्त्यर्धोन्नति क्रमात् ।
चतुरस्रं वर्तुलं वा पीठं कुर्याद् यथाविधि ॥ ४ ॥
तन्मध्ये स्थापयेच्छङ्कु तत्पुरोभागतस्तथा ।
निशाटद्रावकस्थान कल्पयित्वा तथैव हि ॥ ५ ॥
काला सीसा, सुरमा, वज्रतुण्ड-थूहर। ये तीनों समानरूप में मिलाकर मत्स्यमूषानामक बोतल
में डाल कर काकव्यासटिका नामक कुण्ड के अन्दर रख कर १०० दर्जे की उष्णता के वेग से
गलावे फिर उस पिघले रस को यन्त्रमध्य के मुख में धीरे से विधिवत् भर दे, वह तमोगर्भ लोह सूक्ष्म
शुद्ध लघु दृढ हो जावे । इस लोहे से ही तमोयन्त्र करना चाहिये अन्यथा नहीं । ३ बालिश्त लम्बा आधा
बालिश्त ऊंचाई चौकोण या गोल पीठ यथाविधि करे, उसके मध्य में तथा सामने शंकु स्थापित करे ।
निशाटद्रावक-गूगल के द्रावक का स्थान बना कर तथा--॥ १-५ ॥
तमो*द्रेकादर्शक केन्द्रस्थान तत्पश्चिमे क्रमात् ।
रश्म्याकर्षणनालस्य स्थान प्राच्या प्रकल्पयेत् ॥ ६ ॥
तदूर्ध्वं नालसन्धिस्थान प्रकल्प्य तत परम् ।
तन्त्रीसन्धानचक्रस्य स्थान मध्यकेन्द्रके ॥ ७ ॥
कीलोचालनचक्रस्य स्थान तद्दक्षिणे न्यसेत् ।
एव यन्त्रस्य रचनाक्रममुक्त्वा समासतः ॥ ८ ॥
- तम उद्रेकात्-तमोद्रेक इति सन्धिराषं ।