बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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विद्युद्दर्पणयन्त्र ] [ १६७
कुरङ्ग-अकर्करा, पञ्चास्य ?-लोहभेद ?, विरञ्चि ?, शोणज-शोणसम्भव-पिप्पलीमूल या शोण-
सिन्दूर, सुशर्कर-सुन्दर रेत, स्फटिक-स्फटिकमणि-बिल्लौर, कुट्म ?-कुट-शिलाचूर्ण, नीरज-नीरज-मोती,
सुएहालिक ?-हस्तीशुण्डावृक्ष ?, पारद-पारा, क्षार-सज्जी क्षार, टङ्कण-सुहागा, विडौज-विड़लवण
का सत्त्व, पिङ्ग ?-हरिताल, अभ्र-नीलाथोथा, वराटिका-कौड़ी, कर्बुर-स्वर्ण ?, या आमाहल्दी या गन्ध-
पलाशी' । १०, १ ?, ४, ३, १२, २, ३, ७, ११, ७ ?, १४, ३, २२, १८, ५, ११, भाग, क्रमशः शोधित-
।।१०६-११०।।
सङ्गृह्य सन्तोल्य पृथक् पृथक् क्रमात् सम्पूर्य पञ्चास्यकमूषमध्ये ।
विश्वोदरव्यासटिकान्तरे दृढम् । विन्यस्य पञ्चाननभस्त्रिकामुखात् ।।
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