बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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तस्मात् सङ्गृह्य नामानि प्रसङ्गत्यात्र कानिचित् ।
स्फोटादिमहाघनरवान्तान्यत्र प्रकीर्त्यन्ते ॥ १३६ ॥
स्फोटा रवोत्यन्तसूक्ष्मो मन्दोतिमन्दक ।
प्रतितीव्रो तीव्रतरो मध्यश्चातिमध्यम ॥ १३७ ॥
महारवो घनरवो महाघनरवस्तथा ॥ इत्यादि ॥
अब शब्द के स्वरूप का व्याख्यान करेंगे । श, ब, द, बिसर्ग ( : ) के मेल से 'शब्द' कहते
हैं । उनमें 'श' बिन्दु - अणु - जलकण - अभ्र, 'ब' अग्नि, 'द' वायु, विसर्ग ( : ) आकाश यह
यह निर्णय है । स्थावर में या जङ्गम में इनका यथाभाग- भागानुरूप जहा जहा शक्तिया सम्मिलित हैं
वहां वहा ३०४ शब्द भेद होते हैं, ३०४ शब्द हैं यह ब्राह्मण में भी कहा है । ३०४ शब्दों का निर्णय है ।
जैसा कि धुण्डिनाथ ने 'सर्वशब्दनिबन्धन, में कहा है । वहा से लेकर प्रसङ्गत कुछ नाम स्फोट आदि
महाघनरवपर्यन्त यहा कहे जाते हैं । वे स्फोट, रव, अत्यन्त सूक्ष्म, मन्द, अतिमन्दक, अतितीव्र, तीव्रतर,
मध्यम, अतिमध्यम, महारव, घनरव, महाघनरव हैं ॥ १३५-१३७ ॥
यन्त्रसर्वस्वेपि - यन्त्रसर्वस्व में भी कहा है-
वारुणीवाताशनीना शब्दसम्मेलनात् स्वत ।
आकाशाष्टमपरिधिकेन्द्रे त्यन्तभयावहू ॥ १३८ ॥
भवेन्महाघनरवश्श्रोत्रेन्द्रियविदारक ।
तस्मिन् यानप्रवेशस्स्याद् यदि यानस्थयन्तॄणाम् ॥ १३६ ॥
क्षणमात्रेण बाधिर्यं भवेत् तच्छब्दवेगत ।
तस्मात् तत्परिहाराय शब्दकेन्द्रमुखाभिधम् ॥ १४० ॥
व्योमयाने स्थापनाथं सग्रहेण निरूप्यते ।
आाकाशपरिधिमण्डलस्य यथाक्रमम् ॥ १४१ ॥
सप्तोत्तरत्रिशत्केन्द्रा इत्युच्यते बुधै ।
तेषु सप्ततिमात् केन्द्रात् समायात्यतिभीषणम् ॥ १४२ ॥
वारुणीशक्तिसम्भूतशब्दोत्यन्त भयावह ।
तथैवावातसम्भूतशब्दश्चात्यन्तघोषक ॥ १४३ ॥
द्वादशोत्तरत्रिशतकेन्द्रादागच्छति क्रमात् ।
तथैवाशनिशब्दश्च द्वयशीतिमकेन्द्रत ॥ १४४ ॥
एतच्छब्दत्रय सम्यग् मिलित्वाथ परस्परम् ।
भवेन्महाघनरवस्सर्व श्रोत्रविदारकः ॥ १४५ ॥
तेन यानप्रयातॄणा बाधिर्यं प्रभवेद्गत ।
एकैकशब्दकेन्द्राभिमुखतस्सुदृढ यथा ॥ १४६ ॥
‡ वचनव्यत्यय ।