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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 189, कुल 368 में से

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पृष्ठ 189

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  • Verse 103-107:
    तडित्सङ्कलनं वर्ष ऋतौ मेघेषु पञ्चधा ।
    वारुण्यग्निमुखादण्डमहारावशिका इति ॥१०३॥
    तेषु वारुण्यग्निमुखविद्युतावतिवेगत ।
    मुहुर्मुहु प्रचलतस्स्वतो मेघेषु वार्षिके ॥१०४॥
    पश्चाद् यानस्थरौद्रादिदर्पणैस्तावभावपि ।
    आकृष्येते स्वभावेन पश्चात् सम्मेलनं तयो. ॥१०५॥
    परस्पर भवेत् तस्मान्महानग्नि प्रजायते ।
    तेन दग्धो भवेद् व्योमयानस्तत्क्षणात् क्रमात् ॥१०६॥
    अतस्तत्परिहारार्थं मुखदक्षिणकेन्द्रयो ।
    विमाने स्थापयेद् विद्युद्यन्त्र सम्यग्यथाविधि ॥१०७॥ इत्यादि ॥

  • Hindi translation:
    `वर्षा ऋतु में मेघों में विद्युत् का सङ्कलन पांच प्रकार का होता है, जो कि वारुणि