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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 183

१६० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
यानस्याथ केन्द्रदेशे स्थापयेद् विधिवत् क्रमात् ।
तस्माद् विमानसंरक्षण भवेदिति निर्णयतम् ॥ ४८ ॥ इत्यादि ।
ईषादण्ड-पृथिवी और सूर्य की दृष्ट समान गति रेखा के निऋतिकोणवाले केन्द्र मागों से
बिशेषतः जो सूर्यकिरण सम्यक् प्रसार करती हैं वे सब ऋतु के भेद से शक्त्यावर्त-शक्ति के घुमेर में
गिरती हैं वहां के शक्तिसंयोग से किरणों में विशेषत. वेग से सर्वविदाहक ज्वालाएं प्रकट हो जाती हैं
उन ज्वालाओं के सन्धिकेन्द्रों में यदि विमान सञ्चार करे तो तुरन्त उनके वेग से भस्म हो जावे अत
उसके परिहार के लिये रौद्रीदर्पणयन्त्र विमान के नीचले केन्द्रदेश में विधिवत् स्थापित करे उस से
विमान का संरक्षण हो जावे यह निर्णय है ॥ ४४-४८ ॥
यन्त्रसर्वस्वेऽपि - यन्त्रसर्वस्व में भी कहा है-
वसन्तग्रीष्मयोर्मध्यरेखाप्रान्तेषु भूरिश ।
आवृत्तशक्तिष्वंशूना प्रवेशो भवति यदा ॥ ४६ ॥
तदा सञ्जायते कोलाहलज्वालावती स्वत ।
आकाशपञ्चमकक्ष्ये विमानस्सञ्चरेद् यदि ॥ ५० ॥
तत्र कोलाहलज्वालावेगाद् भस्मीकृत भवेत् ।
तस्मात् तत्परिहाराय रौद्रीदर्पणयन्त्रकम् ॥ ५१ ॥
विमाने स्थापयेत् तस्मात् तत्स्वरूपं विविच्यते ।
यन्त्रकोलाहलज्वालाविनाशार्थं यथाविधि ॥ ५२ ॥
कुर्याद् रौद्रीदर्पणेनैवेति शास्त्रविनिर्णय ।
अन्यथा यदि कुर्वीत प्रमादस्स्यान्न संशय ॥ ५३ ॥
वसन्त और ग्रीष्म की मध्यरेखा के सिरों में अत्यधिक घूमती हुई शक्तियों में जब किरणों का
प्रवेश होता है तो कोलाहल-गूंजनेवाली ज्वालामाला स्वत प्रकट हो जाती है, आकाश के पांचवें स्तर
में विमान यदि सञ्चार कर रहा हो तो वहां कोलाहल ज्वाला के वेग से भस्म हो जावे अत उसके परि-
हार के लिये रौद्रीदर्पण यन्त्र विमान में स्थापित करे अत उसके स्वरूप का विवेचन करते हैं। कोलाहल
ज्वालाके विनाशार्थ यथाविधि यन्त्र रौद्रीदर्पण से ही करे ऐसा शास्त्र का निर्णय है अन्यथा करे तो हानि
हो इसमें संशय नहीं ॥ ४६-५३ ॥
लोहासव चुम्बकवीरटङ्कणान् पञ्चानन शून्यमयूरसज्जकान् ।
माध्वीकचञ्चुमुखसूर्यवर्चुलान् रुक्मालिकाशार्करपञ्चपादुकांन् ॥ ५४ ॥
एतान् त्रिसंशोधितशुद्धवस्तून संगृह्य सन्तोल्य समाशत क्रमात् ।
पद्मास्यमूषामुखमध्यरन्ध्रे सम्पूर्य विश्वोदरकुण्डमध्ये ॥ ५५ ॥
संस्थाप्य पश्चाद् विंशतोष्णकक्ष्यप्रमाणतो भस्त्रामुखाद् यथाविधि ।
सगाल्य नेत्रान्तमत पर शनैस्सङ्गृह्य तद्यन्त्रमुखान्तराले ॥ ५६ ॥