बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरौद्रीदर्पणयन्त्र ] [ १६१
सम्पूरित चेत् सुदृढ सुसूक्ष्म वृष्ण विशुद्ध ज्वलान्तक लघु ।
अन्तःप्रकाश विमल मनोहर भवेद् रौद्रीदर्पणमद्भुत हि ॥ ५७ ॥
लोहास्त्र-लोहद्राव या लोहे का मार, चुम्बक, वोर-लोहा, सुहागा, पञ्चाननलोहा, शून्य-अभ्रक,
मयूरसञ्जक ?, माक्षीक-मधुद्राव, चञ्चू-चञ्चु-रक्तएरण्ड, मुख-वडइल, सौञ्चल नमक, रुक्म-स्वर्ण
या लोहा, अलिक-भ्रमर ?, शार्क-लोध, पद्म-कड़वा परवल, पादुक ? । तीन बार शोधी हुई इन
वस्तुओं को लेकर समान तोलकर पद्मास्य बोतल के मुखमध्यछिद्र में भरकर विश्वोदर कुण्ड के मध्य में
रख कर पश्चात् २० या १२० दर्जे माप की भस्त्रामुख से यथाविधि नेत्रपर्यन्त गलाकर धीरे से लेकर
उस यन्त्रमुख के अन्दर यदि भर दे तो सुदृढ अति सूक्ष्म वृष्ण विशुद्ध ज्वलनान्तक हल्का अन्दर प्रकाश
मान विमल मनोहर अद्भुत रौद्रीदर्पण हो जावे ॥ ५४-५७ ॥
एतद्रौद्रीदर्पणेन सुसूक्ष्मेण यथाविधि ।
वितस्तिषोडशायाम पीठ कुर्यात् सुवर्तुलम् ॥ ५८ ॥
यावद्वानप्रमाणस्यात् तावन्मात्र यथाविधि ।
पञ्चविंशत्यङ्गुलप्रमाणगात्र दृढ लघु ॥ ५९ ॥
कृत्वा दण्ड पीठमध्यकेन्द्रे संस्थापयेद् दृढम् ।
सङ्कोचनप्रसारणकीलकद्वयमद्भुतम् ॥ ६० ॥
अनुलोमविलोमाभ्या दण्डाग्रे स्थापयेत् क्रमात् ।
तदधश्शलाकावरणचक्र सन्धारयेत् क्रमात् ॥ ६१ ॥
यथा यानस्यावरक समग्र स्यात् तथैव हि ।
शलाकाद्वयमध्ये पञ्चाशदङ्गु लमन्तरम् ॥ ६२ ॥
कृत्वा शलाकान् परितश्चक्रे सन्धारयेत् क्रमात् ।
अकसीद्रोणसौरम्भभण्टिकातैलसंस्कृतम् ॥ ६३ ॥
इस अति सूक्ष्म रौद्रीदर्पण से यथाविधि १६ बालिश्त लम्बा गोल पीठ विमान के प्रमाणा-
नुसार बनावे, २५ अङ्गुल मोटा बनाकर दण्ड को पीठ के मध्य केन्द्र में संस्थापित करे, फिर सङ्कोचन
और प्रसारण के साधनभूत दो पेंचों को सीधे और उलटे ढंग से दण्ड के अग्रभाग पर लगावे । उसके
नीचे शलाकाओं को घेरने ढकने वाला चक्र लगावे जिस से समग्र विमान का आवरक-ढकने वाला हो
जावे । दो शलाकाओं के मध्य में १५ अङ्गुल का अन्तर दे कर शलाकाओं को सब ओर चक्र में लगावे
"अकसी-अलसी द्रोण-हरिचन्दन या द्रोणपुष्पी ? सौरम्भ-सौरभ-राल या शिलारस ? भण्टिका-
मजीठ" इन के तैल से संस्कृत-शुद्ध शोभायमान बनाया हुआ-॥ ५८-६३ ॥
रौद्रीदर्पणसंसिद्धपत्रायण्य पृथक् पृथक् ।
शलाकोपरि सन्धार्य बध्नीयात् सूक्ष्मकीलकै ॥ ६४ ॥
रौद्रीदर्पणसंसिद्धमणीन् पञ्चमुखान् तथा ।
सन्धारयेत् तैलशुद्धान् शलाकाग्रे पृथक् पृथक् ॥६५॥