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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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१७२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
धुण्डिड कन्द ? के रस से भी सूर्यपुट-धूप देकर रखे । इस प्रकार संस्कार करने से शब्दोपसंहार शक्ति
स्वतः कपिचर्म में आ जाती है ॥ १४८-१५३ ॥
वितस्तिद्वयमायामं विस्त्ये (त ?) कोन्नतिं क्रमात् ।
बधिराख्येन लोहेन पेटिकां कारयेद् दृढम् ॥१५४॥
तन्मध्ये बधिरलोहनालद्वयमतः परम् ।
वक्रास्यं स्थापयेत् पश्चादूर्ध्वं शास्त्रमानतः ॥१५५॥
शब्दपादर्पणकृतच्छत्रिं सन्धारयेत् ततः ।
तन्मणिं च सुसंस्कृत्य तुलसीबीजतैलकैः ॥१५६॥
कपिचर्मणि सम्धार्य बल्व्याक्तात् सन्नियोजयेत् ।
दो बालिश्त लम्बा एक बालिश्त ऊंचा बधिर नामक लोहे से पेटिका-छोटा बक्स बनवाए,
उसके मध्य में बधिरलोह की दो नालें बगुले के मुखाकारवाली स्थापित करे पश्चात् शास्त्रीति से ऊपर
शब्द या दर्पण से बनी छत्री लगावे और तुलसी बीजों से संस्कृत उस मणि को भी कपिचर्म-बन्दर या
लंगूर के चर्म में रखकर लपेटकर बल्व्याक्त-गेण्डे के सींग के चेप या कांटे से युक्त करे ॥१५४-१५६॥
बल्व्याको नाम खङ्गशुल्यनिर्यास - इत्युक्तः गेण्ड के सींग का निर्यास-चेप या
पक्व काढा ।
पेटिकामध्यकेन्द्रस्थदक्षनालान्तरे दृढम् ॥१५७॥
पूर्वोक्तचर्मसहितमणिं सन्धारयेत् तथा ।
वामनाले पञ्चनखचर्ममात्रं नियोजयेत् ॥१५८॥
सूक्ष्मतन्त्रीन् सुसंयोज्य परस्परमतः परम् ।
बध्नीयात् तत्संवतस्सम्यक् सूक्ष्मकीलकशङ्कुभिः ॥१५६॥
पेटिकावरणादूर्ध्वं सिंहास्याकारतः क्रमात् ।
कृत्वा तच्चर्मणा तस्य मूलनालान्तरे तत ॥१६०॥
छिद्रं कृत्वातिसूक्ष्मेण तन्त्रीनालाद् यथाविधि ।
पेटिकान्तरनालस्थमणिं संयोजयेद् दृढम् ॥१६१॥
पेटिकस्योर्ध्वावरणाभागमाच्छाद्य बन्धयेत् ।
पेटिका के मध्यकेन्द्र में स्थित दक्ष-दक्षिण नाल के अन्दर पूर्वोक्त चर्मसहित मणि को
लगावे, वाम नाल में पञ्चनखचर्ममात्र नियुक्त करे। सूक्ष्म तारों को परस्पर लगाकर सूक्ष्मकील शंकुओं
से बान्ध दे, पेटिकावरण से उपर सिंहास्याकार से बनाकर उस चर्म से उसके मूल के अन्दर करके अति
सूक्ष्म छिद्र करके उसमें से तार की नाल से पेटिका के अन्दर नाल में स्थित मणि में संयुक्त करके
पेटिका ऊपरी आवरण भाग को ढककर बान्ध दे ॥१५७-१६१॥
बधिरलोहमुक्तं लोहतन्त्रप्रकरणे—बधिरलोहा कहा है लोहतन्त्रप्रकरण में —
† यहाँ से १६८ श्लोकपर्यन्त पाठ पूनाफोटो में अधिक मिला।