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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

६६ ] बृहद् विमानशास्त्र
तथाऽर्ककिरणाकर्षणदर्पणाप्रकल्पितम् ।
नालमेक ततो यानस्योर्ध्वकेन्द्रस्य दर्पणे ॥१०६॥
प्रतिबिम्बितसूर्यस्य किरणाकर्षकायुतम् ।
नालमेक व्योमयानशिरोमणिरत परम् ॥१०७॥
सन्धानकीलक सूर्यकिरणाना विमानके ।
इति त्रयोविंशदङ्गान्युकानि स्युर्यथाक्रमम् ॥१०८॥
एवमुक्त्वा विमानाङ्गान्यथ तद्रचनाक्रमम् ।
सग्रहेण यथाशास्त्र समालोढ्य प्रचक्षते ॥१०६॥
वितस्तिद्वादशायाम विस्तृत तावदेव हि ।
आदौ प्रकल्पयेत् कृष्णपिप्पलदारुणा ॥११०॥
तथा सूर्य किरणाकर्षणदर्पण से बना एक नाल, फिर ऊर्ध्व केन्द्र के दर्पण में प्रतिबिम्बित
सूर्य के किरणाकर्षक से युक्त एक नाल, विमान की शिरोमणि, विमान में सूर्य किरणों को जोड़ने वाली
कील, ये २३ अङ्ग कहे हैं। इस प्रकार विमान के अङ्गों को कहकर उनके रचना-क्रम को सङ्क्षेप से
शास्त्रानुसार आलोड़न करके कहते हैं। १२ बालिशत लम्बा उतना ही चौड़ा पहिले कृष्णपिप्पल की लकड़ी
से बनावे ॥ १०६—११० ॥
पञ्चत्रिंशतिमादर्शवरघेनावृत यथा ।
पश्चात् तस्मिन् त्रयोविंशत्केन्द्राणि परिकल्पयेत् ॥१११॥
तत केन्द्रानुसारेण कुर्याद् रेखाप्रसारणम् ।
रेखानुसारत केन्द्रस्थानेष्वथ यथाविधि ॥११२॥
प्रदक्षिणावर्तकीलान् स्थापयेत् सुदृढ यथा ।
दर्पणेन कृतान् नालान् गर्भ तन्त्रीसमन्वितान् ॥११३॥
केन्द्रात् केन्द्रान्तरावर्तकीलमूलावधिक्रमात् ।
रेखामार्गानुसारेण प्रत्येक योजयेत् तत ॥११४॥
वितस्तिपञ्चकायाम गात्रे त्वेकवितस्तिकम् ।
मध्ये वितस्त्यष्टकमानगात्रेण समाकुलम् ॥११५॥
३५ वें आदर्श-दर्पण के बने आवरण से आवृत-ढका या घिरा हुआ, फिर उसमें २३ केन्द्र
बनावे, फिर केन्द्रानुसार रेखा प्रसारण करे, रेखानुसार केन्द्र स्थानों में यथाविधि घूमने वाले पेंच दृढ़
स्थापित करे, दर्पण से बनाए नालों को जिनके गर्भ में तार हों उन्हें केन्द्र से केन्द्र की अवधि तक क्रम
से रेखामार्गानुसार प्रत्येक को रखे जो पांच बालिशत लम्बा मोटा एक बालिशत मध्य में ८ बालिशत
मोटाई से युक्त हो ॥ १११—११५ ॥
तथैव कण्ठेष्टादशाङ्गुलगात्रसमन्वितम् ।
मूले वितस्तिप्रमाणगात्रदण्डविराजितम् ॥११६॥

परिवेषक्रियाधिकरण ] [ ६७
वितस्तिदशविस्तारास्ययुक्तं मनोहरम् ।
सप्तत्रिंशतिमादर्शनालस्तम्भ यथाविधि ॥११७॥
त्रिचक्रकीलैस्संयोज्य तन्मध्ये स्थापयेद् दृढम् ।
तस्येशान्यक्रमादष्टद्रावकान् दिक्षु विन्यसेत् ॥११८॥
तद्द्नावकाभिधानानि यथोक्तान्यत्रिणा क्रमात् ।
तान्येवात्र प्रवक्ष्यामि समालोच्य यथामति ॥११६॥
कण्टक कान्तजस्तार्थ्यो नागो गौरी विपन्ध्यय ।
खद्योतो ज्वलनश्चेति वर्णिता द्रावका क्रमात् ॥१२०॥
उसी प्रकार कण्ठ में १८ अंगुल मोटा, मूल में बालिश्तभर मोटे दण्ड से युक्त १० बालिश्त
चौड़े मुखवाला सुन्दर ३७ वें आदर्श से बना नालस्तम्भ यथाविधि, तीन चक्रोंवाले कीलों से युक्त करके
उनके मध्य में स्थापित करे, उसके ईशान्य क्रम से ८ द्रावकों को ८ दिशाओं में रखे उन द्रावकों के
नाम जैसे अत्रि ने कहे हैं क्रम से उन्हें ही यहां विचार कर यथामति कहूंगा वे ई 'कण्टक, कान्तज,
ताक्ष्यं, नाग, गौरी, विपन्ध्यय, खद्योत, ज्वलन,' ये द्रावक कहे हैं ॥ ११८-१२० ॥
विज्ञप्ति—१२१ से १२७ श्लोक अप्राप्त हैं।
कान्तजद्रावक पारादर्शपात्रे प्रपूरयेत् ॥ १२८ ॥
विरिञ्च्यादर्शपात्रेथ नागद्रावक तयैव हि ।
स्फुटिकादर्शपात्रे तु खद्योतद्रावकं न्यसेत् ॥ १२६ ॥
वालुकादर्शपात्रेथ गौरीद्राव प्रपूरयेत् ।
सुरग्रन्थिकादर्शपात्रे विपन्ध्यद्रावकम् ॥ १३० ॥
पञ्चमृद्दर्पणपात्रे ज्वलनद्रावकं न्यसेत् ।
अष्टपात्रे ष्वष्टद्रावान् सम्पूर्य विधिवत् क्रमात् ॥ १३१ ॥
उक्ताष्टदिक्षु विधिवत् विन्यसेत् सुदृढं यथा ।
अष्टदिक्ष्वष्टपात्रस्थाष्टद्रावकेष्वध क्रमात् ॥ १३२ ॥
संयोजयेदष्टमणीन् मणिप्रकरणेरितान् ।
तेषा नामानि वक्ष्यामि समालोच्य यथामति ॥ १३३ ॥
कान्तज द्रावक को पारादर्शपात्र में भर दे, नागद्रावक को विरिञ्च—आदर्श पात्र में, खद्योत-
द्रावक को स्फुटिकादर्श पात्र में रख दे, गौरीद्रावक को बालुकादर्श पात्र में, विपन्ध्यद्रावक को सुरग्रन्थि-
कादर्श पात्र में, ज्वलनद्रावक को पञ्चमृद्दर्पण पात्र में, भर कर क्रम से उक्त आठ दिशाओं में रख दे ।
आठ दिशाओं में आठ पात्रस्थ आठ द्रावकों में नीचे के क्रम से मणिप्रकरण में कही आठ मणियों को
संयुक्त करे, उनके नाम विवेचन करके यथामति कहूँगा ॥ १२८-१३३ ॥
तदुक्तं मणिप्रकरणे—वह कहा है मणिप्रकरण में—

६८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
धूमास्यो घनगर्भश्च शल्याकश्शारिकस्तथा ।
तुवास्यस्सोमकश्शङ्खौशुपश्चेत्यष्टधा स्मृता ॥ १३४ ॥
मणीना नामधेयानि एवमुक्त्वा यथाक्रमम् ।
विनियोग प्रवक्ष्यामि तेषा शास्त्रोक्तवर्त्मना ॥ १३५ ॥
रुक्मद्रावे तु धूमास्यमणि मध्ये विनिक्षिपेत् ।
तथैव कान्तजद्रावे घनगर्भमणि न्यसेत् ॥ १३६ ॥
काष्ण्यंद्रवेथ शल्याक शारिक नागद्रावके ।
गौरीद्रावके तुषास्य च शङ्ख ज्वलनद्रावके ॥ १३७ ॥
विन्ध्यद्रायकेथ सोमक तद्वदेव हि ।
खद्योतद्रावके पश्चादशुपारूयमणि क्रमात् ॥ १३८ ॥
एवमष्टमणीनष्टद्रावेषु नियोजयेत् ।
पश्चात् तेषा पुरोभागे समरेखान्तरे क्रमात् ॥ १३९ ॥
स्थापयेद् विधिवच्छुद्धान् शल्याकर्पणदर्पणान् ।
भरद्वाजोक्तनामानि तेषामत्र यथाक्रमम् ॥ १४० ॥
प्रवक्ष्यामि समालोच्य सग्रहेण यथामति ॥ १४१ ॥
धूमास्य, घनगर्भ, शल्याक, शारिक, तुषास्य, सोमक, शङ्ख, अशुप ये आठ प्रकार की कही हैं ।
यथाक्रम मणियों के नाम कहे हैं उनके विनियोग को शास्त्रोक्त मार्ग से कहूंगा । धूमास्य मणि को तो
रुक्म द्राव में डाल दे, घनगर्भ मणि को कान्तज द्राव में, शल्याक मणि को काष्ण्य द्राव में, शारिक मणि
को नागद्राव में, तुषास्य मणि को गौरीद्राव में, शङ्खमणि को ज्वलनद्रावक मे, सोमक मणि को विन्ध्य
द्रावक में, अ शुप मणि को खद्योत द्राव में । इस प्रकार आठ मणियों को आठ द्रावकों में नियुक्त करे
फिर उनके सामने वाले भाग में समान रेखान्तर में क्रम से विधिपूर्वक शुद्ध दर्पणों को स्थापित करे ।
भरद्वाज के कहे उनके नाम यथाक्रम विवेचन कर संक्षेप से यथामति कहूंगा ॥ १३४-१४१ ॥
तदुक्त दर्पणप्रकरणे-वह कहा है दर्पणप्रकरण में-
तारास्योपवनास्यश्च धूमास्यो वारुणास्यक ।
जलगर्भोग्निमित्रश्च छायास्यो भानुकण्ठक ॥ १४२ ॥
इति दर्पणनामानि कीर्तितान्यष्टधा क्रमात् ।
एवमुक्त्वाष्ट नामानि दर्पणाना यथाक्रमात् ॥ १४३ ॥
अथ तेषा यथाशास्त्र विनियोगक्रमोच्यते* ।
धूमास्यमणिरेखाया विहायाय षडङ्गुलम् ॥ १४४ ॥
तारास्यदर्पण तत्र मणोरभिमुख यथा ।
स्थापयेदूर्ध्वप्रदेशे कीलकयुक्तशलाकया ॥ १४५ ॥
• क्रम उच्यते-क्रमोच्यते सन्धिराषं ।

परिवेषक्रियाधिकरण ] [ ६६
घनगर्भमणे प्रान्तरेखायामपि पूर्ववत् ।
स्थापयेत् पवनास्याख्यदर्पण सुदृढ यथा ॥ १४६ ॥
धूमास्यदर्पण शल्याकरेखाया तथैव हि ।
वारुणास्यदर्पण तु रेखाया शारिकामणे ॥ १४७ ॥
तथा सोमरेखाया जलगर्भाख्यदर्पणम् ।
तुषाम्यमणिरेखायामग्निमित्राख्यदर्पणम् ॥ १४८ ॥
तारास्य, पवनास्य,धूमास्य, वारुणास्य, जलगर्भ, अग्निमित्र, छायास्य ये आठ प्रकार के दर्पण
नाम कहे हैं । इस प्रकार दर्पणों के यथाक्रम नाम कह कर उनका यथाशास्त्र विनियोग क्रम कहा जाता
है । धूमास्य मणि की रेखा में छ अ गुल छोड़ कर तारास्य दर्पण को मणि के सम्मुख ऊपर प्रदेश में
कील से युक्त शलाका से रखे, घनगर्भ मणि की प्रान्त रेखा में पवनास्य दर्पण को स्थापित करे, धूमास्य
दर्पण को शल्याक मणि की रेखा में तथा वारुणास्य दर्पण को शारिकमणि की रेखा में तथा जलगर्भ
नामक दर्पण को सोमक मणि की रेखा में अग्निमित्र नामक दर्पण को तुषास्य मणि की रेखा में सीध
में रखे ॥ १४२-१४८ ॥
छायास्यदर्पण शङ्खमणिरेखान्तरे तथा ।
अ शुपमणिरेखाया भानुकण्ठदर्पणम् ॥ १४६ ॥
एव क्रमेण विधिवत् पूर्वोक्तेनैव वर्त्मना ।
स्थापयेच्छक्त्याकर्षणदर्पणान् सुदृढान् क्रमात् ॥ १५० ॥
अथ तत्पश्चिमे केन्द्रे शक्तितन्त्रे भिवर्णितम् ।
नवम स्थापयेद् विद्युच्छक्तियन्त्र सकीलकम् ॥ १५१ ॥
अथ ताम्रावर्ततन्त्रीन् चर्मपञ्चके वेष्टितान् ।
प्रसारयेच्छक्तियन्त्रात् सर्वत्र विधिवत् समम् ॥ १५२ ॥
त्वक्पञ्चकस्य नामानि सग्रेहेण यथामति ।
क्रियासारोक्तरीत्यात्र कथ्यन्तेन्विष्य च क्रमात् ॥ १५३ ॥
गे (घे ?) ण्डाकूर्मश्वाखुशशनक्राणा च यथाक्रमम् ।
चर्माणि पञ्च प्रोक्तानि मुनिभिशास्त्रवित्तमै ॥ १५४ ॥
छायास्य दर्पण को शङ्ख मणि की सीध में तथा भानुकण्ठ दर्पण को अशुप मणि की रेखा में
रखे । इस प्रकार विधिपूर्वक पूर्वोक्त मार्ग से शक्त्याकर्षण दर्पणों को स्थापित करे । फिर उनके पश्चिम
केन्द्र में शक्तितन्त्र में वर्णित नवम विद्युत्—शक्ति यन्त्र को कीलसहित स्थापित करे, पुन ताम्बे से
घिरे तारों को पाच चर्म में लिपटे हुओं को शक्ति यन्त्र से विधिवत् समानरूप में प्रसारित करे, पांच
चर्मों के नाम संक्षेप से यथामति क्रियासार ग्रन्थ की रीति से यहां खोजकर कहे जाते हैं । गेण्डा, कछवा,
श्वाखु, शश, नाका यथाक्रम पांच चर्म शास्त्रज्ञ मुनियों ने कहे हैं ॥ १४६-१५४ ॥
—••—❖—••—

हस्तलेख रजिस्टर २, कापी संख्या ७—
त्वङ्निर्णयाधिकारेपि—त्वचा के निर्णय-अधिकार में भी कहा है—
आसनार्थं द्रावकाणां तन्त्रीणां वेष्टनाय च ।
पञ्च चर्माणि शास्त्रेषु प्रोक्तानि ज्ञानवित्तमै ॥ १ ॥
गेण्डाकूर्मश्वाखुशशनक्राणां च यथाक्रमम् ।
चर्माणि पञ्च प्रोक्तानि वेष्टनासननिर्णये ॥ २ ॥ इत्यादि ॥
विमान में आसनार्थ और द्रावकतारों के लपेटने के लिए पांच चर्म शास्त्रों में विशेष ज्ञानी जनों
ने कहे हैं । गेण्डा, कछुवा, कुत्ता, चूहा शश, मगर के यथाक्रम पांच चर्म वेष्टन आसन के निर्णयप्रसंग
में कहे हैं ॥ १-२ ॥
चर्मवेष्टिततन्त्रीभिर्विद्युच्छक्तिप्रसारणम् ।
कुर्याच्छास्त्रानुसारेण समयोचितकर्मसु ॥ ३ ॥
भ्रामणीकीलकं पश्चात् स्थापयेद् द्वादशान्तरे ।
एतत्सञ्चालनात् सर्वकेन्द्रकीलप्रचालनम् ॥ ४ ॥
यथा भवेत् तथा सम्यक् शास्त्रदृष्टेन वर्त्मना ।
अथ तच्चलनमार्गमनुसृत्य यथाविधि ॥ ५ ॥
चर्म से लिपटे तारों से विद्युत्-शक्ति का प्रसार शास्त्रानुसार समयोचित कार्यों में करे,
द्वादश (बालिश्त) के अन्तर पर या १२ कीलों के मध्य भ्रामणी—घुमाने वाली कील स्थापित करे इसके
सञ्चालन से सब केन्द्र कीलों का प्रचालन जिससे हो जावे वैसे सम्यक् शास्त्रदृष्ट मार्ग से उनके चलन-
मार्ग का यथाविधि अनुसरण करके—॥ ३-५ ॥
नवमे चाष्टमे केन्द्रे दशमेथ त्रयोदशे ।
द्वादश्यां* षोडशे पञ्चदशैकादशकेन्द्रके ॥ ६ ॥
एतेष्वष्टसु केन्द्रेषु तत्तद्रेखानुसारतः ।
शक्तिस्थापनपात्राणि स्थापयेत् सुदृढं यथा ॥ ७ ॥
एवमष्टसु केन्द्रेषु शक्तिपात्राण्यथाक्रमम् ।
संस्थाप्य पश्चात् तत्सम्मेलपात्रं यथाविधि ॥ ८ ॥

  • अत्र लिङ्गव्यत्यय ।

वातसंयोजकाधिकरण ] [ १०१
त्रयोविंशत्केन्द्रेखावर्त्तकीलमुखे न्यसेत् ।
अथ तद्दक्षिणे पार्श्वे एकोनविंशकेन्द्रके ॥ ६ ॥
वातसंयोजकं पात्रं स्थापयेत् सुदृढं यथा ।
नौवें आठवें दशवें बारहवें सोलहवें पन्द्रहवें ग्यारहवें केन्द्र में, इन आठ केन्द्रों में उस उस
रेखानुसार शक्तिस्थापन यन्त्र सुदृढ़ क्रम में स्थापित करे । इस प्रकार आठ केन्द्रों में शक्तिपात्र यथाक्रम
स्थापित करके पश्चात् उनके सम्मेलन पात्र को भी यथाविधि तेरहवें केन्द्र रेखावर्तकीलमुख—रेखा पर
घूमने वाले पेंच के मुख में लगा दे । फिर दक्षिण पार्श्व में उन्नीसवें केन्द्र में वातसंयोजक यन्त्र को
सुदृढ़ स्थापित करे ॥ ६-६ ॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—वह यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में कहा है—
विद्युत्तन्त्रीसमायोगाच्छतलिङ्गप्रमाणात ॥ १० ॥
भ्राम्यमाणं पञ्चचक्रैस्संयुतं मध्यकेन्द्रके ।
पूर्वपश्चिमकेन्द्रस्थमुखभागे यथाक्रमम् ॥ ११ ॥
सभस्त्रिकादण्डनालयुग्मकीलैर्विराजितम् ।
वातकोशद्वयाविष्ठमास्यत्रयसमन्वितम् ॥ १२ ॥
वातस्तम्भनषट्‌चक्रकीलकेस्सुविराजितम् ।
तथा प्रसारणीनालकीलकद्वयमण्डितम् ॥ १३ ॥
वेगातिवेगसूक्ष्मातिसूक्ष्मशान्तादिकील्कै ।
सचक्रैर्भ्राजमानं कमठाकारवत् स्थितम् ॥ १४ ॥
भारद्वयसमायुक्तमूर्ध्वचक्रविराजितम् ।
वातसंयोजकयन्त्रमित्युच्यते बुधै ॥ १५ ॥ इत्यादि ॥
विद्युत्—तारों के सम्बन्ध से सौ डिग्री माप से घुमाये हुए—घूमते हुए पांच चक्रों से संयुक्त
मध्य केन्द्र में पूर्व पश्चिम केन्द्र स्वमुख भाग में यथाक्रम भस्त्रिका दण्ड की दो नालों की कीलों से
विराजित दो वात कोश में आविष्ट तीन मुखों से युक्त वातस्तम्भन छ चक्र कीलों से सुविराजित तथा
प्रसारणी—वातप्रसारणी नाल की दो कीलों से सुसज्जित चक्रसहित वेग अतिवेग सूक्ष्म अतिसूक्ष्म
शान्त आदि कीलों से प्रकाशमान कमठाकार कच्छुवे या घड़े के आकार की भांति स्थित दो भागों से
युक्त ऊपर चक्रवाला वातसंयोजक यन्त्र बुद्धिमानों द्वारा कहा जाता है ॥ १०-१५ ॥
धूमप्रसारणयन्त्रविचार —धूमप्रसारणयन्त्र विचार प्रस्तुत करते हैं—
एवमुक्त्वा वातसंयोजकयन्त्रमत परम् ।
धूमप्रसारणयन्त्रं समग्रेण निरूप्यते ॥ १६ ॥
आस्यत्रयं पञ्चगर्भकोशं (श ?) भ्रकावृते(कै?)र्युतम् ।
कीलकत्रयसंयुक्तं शक्तिनालेन वेष्टितम् ॥ १७ ॥

१०२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
धूमकृन्मणिसंयुक्तपञ्चद्रावसमाकुलम् ।
मथनोन्मथनचक्रद्वयकीलविराजितम् ॥ १८ ॥
धूमकोशद्वयंयुक्तं भस्त्रनालेन संयुतम् ।
धूमप्रसारणनालमुखकीलविराजितम् ॥ १६ ॥
एतल्लक्षणसंयुक्तं यन्त्रं धूमप्रसारणम् ।
एतद्यन्त्रं विंशतिमे केन्द्रे संस्थापयेद् दृढम् ॥२०॥
धूमप्रसारण यन्त्रमेवमुक्त्वा तत परम् ।
परिवेषक्रियानालस्वरूपं कथ्यते क्रमात् ॥२१॥
पञ्चक्षीराम्बिकापट्टवल्कलद्वयनिर्मितम् ।
क्षीरिकापटमित्युक्तं यानकार्यक्षमं मृदु ॥२२॥
तेन निर्मितनालं यत्तदेवात्र विशेषतः ।
परिवेषक्रियानालमिति सम्यङ्निरूप्यते ॥२३॥
इस प्रकार वातसंयोजक यन्त्र कहकर इससे आगे धूमप्रसारण=धूंआं छोड़नेवाला यन्त्र सक्षेप में
निरूपित किया जाता है। तीन मुखवाले पांच गर्भकोशवाले वातचक्रों से युक्त तीन कीलों से युक्त
शक्तिनाल से लपेटा हुआ धूम करनेवाली मणि से संयुक्त पांच द्राव (ऐसिड) से पूर्ण मथन उन्मथन
दो चक्रों की कीली से विराजित दो धूमकोशों से युक्त भस्त्रनाल से संयुक्त धूमप्रसारण नाल मुखकील
से युक्त हो, इन लक्षणों से युक्त यन्त्र धूमप्रसारण है । इस यन्त्र को बीसवें केन्द्र में दृढ़ संस्थापित करे ।
धूमप्रसारण यन्त्र इस प्रकार कहकर उससे आगे परिवेषक्रियानाल का स्वरूप क्रम से कहा जाता है ।
पञ्च क्षीरा छ अम्बिका (आगे आने वाली) दोनों वल्कल (आगे कहे जाने वाले) से बना क्षीरिकापट
यानकार्य में समर्थ कहा, उससे बना नाल जो है वही यहा विशेषतः परिवेषक्रियानाल सम्यक् निरूपित
किया जाता है ॥१६—२३ ॥
उक्तं हि क्षीरीपटकल्पे — क्षीरीपटकल्प में कहा है—
दुग्धप्रणालीपटपादपाश्च पयोध (द ?) री पञ्चवटी विरञ्चि ।
वृक्षेषूक्तक्षीरिकावृक्षवर्गे इमा पञ्चक्षीरवृक्षा क्रमेण ॥२४॥
उक्ता प्रशस्ता इति क्षीरवस्त्रक्रियाविधौ शास्त्रविदा वरिष्ठै ॥२५॥
दुग्धप्रणाली ? पटपादप—सिम्बल ?, पयोधरी—नारियल वृक्ष ? या पयोविदारी—क्षीर
विदारी ? पञ्चवटी—बिल्व पीपल बढ़ अशोक गूलर, विरञ्चि ? । वृक्षों में उक्त क्षीरिका वृक्षवर्ग में ये पांच
क्षीरवृक्ष क्रम से श्रेष्ठ शास्त्रवेत्ता जनों ने क्षीरवस्त्र क्रियाविधि में प्रशस्त कहे हैं ॥ २४—२५ ॥
पटप्रदीपिकायामपि—पटप्रदीपिका में भी—
उक्तेषु क्षीरवृक्षेषु क्षीरिकापटकर्मणि ।
पयोध (द ?) री पञ्चवटीविरञ्चिः पटपादप ॥२६॥

द्वितीय अध्याय: धातु-प्रकरण (विमानोपयोगी १६ मिश्रधातुएँ)

परिवेषक्रियानालाधिकरण ] [ १०३
दुग्धप्रणालिका चेति पञ्चेमा क्षीरपादपा ।
सुप्रशस्ता इति प्रोक्ताश्शास्त्रेषु ज्ञानवित्तमै ॥२७॥ इत्यादि
क्षीरपटकर्म्म में उक्तक्षीरवृक्षों में पयोधरी-नारियलवृक्ष ? या पयोधरी-पयोविदारी-क्षीरविदारी ?
पञ्चवटी-बिल्व पीपल वट अशोक गूलर, विरञ्चि ?, पटपादप-सिम्बल ? दुग्धप्रणालिका ? ये पांच क्षीरवृक्ष
शास्त्रों में ऊंचे विद्वानों ने सुप्रशस्त कहे है ।
अम्बिकाषट्कमुक्तं क्रियासारे--छ अम्बिका क्रियासार ग्रन्थ में कहे हैं-
गोदाकन्दकुरङ्गकनिर्यामान्दोलिकावियत्सारम् ।
लविकापुष्पकक्षमामलमिति शास्त्रेऽम्बिकाषट्कम् ॥२८॥
एतत्सम्मेलनत पञ्चक्षीरेषु गणितमार्गेण ।
प्रभवेत् क्षीरीवसनशुद्धसृष्टोतिमृदुलश्च ॥२९॥ इत्यादि ॥
गोदाकन्द-गोवारकन्द-दुर्गन्धखैर, कुरङ्ग के निर्याम-अकर्करागोंद ?, आन्दोलिकावियत्सार?,
लविकापुष्पक ?, क्षमामल ?, शास्त्रों में अम्बिकाषट्क है । पाच क्षीरों में गणितरीति से इनके मिलाने
से क्षीरोवस्त्र सुदृढ़ होजावे ॥ २८-२६ ॥
वल्कलद्वयमुक्तमगतस्त्वलहर्याम्-दो वल्कल कहे हैं अगतस्त्वलहरी में-
शारिकाया पञ्चमुखी वल्कलान्त यथाक्रमम् ।
उक्तास्स्यु पञ्चसाहस्रवल्कलशास्त्रवित्तमै ॥३०॥
तेषु मिहिकपञ्चाङ्गवल्कलद्वयमेव हि ।
विमानस्योजनार्हं क्षीरिकापटनिर्णये ॥३१॥
अत्यन्तश्रेष्ठमित्याहु पटलतत्वविदा वरा ॥ इत्यादि ॥
शारिका-शारी-मुझतुरु आदि पञ्चमुखी पञ्चमुख-वासा के वल्कलपयन्त यथाक्रम कहे हैं ।
पाचसाहस्र वल्कल शास्त्रवेत्ताओं ने कहे हैं उनमें मिहिक वासा या कटेली पञ्चाङ्ग वल्कल दोनों विमान
संयोग के योग्य क्षीरिकापट-पटनिर्णय में अत्यन्त श्रेष्ठ पटतत्त्ववेत्ताओं ने कहे हैं ॥ ३०-३१ ॥
पटस्वरूपमुक्तं क्रियासारे-पटक्रियासार ग्रन्थ में कहा है-
दुग्धप्रणालिकाक्षीरमष्टभागमत परम् ।
पटवृक्षक्षीरभागा दश प्रोक्तास्तथा क्रमम् ।
पयोधरीक्षीरभागासप्त इत्युच्यते तथा ॥३३॥
क्षीरस्याष्टादशाशस्यात्पञ्चवट्या यथाक्रमम् ।
द्वादशाश विरञ्चिक्षीरमुक्त शास्त्रत क्रमात् ॥३४॥
एवमुक्त्वा क्षीरिकाशान् सङ्ख्या शास्त्रतस्स्फुटम् ।
अयेदानी यथाशास्त्र क्षोरिकापटनिर्णये ॥३५॥
दुग्धप्रणालिका का दूध ८ भाग, पटवृक्ष का दूध १० भाग पयोधरी का दूध ७ भाग पञ्चवटी
का दूध १८ भाग विरञ्चि (दूधवाला वृक्ष) का दूध १२ भाग शास्त्र से क्रमशः कहा है । इस प्रकार

मिदानीं or निदानीं?
Look at the word: "इदानीम्" means "now". "भागाशाम् + इदानीम्" = "भागाशामिदानीं".
Wait, did the typesetter set 'म' or 'नि'?
Look at the character: it has the vertical stem on the right, top bar, i-matra on the left, and the letter itself has a loop at the bottom left: wait, isn't that 'म'?
Look at 'म' in "सम्प्रचक्षते": म has a loop at bottom-left, horizontal line to the right, vertical line down.
Now look at 'मि' in line 10:
It has a loop at bottom-left, horizontal line to the right, vertical line down, and 'ि' (i-matra)!
Wait, why did I think it was 'नि'? Because the loop is small. But that is standard 'म'!
Wait, look at the number at the end of line 10:
Is it ३६ or ३९?
Let's look at the digit:
३ (three) then...
Look at the second digit:
In line 4: ॥ ३६ ॥ -> the ६ has a loop at the bottom curving left/inward.
In line 10: the second digit has a top curve that goes down and loops... wait, it's ३६! Look at line 14:
"॥ ३६—३६ ॥" or "॥

परिवेषक्रियानालाधिकरणम् ] [ १०५

विमानमध्यकेन्द्रस्थावृत्तकीलाद् यथाविधि ।
यानबाह्य प्रदेशे तु अनुलोमविलोमत ॥ ४६ ॥
वेष्टयेद् विधिवत् सम्यक् कीलकैस्सुदृढ यथा ।
परिवेषक्रियानालमित्युक्त्वा शास्त्रत स्फुटम् ॥ ४७ ॥
किरणाकर्षणादर्शनालमद्य निरूप्यते ॥ ४८ ॥

पट से निर्मित यह परिवेषक्रियानाल कीली चलाने से धूवा विमान को ढकेलता है विमान
मध्यकेन्द्रस्थ घूमनेवाली कील से यथाविधि विमान के बाहरी प्रदेश में ही अनुलोम विलोम से कीलों
से सम्यक् विधिवत् लपेटे, शास्त्र से स्फुट रूप में परिवेषक्रियानाल कहकर किरणाकर्षण आदर्शनाल अब
निरूपित करते हैं ॥ ४६-४८ ॥

तदुक्तं नालिकानिर्णये - वह कहा है नालिकानिर्णय में -
पञ्चोत्तरत्रिशतदर्पणषोडशाश काञ्चोलिकाभरणसत्त्व । पञ्चभागम् ।
सर्पास्यपाटवसुराञ्जिकासत्त्वषट्क हैरण्यकान्तजटसा।रचतुष्टय च ॥ ४९ ॥
शुद्धीकृत टङ्कणमष्टभाग सिञ्जाणसत्त्व वरकुञ्जलद्रवम् ।
आ (मा ?) वृणचूर्णं मणिकुड्मलास्यादर्श च क्षारत्रय बालुका च ॥५०॥
सुराञ्जिकासत्त्वविरञ्चिपिष्ट पोषाश्मकृष्णाभ्रकसत्त्वक च ।
शेलूपसत्त्व वरकुड्मलद्रवम्, एते क्रमात् द्वादश वस्तु वर्णितम् ॥५१॥
नक्षत्रबाणार्कमुनित्रयाष्टशैलाग्निरुद्रा वसुराशिपञ्च ।
एव क्रमाद् द्वादशवस्तुभागानाहृत्य शुद्धान् विधिवद् यथाक्रमम् ॥५२॥
भेकास्यमूषामुखरन्ध्रनाले सम्पूर्णभेकोदरकुण्डमध्ये ।
संस्थापयेद् वेगेन द्विपक्षभस्त्रया संगालयेत् कथ्यशतत्रयोष्णात् ॥५३॥
पश्चात् समाहृत्य च तद्रस वर सम्पूरयेद् दर्पणयन्त्रनाले ।
एव कृते किरणाकर्षणाश्यादर्शो भवेत् सूक्ष्मरूप च शुद्धम् ॥५४॥ इत्यादि

तीन सौ पाश्वें दर्पण के १६ भाग काञ्चोलिकाभरणसत्त्व ? पांच भाग, सर्पास्यपाटव सुराञ्ज-
कासत्त्व?-सर्पास्य-नागकेसर, सुराञ्जिका-सुराञ्जिका-मूर्वाळता ६ भाग, हैरण्यकान्तजटसार ?-हिरण्य-कौडी,
कान्त-सूर्यकान्त, जटा-जटामासी का सार ४ भाग, शुद्ध किया सुहागा ८ भाग, सिञ्जाण ? सिञ्जाण-लोह-
किट्ट ? का सत्त्व, अच्छा कुञ्जललशुन का द्राव, आवृण-कावृण-गन्धतृण का चूर्ण, कुड्मलास्यमणि-
पद्मरागमणि ? का आदर्श, तीनों क्षार-सज्जीक्षार यवक्षार नौसादर और बालु-रेत, सुराञ्जिकासत्त्व,
विरञ्चि की पिष्टी या चूर्ण, पोषाश्मकृष्णाभ्रकसत्त्वक-पोषणनामक कृष्णाभ्रक का सत्त्व, शेलूपसत्त्व-
बिल्व का सत्त्व, वरकुड्मलद्रव, क्रम से ये १२ वस्तुएं कही हैं। जो कि २८, ५, ६, ३ या ७, ३, ८, ७,
३, ११, ८, १२, ५ इस क्रम से १२ वस्तुओं के भागों को लेकर विधिवत् भेकास्य-मेण्डकमुख नामक
मूषामुखछिद्रवाले नाल में भरकर भेकोदरकुण्ड के मध्य में संस्थापित करे वेग से दो पक्षभस्त्रा से तीन
सौ दर्जे की उष्णता से गला दे। पश्चात् उस अच्छे गले रस को लेकर दर्पणयन्त्रनाल में भर दे। ऐसा
करने पर सूक्ष्मरूप किरणाकर्षणनामक हो जावे ॥ ४६-५४ ॥

१०६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
यदेतद्दर्पणकृतनाल तच्छास्त्रत स्फुटम् ।
किरणाकर्षणादर्शनालमित्युच्यते बुधै ॥ ५५ ॥
यन्त्रस्योर्ध्वमुखे पश्चान्नालमेतन्नियोजयेत् ।
किरणाकर्षणादर्शनालमुक्त्वा यथाविधि ॥ ५६ ॥
प्रतिबिम्बार्ककिरणाकर्षणादर्शनालकम् ।
विविच्यतेऽत्र विधिवत् सग्रहेण यथामति ॥ ५७ ॥
जो यह दर्पण से बना नाल शास्त्र से स्फुट है किरणाकर्षणादर्शनाल बुद्धिमानों के द्वारा कहा
जाता है । पश्चात् यन्त्र के उपरिमुख में इस नाल को युक्त करे किरणाकर्षणादर्शनाल यथाविधि कहकर
प्रतिबिम्बकिरणाकर्षणादर्शनाल का विधिवत् संग्रह से विवेचन करते हैं ॥ ५५ - ५७ ॥
तदुक्तं नालिकानिर्णये-यह बात नालिकानिर्णय में कही है-
कूष्माण्डसत्त्व कुडुहञ्चिद्रव द्विचक्रकन्दद्वयक्षारसत्त्वकम् ।
पञ्चास्यमूलत्रयक्षारमोर्व्य चन्द्रद्रव चोलिक

किरणाकर्षकदर्शनाल ] [ १०७
विमानमध्यभागेऽथदशमे केन्द्रकीलके ।
स्थापयेत् सुदृढं कीले पञ्चावर्तमुखैः क्रमात् ॥६५॥ इत्यादि ॥
एवं बिम्बार्ककिरणादर्शनाल यथाविधि ।
निरूप्य पश्चाद् यानस्य शिरोमणिरुदीर्यते ॥६६॥
किरगान्तरेषा (खलु) तत्तच्छक्यपकर्षणे ।
विमानाना अष्टोत्तरशतशिरोमणय ईरिता ॥६७॥
—भरकर, वर्णिकुण्ड में संस्थापित करके पश्चात् सुरघा नामक भस्त्रा से ३१५ दर्जे के वेग से
गलावे, पश्चात् पिंगले शुद्ध रस को लेकर दर्पणयन्त्रनाल में भर दे। शास्त्रविधान से ऐसा करने पर
बिम्बार्कघृष्णिकिरण का आकर्षण करनेवाला दर्पण होआवे जो अत्यन्त सूक्ष्म सुदृढ़ दर्पण से बनी बिम्बार्क-
किरणादर्शनाल यह कहा जाता है। विमान के अग्रभाग में और दशवें केन्द्रकील में पाच घूमनेवाले
मुखवाली कीलों से सुदृढ़ स्थापित करें । इस प्रकार बिम्बार्ककिरणादर्शनाल यथाविधि स्थापित करके
पश्चात् विमानयान की शिरोमणि कही जाती है। अन्य किरणों के उस उस शक्ति के खीचने में विमानों
की शिरोमणियां कही हैं ॥ ६१—६७ ॥
तदुक्तं मणिकल्पप्रदीपिकायाम्—वह कहा है मणिकल्पप्रदीपिका ग्रन्थ में—
द्वात्रिंशन्मणिवर्गेषु वर्गे द्वादशके क्रमात् ।
ये प्रोक्तास्त्युत्तरशतमणयस्ते महर्षिभि ॥६८॥
शिरोमणय इत्युक्तविमानाना विशेषतः ।
तेषा नामानि वक्ष्यामि शास्त्रोक्तानि यथाक्रमम् ॥६६॥
शङ्करो ? शक्तक खर्वो भास्करो मण्डलस्तथा ।
कलान्तको दीप्तिकश्च नन्दको चक्रकण्ठक ॥७०॥
पञ्चनेत्रो राजमुखो राकास्य कालभैरव ।
चिन्तामणि कोशिकश्च चित्रकोशिको भास्करक ॥७१॥
उडुराजो विराजश्च कल्पक कामिकोद्भूत ।
पञ्चशीर्षण पावणिक पञ्चाक्ष पारिभद्रक ॥७२॥
इषीक. काशभृत्काक कङ्कास्य कौटिकस्तथा ।
कलाकर कौर्मिकश्च विघ्न पञ्चपावक ॥७३॥
सैंहिकेयो रौद्रमुखो मञ्जीरो डिम्भकोर्जक ।
पिङ्गक कर्णिक. क्रोधो क्रव्याद कालकोलिक ॥७४॥
विनायको विश्वमुख पावकास्य कपालक ।
विजयो विप्लव. प्राण्ड्डिको कार्मुक (ख ?) पृथु ॥७५॥
शिञ्जीरशिशिकश्चण्डो जम्बाल कुटिलोमिक ।
जृम्भकशक्तामित्रश्च विशाल्य कङ्कुगोरभ ॥७६॥

सुरघस्सूर्यमित्रश्च शशकश्शाकलस्तथा ।
शक्त्याकरश्शाम्भविकश्शिखाणश्शिविकाणुकः ॥७७॥
भेकण्डो मुण्डक कार्ण्यो पुरुहूत पुरञ्जयः ।
भम्वालिको शार्ङ्गिकश्च गम्बीरो घनवर्मकः ॥७८॥
चञ्च्वाकश्चापको नङ्ग पिशङ्गो वार्षिकास्तथा ।
राजराजो नागमुखस्सुधाकरविभाकर ॥७६॥
त्रिणेत्रो भूर्जक कूर्म कुमुद कार्मुखास्तथा ।
कपिलो ग्रन्थिक पाशधरो डमुरगो रविः ॥८०॥
मुञ्जको भद्रकश्चेति शतञ्च श्रीण्यताक्रमम् ।
विमानशिरोमणीना नामान्युक्तानि शास्त्रतः ॥८१॥
३२ मणिवर्गों में बारहवें वर्ग में क्रम से जो १०३ मणियां महर्षियों ने कही हैं वे उक्त
विमान की शिरोमणिया—विशेषत शीर्षस्थान पर योजनीय हैं । उनके नाम यथाक्रम कहूंगा जो शास्त्रोक्त
है—शङ्कुर, शान्तक, खर्व, भास्कर, मण्डल कलान्तक, दीप्तिक, नन्दक, चक्रकण्ठ, पञ्चनेत्र, राजमुख,
राकास्य, कालभैरव, चिन्तामणि, कौशिक, चित्रकौशिकभास्कर, उडु (हु ?) राज, विराज, कल्पक, कामि-
कोद्भव, पञ्चशीर्ष, पार्वणिक, पञ्चाक्ष, पारिभद्रक, इषीक, काशभृत्काफ, कङ्कारय, कौटिक, कलाकर,
कौर्मिक, विषघ्न, पञ्चपावक, सैंहिकेय, रौद्रमुख, मञ्जीर, डिम्भक, जर्क, पिङ्गक, कणिक, क्रोध, क्रव्याद,
कालकौलिक, विनायक, विश्वमुख, पात्राकाश्य, कपालक, विजय, विप्लव, प्राणजह्लिक, कार्मु क(ख?), पृथु, शिण्डीर
शिबिक, मित्र, शशक, शाकल, शक्त्याकर, शाम्भविक, शिखाण, शिविक, शुक, भेकाण्ड, मुण्डक, कार्ण्य,
पुरुहूत, पुरञ्जय, जम्बालिक, शार्ङ्गिक, गम्भीर, घनवर्मक, चञ्च्वाक, चापक, गङ्ग, पिशङ्ग, वार्षिक,
राजराज, नागमुख, सुधाकर, विभाकर, त्रिनेत्र, भूर्जक, कूर्म, कुमुद, कार्मुख, कपिल, ग्रन्थिक पाशधर,
डमुरग, रवि, मुञ्जक, भद्रक । ये १०३ विमान की शिरोमणियों के नाम शास्त्र में कहे हुए हैं ॥६८-८१॥
व्योमयानोर्ध्वभागस्य शिर केन्द्रे यथाविधि ।
स्थापयेदुक्तमणिष्वेकैकं सुदृढं यथा ॥८२॥
विद्युद्यन्त्रमुलात्सर्वतन्त्रीनाहृत्य शास्त्रतः ।
तन्मूले योजयेत्सम्यगेभ्यश्शक्त्यपकर्षणम् ॥८३॥
तस्योर्ध्वमुखपार्श्वेथ किरणाकर्षणान् दृढान् ।
पूर्ववत् योजयेत् पश्चान्मेलनार्थं द्वयोः क्रमात् ॥८४॥ इत्यादि ॥
एवमुक्त्वा यानशिरोमणिकार्यमतः परम् ।
वक्ष्ये किरणसन्धानकीलके शास्त्रतः स्फुटम् ॥८५॥
पञ्चविंशदितिख्याताश्शक्तिसन्धानकीलकाः ।
तेष्वकं किरणयानसन्धाने कीलकः क्रमात् ॥८६॥
कीर्त्यते सप्रह्लादत्र समालोच्य यथामति ।

अङ्गोपसंहारयन्त्र ] [ १०६
विमान यान के उपरिभाग में स्थित शिर केन्द्र में यथाविधि उक्त मणियों में से एक एक मणि
सुदृढ़ स्थापित करे । विद्युद्यन्त्र के मुख से सब तारों को शाखानुसार लेकर उनके मुख में जोड़दे और इन
तारों से शक्त्यपकर्षण—शक्ति को खींचने वाले यन्त्र को उसके उपरि मुख के पास किरणों के आक-
र्षण करने वालों को पूर्व की भांति पश्चात् क्रम से दोनों के मेलनार्थ जोड़ दे । इस प्रकार विमान के
शिर की मणियों को कह कर इससे आगे किरणसन्धानकीलों—किरणों के धारण करने वाले पेंचों को
शास्त्र से स्फुट कहूँगा, शक्तिसन्धान कीलें २५ ख्यात हैं प्रसिद्ध हैं कही गई हैं, उनमें से सूर्यकिरणों के
यानसन्धान में कीलक्रम से संक्षेप से यथामति आलोचना करके कही जाती हैं ॥ ८२-८६ ॥
तदुक्तं बृहत्काण्डिके—यह बात बृहत्काण्डिक ग्रन्थ में कही है—
सन्धानकीलका पञ्चविंशति परिकीर्तिता ॥ ८७ ॥
सूर्याशुयानसन्धाने नवमस्तेषु वर्णित ।
तत्कीलविवक्षार्थं तेषा नामान्यनुक्रमात् ॥ ८८ ॥
बृहत्काण्डिकरीत्या तु सुविचार्य निरूप्यते ।
पिञ्जुलीक कि (की ?) रणको डिम्भकोपवितीयक ॥८६॥
कच्छपो गारुडो दृण्डो शक्तिपो गोविदारक. ।
पवनास्य पञ्चवक्त्रो वञ्चक कङ्कणस्तथा ॥ ६० ॥
अहिर्मु ध्न्य (ध्य ?)कुण्डलिको नाकुलश्वोर्णनाभिक ।
त्रिमुखस्सप्तशीर्षण्यो पञ्चावर्त परावत ॥ ६१ ॥
आवर्तनाभिकोर्ध्वास्यशिलावर्त इति क्रमात् ।
विमानशक्तिसन्धानकीलका पञ्चविंशति ॥ ६२ ॥
एतेषु गोविदारकस्तु कीलकस्सुप्रकाशक ।
सूर्याशुयानसन्धानकार्यनिर्वाहको भवेत् ॥ ६३ ॥ इति ॥
सूर्यकिरणों के यान में जोड़ने में सन्धानकीलें २५ कही हैं, उनमें से नवम कील कही है, उस
कील की विवक्षा के लिए उनके नाम अनुक्रम से बृहत्काण्डिक की रीति से यहां सुविचार कर निरूपित
किया जाता है जो कि पिञ्जुलीक, किरणक, डिम्भ, कोप, वितीयक, कच्छप, गारुड, उद्दण्ड, शक्तिप,
गोविदारक, पवनास्य, पञ्चवक्त्र, वञ्चक, कङ्कण, अहिर्मुधन्य, कुण्डलिक, नाकुल, ऊर्णनाभि, त्रिमुख, सप्त-
शीर्षण्य, पञ्चावर्त, परावत, आवर्त, नाभिक, उर्ध्वास्य, शिलावर्त ये क्रम से विमान शक्तिसन्धानकीलें २५
हैं । इनमें गोविन्दारक कीलक अच्छी प्रकाशक है सूर्यकिरण या यानसन्धान कार्य का निर्वाहक
है ॥ ८७-६३ ॥
अङ्गोपसंहारयन्त्रविचार.—अङ्गोपसंहार यन्त्र का विचार—
एवमुक्त्वा परिवेषक्रियायन्त्रमत परम् ।
अङ्गोपसंहारयन्त्रस्संग्रहेण प्रचक्षते ॥ ६४ ॥
सूर्यादिसर्वग्रहाणा शशिस्यानतस्तथा ।
चारातिचारवक्रातिवकसञ्चारकारणात् ॥ ६५ ॥

११० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
भवेन्मेषादिराशिस्थशक्तिसम्मथनं क्रमात् ।
तेनाकाशतरङ्गस्थशक्त्युद्रेको भवेत्स्वतः ॥ ९६ ॥
तयोस्सङ्घर्षणं पश्चाज्जायतेत्यन्तवेगतः ।
तस्माच्छक्तिप्रवाहाश्चाग्निज्वालाप्रवाहवत् ॥ ९७ ॥
अनुलोमविलोमाभ्यां वक्रगत्यतिवेगतः ।
प्रवहन्ति विशेषेण राशिभोगानुसारतः ॥ ९८ ॥
सञ्चारकाले स्वपथि विमानाङ्गोपरि क्रमात् ।
तत्प्रवाहोष्णसंयोगो यदङ्गो स्याद् विशेषतः ॥ ९९ ॥
दग्ध्वा भस्मीकृत (तो ?' भूयात् तदङ्गमतिशीघ्रतः ।
उष्णप्रमापकाद् यन्त्रात् तद्विज्ञायाथ वेगतः ॥ १०० ॥
तदपायनिवृत्त्यर्थं तदङ्गमुपसंहरेत् ।
तस्मादङ्गोपसंहारयन्त्रमत्र प्रचक्षते ॥ १०१ ॥
इस प्रकार परिवेशक्रिया यन्त्र कह कर इससे आगे अङ्गोपसंहार यन्त्र संक्षेप से कहते हैं ।
सूर्य आदि सब ग्रहों के राशिसंस्थान से चार अतिचार वक्र अतिवक्र सञ्चार के कारण मेष आदि राशिस्थ
शक्ति का मन्थनक्रम से हो जावे—हो जाता है उससे आकाशतरङ्गों में स्थित शक्ति का उद्रेक—
आधिक्य—प्राबल्य स्वत हो जाता है फिर उन दोनों का संघर्षण—टकराव अत्यन्त वेग से हो जाता है
अत शक्तिप्रवाह अग्निज्वालाप्रवाह की भांति सीधे उलटे ढंग से वक्रगति के अतिवेग से राशिभोगा-
नुसार विशेषरूप से प्रवाहित हो जाते हैं । सञ्चारकाल में अपने मार्ग में विमानाङ्गों के ऊपर क्रम से
उस प्रवाह का उष्ण संयोग जिस अङ्ग में विशेष हो जावे तो वह अङ्ग अतिशीघ्र जल कर भस्म हो
जावे, उष्णतामापक यन्त्र से उसको जान कर शीघ्र उस अनिष्ट की निवृत्ति के अर्थ उस अङ्ग का
उपसंहार करे अत. अङ्गोपसंहार यन्त्र यहां कहते हैं ॥ ९४–१०१ ॥

हस्तलेख कापी संख्या ८—
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—वह अङ्गोपसंहार यन्त्र 'यन्त्रसर्वस्व' ग्रन्थ में कहा है—
सुमुलीक शोधयित्वा लोह माक्षीरमिश्रितम् ।
वितस्तिद्वादशायाम घनमष्टादशाङ्गुलम् ॥ १ ॥
चतुरस्रं वर्तुंल वा पीठ कुर्याद् यथाविधि ।
कान्तडिम्बिकसम्मिश्रलोहाद् द्रावकशोधितात् ॥ २ ॥
त्रिंशद्वितस्त्युन्नत च वितस्तित्रयगात्रकम् ।
मूले मध्ये तथा चान्ते छत्रीवत्कीलकान्वितम् ॥ ३ ॥
दण्डमेक कल्पयित्वा पीठमध्ये दृढ न्यसेत् ।
कीलकत्रयमारभ्य दण्डस्याधो यथाविधि ॥ ४ ॥
विमानमूलमध्यान्तस्स्थाङ्गयन्त्रावधि क्रमात् ।
पञ्चकीलसमायुक्तान् सुदृढान् मृदुलानृजून् ॥ ५ ॥
माक्षीर ? मिले सुमुलीक लोहे को शोधकर १२ बालिश्त लम्बा चौड़ा ८ अङ्गुल मोटा चौकोन
या गोल पीठ यथाविधि करे—बनवावे, कान्त—अयस्कान्त, डिम्बिक ? मिश्रलोह द्रावक शोधित से
३० बालिश्त ऊंचा ३ बालिश्त मोटा मूल में मध्य में और अन्त में छत्री की भांति कीलों से युक्त एक
दण्ड बनाकर पीठ के मध्य में लगा दे तीन कीलों से आरम्भ करके दण्ड के नीचे यथाविधि विमान के
मूल मध्य अन्त में स्थित अङ्गयन्त्रों तक क्रम से पांच कीलों से युक्त सुदृढ़ मृदुल सरल—॥ १–५ ॥
उपसंहारोद्धारकावर्तकीलैर्विराजितम् ।
मिश्रलोहकृतान् शुद्धान् शलाकान् विरल यथा ॥ ६ ॥
छत्रीशलाकावत्तत्तत्कीलकेभ्य पृथक् पृथक् ।
तत्तद्देशानुसारेण योजयेत्तदनन्तरम् ॥ ७ ॥
त्रिचक्रकीलकसयुक्त मुखत्रयविराजितम् ।
नालद्वयसमायुक्तं भ्रामणीकीलकद्वयम् ॥ ८ ॥
संस्थापयेद् दण्डमूलकीलकद्वयमध्यमे ।
तदुत्तरे रुक्मतैल नलिकापात्रपूरितम् ॥ ६ ॥

११२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
लेपनार्थं कीलकानां स्थापयेद् विधिवत्तत. ।
यदङ्गस्योपसंहारः कर्तव्यमिति रोचते ॥१०॥
उपसंहार-सङ्कोच और उद्धार-विकास के साधनभूत कीलों-पेंचों से विराजित मिश्रलोहे
से किए शुद्ध शलाकाओं को छेद से छत्री की शलाकाओं की भांति उन उन कीलों से अलग अलग
जोड़ दे पुन उन उनकी रेखासुसार जोड़ दे, तीन चक्र की कीलों से युक्त तीन मुखों से विराजित दो आम्र-
णीकील संस्थापित करे, दण्डे के मूल की दो कीलों के मध्य में उनके उत्तर में रुक्मतैल-नागकेशर का
तैल नलिकापात्र में भरा हो कीलों को लपेटने के लिये विधिवत् स्थापित करे । जिस अङ्ग का उपसंहार
करना रुचिकर हो-॥ ५-१० ॥
तत्क्षणाद् दण्डमूलस्थभ्रामणी चालयेद् यदि ।
तेनाङ्गयन्त्रशलाककीलसञ्चालन भवेत् ॥११॥
छत्रीशलाकवत्तेन तच्छलाकमपि क्रमात् ।
प्रत्यङ्ङ्मुख भवेत् तस्मादङ्गयन्त्रोपसङ्घृति ॥१२॥
प्रभवेदतिवेगेन न्यग्भावस्तच्छलाकत ।
पश्चात् प्राप्तापायनाशो भवत्येव न संशय ॥१३॥
एव क्रमेणाङ्गयन्त्रोपसंहारशलाकत ।
तत्तत्कीलप्रचालनात् कर्तव्य स्यात् पृथक् पृथक् ॥१४॥
यदङ्गस्योपरि भवेद् यानस्यापायसम्भव ।
तदङ्गस्योपसंहारात् तदपायनिवारणम् ॥१५॥
अनुलोमविलोमाभ्यां तत्तत्कीलकलाचालनम् ।
तत्तद्यन्त्रोपसंहारोद्धाराश्चापि भवेत् क्रमात् ॥१६॥
यदि तुरन्त दण्डमूलस्थ भ्रामणी को चलावे तो उससे अङ्गयन्त्र शलाका की कील का सञ्चा-
लन होजावे, छत्रीशलाका की भांति उससे वह शलाका भी क्रम से अङ्गमुख की ओर होजावे उससे
अङ्गयन्त्र का उपसंहार अतिवेग से होजावे उस शलाका से नीचे सङ्कोच होजावे पश्चात् प्राप्त अनिष्ट का
नाश हो जाता ही है संशय नहीं । इस प्रकार क्रम से अङ्गयन्त्र का उपसंहार शलाका से उस उस कील
के चलाने से पृथक् पृथक् करना चाहिए, विमान के जिस अङ्ग के ऊपर अनिष्ट का सम्भव हो उस अङ्ग
के उपसंहार से उस अनिष्ट का निवारण होजाता है। सीधे उलटे ढंग से उस कील का चलाना उस उस
यन्त्र का उपसंहार-सङ्कोच और उद्धार-विकासप्रसार भी क्रम से होता है ॥ ११-१६ ॥
एवमुक्त्वा यन्त्रोपसंहारयन्त्रमत परम् ।
विस्तृतास्यक्रियायन्त्र कथ्येतेत्र यथाविधि ॥१७॥
कूर्मदिग्गजभूमेघविद्युद (र ?) रुणशक्तय ।
यदा पद्ममुखे सम्यङ् मेलयन्ति परस्परम् ॥१८॥
तदा विश्वम्भरी नाम काचिच्छक्ति प्रजायते ।
सा भित्त्वा भूमुल पश्चादत्यन्तोष्णस्वभावत. ॥१६॥

विस्तृतास्यक्रियायन्त्र ] [ ११३
लिङ्गुत्रिशतवेगेनोड्डीयोड्डीयातिवेगत
धावत्यूर्ध्वं खमाश्रित्य व्योमयानं यथाविधि ॥२०॥
इस प्रकार यन्त्रोपसंहार यन्त्र कहकर इससे आगे विस्तृतास्य क्रियायन्त्र यथाविधि यहां
कहा जाता है। कूर्म (भूगर्भशक्ति ?†), दिग्गज (पृथिवी की बाह्य दिशाशक्ति ?), भूमि, मेघ, विद्युत्,
वरुण की शक्तियां जब पद्ममुख मे भली प्रकार परस्पर मिल जाती हैं तब विषम्भरी-विरुद्ध प्रयोगको धारण
करने वाली कोई शक्ति‡ प्रकट हो जाती है वह भूमि के मुख को तोड़कर—भूमि से टकराकर अत्यन्त
उष्णस्वभाव से ३०० डिग्री के वेग से उड़ उड़ कर अतिवेग से ऊपर दौड़ती है आकाश को प्राप्त हो
विमान के मार्ग की अवधि तक—॥१७—२०॥
व्याप्य यानपथ पश्चाद् विमानं स्वशक्तित ।
तत्रस्थसर्वलोकानां मेधशक्तिं निमेषत ॥२१॥
विभज्य तत्क्षणात् तस्मिन्नुद्गारं कुरुते क्रमात् ।
बुद्धिमान्द्यशिरोबाधज्वरदाहविरे (रो?) चना. ॥२२॥
सम्भवन्ति विशेषेण तत्क्षणात् तद्विकारत ।
तद्विलयाय विधिवद् यन्त्राद्यैश्शास्त्रयत क्रमात् ॥२३॥
उद्धरेत् तद्विनाशार्थं व्योमयाने यथाविधि ।
विस्तृतास्यक्रियायन्त्रमिति शास्त्रविनिर्णय ॥२४॥
तस्माच्छास्त्रोक्तविधिना विस्तृतास्यक्रियाभिध (द?) म् ।
यन्त्रमत्रातिसंक्षेपात् प्रसङ्गत्या निरूप्यते ॥२५॥
—यानपथ मे व्याप्त होकर पश्चात् विमान को भी व्याप्त हो अपनी शक्ति से विमानस्थित जनों
की मेधशक्ति को भिन्न भिन्न करके तुरन्त उद्गार कर देती है बुद्धिमन्दता शिरपीड़ा ज्वरदाह विरेचन रोग
विशेषत उत्पन्न हो जाते हैं उनके विकार से—पूर्वरूप से तुरन्त विधिवत् यन्त्र आदि से शास्त्रानुसार
जानकर क्रम से उसके नाशार्थ विमान में यथाविधि उद्धार करे—उपाय करे । वह विस्तृतास्य क्रिया यन्त्र
है, यह शास्त्र का निर्णय है, अत शास्त्रोक्त विधि से विस्तृतास्यक्रियानामक यन्त्र को अतिसंक्षेप से
प्रसङ्ग से निरूपित किया जाता है ॥ २१-२५ ॥
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—यह यह 'यन्त्रसर्वस्व' में कहा है—
बाहुप्रमाण विस्तारे गात्रे द्वाविंशदङ्गुलम् ।
वर्तुलाकारत पीठं कुर्यात् पिप्पलदारुणा ॥२६॥
बाहुप्रमाणगात्रं च द्वात्रिंशद्बाहुरुन्नतम् ।
स्तम्भ कृत्वा दारुमय तन्मध्ये स्थापयेद् दृढम् ॥२७॥
व्योमयानाङ्गोपयन्त्रसङ्ख्या विधिवत् क्रमात् ।
अङ्गोपयन्त्रदिग्रेखामनुसृत्य यथाविधि ॥२८॥
† "कूर्मो बिभर्ति धरणीं खलु चारुपृष्ठे" (शुक० ४।१।३१)
‡ "विष विप्रयोगे"

११४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
स्तम्भमूलाद्यशिरोभागान्त केन्द्रानुसारत ।
प्रदक्षिणावर्तकीलाननुलोमविलोमत ॥ २९ ॥
स्तम्भस्य प्रतिकेन्द्रे थ स्थापयेद् द्वन्द्वत क्रमात् ।
पश्चात् विमानाङ्गोपयन्त्रमध्यकेन्द्रमुखान्तरे ॥ ३० ॥
भस्त्रिकानालस्तम्भकीलद्वन्द्वावधिक्रमात् ।
सर्वत्र योजयेन्नालान् कीलसंख्यानुसारत ॥ ३१ ॥
बाहुभर माप लम्बाई चौड़ाई में, २२ अंगुल मोटाई में गोलाकार पीठ पिप्पल की लकड़ी से
बनावे, बाहुभर माप मोटा ३२ अंगुल ऊंचा स्तम्भ काष्ठ का बना कर उसके मध्य में दृढ स्थापित करे,
व्योमयान के अङ्गोपयन्त्र संख्या से विधिवत् क्रम से अङ्गोपयन्त्र की दिशा रेखा का अनुसरण करके
यथाविधि स्तम्भमूल से शिरोभाग तक केन्द्र के अनुसार घूमने वाली कील के सीधे उलटे ढंग से स्तम्भ
के प्रति केन्द्र में स्थापित करे। दो दो करके पश्चात् विमानाङ्गोपयन्त्र के मध्य केन्द्रमुख में भस्त्रिकानाल
से स्तम्भ की दो कील की अवधि के क्रम

विस्तृतास्यक्रियायन्त्र ] [ ११५
कुर्यात् सम्पूर्णतश्शास्त्रविधिनातिप्रयत्नत ।
त्रिचक्रभ्रामणीकीलमादौ तस्मात् प्रचालयेत् ॥ ४० ॥
तेन द्विचक्रकोलकाश्च सम्यग्भ्राम्यन्ति वेगत ।
अतस्सम्यग्भ्रामकास्स्युस्तस्तम्भस्थावर्तकीलका ॥ ४१ ॥
ततो द्विचक्रकीलस्थपक्षाघातकभस्त्रिका ।
तच्चक्रभ्रमणादेव विस्तृतास्या भवन्ति हि ॥ ४२ ॥
ततोतिवेगता वायुस्तन्मुखात् सम्प्रधावति ।
पश्चाच्छ्वासोच्छ्वासवत्तत्सन्धिनालान्तरे क्रमात् ॥४३॥
सन्धिनालें द्राव से शुद्ध और सुदृढ करें फिर दो चक्कों वाली कीलें पश्चात् पक्षाघात भस्त्रिकाएं
तथा इससे तीन चक्रों वाला भ्रामणीकील यन्त्र और उपसंहार कील आठ प्रकार या आठ स्थानों में कहे
हैं । यन्त्रों के अङ्ग इस प्रकार कहकर अब उनका प्रयोग वर्णित करते हैं, विषम्भरा शक्ति स्वत भूमि को
वेग से तोड कर विमान के सारे अङ्गों पर आक्रमण करके जब व्याप जाती है तो विमान के अङ्गयन्त्रों
को पूर्णरुप से शास्त्रविधि से अतिप्रयत्न से तुरन्त विस्तृतास्य करदे, प्रथम तीन चक्रों वाली भ्रामणी कील
को चलावे उससे दो चक्रों वाली कीलें सम्यक् वेग से घूमती हैं अत स्तम्भस्थ घूमनेवाले पेंच भली प्रकार
घूमने वाले हो जाते हैं । फिर दो चक्र वाली कीलों में स्थित पक्षाघातक भस्त्रिकाए उन चक्रों के भ्रमण
से ही विस्तृतास्य हो जाती हैं फिर अति वेग से उसके मुख से वायु दौड़ता है पश्चात् क्रम से श्वास
उच्छ्वास की भांति सन्धिनाल के अन्दर—॥ ३६-४३ ॥
प्रविश्य चातिवेगेन तद्वायुश्चरति स्वत ।
तद्घाताघातत पश्चादङ्गयन्त्रमुखस्थिता ॥ ४४ ॥
भस्त्रनाला मध्यकेन्द्रे विस्तृतास्त्वेकथैव हि ।
भवन्ति तन्मुखात् पश्चाद् भस्त्रिकावद् विशेषत ॥४५॥
फूत्कारपूर्वक वायुर्वाति पूरंप्रवाहवन् ।
तत्प्रवाहोतिवेगेन शक्ति सम्यग् विषम्भराम् ॥ ४६ ॥
अपहृत्याकाशवातमण्डले नियोजयति ।
ततो विषम्भरा शक्तिस्तत्रैव लयमेधते ॥ ४७ ॥
ततो विमानस्थजनमेघोर्लुङनाशन भवेत् ।
एव विषम्भराशक्ति नाशयित्वा यथाविधि ॥ ४८ ॥
चालयेदुपसहारकीलक तदनन्तरम् ।
तेन यानाङ्गोपयन्त्र्राण्यभूवन् पूर्ववत् क्रमात् ॥ ४६ ॥
विस्तृतास्यक्रियायन्त्रप्रयोगश्चैवमीरित (तम्) ।
एवमुक्त्वा विस्तृतास्यक्रियायन्त्र यथाविधि ॥ ५० ॥
सप्रह्लाद वैरूप्यदर्पणायन्त्रमयोच्यते ।