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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 126

परिवेषक्रियानालाधिकरण ] [ १०३
दुग्धप्रणालिका चेति पञ्चेमा क्षीरपादपा ।
सुप्रशस्ता इति प्रोक्ताश्शास्त्रेषु ज्ञानवित्तमै ॥२७॥ इत्यादि
क्षीरपटकर्म्म में उक्तक्षीरवृक्षों में पयोधरी-नारियलवृक्ष ? या पयोधरी-पयोविदारी-क्षीरविदारी ?
पञ्चवटी-बिल्व पीपल वट अशोक गूलर, विरञ्चि ?, पटपादप-सिम्बल ? दुग्धप्रणालिका ? ये पांच क्षीरवृक्ष
शास्त्रों में ऊंचे विद्वानों ने सुप्रशस्त कहे है ।
अम्बिकाषट्कमुक्तं क्रियासारे--छ अम्बिका क्रियासार ग्रन्थ में कहे हैं-
गोदाकन्दकुरङ्गकनिर्यामान्दोलिकावियत्सारम् ।
लविकापुष्पकक्षमामलमिति शास्त्रेऽम्बिकाषट्कम् ॥२८॥
एतत्सम्मेलनत पञ्चक्षीरेषु गणितमार्गेण ।
प्रभवेत् क्षीरीवसनशुद्धसृष्टोतिमृदुलश्च ॥२९॥ इत्यादि ॥
गोदाकन्द-गोवारकन्द-दुर्गन्धखैर, कुरङ्ग के निर्याम-अकर्करागोंद ?, आन्दोलिकावियत्सार?,
लविकापुष्पक ?, क्षमामल ?, शास्त्रों में अम्बिकाषट्क है । पाच क्षीरों में गणितरीति से इनके मिलाने
से क्षीरोवस्त्र सुदृढ़ होजावे ॥ २८-२६ ॥
वल्कलद्वयमुक्तमगतस्त्वलहर्याम्-दो वल्कल कहे हैं अगतस्त्वलहरी में-
शारिकाया पञ्चमुखी वल्कलान्त यथाक्रमम् ।
उक्तास्स्यु पञ्चसाहस्रवल्कलशास्त्रवित्तमै ॥३०॥
तेषु मिहिकपञ्चाङ्गवल्कलद्वयमेव हि ।
विमानस्योजनार्हं क्षीरिकापटनिर्णये ॥३१॥
अत्यन्तश्रेष्ठमित्याहु पटलतत्वविदा वरा ॥ इत्यादि ॥
शारिका-शारी-मुझतुरु आदि पञ्चमुखी पञ्चमुख-वासा के वल्कलपयन्त यथाक्रम कहे हैं ।
पाचसाहस्र वल्कल शास्त्रवेत्ताओं ने कहे हैं उनमें मिहिक वासा या कटेली पञ्चाङ्ग वल्कल दोनों विमान
संयोग के योग्य क्षीरिकापट-पटनिर्णय में अत्यन्त श्रेष्ठ पटतत्त्ववेत्ताओं ने कहे हैं ॥ ३०-३१ ॥
पटस्वरूपमुक्तं क्रियासारे-पटक्रियासार ग्रन्थ में कहा है-
दुग्धप्रणालिकाक्षीरमष्टभागमत परम् ।
पटवृक्षक्षीरभागा दश प्रोक्तास्तथा क्रमम् ।
पयोधरीक्षीरभागासप्त इत्युच्यते तथा ॥३३॥
क्षीरस्याष्टादशाशस्यात्पञ्चवट्या यथाक्रमम् ।
द्वादशाश विरञ्चिक्षीरमुक्त शास्त्रत क्रमात् ॥३४॥
एवमुक्त्वा क्षीरिकाशान् सङ्ख्या शास्त्रतस्स्फुटम् ।
अयेदानी यथाशास्त्र क्षोरिकापटनिर्णये ॥३५॥
दुग्धप्रणालिका का दूध ८ भाग, पटवृक्ष का दूध १० भाग पयोधरी का दूध ७ भाग पञ्चवटी
का दूध १८ भाग विरञ्चि (दूधवाला वृक्ष) का दूध १२ भाग शास्त्र से क्रमशः कहा है । इस प्रकार