बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
धूमकृन्मणिसंयुक्तपञ्चद्रावसमाकुलम् ।
मथनोन्मथनचक्रद्वयकीलविराजितम् ॥ १८ ॥
धूमकोशद्वयंयुक्तं भस्त्रनालेन संयुतम् ।
धूमप्रसारणनालमुखकीलविराजितम् ॥ १६ ॥
एतल्लक्षणसंयुक्तं यन्त्रं धूमप्रसारणम् ।
एतद्यन्त्रं विंशतिमे केन्द्रे संस्थापयेद् दृढम् ॥२०॥
धूमप्रसारण यन्त्रमेवमुक्त्वा तत परम् ।
परिवेषक्रियानालस्वरूपं कथ्यते क्रमात् ॥२१॥
पञ्चक्षीराम्बिकापट्टवल्कलद्वयनिर्मितम् ।
क्षीरिकापटमित्युक्तं यानकार्यक्षमं मृदु ॥२२॥
तेन निर्मितनालं यत्तदेवात्र विशेषतः ।
परिवेषक्रियानालमिति सम्यङ्निरूप्यते ॥२३॥
इस प्रकार वातसंयोजक यन्त्र कहकर इससे आगे धूमप्रसारण=धूंआं छोड़नेवाला यन्त्र सक्षेप में
निरूपित किया जाता है। तीन मुखवाले पांच गर्भकोशवाले वातचक्रों से युक्त तीन कीलों से युक्त
शक्तिनाल से लपेटा हुआ धूम करनेवाली मणि से संयुक्त पांच द्राव (ऐसिड) से पूर्ण मथन उन्मथन
दो चक्रों की कीली से विराजित दो धूमकोशों से युक्त भस्त्रनाल से संयुक्त धूमप्रसारण नाल मुखकील
से युक्त हो, इन लक्षणों से युक्त यन्त्र धूमप्रसारण है । इस यन्त्र को बीसवें केन्द्र में दृढ़ संस्थापित करे ।
धूमप्रसारण यन्त्र इस प्रकार कहकर उससे आगे परिवेषक्रियानाल का स्वरूप क्रम से कहा जाता है ।
पञ्च क्षीरा छ अम्बिका (आगे आने वाली) दोनों वल्कल (आगे कहे जाने वाले) से बना क्षीरिकापट
यानकार्य में समर्थ कहा, उससे बना नाल जो है वही यहा विशेषतः परिवेषक्रियानाल सम्यक् निरूपित
किया जाता है ॥१६—२३ ॥
उक्तं हि क्षीरीपटकल्पे — क्षीरीपटकल्प में कहा है—
दुग्धप्रणालीपटपादपाश्च पयोध (द ?) री पञ्चवटी विरञ्चि ।
वृक्षेषूक्तक्षीरिकावृक्षवर्गे इमा पञ्चक्षीरवृक्षा क्रमेण ॥२४॥
उक्ता प्रशस्ता इति क्षीरवस्त्रक्रियाविधौ शास्त्रविदा वरिष्ठै ॥२५॥
दुग्धप्रणाली ? पटपादप—सिम्बल ?, पयोधरी—नारियल वृक्ष ? या पयोविदारी—क्षीर
विदारी ? पञ्चवटी—बिल्व पीपल बढ़ अशोक गूलर, विरञ्चि ? । वृक्षों में उक्त क्षीरिका वृक्षवर्ग में ये पांच
क्षीरवृक्ष क्रम से श्रेष्ठ शास्त्रवेत्ता जनों ने क्षीरवस्त्र क्रियाविधि में प्रशस्त कहे हैं ॥ २४—२५ ॥
पटप्रदीपिकायामपि—पटप्रदीपिका में भी—
उक्तेषु क्षीरवृक्षेषु क्षीरिकापटकर्मणि ।
पयोध (द ?) री पञ्चवटीविरञ्चिः पटपादप ॥२६॥