बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
शकुनविमान ] [ २४३
जाने वालों (विमानों) का शतांश हो इस प्रकार विमान का पीठभाग बनावे, विमानयान के ऊंचाई के
माप के आधे माप से पीठ बनावे, उसके मध्य में नालस्तम्भ को घूमनेवाली कीलों के साथ स्थापित
करे ॥ ४५-४७ ॥
नालस्तम्भलक्षणं लल्लेनोक्तम्-नालस्तम्भलक्षण लल्ल आचार्य ने कहा है-
लल्लोक्त यथा शास्त्रे यन्त्रकल्पतरी क्रमात् ।
तदेवात्र प्रवक्ष्यामि नालस्तम्भस्य लक्षणम् ॥ ४८ ॥
हाटकास्येन लोहेन नालस्तम्भ प्रकल्पयेत् ।
न कुर्यादन्यलोहेन कृतञ्चेन्नाशमेष्यते ॥ ४६ ॥
लल्ल आचार्य ने यन्त्रकल्पतरु शास्त्र में जैसे क्रम से कहा है वह ही यहां नालस्तम्भ का
लक्षण कहूंगा। हाटकास्य लोहे से नालस्तम्भ बनाना चाहिए अन्य से किया तो नाश को प्राप्त हो
जाता है ॥ ४८-४६ ॥
हाटकास्यलोहमुक्तं लोहतन्त्रे-हाटकास्य लोहा कहा है लोहतन्त्र में-
सुवर्चलस्याष्टमभागान् लघुश्विद्स्य षोडश ।
लघुबम्भारिकस्याष्टादशभागान् रवेस्तथा ॥ ५० ॥
शतभागान् सुसंयोज्य मूषाया सन्निवेश्य च ।
कूर्भव्यासटिकामध्ये संस्थाप्य सुदृढ यथा ॥ ५१ ॥
सप्तोत्तरत्रिशत्कक्ष्यप्रमाणेिन वेगत ।
महोर्मिभस्त्रिकात्सभ्यक् तःनेत्रोन्मीलनावधि ॥ ५२ ॥
गालयेद् विधिवत् पश्चाद्धाटकास्य भविष्यति । इत्यादि ॥
सुवर्चल-सज्जीक्षार आठ भाग, लघुश्विद्वङ्क हल्का लोहा-जस्ती टीन? सोलह भाग, लघुम्बभारिक?
अठारह भाग, रवि-ताम्बा सौ भाग, इन्हें मिलाकर मूंषिका (कृत्रिम बोतल) में भरकर कूर्भव्यासटिका-कूर्मा-
कार कुण्ड के मध्य में रखकर तीन सौसात दर्जे की उष्णता से वेग से महोर्मिंनामक भस्त्रिक-धोंकनी से
भली भांति नेत्रोन्मीलन अवधि तक गलावे फिर हाटकास्यलोहा हो जावेगा ॥ ५०-५२ ॥
पीठनिय-पीठ-भूमिका-नीचे के ढांचे का निर्णय कहते हैं-
पीठोन्नत्यू वितस्तीनामशीतिरिति वर्णितम् ।
षट्पञ्चाशद्वितस्तीनामायाम च तथैव हि ॥ ५३ ॥
बितस्तिसप्तत्योंन्नतय दक्षिणोत्तरभागयो ।
ह्रस्वो भूत्वान्त्यभागे तु त्रिकोणाकारसयुतम् ॥५४॥
शकुनाख्यविमानस्य पीठाकारमितीरितम् ॥ ५५ ॥
पीठ की ऊंचाई अस्सी बालिशत कही, छप्पन बालिशत लम्बाई चौडाई, दक्षिण और उत्तर
भागों में ऊंचाई सत्तर बालिशत, अन्तवाले भाग में छोटा होकर त्रिकोण आकारयुक्त पीठ का आकार
शकुनविमान का कहा है ॥ ५३-५५ ॥
२४४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
अथनालस्तम्भनिर्णयः- अब नालस्तम्भ का निर्णय कहते हैं—
स्तम्भमूलं वितस्तीनां पञ्चत्रिंशदितीरितम् ।
प्रदक्षिणावृतोत्प्रत्यवर्तुंलाकारतो बहि ॥ ५६ ॥
अन्तर्वलयमानन्तु त्रिंशद्वितस्तय क्रमात् ।
स्तम्भमध्यप्रमाणं तु वर्तुंलाकारतो बहि ॥ ५७ ॥
वर्णित शास्त्रत सम्यक् पञ्चविंशद्वितस्तय ।
तदन्तर्वलयाकारो वितस्तीना हि विंशति ॥ ५८ ॥
स्तम्भान्त्यस्य बहिर्गात्रो वर्तुंलाकारत क्रमात् ।
विंशद्वितस्तय प्रोक्ता ( ? ) तदन्तर्वलयाकृति ॥ ५६ ॥
वितस्तीना पञ्चदशेत्युक्त शास्त्रे मनीषिभि ।
एव प्रमाणतोशीतिवितस्त्योन्नतयत क्रमात् ॥ ६० ॥
नालस्तम्भो राजलोहात्कारयेद् यानकर्मणि ।
तन्मूले पञ्चदशाङ्गुलप्रमाणावधिक्रमात् ॥ ६१ ॥
पीठे स्तम्भप्रतिष्ठार्थ कुर्यादावर्तनीलकम् ।
कर्तुं न्यूनाधिक वायुवेग कालोचित यथा ॥ ६२ ॥
स्तम्भान्तरे दृढ चक्रषट्क संस्थापयेत् क्रमात् ।
पीठ के मध्य जो नालस्तम्भ लगता है उसका मूल—नीचलाभाग ३५ वालिश्त कहा है, घूम के
साथ उठकर बाहिर से गोल हो । पीठ के अन्दर गोलाई में ३३ वालिश्त रहे स्तम्भ के बीच का प्रमाण
तो बाहिर गोलाकार २५ वालिश्त शास्त्र से वर्णित किया है, उसके अन्दर वलयाकार २० बालिश्र्त स्तम्भ
का अन्त्य-सिरा हो बाहिरी अङ्ग गोल हो । उसके अन्दर २० बालिश्त फिर उसके अन्दर अन्य भाग
१५ बालिरत शास्त्र में मनीषियों ने कहा है, इस प्रकार प्रमाण से पाच भागों की ८० वालिश्त ऊंचाई
होनी चाहिए । नालस्तम्भ राजलोहे से करावे विमानयानकर्म में, उसके मूल में १५ अंगुल स्तम्भ के
प्रतिष्ठार्थ घूमनेवाली कील पीठ में करे अथवा वायुवेग समय के अनुसार न्यूनाधिक करे । स्तम्भ के
अन्दर छः दृढ चक्र क्रम से स्थापित करे ॥५६-६२॥
चक्रनिर्णय. — चक्र का निर्णय कहते हैं—
पीठाच्चतुर्थवितस्तीनामूर्ध्वं स्तम्भान्तरे क्रमात् ॥६३॥
सरन्ध्रं वर्तुंल चक्रत्रयं सन्धारयेत् क्रमात् ।
चक्रावर्त वितस्तीना सार्धपञ्चदश स्मृतम् ॥६४॥
पीठाच्चतुश्चत्वारिंशद्वितस्त्योर्ध्वे तथैव हि ।
सरन्ध्रं वर्तुंल चक्रत्रय सम्यक् प्रतिष्ठितम् ॥६५॥
एतेषूर्ध्वाधस्यचक्रद्वय दृढमचञ्चलम् ।
यथा भवेत् तथा सम्यग्बध्नीयाच्छङ्कुभि क्रमात् ॥६६॥
शकुनविमान ] [ २४५
कालानुसारतो मध्यचक्रसम्भ्रमणाय हि ।
नालस्तम्भस्य बाह्ये कीलकास्सम्यक् प्रतिष्ठिता. ।।६७।।
चक्रेषु रन्ध्रस्थितत्वादचलत्वाद् द्विचक्रयोः ।
मध्यचक्रभ्रमात् सम्यक्चक्रत्रयसमूह्त ।।६८।।
वायुसञ्चरणार्थाय सम्यक् मार्गं कृतं भवेत् ।
एतेन वायुसञ्चारस्तिरोधानोप्यथाक्रमम् ।।६६।।
अनुलोमाद्विलोमाच्च बाह्यकीलकचालनात् ।
भवेत्कालानुसारेण सप्रमाणं यथाविधि ।।७०।।
पीठ से चार बालिश्त ऊपर स्तम्भ में कम से छिद्रसहित गोलाकार तीन चक्र लगादे,
चक्रों का घेरा साढे पन्द्रह बालिश्त हो । उसी प्रकार पीठ से ४४ बालिश्त ऊपर छिद्रसहित गोलाकार
तीन चक्र प्रतिष्ठित हों इनमें ऊपर नीचे दो अचल चक्र हों इस प्रकार उन्हें शंकुओं से बान्धे, कालानुसार
मध्यचक्र के घूमने के लिये नालस्तम्भ के बाहिर कीलें लगावे, चक्रों में छिद्र होने से और दो चक्रों के
अचल होने से मध्यचक्र के घूमने से तीनों चक्रों के समूह—तीनों के होने से वायु सञ्चार के लिये
सम्यक् मार्ग हो जाता है इस वायु का सञ्चार और उसका तिरोधान — बन्द हो जाना समयानुसार यथा-
विधि क्रम से कील के सीधा उल्टा चलाने से हो जाता है — होता रहेगा ।।६३-७०।।
गवाक्षशिखरनिर्णय —गवाक्ष शिखर का निर्णय—
बाह्यावृत्त गोपुरस्य सार्धपञ्चदशक्रमात् ।
वितस्तिप्रमाणमिति शास्त्रे प्रोक्तं महर्षिभि ।।७१।।
तदन्तर्वलयं पञ्चवितस्तय इतीरितम् ।
वितस्तिद्वयमोन्नत्यं सु दृढं च मनोहरम् ।।७२।।
गवाक्षशिखरं सम्यग् नालस्तम्भोपरि न्यसेत् ।
गोपुर-सूर्यकिरण द्वार का बाहरी घेरा साढ़े पन्द्रह बालिश्त माप का शास्त्रों से महर्षियों ने
कहा है उसके अन्दर का घेरा पांच बालिश्त कहा है दो बालिश्त उठाव आडेपन का सुन्दर गवाक्षशिखर-
झरोके की ऊंचाई नालस्तम्भ के ऊपर रखे ।
अथ रविचुम्बकमणिनिर्णयः —अब सूर्यकान्तमणि का निर्णय—
प्रदक्षिणावृत्तस्सप्तवितस्तिस्स्यान्मणेस्तथा ।।७३।।
वितस्तिद्वयमायामं वितस्तिद्वयगात्रकम् ।
आदित्यचुम्बकमणि शिखरस्योपरि न्यसेत् ।।७४।।
सूर्यकान्तमणि का घेरा ७ बालिश्त दो बालिश्त लम्बा चौड़ा दो बालिश्त मोटाईवाला हो
उस सूर्यचुम्बकमणि को गवाक्ष की चोटी पर रखे — ऊपरिभाग पर रखे जडवे ।
चतुरौष्मिकयन्त्राणि —चार औष्मिकयन्त्र—
पीठस्योपरिभागे तु वितस्तीनां चतुर्दश ।
२४६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
ततस्त्रयङ्गुलमानेन सौधत्रयं मनोहरम् ॥७५॥
वितस्तीना दशोन्नत्ये गात्रे त्र्यङ्गुलसंयुतम् ।
एतदाकारसंयुक्तं स्तम्भोपरि यथाविधि ॥७६॥
संस्थापितं कीलशङ्कुबन्धनात्सुदृढं यथा ।
प्रतिस्तम्भान्तरायस्तु वितस्तिदशकं स्मृतम् ॥७७॥
प्रतिस्तम्भाग्रभागान्ते चक्रावर्तप्रकल्पनात् ।
परस्परं मिलित्वाथान्योन्यं सम्परिगृह्यते ॥७८॥
एतत्पीठे चतुर्दिक्षु तत्तत्केन्द्रोपरि क्रमात् ।
वितस्तिदशकायामं विस्थ्यष्टोन्नत्यं तथा ॥७९॥
सुदृढं स्थापयेत् सम्यगौष्म्ययन्त्रचतुष्टयम् ।
यन्त्रप्रदक्षिणावृत्तो वितस्तिदशकं स्मृतम् ॥८०॥
पीठ के ऊपरिभाग पर तीन सुन्दर भवन १४ बालिश्त और ३ अंगुल माप प्रसार से तथा
१० बालिश्त ऊंचाई में और ३ अंगुल मोटाई में बनावे । इस आकार से युक्त स्तम्भ के ऊपर यथा-
विधि संस्थापित कील शंकुबन्धनों से सुदृढ करे, स्तम्भ की दूरी १० बालिश्त कही है। स्तम्भ के अग्रभाग
के अन्त में चक्र आवर्त—घेर बनाने से परस्पर मिलकर एक दूसरेसे संयुक्त किया जाता है। यह पीठ में
चारों दिशाओं में उस उस केन्द्र के ऊपर क्रम से १० बालिश्त लम्बाई ८ बालिश्त ऊंचाई पर सुदृढ चार
औष्म्य यन्त्र (एजिन) हों, औष्म्ययन्त्र का घेरा १० बालिश्त कहा गया है—॥७५-८०॥
वितस्त्यष्टकमोन्नत्यमिति शास्त्रविनिर्णयं ।
एतन्मध्यस्थितस्तम्भपंक्तिमार्गानुसारतः ॥८१॥
व्योमयानं प्रयात्तॄणामुपवेष्टुं यथाविधि ।
गृहान् प्रकल्पयेच्छिल्पशास्त्रीत्या पृथक् पृथक् ॥८२॥
एवमुक्त्वा प्रथमसौधप्रदेशे गृहकल्पनाम् ।
विमानस्याङ्गयन्त्राणां स्थापनार्थमतः परम् ॥८३॥
द्वितीयसौधप्रमाणमुक्त्वा तस्मिन् यथाविधि ।
स्तम्भपंक्त्यनुसारेण गृहान् सम्यक् पृथक् पृथक् ॥८४॥
अङ्गयन्त्रप्रमाणानुसारतः परिकल्पयेत् ।
अथैकैकगृहे सिद्धान्यङ्गयन्त्राण्यथाविधि ॥८५॥
एकैकं स्थापयेत्सम्यग्दृढं कीलैः पृथक् पृथक् ।
वितस्तीनां षष्टितमोन्नत्यमुक्तं तथैव हि ॥८६॥
और ऊंचाई ८ बालिश्त हो यह शास्त्र का निर्णय है। इसके मध्य में स्थित स्तम्भपंक्तिमार्ग
के अनुसार व्योमयान के यात्रियों के बैठने को यथाविधि घर—शास्त्ररीति से पृथक् पृथक् बनावे ।
इस प्रकार प्रथम सौध-महल घेरे प्रदेश में गृह(कम्पार्टमेण्ट) बनाना। विमानके अंगयन्त्रों के स्थापनार्थ
शकुनविमान ] [ २४७
दूसरे सौध-महल घेरे में यथाविधि कहकर स्तम्भपंक्ति के अनुसार घरों को पृथक् पृथक् अंगयन्त्रों के
प्रमाणानुसार बनावे, एक एक घर में. सिद्ध अंगयन्त्रों को यथाविधि एक एक को कीलों से स्थापित करे,
६० बालिशत ऊंचाई कही है—॥८१-८६॥
वितस्तिषोडशायाममूर्ध्वोन्नत्यमत परम् ।
चतुर्दशवितस्त्योपर्यंगुलत्रयमेव च ॥८७॥
द्वितीयसौधप्रमाणमुक्त (खलु?) महर्षिभि ।
चत्वारिंशद्वितस्तिप्रमाणमुन्नतमद्भुतम् ॥८८॥
वितस्त्यष्टमायाम तदूर्ध्वोन्नत्यक तथा ।
चतुर्दशवितस्त्योपर्यंगुलत्रयमेव हि ॥८९॥
तृतीयसौधप्रमाणमेव शास्त्रेण वर्णितम् ।
अङ्गयन्त्रस्थापनार्थं तत्रत्यस्तम्भपंक्तिभि ॥६०॥
जनोपवेशनार्थं च गृहान् सम्यक् प्रकल्पयेत् ।
पीठात् श्यावरणान्त च तदारभ्य पुन क्रमात् ॥६१॥
नालस्तम्भान्तपर्यन्तं चतुर्दिक्षु पृथक् पृथक् ।
रज्वाकाराद् रन्ध्रनालादेकैकस्य परस्परम् ॥६२॥
विना बन्ध योजित स्यात् सुदृढ क्रमात् ।
पीठावरणतस्तद्वत्साधं सप्तवितस्तनचध ॥६३॥
यावतीठप्रमाण स्यात् तावदेव यथाविधि ।
एकमावरण कुर्यात्सुदृढं सुमनोहरम् ॥६४॥
१६ बालिशत लम्बा ऊपर उन्नत हुआ १४ बालिशत ३ अंगुल अधिक दूसरे सौध—महल का
प्रमाण महर्षियों ने कहा है । ४० बालिशत प्रमाण का उन्नत ८ बालिशत लम्बा उससे ऊपर, १४ बालिशत
३ अंगुल तीसरा सौध—महल का प्रमाण शास्त्र में कहा है । अंगयन्त्रों के स्थापनार्थ वहां की स्तम्भ-
पंक्तियों से तथा मनुष्यों के बैठने के लिये घर सम्यक् बनावे । पीठ से आवरणपर्यन्त और पुन आवरण
से आरम्भ करके चारों दिशाओं में नालस्तम्भपर्यन्त रस्सी के आकार छिद्रवाली नाल से एक एक का
परस्पर विनाबन्धन के स्थान सुदृढयुक्त किया हो । पीठावरण से साढेसात बालिशत नीचे पीठ के माप का
एक आवरण मनोहर करे ।
यानोपयुक्तयन्त्राण्ये तस्मिन् संरचितानि हि ।
तन्मध्यकेन्द्रनालस्तम्भमूलोस्ति दृढ यथा ॥६५॥
एतन्नालस्तम्भमूले चतुर्दिक्षु यथाक्रमम् ।
वाताकर्षणयन्त्राणि चत्वारि स्थापितानि हि ॥६६॥
तत्प्रेरणकारिणि चत्वारि रौष्ण्ययन्त्राण्यपि क्रमात् ।
पश्चाद्भागे विमानस्य पूर्वभागेऽपि च स्थिते ॥६७॥
२४८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
वातापकर्षणयन्त्रद्वयमध्यस्थकेन्द्रके ।
वातपाचकयन्त्रं च सुदृढं स्थापितं भवेत् ॥९८॥
एतद्यन्त्रमुखे वातपाचनार्थं यथाविधि ।
बाह्यवायुं पूरयितुं पृथग्यन्त्रद्वयं क्रमात् ॥९९॥
यानस्य पूर्वपश्चाद्भागयोस्सम्यक् प्रतिष्ठितम् ।
विमानोभयपार्श्वस्थपक्षयोरुभयोरपि ॥१००॥
प्रसारणाघात*क्रियासिद्धयर्थं च तथैव हि ।
तिर्यङ्न्यग्गुलरूपेणोपसंहारार्थं शास्त्रतः ॥ १०१ ॥
स्वानुकूलं यथा तत्र कीलकास्स्थापितास्तथा ।
विमानस्य पुरोभागस्थितपङ्कभ्रमाय हि ॥ १०२ ॥
शलाका नालमध्यस्था योजिताश्चौष्ण्ययन्त्रके ।
विमानयान के उपर्युक्त यन्त्र इसमें रचे हैं उसके मध्यकेन्द्र में नालस्तम्भ मूल दृढ करे, इस
नालस्तम्भ मूल में चारों दिशाओं में यथाक्रम चार वाताकर्षण यन्त्र—वायु का आकर्षण करने वाले यन्त्र
स्थापित हों, उनके प्रेरक चार औष्ण्य यन्त्र ताप देने वाले यन्त्र ( ऐंञ्जिन ) भी रखे हों। विमान के
पिछले भाग और पूर्व भाग में दोनों यन्त्रों के मध्यकेन्द्र में वातापकर्षण यन्त्र—वात को फेंकने वाले यन्त्र
हों और वातपाचक यन्त्र भी सुदृढ लगावे। इस यन्त्रमुख में यथाविधि वातपाचनार्थ बाह्य वायु को अन्दर
भरने को क्रम से पृथक दो यन्त्र होने चाहिएं वे विमान यान के पूर्व पश्चात् के भागों में ठीक रखे हों।
विमान के दोनों पाश्र्वों में स्थित पंखों को प्रसारण के आघात या प्रसारण और आधानक्रिया सिद्धि के
लिए तिर्यक्—तिरछा नीचे समेटनेरूप से उपसंहार के लिये भी शास्त्र से अनुकूल कीलें वहां लगानी
चाहिएं। विमान के सम्मुख भाग स्थित वातव्यक्तीकरण चक्र† भ्रमण के लिए औष्ण्यक यन्त्र ( ऐञ्जिन )
में शलाकाएं नाल के मध्य में युक्त हों ॥ ९५–१०२ ॥
अथ पक्षनिर्णयः—अब पंखों का निर्णय करते हैं—
विंशद्वितस्त्युन्नत तदायामोऽष्टवितस्तिकः ॥ १०३ ॥
गात्रे सार्धवितस्तीति निश्चितं पक्षमूलयोः ।
तन्मूलो कीलके सम्यक् सुदृढ योजित क्रमात् ॥ १०४ ॥
पक्षयो पञ्चिमभागे रेखावत्परिदृश्यते ।
तत्पुरोभागविस्तारो वितस्तिदशकं भवेत् ॥ १०५ ॥
पश्चाद्भागस्य विस्तारो चत्वारिंशद्वितस्तयः ।
पक्षोन्नत्य वितस्तीनां भवेत् षष्टितम क्रमात् ॥ १०६ ॥
एतदाकारसंयुक्तं पक्षद्वयमितीरितम् ।
- घात ( हस्तलेपे )
† पचि व्यक्तीकरणे ( भ्वादि० )
शकुनविमान ] [ २४६
उसकी ऊंचाई लम्बाई २० बालिश्त ८ बालिश्त चौड़ाई पंखों के मूल में डेढ़ बालिश्त मोटा,
उनके अपने मूल कील में दृढ युक्त हों । पंखों के पिछले भाग में रेखा की भांति दिखलाई पड़ता है,
उसके सामने के भाग का विस्तार १० बालिश्त हो पिछले भाग का विस्तार लम्बाई ४० बालिश्त पंखों का
उन्नतिपथ ६० बालिश्त हो । इस आकार के दो पंख हों ॥ १०३-१०६ ॥
अथ पुच्छप्रमाणम्—अब पुच्छ का प्रमाण कहते हैं—
पुच्छोन्नतय वितस्तीना विशतिस्स्यात्तथैव हि । १०७ ॥
तत्पुरोभागविस्तारस्सार्धत्रयवितस्तिकः ।
तत्पश्चाद्भागविस्तारो वितस्तीनो तु विशति ॥ १०८ ॥
एतत्पुच्छाकारमिति प्रवदन्ति मनीषिण ।
पुच्छ का ऊपर उठाव २० बालिश्त, सामने वाले भाग की मोटाई साढे तीन बालिश्त उसके
पिछले भाग की लम्बाई २० बालिश्त यह पुच्छ का आकार मनीषी कहते हैं ॥ १०७-१०८ ॥
वाताकर्षक यन्त्रं तदौष्ण्यक यन्त्रं च—बाताकर्षक यन्त्र और उसका औष्ण्यक यन्त्र भी—
यन्त्रोन्नतय वितस्तीनामुक्त पञ्चदश क्रमात् ॥ १०६ ॥
वितस्तित्रयमायाममिति शास्त्रे निरूपितम् ।
यन्त्र की ऊंचाई १५ बालिश्त मोटाई ३ बालिश्त शास्त्र में कही है । १०६ ॥
नालप्रमाणम्—नाल का प्रमाण—
वितस्तित्रयमोन्नतय तन्नालाना तथैव हि ॥ ११० ॥
बाह्यावृत्त वितस्तीना चत्वारीति विनिर्णितम् ।
एतद् यन्त्रशलाकाश्च कीलकाद्यास्तथैव हि ॥ १११ ॥
कृतास्तदनुसारेण शास्त्रोक्तेनैव वर्त्मना ।
इसी प्रकार उनके नालों की ऊंचाई मोटाई तीन बालिश्त हो, बाहिरी आवृत्त—मूठ की मोटाई
चार बालिश्त हो ऐसे ही यन्त्र की शलाकाए कील आदि भी अपने माप के अनुसार शास्त्र में कहे मार्ग
से हों ॥ ११०-१११ ॥
अथ बातपायन्त्रनिर्णय —अब वातपा-वायुरक्षकयन्त्र का निर्णय—
वितस्तिद्वादशोन्नतय वर्तुलावरण तथा ॥ ११२ ॥
वितस्तिसार्धनवकप्रमाणेनाभिवर्णितम् ।
इत्युक्त वातपायन्त्रप्रमाण शास्त्रत क्रमात् ॥ ११३ ॥
अन्त प्रदक्षिणावृत्ततन्त्रिभि परिवेष्टितम् ।
एतदन्तर्मुखे नालमेक सन्धारितं भवेत् ॥ ११४ ॥
आवृत्ततन्त्रीनालेनवर्तिसञ्चारतस्तथा ।
तद्बहि पक्वतेलस्य ज्वालसन्धारवेगत ॥ ११५ ॥
१० बालिश्त उठा हुआ गोल आवरण भी साढ़े नौ बालिश्त प्रमाण से कढ़ा है। शास्त्र से
वातपा यन्त्र का प्रमाण कह दिया है। अन्दर घूमने वाले तारों से लपेटा हुआ हो उसके भीतरी मुख में
एक नाल लगाई हो। घूमने वाले तारों के नाल में अन्दर बातसञ्चार होगा, उसके बाहिर गरम तैल ज्वलन-
शक्ति वेग से--॥ ११२-११५ ॥
भवेत्सन्तापितो वायुश्शतकक्ष्यप्रमाणात. ।
एतत्सन्तापित वायुमोष्म्ययन्त्रे नियोजितुम् ॥ ११६ ॥
बाह्यस्यशीतवायोराकर्षणाय तदन्तरे ।
नालाश्च कीलका एतद्यन्त्रे सन्धारिता क्रमात् ॥ ११७ ॥
तैलज्वालासमुत्पन्नधूम वेगान्मुहुर्मुहुः ।
बाह्ये' नियोजितु यन्त्रात्स्तम्भमूलावधि क्रमात् ॥ ११८ ॥
षडङ्गुलगात्रनाला यन्त्रेऽस्मिन् सम्प्रतिष्ठिताः ।
बाह्यस्थ पूर्वोक्तशीतवायु यन्त्रान्तरे क्रमात् ॥ ११९ ॥
नियोजितुं पुनर्वातयन्त्रा
शकुनविमान ] [ २५१
प्रयाणकाले सर्वत्र सहायो भवति ध्रुवम् ॥ १२६ ॥
तथैव व्योमयानस्य पार्श्वयोरुभयोरपि ।
न्यग्गुलीकरणार्थाय पक्षयोरुभयो क्रमात् ॥ १२७ ॥
पक्षाघातककीलेपि कर्तुं स्याद् रज्जुबन्धनम् ।
एतद्रज्ज्वाकर्षणेन पक्षयोरुभयो क्रमात् ॥ १२८ ॥
विस्तृतत्वं च न्यग्भाव क्रमाद् भवति नान्यथा ।
प्रथमावरणादस्ति वितस्तिदशकादध ॥ १२६ ॥
सार्धद्वयबितस्त्यूर्ध्वोन्नत्यमात्र मनोहरम् ।
अन्यदावरण पीठात् किञ्चिन्न्यून प्रमाणतः ॥ १३० ॥
वातनालस्तम्भमूलमेकस्मिन् शास्त्रतो दृढम् ।
प्रदक्षिणावृत्तभागात्सम्यक संयोजित भवेत् ॥ १३१ ॥
वातपा चक्र यन्त्र के पूर्व भाग में यथाविधि तैलप्रज्वलन के लिए दीपचुल्ली लगी हो, उसमें
दीप प्रतिष्ठार्थ अग्नि की उत्पत्ति के निमित्त ही कीलों से विद्युद्यन्त्र दृढ स्थापित हो । इससे समयानुसार
अग्नि जल जावे, दीप के उपसंहार समय—बुझाने के समय तैल संरक्षण के लिए एक कील यथाविधि
लगी हो । पुच्छ के भीतरी प्रवेश के सिरे पर करने को रज्जुबन्धन हो, यन्त्रनियन्ता चालक द्वारा रज्जु के
खींचने से बार वार निरन्तर पुच्छ वेग से ऊपर नीचेवाले भागों में घूमती है इससे विमान के आरोहण—
ऊपर उठने वैसे ही अवरोहण—नीचे आने और प्रयाणकाल—उड़ते हुए सर्वत्र सहायक होता है । ऐसे
ही व्योमयान के दोनों पंखों को क्रम से नीचे ऊपर झुकाने को पंखों को आघात करने—प्रेरित करने
वाली कील में रज्जुबन्धन हो । इस डोरी के खींचने से दोनों पंखों का विस्तार गमन—अपगमन ऊर्ध्व-
गमन और पश्चाद् गमन नीचे गमन क्रम से होता है । प्रथम आवरण से १० बालिश्त नीचे तथा पीठ से
अढाई बालिश्त उठा हुआ अन्य आवरण हो, कुछ न्यून वातनाल मूल एक में घूमने वाले भाग से भली
प्रकार लगी हो—फिट हो ॥ १२१-१३१ ॥
तैलपात्रनिर्णयः—तैलपात्र का निर्णय करते हैं—
एतस्मिन्नेव विधिवज्जलावरणसयुतम् ।
बितस्तीना सार्धनवप्रमाणोन्नत्यक तथा ॥ १३२ ॥
चतुर्वितस्त्यावृत्त चायामे नववितस्तय ।
षडङ्गुल तदुपरिप्रमाणोनाभिर्वर्णिताम् ॥ १३३ ॥
वितस्तीनां पञ्चदशविस्तृताकारसयुतम् ।
तैलपात्रद्वय सम्यक् स्थापित सुदृढ यथा ॥ १३४ ॥
इसी मे विधिवत् जलावरण से युक्त साढे नौ बालिश्त ऊंचाई में तथा चार बालिश्त घेरेवाला
या गोलाई में और नव बालिश्त छः अङ्गुल विस्तार में नाभि कही है पन्द्रह बालिश्त विस्तृत आकारवाला
लम्बे दो तैलपात्र सुदृढ सम्यक् स्थापित करे ॥ १३२—१३४ ॥
२५२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
अथ वातनालनिर्णयः—अब वातनाल का निर्णय दर्शाते हैं—
वितस्तीना पञ्चदशप्रमाणोन्नत्यसम्मितम् ।
वितस्तिद्वयगात्र च वर्णितं तदनन्तरम् ॥ १३५ ॥
सार्धषट्कवितस्तीना विस्तार सुमनोहरम् ।
वाताकर्षणभस्त्राणां चतुष्टयमुदाहृतम् ॥ १३६ ॥
वाताकर्षणयन्त्रैस्सम्भूतवायु यथाविधि ।
एतस्मिन् सन्नियोज्याथ यावदिच्छानुसारत ॥ १३७ ॥
बाह्ये प्रेरयितु नाल कीलक च सुशोधितम् ।
सन्धारित भवेदस्मिन् शास्त्रोक्तेनैव वर्त्मना ॥ १३८ ॥
एतदावरणाधस्ताच्चतुर्दिक्षु यथाविधि ।
वितस्तिसप्तवलयाकाराणि सुदृढान्यपि ॥ १३६ ॥
चक्राणि भूसञ्चारयोग्यानि सन्धारितानि हि ।
एव शकुनयन्त्रस्य रचनाविधिरिरीतम् ॥ १४० ॥
१५ बालिश्त प्रमाण ऊंचाई-ऊंची लम्बाई २ बालिश्त मोटाई कहा है, साढे छः बालिश्त
विस्तार वात को खींचने वाले चार भस्त्राओं को कहा है, वाताकर्षण यन्त्रों से प्रकट या संगृहीत वायु को
यथाविधि इसमें जितनी इच्छा हो उतनी बाहिर फेंकने को नाल और कील भी इस में शास्त्रोक्त मार्ग
से ठीक शोधित लगाई गई हो इस आवरण की चारों दिशाओं में यथाविधि ७ बालिश्त गोल आकार
वाले सुदृढ चक्र भूमि में सञ्चार करने योग्य लगाए हों, इस प्रकार शकुनयन्त्र—शकुनविमान की
रचनाविधि कही है ॥ १३५–१४० ॥
हस्तलेख कापी संख्या १८—
सुन्दरोथ ॥ अ० ३, सू० ६ ॥ १
एवमुक्त्वा शकुनविमान शास्त्रानुसारतः ।
अथेदानो सुन्दरविमान सम्यक् प्रचक्षते ॥ १ ॥
यानप्रबोधकपदद्वयमस्मिन्निरूपितम् ।
तत्रादिमपदाद् याननाम सम्यक् प्रकाशितम् ॥ २ ॥
श्रानन्तर्यवाची स्याद् द्वितीयपदमत्र (हि) तु ।
एव पदद्वयस्यार्थस्सामान्येन निरूपितः ॥ ३ ॥
इदानी तद्विशेषार्थं सग्रहेण प्रचक्षते ।
अष्टाङ्गान्यस्य शास्त्रेस्मिन्निर्णितानि यथाक्रमम् ॥ ४ ॥
तेषा स्वरूप विधिवद् विचार्याथ पृथक् पृथक् ।
विलिख्यते यथाशास्त्र सग्रहेण यथामति ॥ ५ ॥
आदौ पीठस्ततो धूमनालस्तम्भस्तथैव हि ।
पश्चाद् धूमोद्गमयन्त्रपञ्चक च तत परम् ॥ ६ ॥
भुज्युलोहकनालश्च ततो वातप्रसारणम् ।
विद्युद्यन्त्र ततो धातुर्मुखोष्मकमत परम् ॥ ७ ॥
विमाननिर्णयश्चैतान्यष्टाङ्गानि भवन्ति हि ।
तेष्वादौ यानपीठस्य रचनाविधिरुच्यते ॥ ८ ॥
इस प्रकार शकुनविमान शास्त्रानुसार कहकर अब सुन्दरविमान कहते हैं । यान के प्रबोध
करानेवाले दो पद यहा निरूपित किए हैं, उनमें आदि पद से विमान यान का नाम सम्यक् प्रकाशित
किया है द्वितीय पद अनन्तर अर्थ का वाचक यहां है । इस प्रकार दोनों पदों का सामान्य अर्थ निरूपित
कर दिया । अब संक्षेप से इसका विशेष अर्थ कहते हैं । इस शास्त्र में इसके आठ अङ्ग निश्चित किए
हैं इनका विधिवत् स्वरूप विचार कर यथाशास्त्र संक्षेप से पृथक् पृथक् लिखा जाता है । प्रथम पीठ फिर
धूमनालस्तम्भ पश्चात् पांच धूमोद्गमयन्त्र, भुज्य लोहे की नाल, फिर वातप्रसारण फिर विद्युद्यन्त्र पश्चात्
धातुर्मुखोष्मक यन्त्र । ये आठ अङ्ग विमाननिर्णय प्रसङ्ग में हैं जिनमें आदि में विमानयान के पीठ की
रचनाविधि कही जाती है ॥ १-८ ॥
५५४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
अथ पीठनिर्णयः—अब पीठ का निर्णय कहते हैं—
चतुरश्रं वर्तुलं वा वितस्तिशतकावृतम् ।
अथवा यन्मनोद्दिष्ट * तत्प्रमाणेण शास्त्रतः ॥ ६ ॥
राजलोहादेव पीठ वितस्त्यष्टकगात्रकम् ।
कृत्वाय पाचयेत्सप्तवार मञ्जुक्तैलत ॥ १० ॥
तत् पीठं समाहृत्य तस्मिन् केन्द्रानि कारयेत् ।
केन्द्रयोरुभयोर्मध्ये वितस्तिदशकान्तरम् ॥ ११ ॥
विहायैकैकपार्श्वे च प्रत्येकं दश सख्यया ।
आहृत्य चत्वारिंशत्केन्द्राणि कुर्याद् यथाक्रमम् ॥ १२ ॥
केन्द्रमानं पञ्चदशवितस्तिरिति निर्णितम् ।
तन्मध्ये द्वादशवितस्त्यायामेन यथाविधि ॥ १३ ॥
धूमप्रसारणनालस्तम्भकेन्द्रं च कल्पयेत् ।
चौकोर या गोल १०० बालिश्त से घिरा हुआ अथवा मनोऽनुकूल यथेच्छ प्रमाण से शास्त्रा-
नुसार राजलोहे से ही ८ बालिश्त मोटा पीठ बनाकर ७ बार मञ्जुक तैल—मंजीततैल ? में पकावे फिर उस
में से पीठ को निकालकर उसमें केन्द्र बनावे, दोनों केन्द्रों के मध्य में १० बालिश्त अन्तर छोड़कर एक
एक पार्श्व में प्रत्येक १० संख्या से जड़कर ४० केन्द्र करे केन्द्र का माप १५ बालिश्त हो उनके मध्य में
१२ बालिश्त लम्बाई रहे धूमप्रसारणनालस्तम्भ का केन्द्र भी बनावे ॥ ६—१३ ॥
अथ नालस्तम्भनिर्णयः—अब नालस्तम्भ का निर्णय कहते हैं—
षट्पञ्चाशद्वितस्त्योन्नत्यं तथैव यथाविधि ॥ १४ ॥
चतुर्वितस्त्यायामं च नालस्तम्भं प्रकल्पयेत् ।
धूमसम्पूरणार्थाय तन्मूले वर्तुलाकृतिम् ॥ १५ ॥
वितस्त्यष्टकमायाममन्तर्वर्तुलविस्तृतम् ।
चतुर्वितस्त्युन्नत कारयेत् कुम्भवत् ततः ॥ १६ ॥
स्थापयेत् तन्मध्यकेन्द्रे सुदृढं शास्त्रमानतः ।
षड्वितस्त्यन्तरायामं जलपात्रमतः परम् ॥ १७ ॥
तन्मूले कल्पयित्वाय तैलपात्रं यथाविधि ।
चतुर्वितस्त्यायामं तन्मध्ये संस्थापयेद् दृढम् ॥ १८ ॥
तन्मूलेथ यथाशाखं वितस्त्येकप्रमाणकम् ।
विद्युत्सघर्षणामरणीकीलकं स्थापयेद् दृढम् ॥ १६ ॥
पात्रे धूमाञ्जनतैलं द्वादशांशं प्रपूरयेत् ।
शुकतुण्डिकतैलस्य विंशत्यशस्तथैव हि ॥ २० ॥
- मनः-उद्दिष्टम्, मन उद्दिष्टम्, मत्र सन्दिग्धार्थः ।
सुन्दरविमान ] [ २५५
५६ बितस्ति ऊंचाई यथाविधि ४ बालिश्त चौड़ाई में नालस्तम्भ बनावे। और धूम भरने के लिये
उसके मूल में गोलाकार ८ बालिश्त मोटा अन्दर से गोल ४ बालिश्त ऊंचा घड़े जैसा बनावे फिर मध्य
केन्द्र में शास्त्रानुसार सुरुढ स्थापित करे। इस से आगे जलपात्र ६ बालिश्त लम्बा बड़ा उसके मूल में
बनाकर तैलपात्र ४ बालिश्त बड़ा मध्य रखवे । फिर उसके मूल में शास्त्रानुसार १ बालिश्त विद्युत्संघर्षण-
मणि की कील को स्थापित करे, पात्र में धूमाञ्जनतैल ? १२ भाग भरवे शुक्तुतुण्डिकातैल—शुक्तुण्ड—
हिङ्गुलतैल ? के २० अंश भरे ॥ १४-२० ॥
नवांशकुलटीतैल पूरयेत्सप्रमाणत ।
यथेष्ट पूरयेद् यद्वा एव भागक्रमात्सुधीः ॥ २१ ॥
विद्युत्संयोजनार्थाय मणिकीलान्तरे क्रमात् ।
सन्धारयेन्नालमार्गात् तन्त्रीद्वयमत परम् ॥ २२ ॥
नालस्तम्भान्तरे धूमस्तम्भनार्थं तथैव हि ।
प्रसारणार्थं च वेगादनुकूलं यथाभवेत् ॥ २३ ॥
आवृत्तचक्रत्रितय सरन्ध्रं च दृढं यथा ।
स्थापयेत्सरल कीलकद्वयेन यथाविधि ॥ २४ ॥
एतत्सञ्चालनार्थाय त्रिचक्रकीलको तथा ।
अनुलोमविलोमाभ्या स्तम्भबाह्ये नियोजयेत् ॥ २५ ॥
स्तम्भान्तरस्थत्रिचक्रकीलकाना तथैव हि ।
बाह्यस्थत्रिचक्रकीलकेषु संयोजन यथा ॥ २६ ॥
तथा नालान्तरात् तन्त्यस्समागृत्य यथाक्रमम् ।
आदौ मध्ये तथा चान्ते क्रमात् सख्यानुसारतः ॥ २७॥
सन्धारयेद् यथाशास्त्र स्तम्भे स्थानत्रये क्रमात् ।
इति धूमप्रसारणनालस्तम्भविनिर्णय ॥ २८ ॥
६ अंश कुलटीतैल—मन शिला तैल सप्रमाण भरवे अथवा जितना चाहे इस प्रकार भागानु-
सार बुद्धिमान्। विद्युत् के संयोजन (फिट् ) करने के लिये मणिकील के अन्दर क्रम से नाल के मार्ग
से दो तारों को लगावे। तथा नालस्तम्भ के अन्दर धूम को रोकने के निमित्त और वेग से फैलाने-छोड़ने
के निमित्त जैसे अनुकूल हो छिद्रसहित घूमनेवाले तीन चक्र दो सरल कीलों से स्थापित करे इन चक्रों
के सञ्चालनार्थ तीन चक्रोंवाली दो कीलों को सीधे और उलटे ढंग से स्तम्भ के बाहिर नियुक्त करे स्तम्भ
के अन्दर स्थित त्रिचक्रकीलों का बाहिर स्थित तीन चक्रों में संयोजन करे, तथा नाल के अन्दर से तीन
तारों को यथाक्रम निकालकर आदि मध्य तथा अन्त में यथासंख्य स्तम्भ में तीन स्थानों में जोडदे बस
धूमप्रसारणनालस्तम्भ का निर्णय है ॥ २१–२८ ॥
अथ धूमोद्गमयन्त्रम्—अब धूमोद्गमयन्त्र (धूम को निकालने का यन्त्र ) कहते हैं—
वेगादूर्ध्वमुखे धूमोक्षेपण कुरुते यतः ।
अतो धूमोद्गम इति नाम यन्त्रस्य वर्णितम् ॥ २६ ॥
२५६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
हिमसवंर्धकस्सोमस्सुण्डालश्च यथाक्रमम् ।
द्वात्रिंशत्पञ्चविंशाष्टत्रिंशद्भागान् क्रमेण तु ॥ ३० ॥
सम्पूर्य नलिकामूषामुखे पश्चाद् दृढ यथा ।
स्थापयित्वा चक्रमुखकुण्डेऽग्रमुखभस्त्रत ॥ ३१ ॥
द्वादशोत्तरसप्तशतकक्ष्योष्णप्रमाणत ।
सगालयेद् यथाशास्त्रमानेत्रोन्मीलनावधि ॥ ३२ ॥
ततो भवेद् धूमगर्भोलोहस्सूक्ष्मो मृदुर्दृढः ।
कुर्याद् धूमोद्गम यन्त्रमेतेनैव यथाविधि ॥ ३३ ॥
प्रदक्षिणावृत्तकीलवितस्तिदशकोन्नतम् ।
पीठस्याधो भागमध्यकेन्द्रस्थाने यथा भवेत् ॥ ३४ ॥
पीठ कुर्यात्त्रिपञ्चदशवितस्त्यायामतस्तथा ।
धूमोष्यकप्रसारणार्थाय पश्चाद् यथाविधि ॥ ३५ ॥
वेग से ऊपर मुख की ओर धूम को ऊपर फैंकता है अतः धूमोद्गमनामयन्त्र को वर्णित किया
है । हिमसंर्वधक सोम सुण्डाल इन तीनों के यथाक्रम ३२, २५, ३८, भागों को मूषामुख नलिका में
भरकर चक्रमुख कुण्ड में दृढ रखकर अग्रमुखभस्त्रा से आंख खुलजाने तक शास्त्रानुसार गलावे तब धूम-
गर्भ लोहा सूक्ष्म कोमल दृढ हो जावे । इस लोहे से धूमोद्गम (धूम को फेंकनेवाला) यन्त्र करे । घूमने
वाली कील १० बालिशत उठी हो पीठ के नीचले भाग के मध्य केन्द्र स्थान में हो, पीठ १५ बालिशत चौडी
हो धूमोष्यक को प्रसारणार्थ पश्चात् यथाविधि—॥२६—३५॥
जलोष्यकधूमनालद्वय तस्योभयपार्श्वयो ।
स्थापयेत्सुदृढ सम्यग्दक्षिणोत्तरत क्रमात् ॥ ३६ ॥
धूमसम्पूर्णार्थाय तन्नालद्वयमूलयो ।
चतुर्वितस्त्यायामं च वितस्तित्रयमुन्नतम् ॥ ३७ ॥
कुम्भवत्कारयेद् वर्तुलाकार सुदृढ यथा ।
वितस्त्यायामक चाष्टवितस्त्युन्नतमेव च ॥ ३८ ॥
तदन्ते चषकाकार वितस्तित्रयविस्तृतम् ।
एव क्रमेण विधिवत् कृत्वा नालद्वय तत ॥ ३९ ॥
धूमपूरकनालोर्ध्वभागे संयोजयेद् दृढम् ।
तन्मूले जलपात्र च तन्मध्ये तैलपात्रकम् ॥ ४० ॥
जलोष्यक—दो धूमनाल उसके दोनों पार्श्वों में दक्षिण उत्तर भागों में क्रमशः स्थापित करे ।
धूम को भरने के लिये उन दोनों नालों के मूलों में ४ बालिशत लम्बा ३ बालिशत उठा हुआ घडे के समान
गोलाकार सुदृढ स्थान बनावे उसके अन्त में ८ बालिशत लम्बा और ऊंचा ३ बालिशत चौडा पात्र विधि-
वत् क्रम से बनाकर दो नाल जोड दे जिनमें धूम भरने वाले नाल के उपरि भाग में उसके मूल में जल-
पात्र मध्य में तैलपात्र लगावे ॥ ३६—४० ॥
सुन्दरविमान ] [ २५७
तत्पुरस्ताद्विद्युद्घर्षकमण्यो कीलकद्वयम् ।
धूमप्रसारणालस्तम्भवत्संस्थापयेत्क्रमात् ॥ ४१ ॥
पार्श्वयोरुभयोरौष्ण्यनालस्य च यथाविधि ।
जलकोशद्वयं पश्चात् कारयेत्सुदृढं यथा ॥ ४२ ॥
विद्युद्यन्त्रान्नालमेकं समाहृत्य सतन्त्रिकम् ।
विद्युद्घर्षकमणिकीलेके सन्नियोजयेत् ॥ ४३ ॥
लिङ्गाशीतिप्रमाणेन विद्युच्छक्तिं यथाविधि ।
पूर्वोक्तनालस्थतन्त्रीमार्गात् सचोदयेद् यदि ॥ ४४ ॥
तच्छक्तिवेगान्मणिसंघर्षणं प्रभवेत्स्वत ।
शतकक्ष्यप्रमाणोष्णा तेन संजायते क्रमात् ॥ ४५ ॥
उसके सामने विद्युत् को घर्षित करनेवाली मणियों की दो कीलें धूम को फैलाने वाले नाल-
स्तम्भ की भांति स्थापित करे, औष्ण्यनाल के दोनों पाश्र्वों में यथाविधि दो जलकोश पीछे करावे, विद्यु-
यन्त्र से एक नाल तारसहित लेकर विद्युद्घर्षकमणि कील में नियुक्त करे, ८० लिङ्ग (डिग्री) माप से
विद्युत् शक्ति को पूर्वोक्तनाल के तन्त्रीमार्ग से प्रेरित करे उस शक्ति के वेग से स्वत मणि का घर्षण
होगा उससे सौ दर्जे प्रमाण की उष्णता प्रकट हो जावेगी ॥ ४१–४५ ॥
तस्मात् पात्रस्थितं तैलं पाचितं स्याद्विशेषतः ।
तेनधूमो भवेत् तैलं पश्चात् सम्यक् शनैश्शनै ॥ ४६ ॥
विद्युच्छक्तिं च तद्धूमं नालमार्गाद् यथाक्रमम् ।
संगृह्य वेगाद्विधिवत्पश्चात्कीलकमार्गत ॥ ४७ ॥
संचोदयेद् वारिकोशद्वयमध्ये प्रमाणतः ।
एतद्वेगादौष्ण्यधूमाकारं भवति तज्जलम् ॥ ४८ ॥
तैलधूमं धूमनाले जलधूमं तथैव हि ।
जलौष्ण्यनाले विधिवत्पूरयेत्सप्रमाणतः ॥ ४६ ॥
एतद् धूमद्वयं पश्चाद् यथोर्ध्वमुखतः क्रमात् ।
निर्गच्छेद वेगत पञ्चशतकक्ष्योष्णमानतः ॥ ५० ॥
उस से पात्रस्थित तैल विशेषतः पकाया हुआ शनै शनै धूम हो जावेगा । वह धूम यथाक्रम
नालमार्ग से एकत्र होकर कीलमार्ग में वेग से विद्युत्शक्ति को दो जलकोशों में प्रेरित कर देवे—धक्का
दे दे, इसके वेग से वह जल उष्ण धूमाकार हो जावेगा। तैलधूम तैलधूमनाल में जलधूम जलौष्ण्यनाल
में प्रमाण से भरदे, ये दोनों धूम पीछे यथोचित ऊपर से वेग से १०० दर्जे की उष्णता से निकल
जावेगा ॥ ४६–५० ॥
तथा कीलक संधानं कुर्यात् कालानुसारतः ।
धूमसंरोधनार्थं च चोदनार्थं तथैव हि ॥५१॥
संयोजयेत् कीलकाभ्यां सम्यक् सम्भ्रामयेद् यथा ॥
धूमबन्धप्रसरणे पश्चात् कालानुसारतः ॥५२॥
भवेत्* कीलकसञ्चालनेन सम्यग्यथाविधि ।
एवं क्रमेण यन्त्राणि चत्वारिंशद्यथाविधि ॥५३॥
रचयित्वा पीठकेन्द्रस्थानेष्वथ पृथक् पृथक् ।
संस्थापयेत् ततस्तेषां चतुर्दिक्षु यथाक्रमम् ॥५४॥
एकैकयन्त्रो( १?) ष्णधूमनालमूलद्वये क्रमात् ।
वितस्त्येकावृतं चैव वितस्तिद्वादशोन्नतम् ॥५५॥
सन्धारयेत्कीलकेभ्यश्शुण्डालद्वयमुद्भूतम् ।
एतत्सहायतो व्योमयानं वेगात् प्रधावति ॥५६॥
इस प्रकार कील लगावे काल के अनुसार धूमके रोकने फेंकने-छोड़ने के लिये दो कीलों
से युक्त करे घुमावे। धूमका रुकजाना और फैलजाना कालानुसार कील चलाने से सम्यक् यथाविधि
हो। इस प्रकार क्रम से ४० यन्त्र रचकर पीठ केन्द्रस्थानों में पृथक् पृथक् स्थापित करे उनके चारों ओर
यथाक्रम एक एक यन्त्र औष्ण्यधूमनालमूल दोनों में १ बालिश्त गोल १२ बालिश्त ऊंचाई कीलों से दो
अंगुल शुण्डाल इसकी सहायता से व्योमयान वेगसे दौड़ता है ॥५१-५६॥
शुण्डालस्वरूपमुक्तं लल्लेन - शुण्डाल का स्वरूप लल्ल ने कहा है-
तैलस्य धूमसंयोगाज्जलस्यो( १?) ष्ण्यकयोगत ।
विमानमाकर्षयितु शुण्डालान् कल्पयेत्सुधीः ॥५७॥
वटमञ्जूषमातङ्गा पञ्चशाखी शिखावली ।
ताम्रशीर्ष्णी बृहत्कुम्भी महिषी क्षीरवल्लरी ॥५८॥
शोणपर्णी वज्रमुखी क्षीरणी च यथाक्रमम् ।
एते द्वादश शास्त्रेषु क्षीरवृक्षा इतीरिता ॥५९॥
एतैराहृत्य विधिवन्निर्यासं क्षीरमेव वा ।
अग्निबाणाद्रिदिग्द्रवसुदेवमुनिस्तथा ॥६०॥
तैल के धूम सम्पर्क से जल के औष्ण्यकयोग से विमान के खींचने को शुण्डालों को बनावे।
वट, मञ्जूष-मञ्जीठ, मातङ्ग-गूलर या पीपल, पञ्चशाखी, शिखावली-चित्रकबृक्ष, ताम्रशीष्णी-जटा?,
बृहत्कुम्भी-कायफल?, महिषी, क्षीरवल्ली-क्षीरविदारी? शोणपर्णी?, वज्रमुखी?, क्षीरणी-कुम्भीर-दूधिया-
वृक्ष, यथाक्रम वे १२ क्षीरवृक्ष शास्त्रों में कहे हैं इनसे विधिवत् गोन्द या दूध लेकर ३, ५, ७, १०, ११,
८, ७-॥५७-६०॥
गजाब्धिशरयादित्याशप्रकारेण यथाक्रमम् ।
तोलयित्वा बृहद्भाण्डे विनिक्षिप्य ततः परम् ॥६१॥
- एकवचन व्यत्ययेन।
सुन्दरविमान ] [ २५६
ग्रन्थिलोहं च नागं च वज्रं बम्भारिकं तथा ।
वैनतेय कन्दुरं च कुडुपं कुण्डलोत्पलम् ॥६२॥
एतान् सन्तोल्य विधिवत्समभागान् पृथक् पृथक् ।
भाण्डस्थनिर्यासम तद्भाण्डे सन्नियोजयेत् ॥६३॥
पाचयेत् पाचनायन्त्राच्छास्त्रोक्तेनैव वर्त्मना ।
द्वादशोत्तराशीतिकक्ष्योष्णावेगाच्छनैश्शनैः ॥६४॥
पश्चान्निर्यासिपटयन्त्रमुखे सम्प्रपूरयेत् ।
तत सम्भ्रामयेद् वेगात् समीकरणकीलकान् ॥६५॥
एतेन तत्समीभूय कार्पासपटवत्क्रमात् ।
सुदृढं धूम्रवर्णं च सूक्ष्म मृदु सुशीतलम् ॥६६॥
अच्छेद्य छेदनाद्यैस्तैरुष्णावेगापहारकम् ।
निर्यासिपटमुत्कृष्टं भवेदत्यन्तनिर्मलम् ॥६७॥
—४, ७, ३०, १२, अंश रीतिप्रमाण से
२६० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
सुहागे या रक्तपलाश पुष्प के रंग से लेप करदे फिर चमक से सोने जैसा वह पट मनोहर लगता है,
इस पट से ही शुण्डालों को बनावे १ बालिश्त गोल १२ बालिश्त उन्नत-ऊपर लम्बा हाथी की शुण्ड की
भांति अन्दर छिद्रवाला करना चाहिए।
प्रसारणोपसंहारकीलको द्वौ यथाक्रमम् ।
सन्धारयेदावृत्तकीलशङ्कुभिस्सुदृढ यथा ॥७३॥
उपसंहारकीलेन शुण्डालश्चक्रवत्क्रमात् ।
भवेत्सकुंचित यन्त्रमूले शष्कुलवत्पुन ॥७४॥
तत प्रसारणकीलचालनात् सरल यथा ।
बाहुवल्लम्बमान च भवेत्सम्यक् स्वभावत† ॥७५॥
शुण्डालमध्ये धूमप्रसारणार्थ यथाविधि ।
यन्त्राणा मूलतस्पृष्ट कीलकान् परिकल्पयेत् ॥७६॥
यन्त्रस्य धूमश्शुण्डालमुखाद् बहि प्रसारणे ।
पुनश्शुण्डालमुखतो बाह्यवातापकर्षणे ॥७७॥
यथा भवेत् तथा चक्रद्वय कीलकसयुतम् ।
सन्धारयेत् सप्रमाण शुण्डाले सरल यथा ॥७८॥
फैलाने—खोलने और संकोच करने में उपयुक्त दो कीलें भी घूमनेवाले कील शंकुओं से
सुदृढ़ लगादे। उपसंहार कील से शुण्डालक्रम से चक्र की भांति यन्त्रमूल में संकुचित हो जाता है पुन
शष्कुल—गोलपूए की भांति फिर प्रसारणकील चलाने से सरल-सीधा भुजा के समान लम्बा स्वभावत
हो जाता है। शुण्डाल के बीचमें धूम भरने—सञ्चरित करनेके लिये यथाविधि यन्त्रोंके मूलसे छुई हुई
कीलें बनावें, यन्त्र का धूम शुण्डालमुख से बाहिर फैलाने पुन शुण्डालमुख से बाहिरी वायु को खींचने में
जैसे हो सके वैसे चक्र कीलों से युक्त ठीक शुण्डाल में लगादे ॥७३—७८॥
यथा जलापकर्षणयन्त्रकीलं तथैव हि ।
तच्चक्रभ्रमणार्थाय योजयेत्कीलकत्रयम् ॥७६॥
एतत्सम्भ्रमणेनैव वेगाद्धूम प्रधावति ।
एतत्सयोजनाञ्चक्रयो शुण्डालान्तरे क्रमात् ॥८०॥
गमागमोभवेद्वेगात्तेन वातापकर्षणम् ।
धूमप्रसारण चैव भवेदेव न सशय ॥८१॥
षष्टाशीत्युत्तरशतालिङ्गवातापकर्षणम् ।
धूमप्रसारण वैव तावदेव मुहुर्मुहु ॥८२॥
एकदा चक्रगमनागमनाद्वेगतो भवेत् ।
धूमप्रसारण यस्मिन् दिशि शुण्डालतो भवेत् ॥८३॥
† 'भवेत्' क्रिया वचनव्यत्ययेन ।
सुन्दरविमान ] [ २६१
तस्मिन्नेव? विमानस्य गमनं वेगतो भवेत् ।
द्यावर्तने चोर्ध्वमुखगमनेपि तथैव च ॥८४॥
अधोमुखाभिगमने कीलसञ्चालनात् स्वतः ।
यथा शुण्डालस (१?) ङ्कोतस्तया यानः प्रधावति ॥८५॥
जिससे कि जलापकर्षणयन्त्र-जल के खींचनेवाले यन्त्र की कील उस चक्र के भ्रमणार्थ तीन
लगावे, इसके भ्रमण से ही वेग से धूम दौड़ता है इसके लगाने से दोनों चक्रों में शुण्डाल के
अन्दर गमन आगमन हो उससे वात का खींचना बन सके । इससे धूम का प्रसारण फैलना या निकलना
भी नि संशय होता है । १८८ लिङ्क (डिग्री) में वायु का खींचना बन जायगा और धूम का निकलना भी
निरन्तर उतना ही एकबार वेग से चक्र के गमन और आगमन से हो जावेगा । तथा धूम का निकलना
जिस दिशा में शुण्डाल से वेग से होगा उसी दिशा में? वेग से विमान का गमन हो, घूमने या लौटने
ऊर्ध्वगति करने नीचे जाने का कार्य कीलसञ्चालन से स्वतः हो जावेगा, जैसे शुण्डाल का सङ्कोत होता
है वैसे विमानयान प्रगति करता है ॥७६-८५॥
यस्माच्छुण्डालास्तर्गतचक्रवेगात्प्रचालनम् ।
तस्माच्छास्त्रोक्तविधिना कृत्वा शुण्डालान् क्रमात् ॥८६॥
प्रतिधूमोद्गमयन्त्रमूलदेशे पृथक् पृथक् ।
द्वौ द्वौ सन्धारयेत्कीलशङ्कुभिस्सुदृढ यथा ॥८७॥
धूमप्रसारणनालस्तम्भमूलेप्यथाविधि ।
दक्षिणोत्तरयोस्तद्वत्पूर्वपश्चिमयोरपि ॥८८॥
सन्धारयेदेवमेव प्रतिपार्श्वं दृढ यथा ।
अन्तर्बाह्योष्णवेगद्वयमग्न्यातपयो क्रमात् ॥८६॥
सम्यङ् निवारयितु विधिवद् यन्त्रोपरि क्रमात् ।
षट्सङ्ख्याकोष्मपालोहात्कुर्यादावरण दृढम् ॥६०॥
यन्त्रस्योध्र्वोधोभागप्रदेशयो पार्श्वयोरपि ।
यथा स्याद् धूमसञ्चार कीलकान् परिकल्पयेत् ॥६१॥
एव धूमोद्गम यन्त्र कर्तव्य सावधानत ।
एतान्यन्त्राणि चत्वारिशत्कृत्वा सुदृढ यथा ॥६२॥
स्थापयेत्पीठकेन्द्रेषु सम्यगावर्तकीलकात् ।
एतत्सहायतो व्योमयान सञ्चरति क्रमात् ॥ ६३ ॥
इति धूमोद्गमयन्त्र ॥
जिससे कि शुण्डाल के अन्दर चक्रवेग से व्योमयान का प्रचालन होता है अतः शास्त्रोक्तविधि
से क्रम से शुण्डाल बना कर ( उनमें से ) प्रत्येक धूमोद्गम यन्त्र के मूलदेश में पृथक् पृथक् दो दो
शुण्डालों को दृढ कील शंकुओं से लगावे, धूम प्रसारणनालस्तम्भ मूल में भी यथाविधि, दक्षिण उत्तर
२६२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
में उसी भांति पूर्व पश्चिम में भी लगावे, इसी प्रकार प्रतिपार्श्वभाग में लगावे अन्दर बाहर के दोनों
उष्णवेग अग्नि आतप के सम्यक् हटाने को यन्त्र के ऊपर क्रम से, छठी संख्या वाले उष्मपा लोहे से
यन्त्र के ऊपर नीचे भाग प्रदेशों में और पार्श्व भागों में दृढ आवरण करे, जिससे धूमसञ्चार हो इस
प्रकार कील युक्त करे । इस प्रकार धूमोद्गम यन्त्र सावधानता से बनाना चाहिये, इन ४० यन्त्रों को
सुदृढ बना कर पीठकेन्द्रों में घूमने वाली कील से स्थापित करे इनकी सहायता से व्योमयान गति करता
है ॥ ५६-६३ ॥ धूमोद्गम यन्त्रविषय समाप्त हो गया ॥
अथ विद्युद्यन्त्रनिर्णयः—अब विद्युद्यन्त्र का निर्णय देते हैं—
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—वह यह यन्त्रसर्वस्व में कहा है—
सङ्घर्षणं पाकजन्यं जलपातं तथैव हि ।
सायोजकं* किरणजन्यमित्यादीनि शास्त्रतः ॥ ६४ ॥
द्वात्रिंशदिति प्रोक्तानि विद्युद्यन्त्राण्यथाक्रमम् ।
एतेषु व्योमयानोपयुक्तं सायोजकं भवेत् ॥ ६५ ॥
एतेनैव प्रकर्त्तव्यं विद्युद्यन्त्रं यथाविधि ।
शक्तितन्त्रे यथाप्रोक्तमगस्त्येन महर्षिणा ॥ ६६ ॥
संघर्षण, पाकजन्य, जलपात, सांयोजक, किरणजन्य इत्यादि ३२ विद्युद्यन्त्र शास्त्र से कहे हैं
इनमें व्योमयान के उपयुक्त सांयोजक है इससे ही विद्युद्यन्त्र बनाना चाहिये जैसा कि महर्षि अगस्त्य ने
शक्तितन्त्र में कहा है ॥ ६४-६६ ॥
उक्तं हि शक्तितन्त्रे—कहा ही है शक्तितन्त्र में—
पूर्वोक्तसांयोजकलोहेन पीठं यथाविधि ।
पञ्चत्रिंशद्वितस्त्यावृताकारेणाथवा दृढम् ॥ ६७ ॥
कृत्वा पीठं ततस्तस्मिन् प्रदाक्षिण्यक्रमेण तु ।
कल्पयेत्पञ्चकेन्द्राणि तन्मध्ये चैककेन्द्रकम् ॥ ६८ ॥
वितस्तिपञ्चकान्तरं कुर्यात्केन्द्रद्वयान्तरे ।
केन्द्रसङ्ख्यानुसारेण कुर्यात् पात्राण्यथाक्रमम् ॥ ६९ ॥
चतुर्वितस्त्यायामं च वितस्तिद्वयमुन्नतम् ।
यथाकुम्भान्तरालं स्यात्तथैवास्यान्तरालकम् ॥ १०० ॥
पूर्वोक्त सांयोजक लोहे से यथाविधि पीठ बनावे, ३५ बालिश्त गोलाकार से पीठ बना कर उसमें
घूम के क्रम से पांच केन्द्र बनावे उनके बीच में एक केन्द्र ५ बालिश्त के अन्तर से दो केन्द्रों में, केन्द्र
संख्यानुसार पात्र बनावे, ४ बालिश्त लम्बा २ बालिश्त उठा हुआ जैसे घडे का भीतरी भाग—अवकाश हो
वैसा अवकाश रखे ॥ ६७-१०० ॥
- 'सांयोजिकम्' (मूल पाठ) परन्तु आगे सर्वत्र 'सांयोजक' पाठ है।