बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
पृष्ठ 278, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुन्दरविमान ] [ २५५
५६ बितस्ति ऊंचाई यथाविधि ४ बालिश्त चौड़ाई में नालस्तम्भ बनावे। और धूम भरने के लिये
उसके मूल में गोलाकार ८ बालिश्त मोटा अन्दर से गोल ४ बालिश्त ऊंचा घड़े जैसा बनावे फिर मध्य
केन्द्र में शास्त्रानुसार सुरुढ स्थापित करे। इस से आगे जलपात्र ६ बालिश्त लम्बा बड़ा उसके मूल में
बनाकर तैलपात्र ४ बालिश्त बड़ा मध्य रखवे । फिर उसके मूल में शास्त्रानुसार १ बालिश्त विद्युत्संघर्षण-
मणि की कील को स्थापित करे, पात्र में धूमाञ्जनतैल ? १२ भाग भरवे शुक्तुतुण्डिकातैल—शुक्तुण्ड—
हिङ्गुलतैल ? के २० अंश भरे ॥ १४-२० ॥
नवांशकुलटीतैल पूरयेत्सप्रमाणत ।
यथेष्ट पूरयेद् यद्वा एव भागक्रमात्सुधीः ॥ २१ ॥
विद्युत्संयोजनार्थाय मणिकीलान्तरे क्रमात् ।
सन्धारयेन्नालमार्गात् तन्त्रीद्वयमत परम् ॥ २२ ॥
नालस्तम्भान्तरे धूमस्तम्भनार्थं तथैव हि ।
प्रसारणार्थं च वेगादनुकूलं यथाभवेत् ॥ २३ ॥
आवृत्तचक्रत्रितय सरन्ध्रं च दृढं यथा ।
स्थापयेत्सरल कीलकद्वयेन यथाविधि ॥ २४ ॥
एतत्सञ्चालनार्थाय त्रिचक्रकीलको तथा ।
अनुलोमविलोमाभ्या स्तम्भबाह्ये नियोजयेत् ॥ २५ ॥
स्तम्भान्तरस्थत्रिचक्रकीलकाना तथैव हि ।
बाह्यस्थत्रिचक्रकीलकेषु संयोजन यथा ॥ २६ ॥
तथा नालान्तरात् तन्त्यस्समागृत्य यथाक्रमम् ।
आदौ मध्ये तथा चान्ते क्रमात् सख्यानुसारतः ॥ २७॥
सन्धारयेद् यथाशास्त्र स्तम्भे स्थानत्रये क्रमात् ।
इति धूमप्रसारणनालस्तम्भविनिर्णय ॥ २८ ॥
६ अंश कुलटीतैल—मन शिला तैल सप्रमाण भरवे अथवा जितना चाहे इस प्रकार भागानु-
सार बुद्धिमान्। विद्युत् के संयोजन (फिट् ) करने के लिये मणिकील के अन्दर क्रम से नाल के मार्ग
से दो तारों को लगावे। तथा नालस्तम्भ के अन्दर धूम को रोकने के निमित्त और वेग से फैलाने-छोड़ने
के निमित्त जैसे अनुकूल हो छिद्रसहित घूमनेवाले तीन चक्र दो सरल कीलों से स्थापित करे इन चक्रों
के सञ्चालनार्थ तीन चक्रोंवाली दो कीलों को सीधे और उलटे ढंग से स्तम्भ के बाहिर नियुक्त करे स्तम्भ
के अन्दर स्थित त्रिचक्रकीलों का बाहिर स्थित तीन चक्रों में संयोजन करे, तथा नाल के अन्दर से तीन
तारों को यथाक्रम निकालकर आदि मध्य तथा अन्त में यथासंख्य स्तम्भ में तीन स्थानों में जोडदे बस
धूमप्रसारणनालस्तम्भ का निर्णय है ॥ २१–२८ ॥
अथ धूमोद्गमयन्त्रम्—अब धूमोद्गमयन्त्र (धूम को निकालने का यन्त्र ) कहते हैं—
वेगादूर्ध्वमुखे धूमोक्षेपण कुरुते यतः ।
अतो धूमोद्गम इति नाम यन्त्रस्य वर्णितम् ॥ २६ ॥