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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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२६२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
में उसी भांति पूर्व पश्चिम में भी लगावे, इसी प्रकार प्रतिपार्श्वभाग में लगावे अन्दर बाहर के दोनों
उष्णवेग अग्नि आतप के सम्यक् हटाने को यन्त्र के ऊपर क्रम से, छठी संख्या वाले उष्मपा लोहे से
यन्त्र के ऊपर नीचे भाग प्रदेशों में और पार्श्व भागों में दृढ आवरण करे, जिससे धूमसञ्चार हो इस
प्रकार कील युक्त करे । इस प्रकार धूमोद्गम यन्त्र सावधानता से बनाना चाहिये, इन ४० यन्त्रों को
सुदृढ बना कर पीठकेन्द्रों में घूमने वाली कील से स्थापित करे इनकी सहायता से व्योमयान गति करता
है ॥ ५६-६३ ॥ धूमोद्गम यन्त्रविषय समाप्त हो गया ॥
अथ विद्युद्यन्त्रनिर्णयः—अब विद्युद्यन्त्र का निर्णय देते हैं—
तदुक्तं यन्त्रसर्वस्वे—वह यह यन्त्रसर्वस्व में कहा है—
सङ्घर्षणं पाकजन्यं जलपातं तथैव हि ।
सायोजकं* किरणजन्यमित्यादीनि शास्त्रतः ॥ ६४ ॥
द्वात्रिंशदिति प्रोक्तानि विद्युद्यन्त्राण्यथाक्रमम् ।
एतेषु व्योमयानोपयुक्तं सायोजकं भवेत् ॥ ६५ ॥
एतेनैव प्रकर्त्तव्यं विद्युद्यन्त्रं यथाविधि ।
शक्तितन्त्रे यथाप्रोक्तमगस्त्येन महर्षिणा ॥ ६६ ॥
संघर्षण, पाकजन्य, जलपात, सांयोजक, किरणजन्य इत्यादि ३२ विद्युद्यन्त्र शास्त्र से कहे हैं
इनमें व्योमयान के उपयुक्त सांयोजक है इससे ही विद्युद्यन्त्र बनाना चाहिये जैसा कि महर्षि अगस्त्य ने
शक्तितन्त्र में कहा है ॥ ६४-६६ ॥
उक्तं हि शक्तितन्त्रे—कहा ही है शक्तितन्त्र में—
पूर्वोक्तसांयोजकलोहेन पीठं यथाविधि ।
पञ्चत्रिंशद्वितस्त्यावृताकारेणाथवा दृढम् ॥ ६७ ॥
कृत्वा पीठं ततस्तस्मिन् प्रदाक्षिण्यक्रमेण तु ।
कल्पयेत्पञ्चकेन्द्राणि तन्मध्ये चैककेन्द्रकम् ॥ ६८ ॥
वितस्तिपञ्चकान्तरं कुर्यात्केन्द्रद्वयान्तरे ।
केन्द्रसङ्ख्यानुसारेण कुर्यात् पात्राण्यथाक्रमम् ॥ ६९ ॥
चतुर्वितस्त्यायामं च वितस्तिद्वयमुन्नतम् ।
यथाकुम्भान्तरालं स्यात्तथैवास्यान्तरालकम् ॥ १०० ॥
पूर्वोक्त सांयोजक लोहे से यथाविधि पीठ बनावे, ३५ बालिश्त गोलाकार से पीठ बना कर उसमें
घूम के क्रम से पांच केन्द्र बनावे उनके बीच में एक केन्द्र ५ बालिश्त के अन्तर से दो केन्द्रों में, केन्द्र
संख्यानुसार पात्र बनावे, ४ बालिश्त लम्बा २ बालिश्त उठा हुआ जैसे घडे का भीतरी भाग—अवकाश हो
वैसा अवकाश रखे ॥ ६७-१०० ॥

  • 'सांयोजिकम्' (मूल पाठ) परन्तु आगे सर्वत्र 'सांयोजक' पाठ है।