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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 280

सुन्दरविमान ] [ २५७
तत्पुरस्ताद्विद्युद्घर्षकमण्यो कीलकद्वयम् ।
धूमप्रसारणालस्तम्भवत्संस्थापयेत्क्रमात् ॥ ४१ ॥
पार्श्वयोरुभयोरौष्ण्यनालस्य च यथाविधि ।
जलकोशद्वयं पश्चात् कारयेत्सुदृढं यथा ॥ ४२ ॥
विद्युद्यन्त्रान्नालमेकं समाहृत्य सतन्त्रिकम् ।
विद्युद्घर्षकमणिकीलेके सन्नियोजयेत् ॥ ४३ ॥
लिङ्गाशीतिप्रमाणेन विद्युच्छक्तिं यथाविधि ।
पूर्वोक्तनालस्थतन्त्रीमार्गात् सचोदयेद् यदि ॥ ४४ ॥
तच्छक्तिवेगान्मणिसंघर्षणं प्रभवेत्स्वत ।
शतकक्ष्यप्रमाणोष्णा तेन संजायते क्रमात् ॥ ४५ ॥
उसके सामने विद्युत् को घर्षित करनेवाली मणियों की दो कीलें धूम को फैलाने वाले नाल-
स्तम्भ की भांति स्थापित करे, औष्ण्यनाल के दोनों पाश्र्वों में यथाविधि दो जलकोश पीछे करावे, विद्यु-
यन्त्र से एक नाल तारसहित लेकर विद्युद्घर्षकमणि कील में नियुक्त करे, ८० लिङ्ग (डिग्री) माप से
विद्युत् शक्ति को पूर्वोक्तनाल के तन्त्रीमार्ग से प्रेरित करे उस शक्ति के वेग से स्वत मणि का घर्षण
होगा उससे सौ दर्जे प्रमाण की उष्णता प्रकट हो जावेगी ॥ ४१–४५ ॥
तस्मात् पात्रस्थितं तैलं पाचितं स्याद्विशेषतः ।
तेनधूमो भवेत् तैलं पश्चात् सम्यक् शनैश्शनै ॥ ४६ ॥
विद्युच्छक्तिं च तद्धूमं नालमार्गाद् यथाक्रमम् ।
संगृह्य वेगाद्विधिवत्पश्चात्कीलकमार्गत ॥ ४७ ॥
संचोदयेद् वारिकोशद्वयमध्ये प्रमाणतः ।
एतद्वेगादौष्ण्यधूमाकारं भवति तज्जलम् ॥ ४८ ॥
तैलधूमं धूमनाले जलधूमं तथैव हि ।
जलौष्ण्यनाले विधिवत्पूरयेत्सप्रमाणतः ॥ ४६ ॥
एतद् धूमद्वयं पश्चाद् यथोर्ध्वमुखतः क्रमात् ।
निर्गच्छेद वेगत पञ्चशतकक्ष्योष्णमानतः ॥ ५० ॥
उस से पात्रस्थित तैल विशेषतः पकाया हुआ शनै शनै धूम हो जावेगा । वह धूम यथाक्रम
नालमार्ग से एकत्र होकर कीलमार्ग में वेग से विद्युत्शक्ति को दो जलकोशों में प्रेरित कर देवे—धक्का
दे दे, इसके वेग से वह जल उष्ण धूमाकार हो जावेगा। तैलधूम तैलधूमनाल में जलधूम जलौष्ण्यनाल
में प्रमाण से भरदे, ये दोनों धूम पीछे यथोचित ऊपर से वेग से १०० दर्जे की उष्णता से निकल
जावेगा ॥ ४६–५० ॥
तथा कीलक संधानं कुर्यात् कालानुसारतः ।
धूमसंरोधनार्थं च चोदनार्थं तथैव हि ॥५१॥