बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुन्दरविमान ] [ २६१
तस्मिन्नेव? विमानस्य गमनं वेगतो भवेत् ।
द्यावर्तने चोर्ध्वमुखगमनेपि तथैव च ॥८४॥
अधोमुखाभिगमने कीलसञ्चालनात् स्वतः ।
यथा शुण्डालस (१?) ङ्कोतस्तया यानः प्रधावति ॥८५॥
जिससे कि जलापकर्षणयन्त्र-जल के खींचनेवाले यन्त्र की कील उस चक्र के भ्रमणार्थ तीन
लगावे, इसके भ्रमण से ही वेग से धूम दौड़ता है इसके लगाने से दोनों चक्रों में शुण्डाल के
अन्दर गमन आगमन हो उससे वात का खींचना बन सके । इससे धूम का प्रसारण फैलना या निकलना
भी नि संशय होता है । १८८ लिङ्क (डिग्री) में वायु का खींचना बन जायगा और धूम का निकलना भी
निरन्तर उतना ही एकबार वेग से चक्र के गमन और आगमन से हो जावेगा । तथा धूम का निकलना
जिस दिशा में शुण्डाल से वेग से होगा उसी दिशा में? वेग से विमान का गमन हो, घूमने या लौटने
ऊर्ध्वगति करने नीचे जाने का कार्य कीलसञ्चालन से स्वतः हो जावेगा, जैसे शुण्डाल का सङ्कोत होता
है वैसे विमानयान प्रगति करता है ॥७६-८५॥
यस्माच्छुण्डालास्तर्गतचक्रवेगात्प्रचालनम् ।
तस्माच्छास्त्रोक्तविधिना कृत्वा शुण्डालान् क्रमात् ॥८६॥
प्रतिधूमोद्गमयन्त्रमूलदेशे पृथक् पृथक् ।
द्वौ द्वौ सन्धारयेत्कीलशङ्कुभिस्सुदृढ यथा ॥८७॥
धूमप्रसारणनालस्तम्भमूलेप्यथाविधि ।
दक्षिणोत्तरयोस्तद्वत्पूर्वपश्चिमयोरपि ॥८८॥
सन्धारयेदेवमेव प्रतिपार्श्वं दृढ यथा ।
अन्तर्बाह्योष्णवेगद्वयमग्न्यातपयो क्रमात् ॥८६॥
सम्यङ् निवारयितु विधिवद् यन्त्रोपरि क्रमात् ।
षट्सङ्ख्याकोष्मपालोहात्कुर्यादावरण दृढम् ॥६०॥
यन्त्रस्योध्र्वोधोभागप्रदेशयो पार्श्वयोरपि ।
यथा स्याद् धूमसञ्चार कीलकान् परिकल्पयेत् ॥६१॥
एव धूमोद्गम यन्त्र कर्तव्य सावधानत ।
एतान्यन्त्राणि चत्वारिशत्कृत्वा सुदृढ यथा ॥६२॥
स्थापयेत्पीठकेन्द्रेषु सम्यगावर्तकीलकात् ।
एतत्सहायतो व्योमयान सञ्चरति क्रमात् ॥ ६३ ॥
इति धूमोद्गमयन्त्र ॥
जिससे कि शुण्डाल के अन्दर चक्रवेग से व्योमयान का प्रचालन होता है अतः शास्त्रोक्तविधि
से क्रम से शुण्डाल बना कर ( उनमें से ) प्रत्येक धूमोद्गम यन्त्र के मूलदेश में पृथक् पृथक् दो दो
शुण्डालों को दृढ कील शंकुओं से लगावे, धूम प्रसारणनालस्तम्भ मूल में भी यथाविधि, दक्षिण उत्तर