बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंयोजयेत् कीलकाभ्यां सम्यक् सम्भ्रामयेद् यथा ॥
धूमबन्धप्रसरणे पश्चात् कालानुसारतः ॥५२॥
भवेत्* कीलकसञ्चालनेन सम्यग्यथाविधि ।
एवं क्रमेण यन्त्राणि चत्वारिंशद्यथाविधि ॥५३॥
रचयित्वा पीठकेन्द्रस्थानेष्वथ पृथक् पृथक् ।
संस्थापयेत् ततस्तेषां चतुर्दिक्षु यथाक्रमम् ॥५४॥
एकैकयन्त्रो( १?) ष्णधूमनालमूलद्वये क्रमात् ।
वितस्त्येकावृतं चैव वितस्तिद्वादशोन्नतम् ॥५५॥
सन्धारयेत्कीलकेभ्यश्शुण्डालद्वयमुद्भूतम् ।
एतत्सहायतो व्योमयानं वेगात् प्रधावति ॥५६॥
इस प्रकार कील लगावे काल के अनुसार धूमके रोकने फेंकने-छोड़ने के लिये दो कीलों
से युक्त करे घुमावे। धूमका रुकजाना और फैलजाना कालानुसार कील चलाने से सम्यक् यथाविधि
हो। इस प्रकार क्रम से ४० यन्त्र रचकर पीठ केन्द्रस्थानों में पृथक् पृथक् स्थापित करे उनके चारों ओर
यथाक्रम एक एक यन्त्र औष्ण्यधूमनालमूल दोनों में १ बालिश्त गोल १२ बालिश्त ऊंचाई कीलों से दो
अंगुल शुण्डाल इसकी सहायता से व्योमयान वेगसे दौड़ता है ॥५१-५६॥
शुण्डालस्वरूपमुक्तं लल्लेन - शुण्डाल का स्वरूप लल्ल ने कहा है-
तैलस्य धूमसंयोगाज्जलस्यो( १?) ष्ण्यकयोगत ।
विमानमाकर्षयितु शुण्डालान् कल्पयेत्सुधीः ॥५७॥
वटमञ्जूषमातङ्गा पञ्चशाखी शिखावली ।
ताम्रशीर्ष्णी बृहत्कुम्भी महिषी क्षीरवल्लरी ॥५८॥
शोणपर्णी वज्रमुखी क्षीरणी च यथाक्रमम् ।
एते द्वादश शास्त्रेषु क्षीरवृक्षा इतीरिता ॥५९॥
एतैराहृत्य विधिवन्निर्यासं क्षीरमेव वा ।
अग्निबाणाद्रिदिग्द्रवसुदेवमुनिस्तथा ॥६०॥
तैल के धूम सम्पर्क से जल के औष्ण्यकयोग से विमान के खींचने को शुण्डालों को बनावे।
वट, मञ्जूष-मञ्जीठ, मातङ्ग-गूलर या पीपल, पञ्चशाखी, शिखावली-चित्रकबृक्ष, ताम्रशीष्णी-जटा?,
बृहत्कुम्भी-कायफल?, महिषी, क्षीरवल्ली-क्षीरविदारी? शोणपर्णी?, वज्रमुखी?, क्षीरणी-कुम्भीर-दूधिया-
वृक्ष, यथाक्रम वे १२ क्षीरवृक्ष शास्त्रों में कहे हैं इनसे विधिवत् गोन्द या दूध लेकर ३, ५, ७, १०, ११,
८, ७-॥५७-६०॥
गजाब्धिशरयादित्याशप्रकारेण यथाक्रमम् ।
तोलयित्वा बृहद्भाण्डे विनिक्षिप्य ततः परम् ॥६१॥
- एकवचन व्यत्ययेन।