बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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हिमसवंर्धकस्सोमस्सुण्डालश्च यथाक्रमम् ।
द्वात्रिंशत्पञ्चविंशाष्टत्रिंशद्भागान् क्रमेण तु ॥ ३० ॥
सम्पूर्य नलिकामूषामुखे पश्चाद् दृढ यथा ।
स्थापयित्वा चक्रमुखकुण्डेऽग्रमुखभस्त्रत ॥ ३१ ॥
द्वादशोत्तरसप्तशतकक्ष्योष्णप्रमाणत ।
सगालयेद् यथाशास्त्रमानेत्रोन्मीलनावधि ॥ ३२ ॥
ततो भवेद् धूमगर्भोलोहस्सूक्ष्मो मृदुर्दृढः ।
कुर्याद् धूमोद्गम यन्त्रमेतेनैव यथाविधि ॥ ३३ ॥
प्रदक्षिणावृत्तकीलवितस्तिदशकोन्नतम् ।
पीठस्याधो भागमध्यकेन्द्रस्थाने यथा भवेत् ॥ ३४ ॥
पीठ कुर्यात्त्रिपञ्चदशवितस्त्यायामतस्तथा ।
धूमोष्यकप्रसारणार्थाय पश्चाद् यथाविधि ॥ ३५ ॥
वेग से ऊपर मुख की ओर धूम को ऊपर फैंकता है अतः धूमोद्गमनामयन्त्र को वर्णित किया
है । हिमसंर्वधक सोम सुण्डाल इन तीनों के यथाक्रम ३२, २५, ३८, भागों को मूषामुख नलिका में
भरकर चक्रमुख कुण्ड में दृढ रखकर अग्रमुखभस्त्रा से आंख खुलजाने तक शास्त्रानुसार गलावे तब धूम-
गर्भ लोहा सूक्ष्म कोमल दृढ हो जावे । इस लोहे से धूमोद्गम (धूम को फेंकनेवाला) यन्त्र करे । घूमने
वाली कील १० बालिशत उठी हो पीठ के नीचले भाग के मध्य केन्द्र स्थान में हो, पीठ १५ बालिशत चौडी
हो धूमोष्यक को प्रसारणार्थ पश्चात् यथाविधि—॥२६—३५॥
जलोष्यकधूमनालद्वय तस्योभयपार्श्वयो ।
स्थापयेत्सुदृढ सम्यग्दक्षिणोत्तरत क्रमात् ॥ ३६ ॥
धूमसम्पूर्णार्थाय तन्नालद्वयमूलयो ।
चतुर्वितस्त्यायामं च वितस्तित्रयमुन्नतम् ॥ ३७ ॥
कुम्भवत्कारयेद् वर्तुलाकार सुदृढ यथा ।
वितस्त्यायामक चाष्टवितस्त्युन्नतमेव च ॥ ३८ ॥
तदन्ते चषकाकार वितस्तित्रयविस्तृतम् ।
एव क्रमेण विधिवत् कृत्वा नालद्वय तत ॥ ३९ ॥
धूमपूरकनालोर्ध्वभागे संयोजयेद् दृढम् ।
तन्मूले जलपात्र च तन्मध्ये तैलपात्रकम् ॥ ४० ॥
जलोष्यक—दो धूमनाल उसके दोनों पार्श्वों में दक्षिण उत्तर भागों में क्रमशः स्थापित करे ।
धूम को भरने के लिये उन दोनों नालों के मूलों में ४ बालिशत लम्बा ३ बालिशत उठा हुआ घडे के समान
गोलाकार सुदृढ स्थान बनावे उसके अन्त में ८ बालिशत लम्बा और ऊंचा ३ बालिशत चौडा पात्र विधि-
वत् क्रम से बनाकर दो नाल जोड दे जिनमें धूम भरने वाले नाल के उपरि भाग में उसके मूल में जल-
पात्र मध्य में तैलपात्र लगावे ॥ ३६—४० ॥