बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
पृष्ठ 283, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ें२६० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
सुहागे या रक्तपलाश पुष्प के रंग से लेप करदे फिर चमक से सोने जैसा वह पट मनोहर लगता है,
इस पट से ही शुण्डालों को बनावे १ बालिश्त गोल १२ बालिश्त उन्नत-ऊपर लम्बा हाथी की शुण्ड की
भांति अन्दर छिद्रवाला करना चाहिए।
प्रसारणोपसंहारकीलको द्वौ यथाक्रमम् ।
सन्धारयेदावृत्तकीलशङ्कुभिस्सुदृढ यथा ॥७३॥
उपसंहारकीलेन शुण्डालश्चक्रवत्क्रमात् ।
भवेत्सकुंचित यन्त्रमूले शष्कुलवत्पुन ॥७४॥
तत प्रसारणकीलचालनात् सरल यथा ।
बाहुवल्लम्बमान च भवेत्सम्यक् स्वभावत† ॥७५॥
शुण्डालमध्ये धूमप्रसारणार्थ यथाविधि ।
यन्त्राणा मूलतस्पृष्ट कीलकान् परिकल्पयेत् ॥७६॥
यन्त्रस्य धूमश्शुण्डालमुखाद् बहि प्रसारणे ।
पुनश्शुण्डालमुखतो बाह्यवातापकर्षणे ॥७७॥
यथा भवेत् तथा चक्रद्वय कीलकसयुतम् ।
सन्धारयेत् सप्रमाण शुण्डाले सरल यथा ॥७८॥
फैलाने—खोलने और संकोच करने में उपयुक्त दो कीलें भी घूमनेवाले कील शंकुओं से
सुदृढ़ लगादे। उपसंहार कील से शुण्डालक्रम से चक्र की भांति यन्त्रमूल में संकुचित हो जाता है पुन
शष्कुल—गोलपूए की भांति फिर प्रसारणकील चलाने से सरल-सीधा भुजा के समान लम्बा स्वभावत
हो जाता है। शुण्डाल के बीचमें धूम भरने—सञ्चरित करनेके लिये यथाविधि यन्त्रोंके मूलसे छुई हुई
कीलें बनावें, यन्त्र का धूम शुण्डालमुख से बाहिर फैलाने पुन शुण्डालमुख से बाहिरी वायु को खींचने में
जैसे हो सके वैसे चक्र कीलों से युक्त ठीक शुण्डाल में लगादे ॥७३—७८॥
यथा जलापकर्षणयन्त्रकीलं तथैव हि ।
तच्चक्रभ्रमणार्थाय योजयेत्कीलकत्रयम् ॥७६॥
एतत्सम्भ्रमणेनैव वेगाद्धूम प्रधावति ।
एतत्सयोजनाञ्चक्रयो शुण्डालान्तरे क्रमात् ॥८०॥
गमागमोभवेद्वेगात्तेन वातापकर्षणम् ।
धूमप्रसारण चैव भवेदेव न सशय ॥८१॥
षष्टाशीत्युत्तरशतालिङ्गवातापकर्षणम् ।
धूमप्रसारण वैव तावदेव मुहुर्मुहु ॥८२॥
एकदा चक्रगमनागमनाद्वेगतो भवेत् ।
धूमप्रसारण यस्मिन् दिशि शुण्डालतो भवेत् ॥८३॥
† 'भवेत्' क्रिया वचनव्यत्ययेन ।