बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
वातस्कम्भनालकीलक्यन्त्र ] [ १६३
तदुक्तं गतिनिर्णयाध्याये – वह कहा है गतिनिर्णय के अध्याय में—
आवहादिमहावातमण्डलेषु स्वभावत ।
द्वाविशदुत्तरशतप्रभेदेन यथाक्रमम् ॥ ७५ ॥
पवमानगतिश्चित्रविचित्रत्वेन वर्णिता ।
तेष्वेकोनाशीतितमगतिर्वातायनाभिधा ॥ ७६ ॥
तद्गतिस्स्याद् विशेषेण वायौग्रीष्मऋतौ क्रमात् ।
चतुर्यकक्ष्यगगने यानसञ्चरते यदा ॥ ७७ ॥
तदा वातायनगतिवेगाद् बायोविशेषत ।
विमानस्य भवेद् वक्रगतिस्तस्मात् परस्परम् ॥ ७८ ॥
यन्त्रूणा प्रभवेत् कष्टमत्यन्तं सुदुस्सहं क्रमात् ।
अतस्तत्परिहाराय यानाथ. पार्श्वकेन्द्रके ॥ ७६ ॥
वातस्तम्भनालकीलकयन्त्र स्थापयेत् सुधी ।
तेनापायनिवृत्तिस्स्याद् यन्त्रृणा सुखद भवेत् ॥ ८० ॥ इत्यादि ॥
आवह आदि महावायुमण्डलों में स्वभावतः १२२ भेद से यथाक्रम वायुगति चित्रविचित्ररूप
से वर्णन की है, उन में ७६वीं गति वातायन नामक है, उस वायु की गतिविशेष करके ग्रीष्मऋतु में क्रम
से हो तो चतुर्थ कक्ष्यावाले गगनमण्डल में विमान सञ्चार करता है । तब वातायनगति वेगसे वायु का
विशेषत विमान को परस्पर वक्रगति हो जावे उस से चालक यात्रियों को अत्यन्त दुःसह कष्ट हो जावे,
अत उसके हटाने के लिये विमान के नीचे पार्श्वकेन्द्र में बुद्धिमान् जन वातस्तम्भनालकील यन्त्र स्थापित
करे उस से अनिष्ट की निवृत्ति तथा यात्रियों को सुखद हो ॥ ७५–८० ॥
उक्तं हि यन्त्रसर्वस्वे—कहा है यन्त्रसर्वस्व ग्रन्थ में—
विमानवक्रगमनपरिहाराय केवलम् ।
वातस्कन्धनालकीलक यन्त्रमथ प्रचक्षते ॥ ८१ ॥
वातस्तम्भनलोहेनैव तद्यन्त्र प्रकल्पयेत् ।
अन्यथा निष्फलमिति प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ८२ ॥
विमान के वक्रगमन के दूर करने को वातस्कन्धनालकीलयन्त्र अब कहते हैं । वातस्तम्भन लोहे
से ही उस यन्त्र को बनावे अन्यथा निष्फल है ऐसा मनीषी (Thinker) कहते हैं ॥ ८१–८२ ॥
तदुक्तं लोहतत्त्वप्रकरणे—वह कहा है लोहतत्त्व प्रकरण में—
विशावर सुवर्चल मयूरलोहपञ्चकम् ।
भ्रु०शुण्डिक सुरक्षिक वराहकान्तिलोहकम् ॥
विरोहिण कुबेरक मुरारिकान्घ्रि रञ्जजम् ।
सुहसनेत्रजः दल वरालिक मुनालिकम् ॥ ८३ ॥
१६४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
सुशोधितान् यथाविधि यथाप्रतोलितान् समं समम् ।
मत्स्यमूषमध्यमास्यपूरितान् समग्रकम् ॥
संस्थाप्य माधिमारुयकुण्डमध्ये दृढ यथा ।
विजृम्भणाख्यभस्त्रिकामुखेन सन्धमनेत् क्रमात् ॥८४॥
विगालय चाथ तद्रस सुयन्त्रमध्यनालके ।
कटुष्णत प्रपूरयेच्छनैश्शनैर्यथाक्रमम् ॥
एवकृतेतिसूक्ष्मरूपक विशुद्धमच्युतम् ।
सुवातस्तम्भलाहक भवेत् सुवर्चल लघु ॥ ८५ ॥ इत्यादि ॥
विशावर ?-विशाकर-दन्ती, सुवर्चल-सौवर्चलनमक, मयूर-गन्धक,-लोहपञ्चक-लोहेपञ्चप्रकार के,-मुसु-
ण्डिक ?, सुरञ्जिक-सुरञ्जी श्वेतकाकमाची या रञ्जक-हिङ्गुल-शिंगरक, वराहांघ्रि लोहा ?, विरोहिण-
रोहिण-कायफल, कुबेरक-इन्द्रवृक्ष, मुरारिकांघ्रिलोहा ? सुहृ'सनेत्रक ?, दल-तेजपत्र ?, वरालिका-वरा-
टिका-कौडी, मृणालिक-मृणालिक-मृणाल-सुगन्धतृण या अश्वगन्ध । सुशोधित समान भाग तोलकर
मत्स्यबोतल के मध्यमुख में भरकर माधिम ? माध्यमिकारूय कुण्डमध्य में रखकर विजृम्भणाख्य भास्त्रका
मुख से धमन करे गलाकर रस को यन्त्रमध्यनाल में थोड़ा गरम धीरे धीरे भर दे ऐसा करने पर सूक्ष्म
शुद्ध अटूट वातस्तम्भलोहा सुन्दर बन जावे ॥ ८३-८५ ॥
वितस्तीना पञ्चदशप्रमाणेन सुवर्तुलम् ।
नालष्टक विस्तृतस्यामादौ कृत्वा यथाविधि ॥ ८६ ॥
अन्तश्छिद्र प्रमाणेन वितस्तोना दश स्मृतम् ।
विमानमूलमध्याग्रप्रदेशेषु यथाक्रमम् ॥ ८७ ॥
पूर्वं पश्चिमताश्चैव दक्षिणोत्तरतस्तथा ।
सन्धारयेल्लोहकृतपट्टिकान् भारवर्जितान् ॥ ८८ ॥
पूर्वोक्तनालान् सङ्गृह्य पट्टिकासु यथाक्रमम् ।
नालास्यानामाभिमुख्यं चतुर्दिक्षु यथा भवेत् ॥ ८९ ॥
तथा सन्धारयित्वाथबध्नीयात् कोलकादिभि ।
पश्चादेकैकनालास्ये वातपामणिमुत्तमम् ॥ ९० ॥
१५ बालिश्त माप से गोलाकार ६ नालें बड़े मुखवाली प्रथम यथाविधि करके अन्दर जिनके
छिद्र हो १० बालिश्त कहे हैं, विमान के मूल मध्य और अग्रप्रदेश में यथाक्रम पूर्व पश्चिम की ओर
और दक्षिण उत्तर की ओर भी लोहे से बनी भाररहित पट्टिकाओं को लगावे, नालों के मुखों का साम्मुख्य
चारों दिशाओं में जिस से हो वैसे लगा कर कीलों से बान्धे पश्चात् एक एक नाल के मुख में उत्तम
वातपामणि- ॥ ८६-९० ॥
एकैक योजयेत् तन्त्रीमूलकात् सुदृढ यथा ।
वातायनीवातवेगापकर्षणपटून् तत. ॥ ९१ ॥
वातस्कन्धनालकील यन्त्र ] [ १६५
पताकान् रोलिकपटनिर्मितान् नालसन्धिषु ;
सन्धारयेत् सूत्रबद्धान् पञ्चसंस्कारसंस्कृतान् ॥ ६२ ॥
वातस्तम्भलोहकृतचक्रान् तत्तद्ध्वजाग्रत ।
एकैकं स्थापयेत् पश्चात् तन्त्री सर्वत्र योजयेत् ॥ ६३ ॥
वातायनीवातवेगप्रवाहोत्यन्तवेगत ।
पताकाभिमुखो भूत्वा व्याप्यते सर्वत क्रमात् ॥ ६४ ॥
तद्वे गमपहृत्यथ पताकाश (न्? श)ब्दपूर्वकम् ।
प्रचलन्त्यतिवेगेन सर्वतोमुलत क्रमात् ॥ ६५ ॥
एक एक तार के मूल से दृढ़ लगावे फिर वातायनी नामक वायु के वेग को खींचनेवाले पञ्च-
संस्कारयुक्त रोलिक ?-तौलिक रूई से बने फूलने वाले थैलों पताकाओं को नालों की सन्धियों में सूत्रों से
बान्धकर लगावे । वातस्तम्भ लोहे से बने चक्रों को उस उस ध्वजा के अग्र भाग में एक एक को स्थापित
करे फिर सर्वत्र तार लगावे । वातायनीनामक वायु के वेग का प्रवाह अत्यन्त वेग से पताका के सामने
होकर सर्वत्र व्याप जाता है । उस के वेग को हटाकर पताकाए शब्दपूर्वक सब ओर चलती हैं ॥६१-६५॥
पश्चात् तन्मूलकीलस्थचक्राण्यपि यथाक्रमम् ।
प्रतिवेगेन भ्राम्यन्ति तद्वे गान्मणयस्तथा ॥ ६६ ॥
वातायनीवातवेग पताका. प्रथम क्रमात् ।
समाहरन्ति वेगेन पश्चाच्चक्राणि वेगत ॥ ६७ ॥
समाहृत्य प्रेषयन्ति मणीन् प्रति विशेषत ।
मणयस्त समाकृष्टा नालास्ये योजयन्ति हि ॥ ६८ ॥
तन्नालान्तश्छिद्रमुखादागत्यान्यमुखान्तरात् ।
बाह्याकाशेथ विलय यान्ति नास्त्यत्र सशय ॥ ६६ ॥
पश्चादृजुगतिस्तेन विमानस्य भवेत् क्रमात् ॥१००॥
अतो वातस्कन्धनालकीयन्त्र यथाविधि ।
विमाने स्थापयेत् सम्यगिति शास्त्रविनिर्णय ॥१०१॥
फिर उनके मूलों की कीलों में स्थित चक्र भी यथाक्रम अतिवेग से घूमते हैं उनके वेग से
मणियां भी घूमती हैं । प्रथम पताकाएं वातायनीनामक वायु के वेग को शीघ्र लेती हैं पश्चात् चक्रों को
वेग से लेकर मणियों के प्रति विशेषत प्रेरित करते हैं, मणियां आकृष्ट हुईं उसे नालों के मुख में युक्त
करती हैं, उन नालों के भीतरी छिद्रमुख से आकर अन्य मुख के अन्दर से बाहरी आकाश में विलय
को प्राप्त हो जाती है इसमें संशय नहीं पश्चात् उस से विमान की सरलगति क्रम से हो जाती है, अत
वातस्कन्धनाल के कीलयन्त्र को यथाविधि विमान में सम्यक् स्थापित करे यह शास्त्र का निर्णय
है ॥ ६६-१०१ ॥
अथ विशुङ्र्पणयन्त्रः—अब विशुङ्र्पण यन्त्र कहते हैं—
? No, just an apostrophe/single quote: ' उक्तं हि सौदामिनीकलायाम्orउक्तं हि. It's just an ink artifact or apostrophe. Let's write उक्तं हि`.
-
Verse 103-107:
तडित्सङ्कलनं वर्ष ऋतौ मेघेषु पञ्चधा ।
वारुण्यग्निमुखादण्डमहारावशिका इति ॥१०३॥
तेषु वारुण्यग्निमुखविद्युतावतिवेगत ।
मुहुर्मुहु प्रचलतस्स्वतो मेघेषु वार्षिके ॥१०४॥
पश्चाद् यानस्थरौद्रादिदर्पणैस्तावभावपि ।
आकृष्येते स्वभावेन पश्चात् सम्मेलनं तयो. ॥१०५॥
परस्पर भवेत् तस्मान्महानग्नि प्रजायते ।
तेन दग्धो भवेद् व्योमयानस्तत्क्षणात् क्रमात् ॥१०६॥
अतस्तत्परिहारार्थं मुखदक्षिणकेन्द्रयो ।
विमाने स्थापयेद् विद्युद्यन्त्र सम्यग्यथाविधि ॥१०७॥ इत्यादि ॥ -
Hindi translation:
`वर्षा ऋतु में मेघों में विद्युत् का सङ्कलन पांच प्रकार का होता है, जो कि वारुणि
विद्युद्दर्पणयन्त्र ] [ १६७
कुरङ्ग-अकर्करा, पञ्चास्य ?-लोहभेद ?, विरञ्चि ?, शोणज-शोणसम्भव-पिप्पलीमूल या शोण-
सिन्दूर, सुशर्कर-सुन्दर रेत, स्फटिक-स्फटिकमणि-बिल्लौर, कुट्म ?-कुट-शिलाचूर्ण, नीरज-नीरज-मोती,
सुएहालिक ?-हस्तीशुण्डावृक्ष ?, पारद-पारा, क्षार-सज्जी क्षार, टङ्कण-सुहागा, विडौज-विड़लवण
का सत्त्व, पिङ्ग ?-हरिताल, अभ्र-नीलाथोथा, वराटिका-कौड़ी, कर्बुर-स्वर्ण ?, या आमाहल्दी या गन्ध-
पलाशी' । १०, १ ?, ४, ३, १२, २, ३, ७, ११, ७ ?, १४, ३, २२, १८, ५, ११, भाग, क्रमशः शोधित-
।।१०६-११०।।
सङ्गृह्य सन्तोल्य पृथक् पृथक् क्रमात् सम्पूर्य पञ्चास्यकमूषमध्ये ।
विश्वोदरव्यासटिकान्तरे दृढम् । विन्यस्य पञ्चाननभस्त्रिकामुखात् ।।
[L
१६८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
तडिद्दर्पण से यह यन्त्र यथाविधि करना चाहिए, अन्यथा करे तो निश्चित विनाश होजाता
है । २० बालिश्त लम्बा एक बालिश्त ऊंचा चौरस या गोल पीठ बनावे पूर्व-पश्चिम से और दक्षिणोत्तर
अर्धाकृतिवाले दर्पण से बनाई चार नालों को तथा तारमय पांच मुखवाले पिञ्जरे को दृढ स्थापित करे
एकैकमुख केन्द्र में शक्तिकीलों को लगावे एक एक कील स्थान में विद्युद्दर्पण से बने घड़े लोटे जैसे यन्त्रों
को तथा सात अर्रों वाले नालयुक्त आठ मुखवाले दश कोणवाले विद्युद्दर्पणकृत गोपुर—गोल गवाक्षचक्र
यन्त्र दृढ स्थापित करे, अतः कीलो चलाने से गोपुर स्वयं घूमता है ॥११५-१२०॥
तद्वेगो विद्युदुत्पन्नवह्निवेग समग्रत ।
समाकृष्यातिवेगेन स्वयं पिबति तत्क्षणात् ॥१२१॥
पश्चान्मार्तण्डकिरणशक्तयस्स्वीयतेजसा ।
तच्छक्तिं च समाहृत्य गोपुरस्था सुदारुणाम् ॥१२२॥
महामाण्डलिकाख्ये वातमण्डलेम्बरान्तरे ।
तत्क्षणात् प्रविलाप्यन्ति तद्विनाशो भवेत् तत ॥१२३॥
पश्चाद्धिमवदत्यन्त शीतल प्रभवेत् क्रमात् ।
तेन यानस्थयन्तॄणा भवेदाप्यायन तत ॥१२४॥
सुरक्षित भवेद् व्योमयान चापि विशेषत ।
तस्मात् सस्थापयेद् व्योमयाने शास्त्रविधानत. ॥१२५॥
एतद् विद्युद्दर्पणाख्ययन्त्रमद्भुतमव्ययम् ।
नोचेद विमाननाशस्स्यादप्रमादी भवेद्यत ॥१२६॥ इत्यादि ॥
उस 'गोपुर यन्त्र' का वेग विद्युत् से उत्पन्न अग्नि के वेग को पूर्णरूप से अति वेग से खींच
कर स्वयं पी लेता है पश्चात् सूर्यकिरणशक्तियां अपने तेज से गोपुरस्थ दारुण उस शक्ति को लेकर
महामाण्डलिक वातमण्डल में आकाश के अन्दर तुरन्त प्रविलीन कर देती है पुन उस शक्ति का विनाश
हो जाता है । पश्चात् वह हिम (बर्फ) की भांति अत्यन्त शीतल हो जावे, उससे विमान यान में बैठे
चालक यात्रियों का प्रफुल्लितत्व—सन्तोष सुख हो जावे और विमान भी सुरक्षित हो जावे । अतः विमान
में शास्त्र-विधि से इस अद्भुत स्थिर विद्युद्दर्पण नामक यन्त्र को संस्थापित करे नहीं तो विमान का
नाश हो जावे अतः इस विषय में अप्रमादी होवे—प्रमादरहित रहे ॥१२१-१२६॥
अथ शब्दकेन्द्रमुखयन्त्रः-अब शब्दकेन्द्रमुख यन्त्र कहते हैं—
एवमुक्त्वा सग्रहेण विद्युद्दर्पणायन्त्रकम् ।
अथेदानी शब्दकेन्द्रमुखयन्त्र प्रचक्षते ॥१२७॥
इस प्रकार संक्षेप से विद्युद्दर्पणयन्त्र कहकर अब शब्दकेन्द्रमुखयन्त्र कहते हैं ॥१२७॥
तदुक्त क्रियासारे—यह क्रियासार में कहा है—
शब्दोत्पत्तिस्थानभेदाच्छब्दकेन्द्रा इतीरिता ।
तेभ्य प्रसारण यत् स्याच्छब्दादीना दिशप्रभेदत ॥१२८॥
प्रविलाप्यन्ति आर्षप्रयोग ।
शब्दकेन्द्रमुखयन्त्र ] [ १६६
तदेव तच्छब्दकेन्द्रमुखस्थानमितीयते ।
तत्रत्यशब्दोपसंहारार्थं तस्मिन् प्रतिष्ठितम् ॥१२६॥
यन्त्र यत्तच्छब्दकेन्द्रमुखयन्त्रमितीरितम् ।
चतुरुत्तरत्रिशतशब्दभेदेषु यथाक्रमम् ॥१३०॥
वारुणीवाताशनीनां शब्दास्तीव्रतरास्स्मृता ।
आकाशस्याष्टमे कक्ष्ये एतच्छब्दयन्त्र क्रमात् ॥१३१॥
एकीभूय स्वभावेन माघफाल्गुनमासयो ।
भवेन्महाघनरवस्तीक्ष्णश्श्रोत्रविदारक ॥१३२॥
तस्य श्रवणमात्रेण बाधिर्यं यन्तॄणां भवेत् ।
अतस्तत्परिहाराय शब्दकेन्द्रमुखाभिधम् ॥१३३॥
यन्त्र संस्थापयेद् यानवामभागे यथाविधि । इत्यादि ॥
शब्द की उत्पत्ति के स्थानभेद शब्दकेन्द्र कहे गए हैं, उनसे वहां से दिशाभेद से शब्द
आदि का प्रसारण—फैलाव जो होता है वह ही शब्द केन्द्रमुख स्थान कहा जाता है । वहां के शब्दोप-
संहारार्थ उसमें स्थिर हुआ यन्त्र जो है वह शब्द केन्द्रमुखयन्त्र कहा जाता है । ३०४ शब्दभेदों में यथा-
क्रम मेघगर्ज, वायु, विद्युत् की कड़क के शब्द तीव्र कहे हैं, आकाश के आठवें स्तर में यह शब्दयन्त्र
स्वभाव से मिलकर यहां घन शब्द तीक्ष्ण कानों का विदारण करने वाला होता है ? उसके श्रवणमात्र
से बहिरापन यात्रियों का हो जाता है, अतः उसके प्रतीकारार्थ शब्दकेन्द्रमुखनामक यन्त्र यथाविधि
विमान के वामभाग में संस्थापित करे ॥१२८-१३३॥
महाघनरवमुक्तं शब्दनिबन्धने--महाघनरव कहा है शब्दनिबन्धन ग्रन्थ में—
बिन्दुवाताग्न्यम्बराणां क्रमात् साङ्केतकास्स्मृताः ॥ १३४ ॥
बिन्दु—अणु या जलकण—जलधूम—अभ्र, वायु, अग्नि, गगनमण्डल के साङ्केत—नाम
सङ्केत क्रम से कहे हैं ॥ १३४॥
तदुक्तं नामार्थकल्पसूत्रे--वह कहा है नामार्थकल्पसूत्र ग्रन्थ में—
अथ शब्दस्वरूपं व्याख्यास्यामो*शब्दविसर्गाणां सम्मेलननाच्छब्द इत्याचक्षते ।
तत्र शकारो बिन्दुर्बकारोवह्निर्दकारो वायुर्विसर्गश्चाकाश इति निर्णिता भवन्ति॥
स्थावरे जङ्गमे व एतेषां यथाभाग यत्र यत्र शक्तयस्सम्मिलिता भवन्ति तत्र
तत्र चतुरुत्तरत्रिशतशब्दभेदा प्रभवन्ति । चतुरुत्तरत्रिशतशब्दा इति हि
ब्राह्मणम्† ॥
चतुरुत्तरत्रिशतशब्दानां नामनिर्णयं ।
यथोक्तं घुण्डिनायेन सर्वशब्दनिबन्धने ॥ १३५ ॥
- एतादृश स्वल्पपाठ आर्षो बहुत्रानोपलभ्यते ।
† लुप्तब्राह्मणम् ।
१७० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
तस्मात् सङ्गृह्य नामानि प्रसङ्गत्यात्र कानिचित् ।
स्फोटादिमहाघनरवान्तान्यत्र प्रकीर्त्यन्ते ॥ १३६ ॥
स्फोटा रवोत्यन्तसूक्ष्मो मन्दोतिमन्दक ।
प्रतितीव्रो तीव्रतरो मध्यश्चातिमध्यम ॥ १३७ ॥
महारवो घनरवो महाघनरवस्तथा ॥ इत्यादि ॥
अब शब्द के स्वरूप का व्याख्यान करेंगे । श, ब, द, बिसर्ग ( : ) के मेल से 'शब्द' कहते
हैं । उनमें 'श' बिन्दु - अणु - जलकण - अभ्र, 'ब' अग्नि, 'द' वायु, विसर्ग ( : ) आकाश यह
यह निर्णय है । स्थावर में या जङ्गम में इनका यथाभाग- भागानुरूप जहा जहा शक्तिया सम्मिलित हैं
वहां वहा ३०४ शब्द भेद होते हैं, ३०४ शब्द हैं यह ब्राह्मण में भी कहा है । ३०४ शब्दों का निर्णय है ।
जैसा कि धुण्डिनाथ ने 'सर्वशब्दनिबन्धन, में कहा है । वहा से लेकर प्रसङ्गत कुछ नाम स्फोट आदि
महाघनरवपर्यन्त यहा कहे जाते हैं । वे स्फोट, रव, अत्यन्त सूक्ष्म, मन्द, अतिमन्दक, अतितीव्र, तीव्रतर,
मध्यम, अतिमध्यम, महारव, घनरव, महाघनरव हैं ॥ १३५-१३७ ॥
यन्त्रसर्वस्वेपि - यन्त्रसर्वस्व में भी कहा है-
वारुणीवाताशनीना शब्दसम्मेलनात् स्वत ।
आकाशाष्टमपरिधिकेन्द्रे त्यन्तभयावहू ॥ १३८ ॥
भवेन्महाघनरवश्श्रोत्रेन्द्रियविदारक ।
तस्मिन् यानप्रवेशस्स्याद् यदि यानस्थयन्तॄणाम् ॥ १३६ ॥
क्षणमात्रेण बाधिर्यं भवेत् तच्छब्दवेगत ।
तस्मात् तत्परिहाराय शब्दकेन्द्रमुखाभिधम् ॥ १४० ॥
व्योमयाने स्थापनाथं सग्रहेण निरूप्यते ।
आाकाशपरिधिमण्डलस्य यथाक्रमम् ॥ १४१ ॥
सप्तोत्तरत्रिशत्केन्द्रा इत्युच्यते बुधै ।
तेषु सप्ततिमात् केन्द्रात् समायात्यतिभीषणम् ॥ १४२ ॥
वारुणीशक्तिसम्भूतशब्दोत्यन्त भयावह ।
तथैवावातसम्भूतशब्दश्चात्यन्तघोषक ॥ १४३ ॥
द्वादशोत्तरत्रिशतकेन्द्रादागच्छति क्रमात् ।
तथैवाशनिशब्दश्च द्वयशीतिमकेन्द्रत ॥ १४४ ॥
एतच्छब्दत्रय सम्यग् मिलित्वाथ परस्परम् ।
भवेन्महाघनरवस्सर्व श्रोत्रविदारकः ॥ १४५ ॥
तेन यानप्रयातॄणा बाधिर्यं प्रभवेद्गत ।
एकैकशब्दकेन्द्राभिमुखतस्सुदृढ यथा ॥ १४६ ॥
‡ वचनव्यत्यय ।
शब्दकेन्द्रमुखयन्त्र ] [ १७१
सन्धारयेच्छब्दोपसंहारयन्त्रान्यथाविधि ।
तेन तच्छब्दोपसहारो भवेन्नात्र संशय ॥ १४७ ॥
वारुणी-जलधारा, वायु, विद्युतपतन के शब्दों के सम्मेलन से स्वत आकाश की आठवीं परिधि
के केन्द्र में अत्यन्त भयावह कान इन्द्रिय को फोड़ने वाला महाघनरव हो जावे-हो जाता है, उसमें
विमान का प्रवेश यदि हो जावे तो विमान में स्थित यात्रियों का उस शब्द के वेग से क्षणमात्र में बहिरा-
पन हो जावे, अत उसके परिहार के लिए शब्दकेन्द्रमुख नामक यन्त्र विमान में स्थापनार्थ संक्षेप से
निरूपित किया जाता है । आकाशपरिघिमण्डल के यथाक्रम ३०७ केन्द्र हैं ऐसा बुधजन कहते हैं, उन
केन्द्रों में ७० वें केन्द्र से अति भीषण वारुणो शक्ति-अभ्रप्रवाह शक्ति से उत्पन्न अत्यन्त भयावह शब्द
तथा वायु से उत्पन्न अत्यन्त घोष करने वाला शब्द ३१२वें केन्द्र से आता है वैसे ही विद्युत् शब्द ८२वें
केन्द्र से आता है, इस प्रकार तीनों शब्द सम्यक् मिल कर परस्पर महाघन रव शब्द कान का फोडने
वाला हो जाता है उससे विमान के यात्रियों का बहिरापन हो जावेगा एक एक शब्द केन्द्र के सामने
सुदृढ शब्दोपसहार यन्त्र यथाविधि लगावे उससे शब्द का उपसहार हो जावे-हो जावेगा, इसमें संशय
नहो ॥ १३८-१४७ ॥
अथ यन्त्रोपकरणानि-अथ यन्त्र को उपयुक्त करने वाले साधन-
जम्बाल शणकोश च क्रौञ्चिक वारिपिष्टकम् ।
गव्यारिक पञ्चनखचर्मसंशोधित तथा ॥ १४८ ॥
रुण्डाकमामिष शुण्ड वग चेति दश क्रमात् ।
सगृह्यं तान्यथाशास्त्रमादो शुद्धि प्रकल्पयेत् ॥ १४६ ॥
कपिचर्मविना सर्ववस्तुनिर्या सयन्त्रके ।
सम्पूर्य महिषीपित्ता(त्थ ?) त्पाचयेत् त्रिदिन क्रमात् ॥१५०॥
समत्वेनैव वस्तूना मेलन कारयेत् क्रमात् ।
पश्चात् सगृह्य निर्यास रक्तवर्णं सुशोभनम् ॥ १५१ ॥
लेपयेत् पञ्चनखचर्मण्यस्सप्तधा सुधी ।
कृत्वा सूर्यपुट पश्चाद् घुण्डिकन्दरसात् तया ॥ १५२ ॥
शब्दोपसहारशक्तिरेतत्सस्कारत क्रमात् ।
स्वतस्सञ्जायते सम्यक् कपिचर्मण्यथाबलम् ॥ १५३ ॥
जम्बाल-शैवाल-काई, शणकोश-मशकोश, कौञ्चिक - नाम का कृत्रिम लोहा या पद्मबीज
कमल गट्टा, वारिपिष्टक ?-वारिपर्शी-वारिपर्णी ?-जलकुम्भी, गव्यारिक ?, पञ्चनखचर्म ?-व्याघ्रचर्म शोधित
बाघ, ऊंट, रीछ, गोह, कच्छुआ के चर्म ?, रुण्डाक ?--रुण्डक- अगर काष्ठ ?, आमिष ?-दही ?,
शुण्ड ?--शुण्डा-हाथी शुण्ड-हाथी शुण्ड वृक्ष, वंग-रांगा धातु । इन १० वस्तुओं को लेकर यथाशास्त्र
आदि में शुद्धि करे, कपिचर्म-बन्दर के चाम छोड कर सब वस्तुओं को निर्यासयन्त्र-काढा बनाने
वाले यन्त्र में भर कर भैंस के पित्त-भैंस के रोचन से ३ दिन पकावे समान भाग वस्तुएं ले फिर
निर्यास-काढा लाल रंग का हो जावे उसे पञ्चनख चर्म पर लेप करे सात बार फिर सूर्यपुट-धूप देकर
१७२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
धुण्डिड कन्द ? के रस से भी सूर्यपुट-धूप देकर रखे । इस प्रकार संस्कार करने से शब्दोपसंहार शक्ति
स्वतः कपिचर्म में आ जाती है ॥ १४८-१५३ ॥
वितस्तिद्वयमायामं विस्त्ये (त ?) कोन्नतिं क्रमात् ।
बधिराख्येन लोहेन पेटिकां कारयेद् दृढम् ॥१५४॥
तन्मध्ये बधिरलोहनालद्वयमतः परम् ।
वक्रास्यं स्थापयेत् पश्चादूर्ध्वं शास्त्रमानतः ॥१५५॥
शब्दपादर्पणकृतच्छत्रिं सन्धारयेत् ततः ।
तन्मणिं च सुसंस्कृत्य तुलसीबीजतैलकैः ॥१५६॥
कपिचर्मणि सम्धार्य बल्व्याक्तात् सन्नियोजयेत् ।
दो बालिश्त लम्बा एक बालिश्त ऊंचा बधिर नामक लोहे से पेटिका-छोटा बक्स बनवाए,
उसके मध्य में बधिरलोह की दो नालें बगुले के मुखाकारवाली स्थापित करे पश्चात् शास्त्रीति से ऊपर
शब्द या दर्पण से बनी छत्री लगावे और तुलसी बीजों से संस्कृत उस मणि को भी कपिचर्म-बन्दर या
लंगूर के चर्म में रखकर लपेटकर बल्व्याक्त-गेण्डे के सींग के चेप या कांटे से युक्त करे ॥१५४-१५६॥
बल्व्याको नाम खङ्गशुल्यनिर्यास - इत्युक्तः गेण्ड के सींग का निर्यास-चेप या
पक्व काढा ।
पेटिकामध्यकेन्द्रस्थदक्षनालान्तरे दृढम् ॥१५७॥
पूर्वोक्तचर्मसहितमणिं सन्धारयेत् तथा ।
वामनाले पञ्चनखचर्ममात्रं नियोजयेत् ॥१५८॥
सूक्ष्मतन्त्रीन् सुसंयोज्य परस्परमतः परम् ।
बध्नीयात् तत्संवतस्सम्यक् सूक्ष्मकीलकशङ्कुभिः ॥१५६॥
पेटिकावरणादूर्ध्वं सिंहास्याकारतः क्रमात् ।
कृत्वा तच्चर्मणा तस्य मूलनालान्तरे तत ॥१६०॥
छिद्रं कृत्वातिसूक्ष्मेण तन्त्रीनालाद् यथाविधि ।
पेटिकान्तरनालस्थमणिं संयोजयेद् दृढम् ॥१६१॥
पेटिकस्योर्ध्वावरणाभागमाच्छाद्य बन्धयेत् ।
पेटिका के मध्यकेन्द्र में स्थित दक्ष-दक्षिण नाल के अन्दर पूर्वोक्त चर्मसहित मणि को
लगावे, वाम नाल में पञ्चनखचर्ममात्र नियुक्त करे। सूक्ष्म तारों को परस्पर लगाकर सूक्ष्मकील शंकुओं
से बान्ध दे, पेटिकावरण से उपर सिंहास्याकार से बनाकर उस चर्म से उसके मूल के अन्दर करके अति
सूक्ष्म छिद्र करके उसमें से तार की नाल से पेटिका के अन्दर नाल में स्थित मणि में संयुक्त करके
पेटिका ऊपरी आवरण भाग को ढककर बान्ध दे ॥१५७-१६१॥
बधिरलोहमुक्तं लोहतन्त्रप्रकरणे—बधिरलोहा कहा है लोहतन्त्रप्रकरण में —
† यहाँ से १६८ श्लोकपर्यन्त पाठ पूनाफोटो में अधिक मिला।
शब्दकेन्द्रमुखयन्त्र ] [ १७३
जम्भीर लगुड विरञ्चि ऋषिक मालूरपञ्चाननम् ।
लुण्टाक वरसिंहिक कुरवक सर्पास्यकुन्दावरम् ।
वाकूल मुरज मुडाङ्करटको संगृह्य सर्वं समम् ।
सम्पूर्य त्र्युटिमूषमध्यमविले कुण्डे सुसंस्थाप्य च ॥१६२॥
यन्त्रास्ये द्रुततद्रस सुरुचिर सम्पूरयेच्छीघ्रत ।
एतेन प्रभवेद् विशुद्धममलं शैत्य सुसूक्ष्म दृढम् ।
श्याम शब्दहन च भाररहित शक्त्या समाच्छादितम् ॥१६३॥
रक्तस्तम्भनपाटव घनरवे योद्धाङ्गशल्यापहम् ।
भ (ज ?) ष्मामारुतशब्दनाशनपटु सर्वव्रणोच्छेदकम् ॥१६४॥ इत्यादि ॥
जम्भीर=जम्भीरीनिम्बू, लगुड=कनेयर, विरञ्चि=असवर्ग ?, ऋषिक=सियाडिलता, मालूरु-
मालूर=कैथ या विल्व, पञ्चानन=लोहाविशेष ?, लुण्टाक=लुण्टक=शाकविशेष सम्भवत खट्टाशाकलोणी ?,
वरसिंहिक=बड़ी कटेरी, कुरवक=श्वेत आक=सफेद फूल का आख, सर्पास्य ?=सर्पाख्य ?=नागकेसर
या सर्पास्य=सर्पदन्ती ?=नागदन्ती कुन्दावर=कुन्दुरु=बाळभककोडा, वाकुल=मोलमरी बीज, मुरज-
कटहल, मुडाङ्ग=मृगाङ्क=कपूर ? या सुडङ्गण=सुगन्धवाला ?, रटक ?=रण्डक=अफलबृक्ष ? या रण्डा-
मूषकणी ? सबको समान लेकर त्र्यटिमूषमध्य-तीन पत्री-तीन परतवाली बोतल छिद्रबाले कुण्ड में रख
कर ३०० दर्जे की उष्णता से पांचमुखवाली भस्त्रामुख से गलाकर यन्त्र के मुख में पिघलारस शीघ्र भरवे
इससे विशुद्ध निर्मल शीत-ठण्डा अतिसूक्ष्म दृढ श्याम रंगवाला शब्दनाशक भाररहित शक्ति से प्रपूर्ण
रक्तस्तम्भन में कुशल-योग्य घन रण में योद्धा के अङ्गों से शल्य का निकालनेवाला भष्मावात शब्द
के नाश में योग्य सब घावों को नष्ट करनेवाला हो जाता है ॥१६२-१६४॥
पूर्वोक्तोत्यन्तभयद महाघनरवे क्रमात् ।
सिंहास्यभस्त्रिकात्पश्चात् समाकृष्यति वेगत ॥१६५॥
पेटिकान्तर्नालस्थमणी संयोजयेदथ ।
कपिचर्मस्वशक्त्या तच्छब्दमाकृष्य वेगत ॥१६६॥
निश्शब्दं कुरुते स्वस्मिन्नुपसंहृत्य तत्क्षणात् ।
तेन यानस्थयन्त्राणामत्यन्तसुखदं भवेत् ॥१६७॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन शब्दकेन्द्रमुखभिधम् ।
यन्त्रं संस्थापयेद् व्योमयाने सम्यग्यथाविधि ॥१६८॥ इत्यादि ॥
पूर्वोक्त अत्यन्त भय देनेवाले महाघनरव को क्रम से अतिवेग से सिंहास्य भस्त्रिका से अतिवेग
से खींचकर पेटिका के अन्दर नाल में स्थित मणि में युक्त करदे, कपिचर्म अपनी शक्ति से उस शब्द
को वेग से खींचकर अपने में लीन करके तुरन्त शब्दरहितता कर देता है अतः सर्वप्रयत्नसे शब्दकेन्द्रमुख
नामक यन्त्र को विमान में सम्यक् यथाविधि संस्थापित करे ॥१६५-१६८॥
हस्तलेख कारी संख्या १२—
अथ विद्युद्द्वादशकयन्त्र —अब विद्युद्द्वादशकयन्त्र कहते हैं —
एवमुक्त्वा शब्दकेन्द्रमुख्ययन्त्रं यथाविधि ।
विद्युद्द्वादशकयन्त्रमिदानीं सम्प्रचक्षते ॥१॥
इस प्रकार शब्दकेन्द्रमुख्ययन्त्र यथाविधि कहकर विद्युद्द्वादशकयन्त्र अब कहते हैं ॥१॥
तदुक्तं क्रियासारे—यह कहा है क्रियासार ग्रन्थ में—
वाणस्थधूमकेतूनां मण्डलस्याष्टमेन्तरे ।
त्रिकोटिसप्तलक्षत्रिसहस्रद्विशतोपरि ॥२॥
एकविंशतिसंख्याका वर्तन्ते धूमकेतव ।
विद्युद्गर्भास्तेषु धूमकेतूष्टसहस्रका ॥३॥
महाकालादयो रौद्रा विद्युद्द्वादशलोचनाः ।
तेषु द्वादशसंख्याका प्रशस्ता धूमकेतवः ॥४॥
वाण ? में स्थित धूमकेतुओं के अष्टम मण्डल के अन्दर धूमकेतुओं या पुच्छलतारों के मण्डल
के आठवें अन्तर—सिरे पर ३०७०३२२१ इतनी संख्या वाले धूमकेतु रहते हैं, उनमें विद्युद्गर्भ
८००० महाकाल आदि हैं उनमें रौद्र विद्युद्द्वादश लोचन हैं, १२ संख्यावाले धूमकेतु अच्छे हैं ॥२-४॥
विद्युद्द्वादशकमुक्तं शक्तितन्त्रे —विद्युद्द्वादशकयन्त्र शक्तितन्त्र ग्रन्थ में कहा है—
रोचिषी दाहका सिंही पतङ्गा कालनेमिका ।
लता वृन्दा रटा चण्डी महोर्मि पार्वारिण मृडा ॥५॥
उल्कानेत्रस्थिता ह्येते विद्युतो द्वादश क्रमात् । इति ॥
रोचिषी, दाहका, सिंही, पतङ्गा, कालनेमिका, लता, वृन्दा, रटा, चण्डी, महोर्मि, पार्वारिण, मृडा
ये १२ विद्युत् उल्कानेत्र-उल्काएं जिनकी नायक हैं अर्थात् उल्कारूप हैं ॥५॥
धूमकेतव (वो?) उक्ताः खेटसर्वस्वे—धूमकेतु कहे हैं खेटसर्वस्व ग्रन्थ में—
महाकाली महाग्रामो महाज्वालामुखस्तथा ।
विस्फुलिङ्गमुखो दीर्घवातो लङ्को महोर्मिकः ॥६॥
An exact line-by-line transcription of the document:
विद्युद्द्वादशकयन्त्र ] [ १७५
\ स्फुलिङ्गवमनो गण्डो दीर्घजिह्वो दुरोणक ।
सर्पास्यश्चेति विद्युन्नेत्रोल्का द्वादशधा स्मृता ॥७॥ इत्यादि ॥
महाकाल, महाभास, महाज्वालामुख, विस्फुलिङ्मुख, दीर्घवाल, खब्ज, महोर्मि, स्फुलिङ्गवमन,
गण्ड, दीर्घजिह्व, दुरोणक, सर्पास्य ये १२ प्रकार के विद्युन्नेत्र उल्काएं कही हैं ॥६-७॥
तेषा विद्युत्सम्मोहास्तु शरद्वासन्तयो क्रमात् ।
भवन्त्यादित्यकिरणेष्वन्तर्भू तास्स्वभावत ॥८॥
किरणोल्कस्थशक्तीना परस्परविमेलनात् ।
भवेदज (जि?) गरानाम काचिच्छक्ति र्भयङ्करा ॥९॥
खस्थद्वाविंशतिमकेन्द्रमुखमध्ये यदा क्रमात् ।
व्योमयान समायाति तदाज (जि?) गरसञ्ज्ञिका ॥१०॥
शक्तिर्यान्स्तम्भन स्ववेगात् तत्र
१७६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
विमानावरणान्तर्गुहाशये स्थापयेत् सुधी ।
विद्युद्वेगोपसंहारदर्पणेन यथाविधि ॥ १६ ॥
शलाकान् षट् बाहुमात्रानष्टौ कुर्याद् दृढ यथा ।
अष्टदिक्षु स्थापयेत् तद्विमानावरकोपरि ॥ १७ ॥
विधिवत् स्थापयेत् पश्चाद् दम्भोलिलोहनिर्मितान् ।
कीलीचकान् पञ्चमुखानन्योन्याश्रयसंयुक्तान् ॥१८॥
विमानावरकस्यादौ मध्येचान्ते यथाक्रमम् ।
बध्नीयादावर्तसूक्ष्मशङ्कुभिस्सुदृढ यथा ॥१९॥
पौण्ड्रकादिमणीना तु पञ्जर सूक्ष्मतन्त्रिभि ।
पृथक् पृथक् कल्पयित्वा तन्त्रद्यग्राणि यथाक्रमम् ॥२०॥
विद्युत् के वेग का उपसंहार करनेवाले दर्पण के साथ यथाविधि विमानावरण के अन्तर्गत
गुहाशय—गुहा में रहने वाले यन्त्र को बुद्धिमान् स्थापित करे ६ भुज माप में ८ शलाकाओं को भी ८
दिशाओं में दृढ स्थापित करे उस विमानावरण के ऊपर विधिवत् दम्भोलि लोहे—वज्रलोहे से बने एक
दूसरे से आश्रित मिले हुए पांच मुखवाले कीलबक स्थापित करे, विमानावरण विमान को ढकनेवाले
साधन के आदि में मध्य में और अन्त में यथाक्रम घूमनेवाले सूक्ष्म शङ्कुओं से बान्ध दे, पौण्ड्रक
आदि मणियों का पिञ्जरा सूक्ष्म तारों से पृथक् पृथक् बनाकर तारों के अग्रभागों को यथाक्रम-॥१६-२०॥
एकैककीलमूलाग्रे सम्यक् सन्धारयेत् क्रमात् ।
भवेत् पञ्जरतन्त्रीणा चतुर्णामेककीलक ॥ २१ ॥
पश्चात्सम्भ्रामयेन्मूलकीली वेगाद् यथाविधि ।
पञ्जरैस्सह भ्राम्यन्ति मणयो द्वादश क्रमात् ॥ २२ ॥
तेनावरणकोशाना विकासो भवति ध्रुवम् ।
तेभ्य (१?)पटघनान्तस्थविद्युद्वेगोपहारिणी ॥ २३ ॥
शक्तिर्विजृम्भते सम्यक् प्रतिकोशे विशेषत ।
पूर्वोक्त विद्युत्किरणसञ्जाताज(जि?) गराभिधम् ॥२४॥
शक्ति तन्मणय पश्चात् समाकृष्यातपान्तरात् ।
किरणेभ्य पृथक् कृत्वा तद्वेग सन्निरुध्य च ॥ २५ ॥
एक एक कीली के मूल के आगे लगावे। पिञ्जरे के चार तारों का एक कील—पेंच हो पश्चात्
वेग से मूलकीली को घुमावे तो पिञ्जरों के साथ १२ मणिया घूमती हैं उस से निश्चय आवरण कोशों का
विकास होता है, उन कोशों से पटघन के अन्दर स्थित विद्युत् के वेग को लेने वाली शक्ति प्रत्येक कोश
में सम्यक् विकसित होती है—फैलती है। पूर्वोक्त विद्युत् किरण से उत्पन्न अजिगरा शक्ति को वे मणियां
आतप के अन्दर से खींचकर किरणों से पृथक् करके उसके वेग को रोक कर—॥ २१—२५ ॥
विद्युद्द्वावशक्यन्त्र ] [ १७७
तत्रत्याष्टशलाकेषु योजयन्ति स्वशक्तितः ।
परिगृह्य शलाकास्तच्छक्तिं पश्चात् स्वतेजसा ॥ २६ ॥
पूर्वोत्क्तावरणान्तस्स्थप्रतिकोशमुखान्तरे ।
सयोजयन्ति वेगेन तत्कोशास्तदनन्तरम् ॥ २७ ॥
तच्छक्तिं प्रेषयेद् वेगाद् द्रावकाभिमुखं यथा ।
ततस्सञ्चालयेन्मध्यकीलीमावरणास्थिताम् ॥ २८ ॥
विमानावरकान्तस्स्थद्रवात् तेनातिवेगतः ।
विद्युत्कुठारिका नाम शक्तिरुर्ध्वमुखीस्वत । ॥ २६ ॥
समुत्थाय स्वभावेन कोशस्थाजिगराभिधाम् ।
समाहृत्य स्वशक्त्याथ द्रावणे सन्निरुन्ध्यति ॥ ३० ॥
वहा की आठ शलाकाओं में स्वशक्ति से जोड देती है, पश्चात् शलाकाएं स्वबल से इस शक्ति
को पकड कर पूर्व कहे आवरण के अन्दर स्थित प्रत्येक कोशमुख के अन्दर वेग से संयुक्त कर देते हैं,
उसके अनन्तर वह कोश वेग से उस शक्ति को द्रावक की ओर प्रेरित कर देती है फिर आवरणस्थित
मध्य कीली को चलावे तो विमान के आवरण के अन्दर स्थित द्रावक से अतिवेग से विद्युत्कुठारिका
ऊर्ध्वमुखी शक्ति स्वतः उठकर स्वभाव से कोशस्थ अजगरा नामक शक्ति को अपनी शक्ति से लेकर —
समेटकर द्रावक में रोक लेती है ॥ २६—३० ॥
पश्चादावरणान्तस्स्थान्त्यकीलीप्रचालनात् ।
द्रवस्थाजिगरा शक्ति स्वय पटघनान्तरे ॥ ३१ ॥
भवेद् विलीन सर्वत्र ततो वायुस्स्ववेगतः ।
तत्रस्थाजिगराशक्तिं समाहृत्य पिबेत् क्रमात् ॥ ३२ ॥
तस्मात् तत्क्षणातो व्योमयानबन्धविमोचनम् ।
भवेत् ततो विमानस्थयन्तॄणां सुखद भवेत् ॥ ३३ ॥
पश्चात् आवरण के अन्दर स्थित अन्तिम कीली के चलाने से द्रव में स्थित अजगरा शक्ति
स्वयं पटघन के अन्दर सर्वत्र विलीन हो जावे, फिर वायु अपने वेग से वहा की अजगरा शक्ति को समेट
कर पीले—पीलेता है, इससे तुरन्त विमान के बन्धन का विमोचन-छुटकारा हो जाता है फिर विमानस्थ
यात्रियों को सुख होता है ॥ ३१—३३ ॥
विद्युद्वेगोपसंहारदर्पणमुक्तं दर्पणप्रकरणे—विद्युद्वेगोपसंहार यन्त्र दर्पणप्रकरण में कहा है—
शुण्डालकमुडकान्तकसुघनोदरसत्त्वान् ।
बुडिलाकरविषपङ्कजकुटिलोरगनागान् ॥
सिकतावरगरदाघनगरलामुखभृङ्गान् ।
स्फटिकावरमुक्ताफलवरकान्तकुञ्जरान् ॥ ३४ ॥
क्षारत्रयरविकञ्चुकचुलकोडुपबन्ध्यान् ।
[ १७८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र ]
गरुडारिसुजम्बालिककुशकुड्मलरुक्मान् ॥
शुद्धान् वरषड्विंशतिवस्तूनि परिगृह्य ।
सम्पूर्य विराजमानमूषामुखमध्ये ॥ ३५ ॥
पद्माकरकुण्डान्तरमध्ये वरमूषाम् ।
संस्थाप्य मृगेन्द्राकृतिभस्त्रामुखरन्ध्रै ॥
अतिवेगान् सगल्योष्णैककथ्यत्रिशताशाद् ।
यन्त्रास्येथ निसिञ्चेद्रसमाहृत्य विधानात् ॥ ३६ ॥
अतिमृदुल सुदृढस्फटिकशुद्धतरञ्च
तद्विद्युद्गेहर वरमुकुर प्रभवेद्वि ॥ इत्यादि ॥
शुण्डालक-शुण्डाल कृत्रिम लोहविशेष ? या शुण्डालक-शुण्डी-हाथी शुण्डी वृत्त ?, मण्डूक ?,
अन्तक-कचनार, घनोदर ? इनके सत्त्व । बुण्डिल ?, अकर-अकरा-अमली ?, विष-वत्सनाभ, भृङ्ग-भृङ्ग-
राज-भृङ्गराज बूटा या भृङ्ग-कमल ?, कुटिलशङ्ख ?, उरग-नागकेसर, नाग-सीसा धातु या हाथी दान्त
या नागवल्ली ?, सिकता- शुद्ध रेत ?, वर-सैन्धव नमक, गरद-संख्याविष ?, घन-अभ्रक, गरला-मधु-
मक्खी, मुख-कठल बदल, शृङ्ग-शृङ्गोदर ? या अगरकाष्ठ, स्फटिक-स्फटिक मणि ? या फिटकरी,
अवर-अवरदारुक-पत्र विष ? मुक्ताफल-कपूर ? या मोती या वरमुक्ताफल-बडा मोती, वर-गूगल,
कान्त-अयस्कान्त या वरकान्त-श्रेष्ठ अयस्कान्त, कुरङ्ग ?-करञ्ज-करञ्जवा, क्षारत्रय-सज्जीक्षार यवक्षार
सुहागा, राँय-चाम्बा, कञ्चुक-सर्प की केंचुली, चुलक ?, उदुर ?, बन्ध्या-बांझककोडा या ह्रीवेर,
गरुड-पोनामाखो, अरि-खदिरपत्रिका, सुजाम्बलिक-अकळो जाम्बालिक-जम्बाल-गन्धतृण या
केतकी-केवडा, कुश-कुशातृण, कुड्मल-पुष्पकोरक, रुक्म-तीक्ष्ण लोह । शुद्ध की हुई २६ वस्तुओं को
लेकर विराजमान मूषामुख मध्य में भर कर पद्माकर कुण्ड के अन्दर बीच में बडी मूषा-बोतल को रख
कर सिंहाकृति वाले भस्त्रिकामुख छिद्रों से अतिवेग से गला कर ३०० दर्जे की उष्णता से गला कर यन्त्र
के मुख में पिघले रस को सीञ्च दे, अति मृदुल दृढ स्फटिक अति शुद्ध विद्युद्गेग को हरने वाला श्रेष्ठ
दर्पण हो जावे ॥ ३४-३६ ॥
दम्भोलीलोहमुक्तं लोहतन्त्रप्रकरणे-दम्भोली लोहा कहा है लोहतन्त्रप्रकरण में -
उर्वारक कारविक कुरङ्ग शुण्डालक चन्द्रमुख विरिश्चिम् ।
क्रान्तोदर जा(या ?) लिकसिंहवक्त्री ज्योत्स्नाकर द्विरुडपद्ममौक्तिकी ।
एतान् समाहृत्य विशुद्धलोहान् सन्तोल्य पश्चात् समभागत क्रमात् ॥ ३७ ॥
मण्डूकमूषोदरमध्यास्ये सम्पूर्य चञ्चुमुखकुण्डमध्ये ।
संस्थाप्य पञ्चाननभस्त्रिकामुखात् सञ्जालयेत् पञ्चशतोष्णैककथ्यत ॥ ३८ ॥
दम्भोलीलोह प्रभवेद् विशुद्धमेव कृते शास्त्रविधानत क्रमात् ॥ इत्यादि ॥
उर्वारक, कारविक, कुरङ्ग, शुण्डालक, चन्द्रमुख, विरिञ्च, कान्तोदर, जालिक, सिंहवक्त्र, ज्योत्स्ना-
कर, द्विरुङ्गि, पद्ममौक्तिक । इन विशुद्ध लोहों को लेकर समानभाग तोल कर मण्डूक मूषोदर मध्यम के
मुख में भर कर पञ्चमुख कुण्ड के मध्य में संस्थापित करके पांचमुख वाली भस्त्रिका से ५०० दर्जे की
...`
Wait, what are the traditional 12 gems in Vaimanika Shastra (Mani Prakarana)?
Let's recall Vaimanika Shastra:
The 12 manees for Agnigara / Ajjiga shanti:
- Paundraka
- Jrumbhaka
- Shivira
- Apalochana
- Chapalaghna
- Ashupamani (or Amshupa)
- Veeraha (Veeragho)
- Gajatundika
- Taaraamukha
- Maandalika
- Vajraasya or Panchaasya?
In Vaimanika Shastra: "पञ्चास्यो" or "वज्रास्यो"?
Wait, "वज्रास्य" is diamond-faced/adamantine-faced!
Look closely at the image in line 5:
Is thatवज्रास्यो?
Wait! Look at the letter:वwith aज्रconjunct!
Wait, look at the glyph:
It has a top bar, thenव, but wait, is itव?
Look at the character: it hasवand thenज्र? No, it looks likeवwith something, orपwithञ्च?
Wait, let's zoom in to line 5:
त ा रा मु खो
म ा ण्ड लि को
`
१८० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
क्रियासारेपि--क्रियासार में भी-
क्रमाद् विद्युद्वातधूमशक्तीना सप्रमाणत ।
तत्कालानुसारेण चोदनादिक्रियादिषु ॥४७॥
नियामक़ार्थं तन्नानप्राणकुण्डलीकेन्द्रे ।
मूलस्थाने स्थाप्यते यद् यन्त्रशास्त्रविशारदै ॥४८॥
प्राणकुण्डलिनोयन्त्रमिति तत्सम्प्रचक्षते ।
क्रम से विद्यु त् वायु धूमशक्तियों का प्रमाणसहित उस उसके अनुसार प्रेरणा आदि क्रियाओं
में नियमकार्थ—नियन्त्रण के लिये विमान के प्राणकुण्डलीकेन्द्र वाले मूलस्थान मे जो यन्त्रशास्त्रज्ञ
विद्वानों द्वारा स्थापिन किया जाता है उसे प्राणकुण्डलिनी यन्त्र कहते है ॥४७-४८॥
यन्त्रसर्वस्वेपि—यन्त्रसर्वस्व में भी कहा है—
विमाने धूमविद्युद्वातशक्तीना यथाविधि ।
प्रसारणे चालने च चोदने स्तम्भनेपि च ॥४६॥
विचित्रगमने तद्वत् तिर्यग्गमनकर्मणि ।
नियम्य सप्रमाणेन तत्तन्नालमुखान्तरात् ॥५०॥
प्रेरणार्थ सग़्रहेण यथाशास्त्र यथामति ।
प्राणकुण्डलिनोयन्त्र शास्त्रे स्मिनूसम्प्रकीर्त्यते ॥५१॥
चतुरश्र र्वर्तुल वा केन्द्राष्टकविराजितम् ।
वितस्तित्रयमायाम वितस्तित्रयमुन्नतम् ॥५२॥
कुर्याद् वृपललोहेन पीठमादौ यथाविधि ।
एकैककेन्द्रस्थानेथ चक्रद्वयविराजितम् ॥५३॥
प्रदक्षिणावर्तकीलस्थापनार्थं यथाविधि ।
रन्ध्रत्रयसमायुक्तान् चतुर्दन्तविराजितान् ॥५४।
शङ्कुत्रयसमाविष्टान् सूक्ष्मपीठान् दृढ यथा ।
सन्धारयेत् ततस्तेषा मध्ये शङ्कुमपि क्रमात् ॥५५॥
विमान में धूम विद्युत् वायु शक्तियो के यथाविधि प्रसारण चालन प्रेरणा स्तम्भन में विचित्र-
गमन तथा तिर्यग्गमनकर्म में सप्रमाण नियन्त्रित करके उस उस नालके मुखके अन्दरसे प्रेरणार्थ संक्षेपसे
यथाशास्त्र यथामति प्राणकुण्डलिनी यन्त्र इस शास्त्र में कहा जाता है । प्रथम चौकोन या गोल आठकेन्द्रों
में विराजित ३ बालिस्त लम्बा ३ बालिख्त ऊं'चा वृपल लोहे से पीठ करे । एक एक केन्द्रस्थान में दो
चक्रविराजित हों घूमनेवाली कील के स्थापनार्थ यथाविधि तीन छिद्रों से युक्त चार दान्तों के सहित तीन
शंकुओं से सम्बन्धित—घिरे हुए सूक्ष्मपीठों को लगावे उनके मध्य में शंकु भी लगावे ॥४६—५५॥
उक्तविद्युद्घूमवातपयनालमुलावधि ।
प्रकाशनतिरोधानहस्तचकैर्विराजितम् ॥५६॥
प्राणकुण्डलिनीतन्त्र ] [ १८१
सव्यासपसवचलनकीलकद्वयशोभितम् ।
साङ्केतार्थं तन्मध्ये शब्दनालेन सयुतम् ॥५७॥
पक्षाघातकचक्राद्यैस्सकीलैस्सशलाककै ।
संशोभित रक्तवर्णं नालत्रयमत परम् ॥५८॥
पीठस्थशकुन पूर्वं ईशाग्न्याग्नेयकेन्द्रत' ।
तथैव पश्चिमदिशि मध्यकेन्द्राद् यथाक्रमम् ॥५९॥
यानकुण्डलिनीमध्यमार्गस्थानावधिकमात् ।
सन्धायवृत्तादिकीलेशङ्कुभिस्सुदृढ यथा ॥३०॥
उक्त विद्युत् धूमवात के मार्ग सम्धीनाल मुख अवधि तक प्रकाशक्रिया प्रकट करने और
तिरोभावक्रिया बन्द करने के साधनरूप हस्तचक्रों से विराजित सीधी उल्टी गति देने वाली दो
कीलों—पेंचों से शोभित उनके मध्य में संकेत देने वाले शब्दनाल से युक्त पक्षाघात—एक पक्ष में
गति प्रेरणा देने वाले कीलसहित और शलाकाओंसहित चक्र आदि से युक्त लाल रंग की तीन नालें
पीठस्थ शंकु के पूर्व में ईशान्य आग्नेय केन्द्र से पश्चिम दिशा में मध्य मार्ग के स्थान तक क्रम से लगा
कर जोड कर घूमने वाली कीलों के शंकुओं से जैसे सुदृढ—॥ ५६-६० ॥
संस्थाप्य विधिवत् केन्द्रत्रयमूलावधि दृढम् ।
चालनादिक्रियास्सर्वेहस्तचक्रैर्यथाक्रमम् ॥ ६१ ॥
तत्तत्कीलचलनेन तत्तन्नालमुखान्तरात् ।
भवेत् तेन व्योमयानसञ्चार प्रभवेत् तत् ॥ ६२ ॥
उक्तकेन्द्राष्टस्थानमध्यपीठाद् यथाविधि ।
एकेकनालतन्त्री सरन्ध्रा दृढतरा क्रमात् ॥ ६३ ॥
सन्धायं शङ्कुन पूर्वकेन्द्रपीठान्तरादित ।
पूर्वोक्तनालत्रयोर्ध्वभागे वातायनान्तरे ॥ ६४ ॥
सन्धारयेत् तदग्राणि कीलकैस्सुदृढ यथा ।
यानसञ्चारोपयोग कृत्वा शक्तित्रय तथा ॥ ६५ ॥
—हो ऐसे विधिवत् तीन केन्द्र के मूल तक संस्थापित करके चालन आदि क्रियाएं सब हस्त-
चक्रों से यथाक्रम उनकी कीली चलाने से उस उस नालमुख के अन्दर से हो सके फिर उससे विमान-
सञ्चार बन सके । उक्त केन्द्र के आठ स्थान के मध्य पीठ से यथाविधि छिद्रसहित दृढ एक एक नालतार
को शंकु से पूर्व केन्द्र के पीठ के अन्दर से जोड कर पूर्वोक्त तीन नालों के ऊपरि भाग में वातायनयन्त्र
के अन्दर लगावे उनके अग्रभाग कीलों से दृढ विमानचालन में उपयोग करके तोनों शक्तियों—॥६८-६५॥
शक्तित्रयावशिष्टाश समप्रमतिवेगत ।
उक्ताष्टनालरन्ध्रेषु योजयेत् कोलचालनात् ॥ ६६ ॥
१८२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
ततश्शक्तित्रयं गत्वा आकाशे पतति स्वयम् ।
पश्चाद् वातप्रवाहे संम्मिलित्वा नाशमेधते ॥ ६७ ॥
तस्माद् विमानसञ्चारो अनायासेन सिध्यति ।
—तीनों शक्तियों के अवशिष्ट समग्र अंश को अतिवेग से कहे हुए आठ नालों के छिद्रों में कील
पच चला कर लगा दे फिर तीनो शक्तियां आकाश में पहुंच कर गिर जाती हैं—स्वयं नष्ट हो जाती हैं
पश्चात वायुप्रवाह में मिल कर नाश को प्राप्त हो जाती हैं अत विमानसञ्चार अनायास सिद्ध होता
है ॥ ६६-६७ ॥
अथ शक्त्युद्गमयन्त्रनिर्णय — अथ शक्त्युद्गम यन्त्र का निर्णय देते हैं—
एवमुक्त्वा प्राणकुण्डलिनोयन्त्रमत परम् ।
अथ शक्त्युद्गमयन्त्रस्सङ्ग्रहेण निरूप्यते ॥ ६८ ॥
इस प्रकार प्राणकुण्डलिनी यन्त्र कहकर उससे आगे शक्त्युद्गम यन्त्र संग्रह से निरूपित
किया जाता है ॥ ६८ ॥
उक्तं हि खेटविलासे—खेटविलास में कहा है—
ग्रहभानामष्टशक्तीर्महावारुणीशक्ति ।
आकृष्यन्ते पौर्णमायां कार्त्तिके मासि वेगत ॥ ६९ ॥
आकाशकक्ष्यपरिधिकेन्द्रेष्वथ यथाक्रमम् ।
सप्तत्रिंशोत्तरशतकेन्द्ररेखापथि क्रमात् ॥ ७० ॥
जलपिञ्जूलिकाशक्त्याकर्षणादतिवेगत ।
तच्छक्तयोऽष्टौ सर्वत्र व्याप्नुवन्ति विशेषत ॥ ७१ ॥
अन्योन्यशक्तिसंसर्गाद्धिमोद्रेको भयङ्कर ।
भवेत् पश्चात् त्रिधा तद्विभागस्स्याच्छक्तिभेदत ॥ ७२ ॥
तेष्वेकांशो शीतरसरूपवातो भवेत् तत ।
अपरो जलशो (सी ?) तस्य सीकराकारमेघते ॥ ७३ ॥
अन्यो भवेद् वातशीतरसप्रवाहिक क्रमात् ।
यदा यानस्समायाति केन्द्ररेखापथि क्रमात् ॥ ७४ ॥
वातशीतरसप्रवाहिकशक्तिस्स्ववेगत ।
विमानशक्तिसर्वस्वमपकर्षति तत्क्षणात् ॥ ७५ ॥
ग्रह नक्षत्रों की आठ शक्तियां महावारुणी शक्ति से कार्तिक मास में पौर्णमासी में वेग से
खींची जाती है, आकाशकक्षा सम्बन्धी परिधि केन्द्रों में यथाक्रम १३७ वें केन्द्ररेखामार्ग में जल
की पिनी रुई जैसी भाप शक्ति—अभ्रशक्ति के आकर्षण से अतिवेग से वे आठ शक्ति सर्वत्र
विशेष व्याप जाती हैं, एक दूसरे के शक्तिसंसर्ग से भयंकर हिम का उत्थान हो जावे पश्चात् शक्तिभेद
से उसका विभाग तीन प्रकार हो जावे, उनमें एक अंश शीतरसरूप वायु—ठण्डी भापमय वायु हो