त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
त्रिशतिका 45
बीजगणितीय समीकरण के अनुसार-
1/3 + 1/5 + 1/6 + 1/10 = 24/30 = 4/5
⇒ 4/5x + 6 = x
⇒ 4x + 30 = 5x
⇒ 5x - 4x = 30
x = 30
जाँचें
30 × 1/3 = 10 धरती पर गिरे
30 × 1/5 = 6 बिस्तर पर गिरे
30 × 1/6 = 5 कामिनी को प्राप्त हुए
30 × 1/10 = 3 प्रिय ने उठाए
शेष = 6
= 30 कुल मोती
अन्यदुदाहरणम्
यूथार्धं सत्रिभागं गिरिशिखरगतं कुञ्जराणां च दृष्टं।
षट् भागश्चैव नद्यां पिबति च सलिलं सप्तभागेन युक्तः॥
पद्मिन्यामष्टभागः स्वनवकसहितः क्रीडते जातरागो।
नागेन्द्रो हस्तिनीभिस्तिसृभिरनुगतः का भवेद्यूथसंख्या१॥ २७॥
न्यासः 1/2 1/6 1/8 दृश्यम् 4, लब्धं यूथसंख्या 1008
1/3 1/7 1/9
सुक्षेमा अनुवाद-किसी जंगल में हाथियों का बहुत बड़ा झुण्ड देखा गया।
उस झुण्ड का 1/2 अपने 1/3 से युक्त होकर अर्थात् 1/2 का तृतीयांश उसी 1/2 से जुड़कर
जंगल की खोह में चला गया। झुण्ड का 1/6 अपने 1/7 से युक्त होकर नदी में पानी
पीने चला गया। उसी झुण्ड का 1/8 अपने 1/9 से युक्त होकर कमलिनीवन में चला
गया। शेष 3 हथिनियों के बीच 1 गजेन्द्र प्रेमक्रीडा करता हुआ देखा गया। हाथियों
की कुल संख्या बताओ।
१. तुल. ग.ति.पृ. 42
46 त्रिशतिका
अनुशीलन-इस प्रश्न में प्रत्येक भिन्न संख्याओं के साथ उसी संख्या का
कोई अंश भी सम्मिलित हैं। अतः यहाँ श्लोक 24 में कही गई भागानुबन्ध विधि
के पश्चात् पूर्वोक्त संक्रिया की जावेगी।
इस प्रकार भागानुबन्ध विधि से जोड़
{1 (3+1)} / (2×3) + {1 (7+1)} / (6×7) + {1 (9+1)} / (8×9) = 251 / 252
अथवा
½ + (½ × ⅓) + ⅙ + (⅙ × ⅐) + ⅛ + (⅛ × ⅑)
⇒ ½ + ⅙ + ⅙ + ¹/₄₂ + ⅛ + ¹/₇₂ = ⁵⁰²/₅₀₄ = ²⁵¹/₂₅₂
कल्पित राशि 1 से घटाएँ ⇒ 1- ²⁵¹/₂₅₂ = ¹/₂₅₂
शेष से दृश्य का भाग ⇒ 4 ÷ ¹/₂₅₂ = 4×252 = 1008 अभिमत राशि
बीजगणितीय समीकरण के अनुसार-
{ ½ (1+ ⅓) + ⅙ (1 + ⅐) + ⅛ (1 + ⅑)} x + 4 = x
⇒ { ½ × ⁴/₃ + ⅙ × ⁸/₇ + ⅛ × ¹⁰/₉ } x + 4 = x
⇒ ²⁵¹/₂₅₂ x + 4 = x,
⇒ 251 x + 1008 = 252x
⇒ 252 x - 251 x = 1008
⇒ x = 1008
जाँचें-
1008 × ⅔ = 672 जंगल की खोह में चले गए
1008 × ⁴/₂₁ = 192 नदी में पानी पीने गए
1008 × ⁵/₃₆ = 140 कमलिनीवन में चले गए
शेष = 4
─────
1008 कुल हाथियों की संख्या
─────
अन्यदुदाहरणम्
षड्भागः पाटलासु भ्रमति गणयुतः स्वत्रिभागः कदम्बे।
पादश्चूतद्रुमे च प्रदलितकुसुमे चम्पके पञ्चमांशः।
त्रिशतिका 47
प्रोत्फुल्लाम्भोजखण्डे रविकरदलिते त्रिंशदंशोऽभिरेमे।
तत्रैको मत्तभृंगो भ्रमति नभसि चेत् का भवेद् भृंगसंख्या¹॥ २८॥
न्यासः १/६ १/३ १/४ १/५ १/३० दृश्यम् 1 लब्धं भृंगाः 60
सुक्षेमा अनुवाद-भ्रमरसमूह का 1/6 भाग पाटल पर, 1/3 भाग कदम्ब पर, 1/4
भाग आम के वृक्ष पर, 1/5 भाग चम्पा पुष्पों पर, तथा 1/30 भाग सूर्य की किरणों से
खिले हुए कमल-पुष्पों पर रमण करने लगा। उनमें से केवल 1 मतवाला भौंरा
आकाश में उड़ रहा था। कुल भौंरों की संख्या बताओ।
अनुशीलन-यहाँ पूर्वोक्त विधि के अनुसार-
भौरों के सभी उपविभागों का योग⇒
1/6 + 1/3 + 1/4 + 1/5 + 1/30 = (10+20+15+12+2) / 60 = 59 / 60
[
48 त्रिशतिका
पादः पादेन संयुक्तस्त्र्यंशस्त्र्यंशेन संयुतः।
पञ्चांशः पञ्चमांशेन दृष्टश्चैकादशः पृथक्।। २९।।
न्यासः ¼ ⅓ ⅕ दृश्यम् 11, लब्धं हस्ताः 3600
¼ ⅓ ⅕
इति स्तम्भोद्देशकाः।
सुक्षेमा अनुवाद-किसी विशाल पहाड़ का पाद या एक चौथाई अपने
चौथाई के चौथाई से युक्त, इसी प्रकार एक तिहाई अपने तिहाई के एक तिहाई से
तथा ⅕ अंश अपने ⅕ के पाँचवें अंश से युक्त होने पर 11 हाथ अलग से दिखता
है, उसकी कुल कितनी लम्बाई है।
अनुशीलन-यहाँ प्रश्नानुसार-
¼ + (¼ × ¼) + ⅓ + (⅓ × ⅓) + ⅕ + (⅕ × ⅕)
⇒ ¼ + 1/16 + ⅓ + 1/9 + ⅕ + 1/25 = 900+225+1200+400+720+144 / 3600
= 3589 / 3600
कल्पित 1 राशि से घटाएँ ⇒ 1 - 3589/3600 = 11/3600
शेष से दृश्य का भाग (3600 × 11) / 11 = 3600 हाथ
बीजगणितीय समीकरण के अनुसार-
¼ + 1/16 + ⅓ + 1/9 + ⅕ + 1/25 = 3589/3600
⇒ 3589/3600 x + 11 = x
⇒ 3589 x + 39600 = 3600x
⇒ 3600 x - 3589 x = 39600
⇒ 11 x = 39600
⇒ x = 39600 / 11
= 3600 हाथ
त्रिशतिका 49
त्रैराशिके सूत्रम्
आद्यन्तयोस्त्रिराशावभिन्नजाती प्रमाणमिच्छा च।
फलमन्यजाति मध्ये तदन्त्यगुणमादिमेन भजेत्¹॥ २९॥
सुक्षेमा अनुवाद-त्रैराशिक में प्रमाण तथा इच्छा समान जाति वाले होते हैं।
इन्हें क्रमशः आदि तथा अन्त में रखना चाहिये। फल या प्रमाण-फल अन्य जाति
वाला है, इसे मध्य में रखें। इस प्रमाण-फल को अन्त्य या इच्छा से गुणित करके
आदिम अर्थात् प्रमाण से भाग देना चाहिये।
अनुशीलन-प्रस्तुत श्लोक में अनुपात तथा समानुपात के नियमों को
समझाया गया है। अनुपात में दो राशियों की आपस में तुलना की जाती है। प्रस्तुत
नियम में विभाजन द्वारा इन्हें तुलनीय बनाया गया है। अर्थात् किसी राशि का अन्य
राशि के साथ दूरी या सह सम्बन्ध को, वह कितनी बार अन्य राशि से विभाजनीय
है, इस रूप में प्रकट किया गया है।
इस उपाय से किन्हीं दो राशियों का जो अनुपात है, ठीक वही दूरी या
अनुपात अन्य दो राशियों का भी हो तो प्रथम दो राशियों के सापेक्ष अन्य दो
राशियाँ समानुपात में
50 त्रिशतिका
तीन राशियों से सम्बन्धित होने के कारण इस नियम को त्रैराशिक नाम
दिया गया है। आर्यभट ने स्पष्ट रूप से इसका उल्लेख किया है। गणितशास्त्र में
शताब्दियों तक इस नियम का बहुत सम्मान किया गया है। भास्कराचार्य की यह
उक्ति प्रसिद्ध है कि-
त्रैराशिकेनैव यदेतदुक्तं व्याप्तं स्वभेदैर्हरिणेव विश्वम्।
—लीलावती, छाया व्यवहार श्लोक ४
अर्थात् जिस प्रकार विष्णु अनेक भेदों से सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है, उसी
प्रकार सम्पूर्ण गणित त्रैराशिक के भेदों से परिपूर्ण है।
इस नियम को प्रस्तुत उदाहरण द्वारा आसानी से समझा जा सकता है-
चन्दनपलं सकर्ष सार्धैर्यदि लभ्यते पणैर्दशभिः।
तत् कियता लभ्यन्ते पलानि नव कर्ष युक्तानि¹।। ३०।।
न्यासः 1 10 09
1/4 1/2 1/4 लब्धं पुराणाः 4, पणाः 13
काकिण्यौ 2 । वराटकाः 16
सुक्षेमा अनुवाद-1 कर्ष या 1/4 पल सहित 1 पल अर्थात् 5/4 पल चन्दन 1/2
सहित 10 पण में अर्थात् 21/2 पण में प्राप्त होता है। तो 1 कर्ष या 1/4 पल सहित 9
पल अर्थात् 37/4 पल चन्दन कितने मूल्य में प्राप्त होगा।
अनुशीलन-यहाँ सुविधा के लिये पहले भिन्न संख्याओं को पूर्णांक में बदल
लेते हैं-
पूर्वोक्त विवरण के अनुसार 4 कर्ष का 1 पल तथा 4 काकिणी का 1 पण।
अतः-
5/4 × 4 = 5 कर्ष,
21/2 × 4 = 42 काकिणी
37/4 × 4 = 37 कर्ष
अब सूत्र के निर्देश के अनुसार प्रमाण (a) 5 कर्ष को पहले तथा प्रमाणफल
(b) 42 काकिणी को बाद में रखते हुए प्रश्न का यह आकार बनाते हैं-
5 कर्ष चन्दन (a) का मूल्य 42 काकिणी (b) है
37 कर्ष चन्दन (c) का मूल्य कितना (d) होगा।
१. तुल. पाटी-गणित उदा. 45
त्रिशतिका 51
सूत्र के अनुसार इस प्रश्न का हल—
(42 × 37) / 5 = 1554 / 5 अथवा 310 ⁴/₅ काकिणी
³¹⁰/₄ पण + ⁴/₅ काकिणी = 77 पण + 2 ⁴/₅ काकिणी
⇒ ⁷⁷/₁₆ पुराण + 2 ⁴/₅ काकिणी = 4 पुराण + 13 पण + 2 ⁴/₅ काकिणी
⇒ 4 पुराण + 13 पण + 2 काकिणी + (4 × 20) / 5 वराटक
= 4 पुराण + 13 पण + 2 काकिणी + 16 वराटक
इस कुल मूल्य से 37 कर्ष चन्दन प्राप्त होगा।
प्रस्तुत उदाहरण में प्रथम राशिद्वय प्रमाण तथा प्रमाणफल क्रमशः 5 कर्ष
तथा 42 में अनुपात स्थापित किया गया है। इन संख्याओं की विभाजन विधि से
तुलना के द्वारा कहा जा सकता है कि 1 कर्ष की तुलना में काकिणी ⁴²/₅ गुना
अधिक है। अतः अनुपात—
1 : ⁴²/₅
इस समानुपात को दोनों ओर एक ही प्रकार की संख्याओं से गुणित करके
अन्य अनेक समानुपात प्राप्त किये जा सकते हैं। जैसे—
1 : ⁴²/₅ :: 2 : ⁸⁴/₅ :: 3 : 126/5 :: 4 : 168/5 :: 5 : 210/5 = 5 : 42
यहाँ सभी संगत मानों में 1 : ⁴²/₅ का अनुपात बदलता नहीं है। अतः ये सभी
समानुपाती मान हैं। दोनों ओर एक ही प्रकार की संख्या से गुणित करके अनन्त
ऐसे मान प्राप्त किये जा सकते हैं।
प्रस्तुत प्रश्न तथा इसकी विधि में 1 : ⁴²/₅ का 37 के साथ संगत समानुपात
खोजा गया है। ऐकिक नियम में भी ठीक यही संक्रिया की जाती है। अतः वहाँ
भी इसी अनुपात को जानने का प्रयास किया गया है।
इस विवरण से समानुपात का यह रूप प्राप्त होता है—
प्रमाण (a) / प्रमाणफल (b) = इच्छा (c) / इच्छाफल (d)
इससे स्वभावतः यह समीकरण विकसित होता है—
प्रमाण (a) × इच्छाफल (d) = प्रमाणफल (b) × इच्छा (c)
इस समीकरण से समानुपात के लिये यह नियम स्थिर होता है कि
52 त्रिशतिका
समानुपात में संगत पदों का वज्रगुणन फल या व्युत्क्रम गुणनफल बराबर होता है।
इस समीकरण से पुनः वही सूत्र प्राप्त करने में सक्षम हो जाते हैं, जिसका
उल्लेख त्रिशतिकाकार ने किया है-
इच्छाफल (d) = [प्रमाणफल (b) × इच्छा (c)] / प्रमाण (a)
उपर्लिखित विवेचना का निष्कर्ष यह है कि-
I. त्रैराशिक नियम के सभी प्रश्न संगत समानुपात के प्रश्न हैं। इसमें संगत
समानुपात की एक अज्ञात राशि का पता लगाया जाता है।
II. इसमें दो राशियों को विभाजन की विधि से या 1 के सापेक्ष तुलना द्वारा
अनुपात स्थापित किया जाता है।
III. पुनः संगत समानुपात की एक राशि के ज्ञान होने पर दूसरी अज्ञात
समानुपातिक राशि को पहचाना जाता है।
IV. इसके लिये सीधे उपर्लिखित अंकगणितीय सूत्र का या ऐकिक नियम
का या बीजगणितीय समीकरण का उपयोग किया जाता है। प्रत्येक विधि से वही
सूत्र तथा ठीक वही परिणाम प्राप्त होता है।
अन्यदुदाहरणम्
मरिचपलं सत्र्यंशं पणेन यदि लभ्यते सपादेन।
तत् त्र्यंशोनैर्दशभिः पणैः कियत् कथ्यतामाशु।। ३१।।
न्यासः 1 1 10
1/4 1/3 1/3 लब्धं पलानि 10 । कर्षम् 1
माषा 3 । गुञ्जाः 4 । भागाश्च 4/9
सुक्षेमा अनुवाद-यदि 1 1/4 या 5/4 पण से 1 1/3 = 4/3 पल मरिच मिलती है तो
10 - 1/3 = 29/3 पण में कितनी प्राप्त होगी।
यहाँ 5/4 प्रमाण (a), 4/3 प्रमाणफल (b) तथा 29/3 इच्छा (c) है। अतः पूर्वोक्त
सूत्रानुसार-
इच्छा-फल (d) = [(4/3) × (29/3)] / (5/4) = [116 × (4/5)] / 9 = 464/45 पल मरिच
464/45 = 10 14/45 पल, 14/45 × 4 = 56/45 = 1 11/45 कर्ष
भिन्न-व्यवहार एवं त्रैराशिक, पञ्चराशिक नियम (श्लोक ३१-५५)
त्रिशतिका 53
11/45 × 16 = 176/45 = 3 41/45 माष, 41/45 × 5 = 205/45 = 4 25/45 गुंजा
25/45 = 5/9 गुंजा के भाग।
ऐकिक नियम द्वारा प्रश्न का हल-
5/4 पण में 4/3 पल
∴ 1 पण में 4/3 × 4/5 = 16/15 पल
∴ 29/3 पण में 29/3 × 16/15 = 464/45 पल
बीजगणितीय समीकरण द्वारा प्रश्न का हल-
a b c d
हम देखते हैं कि- 5/4 : 4/3 :: 29/3 : x
अतः-
a × d = b × c के अनुसार-
5/4 x = 4/3 × 29/3
⇒ x = 4/3 × 29/3 × 4/5 = 464/45
यह पूर्वोक्त सूत्र के सर्वथा समकक्ष है।
खारीषष्टिः सार्धा रूपशतेन त्रिभागयुक्तेन।
यदि कथय ततो धान्यं रूपस्यैकस्य किं भवति॑॥ ३२॥
न्यासः 60 100 1
1/2 1/3 1 लब्धं खारी 0। द्रोणाः 9
आढकौ 2। प्रस्थौ 2। कुडवः 1। कुडवभागश्च 139/301
सुक्षेमा अनुवाद-100 1/3 या 301/3 रूप से 60 1/2 या 121/2 खारी धान्य प्राप्त होता
है, तो 1 रूप से कितना धान्य प्राप्त होगा।
अनुशीलन-सूत्रानुसार-
121/2 × 3/301 = 363/602 खारी धान्य। पूर्णांक खारी
363/602 × 16 = 2904/301 = 9 195/301 द्रोण, 195/301 × 4 = 780/301 = 2 178/301 आढक
178/301 × 4 = 712/301 = 2 110/301 प्रस्थ, 110/301 × 4 = 440/301 = 1 139/301 कुडव
१. तुल. पाटी-गणित उदा. 28
54 त्रिशातिका
धान्यद्रोणः सार्धः कुडवत्रितयं च लभ्यतेऽष्टाभिः।
तद् द्रोणयुक्तखार्या किं मूल्यं कथ्यतामाशु१।। ३३।।
आद्यन्तयोः कुडवैन्यासः ९९/१ 8/१ 1088/१
लब्धानि रूपाणि 87 भागाश्च ९१/९९
सुक्षेमा अनुवाद-३/२ द्रोण तथा 3 कुडव अर्थात् 99 कुडव धान्य का मूल्य
8 रूप है तो 1 द्रोण से युक्त 1 खारी अर्थात् 1088 कुडव धान्य का मूल्य क्या
होगा।
अनुशीलन-यहाँ सूत्रानुसार-
8 × 1088/99 = 8704/99 = 87 ९१/९९ रूप मूल्य
अन्यदुदाहरणम्
यत्र सुवर्णो लभते रूपाणां सप्ततिं त्रिभागयुताम्।
तत्रैको माषः किं दशभागोनः सखे कथय।। ३४।।
न्यासः 16/1 70 1
1/3 1/10 लब्धानि रूपाणि 3, भागाश्च 153/160
सुक्षेमा अनुवाद-1 सुवर्ण या 16 माष से 70 1/3 या 211/3 रूप प्राप्त होते हैं।
तो 1- 1/10 अर्थात् 9/10 माष से कितने रूप प्राप्त होंगे।
अनुशीलन-यहाँ सूत्रानुसार-
(211/3 × 9/10) / 16 = 633/10 × 1/16 = 633/160 = 3 153/160 रूप
अन्यदुदाहरणम्
पंगुः प्रयाति कश्चिद् दिवसत्रितयेन योजनाष्टांशम्।
योजनशतं स यास्यति निगद्यतां केन कालेन२।। ३५।।
न्यासः 1/8 3/1 100 लब्धं वर्षाणि 6 मास 8
सुक्षेमा अनुवाद-कोई लंगड़ा 1/8 योजन 3 दिन में पार करता है तो वह 100
योजन कितने दिन में पहुँचेगा।
१. तुल. पाटी-गणित उदा. 27-28, ग.सा.सं. 5.2, म.सि. 15.24-25, ग.ति.पृ. 68, लीलावती
त्रैराशिक उदा. 3
२. उदा. 30, ग.सा.सं. 5.3.4, ग.ति.पृ. 72
6। 6। 1000। लब्धं Wait,106। 6। 1000।-> Yes,106। 6। 1000। लब्धं`
रूपाणि भाव्यके 56। रूपभागाश्च 32/53सुक्षेमा अनुवाद-यदि 100 में 6 मिलाने पर अर्थात् 106 मूल्य से 6 वस्तुएँप्राप्त होती हैं तो 1000 मूल्य से कितनी प्राप्त होंगी।अनुशीलन-सूत्रानुसार -6 × 1000 = 6000/106 = 56 + 64/106 या 32/53 भाग
Wait, under6 × 1000is106.अन्यदुदाहरणम्अष्टसेतिकहारेण मापिता हारविंशतिः।सा षट् सेतिकहारेण का संख्या भवितोच्यताम्।। ३८।।- Footnote:
१. त्रिशतिका श्लोक 7 के अनुसार 2000 दण्ड का एक कोस, 4 हस्त का 1 दण्ड, 24 अंगुल
`का 1 हस्त सिद्ध होता है।
56 त्रिशतिका
अत्र त्रैराशिकद्वयम्
यद्येकस्मिन् हारे अष्टौ सेतिकाः स्यु ततो हारविंशत्या कति सेतिकाः स्युरिति।
न्यासः।। 1। 8। 20।। लब्धं सेतिकाः 160
पुनस्त्रैराशिकम्
यदि सेतिकाषट्केनैको हारस्तत् सेतिकाशतेन षष्ट्यधिकेन कति हाराः स्युरिति
न्यासः।। 6। 1। 160। लब्धं हाराः 26 हारभागाश्च 2/3
सुक्षेमा अनुवाद-यदि एक हार में 8 सेतिका या गुरिया हों तो 20 हार में
कितनी गुरियाँ मापी जावेंगी।
श्लेष से अन्य प्रश्न- यदि 6 गुरिया से 1 हार बनता है तो 20×8 = 160
गुरिया से कितने हार बनेंगे।
अनुशीलन-सूत्रानुसार-
प्रथम प्रश्न-
8×20 = 160 गुरियाँ
द्वितीय प्रश्न-160/6 = 26 + 4/6 अर्थात् 26 पूर्ण हार, 2/3 भाग
अन्यदुदाहरणम्
षोडशवर्णककाञ्चनसुवर्णशतमष्टषष्टि-संयुक्तम्।
परिवर्त्य लभ्यते कियदेकादशवर्णकं कनकम्१॥ ३९॥
अत्रापि त्रैराशिकद्वयम्
यद्येकस्मिन् सुवर्णे षोडशवर्णकाः कल्याणसुवर्णस्य षोडशमाषका इत्यर्थः।
तत्सुवर्णशतेऽष्टषष्ट्यधिके कति वर्णकाः स्युरिति। न्यासः।। 1। 16। 168। लब्धं
वर्णकाः 2688
पुनस्त्रैराशिकम्
यद्येकादशभिर्वर्णकैरैकः सुवर्णस्ततः षड्विंशत्याष्टाशीत्यधिकया कियन्तः सुवर्णाः
स्युरिति न्यासः 11। 1। 2688। लब्धं सुवर्णाः 244। माषाः 5। गुञ्जाः 4।
गुञ्जाभागाश्च 1/11।।
१. तुल. पाटी-गणित उदा. 36, ग.सा.सं. 5.18, ग.ति.पृ. 74
त्रिशतिका 57
सुक्षेमा अनुवाद-यदि 1 'सुवर्ण' नामक सिक्के में 16 वर्णक या माषक
होते हैं। तो 68 सहित 100 अर्थात् 168 'सुवर्ण' सिक्के में कितने माषक होंगे।
श्लेष से अन्य प्रश्न- यदि 11 वर्णक वाले सोने का मूल्य एक 'सुवर्ण'
सिक्का है तो 168 × 16 = 2688 वर्णकों का मूल्य कितने सुवर्ण होगा।
त्रिशतिका सूत्र 5 पृ. 3 से प्रकट है कि 'कल्याणसुवर्ण' नामक सिक्का 16
माष का होता है। यह 16 वर्ण अर्थात् 24 कैरेट का सबसे विशुद्ध सोना माना जाता
है।
अनुशीलन-सूत्रानुसार-
प्रथम प्रश्न- 168 × 16 = 2688 माषक व्यस्तत्रैराशिके सूत्रम्
द्वितीय प्रश्न 2688/11 = 244+ 4/11 सुवर्ण
4/11 × 16 = 64/11 = 5 + 9/11 माष
9/11 × 5 = 45/11 = 4 + 1/11 गुंजा, 1/11 गुंजा भाग
आदिगुणितेऽन्त्यभक्ते मध्ये मानान्तरे भवति गणितम् १।
सुक्षेमा अनुवाद-मध्य या प्रमाण फल (b) को आदि प्रमाण (a) से गुणित
करके अन्त्य या इच्छा (c) से भाग करने पर विपरीत मान या व्युत्क्रम अनुपात
वाला गणित सिद्ध होता है।
अनुशीलन-प्रस्तुत श्लोक में विपरीत अनुपात या व्युत्क्रमानुपात के नियम
बताए गए हैं। किन्हीं दो पदों का जो अनुपात है, यदि उनके संगत पदों का ठीक
उनसे विपरीत अनुपात हो तो वे व्युत्क्रमानुपाती पद कहे जावेंगे।
यदि दो पद तथा उनके संगत पदों में से एक की व्युत्क्रमानुपाती राशि बता
दी गई हो तो दूसरी व्युत्क्रमानुपाती राशि प्रस्तुत नियम के द्वारा खोजी जा सकती
है। इसके प्रकार के प्रश्नों में 3 राशियाँ ज्ञात होती है। साथ ही तीसरी संगत राशि
अन्य के सापेक्ष व्युत्क्रम होने से इसे व्यस्तत्रैराशिक नाम दिया गया है।
यहाँ भी प्रमाण को a प्रमाणफल को b तथा इच्छा को c से प्रकट कर सकते
हैं। श्लोक के अनुसार ऐसे प्रश्नों के हल के लिये प्रमाण (a) प्रमाणफल (b) से
१. तुल. ब्रा.स्फु.सि. 12.11 ग.सि. 15.25, लीलावती
58 त्रिशतिका
गुणा करके इच्छा (c) से भाग देकर अज्ञात राशि (d) का प्राप्त कर सकते हैं। इस
नियम के अनुसार हम यह सूत्र प्राप्त करते हैं-
प्रमाण (a) ×प्रमाणफल (b)
इच्छाफल (d) = ─────────────────────
इच्छा (c)
इस नियम को प्रस्तुत उदाहरण में समन्वित करते हैं-
अष्टसेतिकहारेण मापिता हारविंशतिः।
सा षट् सेतिकहारेण का संख्या भवितोच्यताम्।। ४०।।
न्यासः 8/1 20/1 6/1 लब्धं हाराः 26 २/३
सुक्षेमा अनुवाद-कुछ सेतिका या मोतियों में से 8-8 मोतियों वाले 20 हार
बनते हैं, तो उतने ही मोतियों में से 6-6 मोतियों वाले कितने हार बनेंगे।
अनुशीलन-यहाँ पूर्वोक्त श्लोक का अर्थ परिवर्तित करके व्युत्क्रमानुपात के
रूप में प्रस्तुत किया गया है।
यहाँ 8 सेतिका वाला हार प्रमाण (a) है। 20 हार प्रमाणफल (b) तथा 6
सेतिका वाला हार इच्छा है। अतः अज्ञात राशि (d) के लिये सूत्रानुसार-
8×20 = 160 = 26 २/३ हार
────── ─────
6 6
यहाँ प्रस्तुत प्रश्नों में 8 तथा 20 इस मान का व्युत्क्रमानुपाती संगत मान प्राप्त
किया गया है। यहाँ तुलना के लिये इन मानों के व्युत्क्रमानुपाती तथा समानुपाती
संगत मान इस तालिका में प्रस्तुत करते हैं-
व्युत्क्रमानुपाती | अनुक्रमानुपाती
मोती x 8ᵃ 6ᶜ | x 8 6
हार y 20ᵇ 26 २/३ᵈ | y 26 २/३ 20
तालिका से स्पष्ट है कि अनुक्रमानुपाती में x के पदों का जो अनुपात है
ठीक वही अनुपात इसके संगत y पदों का भी है। क्योंकि-
8× ३/४ = 6 तथा ८०/३ × ३/४ = 20
────────────────────────────────────────────────────────
१. मुक्ताफलानामष्टभिरिष्टभिः सेतिकैरैकैको हारः कृतः, विंशतिश्च हारा जाताः।
त एव मुक्ताहारा मुक्तावलीकृताः षट्सेतिकहारकल्पनया कियन्तो भवन्ति।। - पाटी-गणित
उदा. 34 पर व्याख्या
त्रिशतिका 59
पर व्युत्क्रमानुपाती तालिका में x के पदों के अनुपात के ठीक विपरीत y
के संगत पदों का है। यह तालिका से स्पष्ट है तथा इस प्रकार भी–
8× ¾ = 6 तथा 20× 4/3 = 80/3
इससे स्पष्ट है कि व्युत्क्रमानुपात में x में प्रथम पद के सापेक्ष दूसरे पद का
अनुपात जितना घटता (या बढ़ता) है, उसके संगत y के प्रथम पद के सापेक्ष दूसरे
पद का अनुपात ठीक उतना ही बढ़ता (या घटता) है। इस स्थिति में व्युत्क्रमानुपात
का विवरण इस प्रकार प्राप्त होता है–
प्रमाण (a) / इच्छाफल (d) = इच्छा (c) / प्रमाणफल (b)
अतः स्वभावतः समीकरण यह प्राप्त होता है–
a × b = c × d
इससे यह समीकरण प्राप्त होता है–
इच्छाफल (d) = [प्रमाण (a) × प्रमाणफल (b)] / इच्छा (c)
इस प्रकार हमने बीजगणितीय समीकरण की विधि से उक्त सूत्र पुनः प्राप्त
कर लिया है। इससे यह भी सिद्ध है कि त्रिशतिका का यह सूत्र वास्तव में
व्युत्क्रमानुपात के एक अज्ञात पद को खोजने का उपाय है।
अन्यदुदाहरणम्
पञ्चरक्तिकमाषेण सुवर्णानां शतत्रयम्।
षष्टिरक्तिकमाषेण¹ का संख्या भवितोच्यताम्॥
5। 300। 60। लब्धं 25।।
सुक्षेमा अनुवाद-यदि 5 रक्तिक (रत्ती) वाले 'माष' वाले तोल से 300
सुवर्ण तोले जाते हैं, तो 60 रत्ती वाले माष वाले तोल से कितने सुवर्ण तुलेंगे।
अनुशीलन-सूत्रानुसार–
(5 × 300) / 60 = 1500 / 60 = 25 सुवर्ण
१. तत् षड्रक्तिक माषेण...पाटी-गणित श्लोक 35
स्पष्टतः 6 रत्ती वाले तोल से 250 सुवर्ण प्राप्त होंगे।
60 त्रिशतिका
समीकरण विधि के अनुसार-
a × b = c × d अतः 60x = 5 × 300
x = (5 × 300) / 60 = 25
स्पष्टतः समीकरण तथा सूत्र सर्वथा समान हैं।
अन्यदुदाहरणम्
सार्धद्वादशवर्णं सुवर्णशतमर्धकोपेतम्।
दत्त्वाऽऽप्यते कियत् तत् सचरणदशवार्णिकं कनकम्¹॥ ४२॥
न्यासः 12 100 10
½ ½ ¼ लब्धं सुवर्णाः 122
पणाः 8। रक्तिकाः 4। रक्तिकाभागश्च 36/41।।
सुगमानुवाद-एक निश्चित मूल्य देकर 12½ या 25/2 वर्ण (carat) वाले
आधे सहित 100 अर्थात् 201/2 'सुवर्ण' प्राप्त होते हैं तो उतना ही मूल्य देकर 10¼
वाले कितने 'सुवर्ण' खरीदे जा सकेंगे।
अनुशीलन-स्पष्टतः सोना जितना हीन
त्रिशतिका 61
सुक्षेमा अनुवाद- विद्वन्! यदि सूत्र के एक निश्चित परिमाण से क्रमशः 3
तथा 9 चौड़ाई तथा लम्बाई वाले 200 कम्बल निर्मित होते हैं। तो उतने ही परिमाण
से 2 तथा 6 चौड़ाई, लम्बाई वाले कितने कम्बल निर्मित होंगे।
अनुशीलन- स्पष्टतः जितने छोटे कम्बल होंगे उतने ही अधिक संख्या में
कम्बल बनेंगे। यहाँ 3 × 9 = 27 वर्गहस्त तथा 2 × 6 = 12 वर्गहस्त क्षेत्रफल मानने
पर-
27 × 200 5400
──────── = ──────── = 450 कम्बल प्राप्त होंगे।
12 12
अथ पञ्चसप्तनवराशिकेषु करणसूत्रमार्या
नीतफले ऽन्यं पक्षं विभजेद् बहुराशिपक्षम Fred?ितरेण।
छेदानां व्यत्यासं कृत्वाभ्यासं च राशीनाम्॥ ३१॥
प्रमाण फल (R) का व्यत्यास या स्थान-परिवर्तन करके उन राशियों का
अभ्यास या गुणित करके बहुराशि पक्ष या अधिक राशि के गुणनफल को इतर या
अल्पराशि पक्ष अर्थात् अल्प राशि के गुणनफल से भाग देने पर पञ्चराशिक की
अज्ञात राशि प्राप्त होती है।
उदाहरणम्
मासेन पञ्चकशते षष्टेर्वर्षेण किं फलं भवति।
फलतश्च कथय कालं ताभ्यामज्ञातमूलं च^२॥ ४४॥
न्यासः 1 12
100 60 लब्धं फलम् 36।
5
कालज्ञानार्थं न्यासः 1 0
100 60 लब्धं कालो मासाः 12
5 36
──────────────────────────────────────────────
१. तुल. ब्रा.स्फु.सि. 12.11, पाटी-गणित सू. 45, ग.सा.सं. 5.32, म.सि. 15.26-27, ग.ति.पृ.
74, सि.शे. 13.15, लीलावती पाञ्चराश्यादिकम् श्लोक 9
२. पाटी-गणित उदा. 39, ग.सा.सं. 5.33, ग.ति.पृ. 75 लीलावती
62 त्रिशतिका
मूलज्ञानार्थ न्यासः 1 12
100 0 लब्धं मूलं 60।
5 36
शतफलेऽज्ञाते न्यासः 1 12
100 60 लब्धं शतफलम् 5
0 36
प्रमाणकालेऽज्ञाते न्यासः 0 12
100 60 लब्धं प्रमाणकालः 1
5 36
सुक्षेमा अनुवाद-100/- रु. का 1 महीने का ब्याज 5/- रु. हो तो 60/-
रु. का 1 वर्ष या 12 महीने का ब्याज फल कितना होगा। इस फल के आधार पर
काल तथा इन दोनों के आधार पर मूलधन को ज्ञात करो। (इनके आधार पर
शतफल तथा प्रमाण भी ज्ञात करो।)
अनुशीलन-इस प्रकार के प्रश्नों में 5 राशियाँ प्रस्तुत की जाती हैं। इनके
द्वारा एक अन्य छठी राशि को ज्ञात करना होता है। अतः इन्हें पञ्चराशिक नाम
दिया गया है। इन प्रश्नों में दो-दो राशियाँ आपस में गुणित होकर अन्य से संगत
मान बनाती हैं। इस दशा में समानुपाती प्रश्न होता है। अथवा एक-एक राशि अन्य
से समानुपात तथा दूसरी एक-एक राशि अन्य से व्युत्क्रमानुपात बनाती हैं। इस
दशा में समानुपात के सूत्र से प्रथम राशि समूह की चतुर्थ राशि ज्ञात करने के
पश्चात् व्युत्क्रमानुपात के सूत्र से द्वितीय राशि समूह की अज्ञात राशि का पता
लगाया जाता है। इस दशा में समानुपात तथा व्युत्क्रमानुपात के पूर्वोक्त सूत्र तथा
समीकरण के पूर्वोक्त नियम ही मूलतः क्रियाशील होते हैं।
इस प्रकार के प्रश्न मुख्यतः ब्याज के प्रश्नों से सम्बन्धित हैं। त्रिशतिकाकार
ने ऐसे प्रश्नों को आसान रीति से सिद्ध करने का प्रयास किया है। इनके अनुसार
इन नामों वाली संख्याओं को क्रम से रख लेते हैं-
प्रमाण राशि पक्ष इच्छा राशि पक्ष
1 प्रमाण काल 12 इच्छा काल (T)
100 प्रमाण धन 60 इच्छा धन (P)
5 प्रमाण फल (R) x अज्ञात फल (ब्याज)
त्रिशतिका 63
अब निम्न सूत्र के अनुसार इनका स्थान परिवर्तन करते हुए प्रमाण-फल
(R) को भाज्य बनाते हुए इस प्रकार लिखते हैं-
प्रमाणफल × इच्छा काल × इच्छा धन
ब्याज = ─────────────────────────────────
प्रमाण काल × प्रमाण धन
अथवा प्रमाण काल 1 तथा प्रमाणधन 100 होने पर-
P . T . R
ब्याज I = ─────────
100
इसके अनुसार इन राशियों को इस प्रकार लिखेंगे-
5 × 12 × 60 3600
x = ─────────── = ──── = 36/= रु. ब्याज
1 × 100 100
यह मूलतः समानुपात का प्रश्न है। यहाँ 100 × 1 का संगत पद 60×12
है। इसमें से 100 का संगत मान 5 बता दिया गया है। अन्य पद का समानुपाती
मान ज्ञात करना है। अतः हम निम्न तालिका प्राप्त करते हैं-
100ᵃ : 60 × 12ᶜ : : 5ᵇ : x ᵈ
अब पूर्वोक्त a × d = b × c के नियमानुसार-
100 x = 5 × 60 ×12
अतः पूर्वोक्त समानुपात के सूत्र या समीकरण के नियमानुसार-
5 × 60 ×12
x = ──────────
100
इस सामान्य नियम से हमने ठीक वही संक्रिया प्राप्त कर ली है, जिसका
इस श्लोक में वर्णन किया गया है। इससे सिद्ध है कि ब्याज के ये प्रश्न मूलतः
समानुपात के प्रश्न हैं।
ब्याज के ज्ञात होने के आधार पर इच्छा काल (T) ज्ञात करना-
यदि इसी प्रश्न का काल अज्ञात हो तो उसे इस प्रकार लिखेंगे-
100/= रु. का 5/= रु. ब्याज 1 महीने में बनता है तो 60/= का 36/= ब्याज
कितने महीने में बनेगा।
यहाँ श्लोक की रीति के अनुसार उपरिलिखित तालिका में से स्थान-परिवर्तन
करके बहुराशि पक्ष को अल्प राशि पक्ष के गुणनफल से भाग देने से अज्ञात राशि
काल ज्ञात होता है। जैसे-
64 त्रिशतिका
तालिका–
प्रमाण राशि पक्ष इच्छा राशि पक्ष
1 0
100 60
5 36
स्थान परिवर्तन करके भाग देने पर–
बहुराशिपक्ष ⇒ 1 × 100 × 36
अल्पराशिपक्ष ⇒ 60 × 5 = 3600 / 300 = 12 मास
वास्तव में बीजगणितीय सामान्य समीकरण से इसका सूत्र प्राप्त हो सकता
है। प्रमाण–काल 1 तथा प्रमाण–धन 100 होने पर–
प्र.फ. × इ.का. × इ.ध. अथवा–
ब्याज = ───────────────────── I. = P. × T. × R.
100 ────────────
ब्याज × 100 100
∴ इच्छाकाल = ───────────── T. = I. × 100
प्र.फ. × इ.ध. ──────────
P. × R.
स्पष्टतः ऊपर श्लोकानुसार यही संक्रिया की गई है। यह प्रश्न व्युत्क्रमानुपात
तथा समानुपात दोनों का होने से इसमें मूलतः उपरिलिखित दोनों सूत्र क्रियाशील
हैं। यहाँ मूलधन तथा काल का व्युत्क्रमानुपात है। क्योंकि एक निश्चित ब्याज की
प्राप्ति के लिये ज्यों–ज्यों मूलधन बढ़ता है (या घटता है) त्यों–त्यों काल घटता है।
(या बढ़ता है) साथ ही ब्याज तथा काल का समानुपात है। क्योंकि एक निश्चित
मूलधन का काल बढ़ने पर उसी अनुपात में ब्याज भी बढ़ता है। अतः पहले
व्युत्क्रमानुपात का सूत्र लगाकर बाद में समानुपात का सूत्र लगाकर अथवा इसके
विपरीत क्रम से भी हल किया जा सकता है। जैसे–
काल का मूलधन के अथवा ऐकिक नियम
साथ व्युत्क्रमानुपात–
मूलधन 100 60 100/= का 5/= ब्याज 1 महीने में
काल (महीना में) 1 x 1 का 5/= ब्याज 100×1 महीना
इस प्रकार 60 x = 100×1
∴ x = 100/60 महीना ∴ 60/= का 5/= ब्याज 100/60 महीने में