त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 79, कुल 208 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिशतिका 51
सूत्र के अनुसार इस प्रश्न का हल—
(42 × 37) / 5 = 1554 / 5 अथवा 310 ⁴/₅ काकिणी
³¹⁰/₄ पण + ⁴/₅ काकिणी = 77 पण + 2 ⁴/₅ काकिणी
⇒ ⁷⁷/₁₆ पुराण + 2 ⁴/₅ काकिणी = 4 पुराण + 13 पण + 2 ⁴/₅ काकिणी
⇒ 4 पुराण + 13 पण + 2 काकिणी + (4 × 20) / 5 वराटक
= 4 पुराण + 13 पण + 2 काकिणी + 16 वराटक
इस कुल मूल्य से 37 कर्ष चन्दन प्राप्त होगा।
प्रस्तुत उदाहरण में प्रथम राशिद्वय प्रमाण तथा प्रमाणफल क्रमशः 5 कर्ष
तथा 42 में अनुपात स्थापित किया गया है। इन संख्याओं की विभाजन विधि से
तुलना के द्वारा कहा जा सकता है कि 1 कर्ष की तुलना में काकिणी ⁴²/₅ गुना
अधिक है। अतः अनुपात—
1 : ⁴²/₅
इस समानुपात को दोनों ओर एक ही प्रकार की संख्याओं से गुणित करके
अन्य अनेक समानुपात प्राप्त किये जा सकते हैं। जैसे—
1 : ⁴²/₅ :: 2 : ⁸⁴/₅ :: 3 : 126/5 :: 4 : 168/5 :: 5 : 210/5 = 5 : 42
यहाँ सभी संगत मानों में 1 : ⁴²/₅ का अनुपात बदलता नहीं है। अतः ये सभी
समानुपाती मान हैं। दोनों ओर एक ही प्रकार की संख्या से गुणित करके अनन्त
ऐसे मान प्राप्त किये जा सकते हैं।
प्रस्तुत प्रश्न तथा इसकी विधि में 1 : ⁴²/₅ का 37 के साथ संगत समानुपात
खोजा गया है। ऐकिक नियम में भी ठीक यही संक्रिया की जाती है। अतः वहाँ
भी इसी अनुपात को जानने का प्रयास किया गया है।
इस विवरण से समानुपात का यह रूप प्राप्त होता है—
प्रमाण (a) / प्रमाणफल (b) = इच्छा (c) / इच्छाफल (d)
इससे स्वभावतः यह समीकरण विकसित होता है—
प्रमाण (a) × इच्छाफल (d) = प्रमाणफल (b) × इच्छा (c)
इस समीकरण से समानुपात के लिये यह नियम स्थिर होता है कि