सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 77, कुल 208 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 77

त्रिशतिका 49
त्रैराशिके सूत्रम्
आद्यन्तयोस्त्रिराशावभिन्नजाती प्रमाणमिच्छा च।
फलमन्यजाति मध्ये तदन्त्यगुणमादिमेन भजेत्¹॥ २९॥
सुक्षेमा अनुवाद-त्रैराशिक में प्रमाण तथा इच्छा समान जाति वाले होते हैं।
इन्हें क्रमशः आदि तथा अन्त में रखना चाहिये। फल या प्रमाण-फल अन्य जाति
वाला है, इसे मध्य में रखें। इस प्रमाण-फल को अन्त्य या इच्छा से गुणित करके
आदिम अर्थात् प्रमाण से भाग देना चाहिये।
अनुशीलन-प्रस्तुत श्लोक में अनुपात तथा समानुपात के नियमों को
समझाया गया है। अनुपात में दो राशियों की आपस में तुलना की जाती है। प्रस्तुत
नियम में विभाजन द्वारा इन्हें तुलनीय बनाया गया है। अर्थात् किसी राशि का अन्य
राशि के साथ दूरी या सह सम्बन्ध को, वह कितनी बार अन्य राशि से विभाजनीय
है, इस रूप में प्रकट किया गया है।
इस उपाय से किन्हीं दो राशियों का जो अनुपात है, ठीक वही दूरी या
अनुपात अन्य दो राशियों का भी हो तो प्रथम दो राशियों के सापेक्ष अन्य दो
राशियाँ समानुपात में