त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
DevanagariHindipublished208 पृष्ठ
पृष्ठ 78, कुल 208 में से
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तीन राशियों से सम्बन्धित होने के कारण इस नियम को त्रैराशिक नाम
दिया गया है। आर्यभट ने स्पष्ट रूप से इसका उल्लेख किया है। गणितशास्त्र में
शताब्दियों तक इस नियम का बहुत सम्मान किया गया है। भास्कराचार्य की यह
उक्ति प्रसिद्ध है कि-
त्रैराशिकेनैव यदेतदुक्तं व्याप्तं स्वभेदैर्हरिणेव विश्वम्।
—लीलावती, छाया व्यवहार श्लोक ४
अर्थात् जिस प्रकार विष्णु अनेक भेदों से सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है, उसी
प्रकार सम्पूर्ण गणित त्रैराशिक के भेदों से परिपूर्ण है।
इस नियम को प्रस्तुत उदाहरण द्वारा आसानी से समझा जा सकता है-
चन्दनपलं सकर्ष सार्धैर्यदि लभ्यते पणैर्दशभिः।
तत् कियता लभ्यन्ते पलानि नव कर्ष युक्तानि¹।। ३०।।
न्यासः 1 10 09
1/4 1/2 1/4 लब्धं पुराणाः 4, पणाः 13
काकिण्यौ 2 । वराटकाः 16
सुक्षेमा अनुवाद-1 कर्ष या 1/4 पल सहित 1 पल अर्थात् 5/4 पल चन्दन 1/2
सहित 10 पण में अर्थात् 21/2 पण में प्राप्त होता है। तो 1 कर्ष या 1/4 पल सहित 9
पल अर्थात् 37/4 पल चन्दन कितने मूल्य में प्राप्त होगा।
अनुशीलन-यहाँ सुविधा के लिये पहले भिन्न संख्याओं को पूर्णांक में बदल
लेते हैं-
पूर्वोक्त विवरण के अनुसार 4 कर्ष का 1 पल तथा 4 काकिणी का 1 पण।
अतः-
5/4 × 4 = 5 कर्ष,
21/2 × 4 = 42 काकिणी
37/4 × 4 = 37 कर्ष
अब सूत्र के निर्देश के अनुसार प्रमाण (a) 5 कर्ष को पहले तथा प्रमाणफल
(b) 42 काकिणी को बाद में रखते हुए प्रश्न का यह आकार बनाते हैं-
5 कर्ष चन्दन (a) का मूल्य 42 काकिणी (b) है
37 कर्ष चन्दन (c) का मूल्य कितना (d) होगा।
१. तुल. पाटी-गणित उदा. 45