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त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 208 में से

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पृष्ठ 91

त्रिशतिका 63
अब निम्न सूत्र के अनुसार इनका स्थान परिवर्तन करते हुए प्रमाण-फल
(R) को भाज्य बनाते हुए इस प्रकार लिखते हैं-
प्रमाणफल × इच्छा काल × इच्छा धन
ब्याज = ─────────────────────────────────
प्रमाण काल × प्रमाण धन
अथवा प्रमाण काल 1 तथा प्रमाणधन 100 होने पर-
P . T . R
ब्याज I = ─────────
100
इसके अनुसार इन राशियों को इस प्रकार लिखेंगे-
5 × 12 × 60 3600
x = ─────────── = ──── = 36/= रु. ब्याज
1 × 100 100
यह मूलतः समानुपात का प्रश्न है। यहाँ 100 × 1 का संगत पद 60×12
है। इसमें से 100 का संगत मान 5 बता दिया गया है। अन्य पद का समानुपाती
मान ज्ञात करना है। अतः हम निम्न तालिका प्राप्त करते हैं-
100ᵃ : 60 × 12ᶜ : : 5ᵇ : x ᵈ
अब पूर्वोक्त a × d = b × c के नियमानुसार-
100 x = 5 × 60 ×12
अतः पूर्वोक्त समानुपात के सूत्र या समीकरण के नियमानुसार-
5 × 60 ×12
x = ──────────
100
इस सामान्य नियम से हमने ठीक वही संक्रिया प्राप्त कर ली है, जिसका
इस श्लोक में वर्णन किया गया है। इससे सिद्ध है कि ब्याज के ये प्रश्न मूलतः
समानुपात के प्रश्न हैं।
ब्याज के ज्ञात होने के आधार पर इच्छा काल (T) ज्ञात करना-
यदि इसी प्रश्न का काल अज्ञात हो तो उसे इस प्रकार लिखेंगे-
100/= रु. का 5/= रु. ब्याज 1 महीने में बनता है तो 60/= का 36/= ब्याज
कितने महीने में बनेगा।
यहाँ श्लोक की रीति के अनुसार उपरिलिखित तालिका में से स्थान-परिवर्तन
करके बहुराशि पक्ष को अल्प राशि पक्ष के गुणनफल से भाग देने से अज्ञात राशि
काल ज्ञात होता है। जैसे-