त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
DevanagariHindipublished208 पृष्ठ
पृष्ठ 85, कुल 208 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 85त्रिशतिका 57
त्रिशतिका 57
सुक्षेमा अनुवाद-यदि 1 'सुवर्ण' नामक सिक्के में 16 वर्णक या माषक
होते हैं। तो 68 सहित 100 अर्थात् 168 'सुवर्ण' सिक्के में कितने माषक होंगे।
श्लेष से अन्य प्रश्न- यदि 11 वर्णक वाले सोने का मूल्य एक 'सुवर्ण'
सिक्का है तो 168 × 16 = 2688 वर्णकों का मूल्य कितने सुवर्ण होगा।
त्रिशतिका सूत्र 5 पृ. 3 से प्रकट है कि 'कल्याणसुवर्ण' नामक सिक्का 16
माष का होता है। यह 16 वर्ण अर्थात् 24 कैरेट का सबसे विशुद्ध सोना माना जाता
है।
अनुशीलन-सूत्रानुसार-
प्रथम प्रश्न- 168 × 16 = 2688 माषक व्यस्तत्रैराशिके सूत्रम्
द्वितीय प्रश्न 2688/11 = 244+ 4/11 सुवर्ण
4/11 × 16 = 64/11 = 5 + 9/11 माष
9/11 × 5 = 45/11 = 4 + 1/11 गुंजा, 1/11 गुंजा भाग
आदिगुणितेऽन्त्यभक्ते मध्ये मानान्तरे भवति गणितम् १।
सुक्षेमा अनुवाद-मध्य या प्रमाण फल (b) को आदि प्रमाण (a) से गुणित
करके अन्त्य या इच्छा (c) से भाग करने पर विपरीत मान या व्युत्क्रम अनुपात
वाला गणित सिद्ध होता है।
अनुशीलन-प्रस्तुत श्लोक में विपरीत अनुपात या व्युत्क्रमानुपात के नियम
बताए गए हैं। किन्हीं दो पदों का जो अनुपात है, यदि उनके संगत पदों का ठीक
उनसे विपरीत अनुपात हो तो वे व्युत्क्रमानुपाती पद कहे जावेंगे।
यदि दो पद तथा उनके संगत पदों में से एक की व्युत्क्रमानुपाती राशि बता
दी गई हो तो दूसरी व्युत्क्रमानुपाती राशि प्रस्तुत नियम के द्वारा खोजी जा सकती
है। इसके प्रकार के प्रश्नों में 3 राशियाँ ज्ञात होती है। साथ ही तीसरी संगत राशि
अन्य के सापेक्ष व्युत्क्रम होने से इसे व्यस्तत्रैराशिक नाम दिया गया है।
यहाँ भी प्रमाण को a प्रमाणफल को b तथा इच्छा को c से प्रकट कर सकते
हैं। श्लोक के अनुसार ऐसे प्रश्नों के हल के लिये प्रमाण (a) प्रमाणफल (b) से
१. तुल. ब्रा.स्फु.सि. 12.11 ग.सि. 15.25, लीलावती