त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
त्रिशतिका 37
1 1 1 1 1
1/6 1/10 1/3 1/9 1/2 लब्धं रूपाणि 30
सुक्षेमा अनुवाद-1 का उसी 1 के छठे भाग अर्थात् 1/6 से भाग, इसी प्रकार
1 का 1/10 1/3 1/9 1/2 से भाग करके प्राप्त संख्या का योग सोच कर बताओ, यदि
गणित विधि जानते हो।
अनुशीलन-यहाँ पूर्वोक्तानुसार-
1 ÷ 1/6 = 1×6 = 6 इसी प्रकार अगली संख्याएँ प्राप्त है।
अतः 6 + 10 + 3 + 9 + 2 = 30
अन्यदुदाहरणम्
त्र्यादिषदन्तैश्छेदैर्व्याद्यंशकभागराशिसम्भक्तम्।
रूपं पृथक् कियत् स्यात् संयोगे वित्तमाचक्ष्व।। १९।।
न्यासः 1 1 1 1
2/3 3/4 4/5 5/6 लब्धं रूपाणि 5, भागाश्च 17/60
सुक्षेमा अनुवाद-ऐसी भिन्न संख्याएँ जिनके हर क्रमशः 3 से 6 तक हैं
तथा उन्हीं के अंश क्रमशः 2 से 5 तक हैं। इनका 1 से भाग करने पर भाग तथा
उनके भागफल का योग करने पर कितना कुल धन होगा, बताओ।
अनुशीलन-यहाँ पूर्वोक्तानुसार-
1 ÷ 2/3 = 1 × 3/2, इसी प्रकार अन्य संख्याओं के भाग से प्राप्त संख्याओं का
योग → 3/2 + 4/3 + 5/4 + 6/5 = 317/60 = 5 17/60
भागमातृजातौ करणसूत्रम्
भागादीनां यस्यां सम्भूतिर्भवति भागमाता सा।
तस्यां यथोक्तकरणैः पृथक्-पृथक् फलविनिष्पत्तिः¹।। २५।।
सुक्षेमा अनुवाद-जिस संख्या में भाग आदि अनेक संक्रियाएँ की जाती हैं,
वह भागमाता कही जाती है। उसमें पूर्वोक्त अनुसार अलग-अलग संक्रियाओं के
प्रयोग से परिणाम प्राप्त होते हैं।
अर्ध पादात् पादस्त्रिभागभागोऽर्धमर्धसंयुक्तम्।
त्र्यंशोऽर्धेन विहीनः समासतः किं फलं भवति।। २०।।
१. तुल. पाटी-गणित सू. 42, ग.सा.सं. 3.138
38 ·त्रिशतिका
न्यासः ½ ¼ ¼ 1 ½ ⅓ लब्धं रूपाणि 4, भागाश्च 23/48
⅓ ½ ½
सुक्षेमा अनुवाद-आधा का आधा या ½×½ = ¼, चौथाई का चौथाई या
¼×¼= 1/16, 1 से एक तिहाई इस भिन्न संख्या का भाग या 1 ÷ ⅓ = 1×3 = 3 तथा,
आधा से युक्त आधा या ½ + ½=1 तथा आधे से एक तिहाई कम या ½ -⅓ = ⅙
इनका योग करने पर क्या फल होगा।
अनुशीलन-इस उदाहरण में ½ के साथ अनेक संक्रियाएँ की गई हैं। अतः
यही भागमाता है। उपरिलिखित का जोड़ निम्नानुसार-
4 पूर्ण तथा ¼ + 1/16 + ⅙ = (12 + 3 + 8)/48 = 23/48
अन्यदुदाहरणम्।
पादत्र्यंशस्य दलं द्विभागभागोऽर्धसंयुतान्यष्टौ।
योगे कियद्धनं वद यदि गणितविधिं विजानासि॥ २१॥
न्यासः ¼ ⅓ ½ 1 8
½ ½ लब्धम् 10 11/12 इति भागमातृजाततिः
इति षट्प्रकारकलासवर्णनम्।
सुक्षेमा अनुवाद-तीसरा हिस्सा या ⅓ तथा उसका पाद या एक चौथाई भाग
या ⅓×¼ = 1/12, 1 का द्विभाग इस भिन्न संख्या का भाग अर्थात् 1 ÷ ½ = 1×2/1 = 2
तथा आधे से युक्त 8 अर्थात् 8½ = 17/2 इनके जोड़ने पर बताओ कुल कितना धन
होता है, यदि गणित विधि को जानते हो।
अनुशीलन-यहाँ भी ½ भागमाता है। प्रश्नानुसार 2 पूर्ण तथा ⅓ + 1/12 + 17/2
= (4+1+102)/12 = 107/12 = 8 11/12 + 2 = 10 11/12
अथ वल्लीसवर्णने करणसूत्रम्
प्राक् छेदांशौ गुणयेच्छेदेनाधःस्थितेन पूर्वांशे।
धनमृणमधःस्थितांशं कुर्वीत सवर्णे वल्ल्या१॥ २६॥
सुक्षेमा अनुवाद-वल्ली के सवर्णन या एकरूप बनाने के लिये पहले कहे
गए छेद या हर तथा अंश को उससे नीचे स्थित हर के साथ गुणित करें। पुनः
१. तुल. पाटी-गणित सू. 41, म.सि. 15.18, ग.ति.पृ. 39
त्रिशतिका ३९
पहले अंश में अधः स्थित या नीचे वाले अंश को यथावसर जोड़ने या घटाने पर
वल्ली-सवर्णन होता है।
पञ्च पुराणास्त्रिपणाः काकिण्येका वराटकेनोना।
तत्पञ्चमभागोना समासतः किं फलं भवति।। २२।।
५/१
३/१६
१/४
१/२०
१/५ न्यासः। सवर्णिते जातं १६६४७/३२०० , लब्धं पुराणाः 5, पणाः 3, काकिणी 0।
वराटकाः 18। वराटकभागांश्च ४/५। इति वल्ली-सवर्णनम्।
सुक्षेमा अनुवाद-5 पुराण, 3 पण तथा 1 काकिणी में 1 वराटक कम तथा
उसी काकिणी में से वराटक का १/५ कम होने की स्थिति में सबका जोड़ क्या
होगा।
अनुशीलन-इस प्रकार के प्रश्नों को हल करने के लिये वल्ली या सारिणी
बनाई जाती है। पश्चात् उपरिलिखित विधि से अलग-२ परिमाण के सिक्कों का
'सवर्णन' या एकरूप बनाया जाता है। इस प्रकार बनाकर जोड़ने या घटाने से
अभीष्ट परिणाम प्राप्त होता है।
प्रस्तुत उदाहरण की संस्कृत व्याख्या में इस प्रकार की वल्ली बनाई गई है।
इसमें क्रमशः उपरिलिखित विधि अन्वित करते हैं-
83
16
1
संक्रिया का निरूपण- 5 पुराण तथा
4
३/१६ पुराण को जोड़ने पर 5 + ३/१६ = ८३/१६
1-
20
1-
5
पुनः श्लोक का अनुगमन करते हुए अगली सारणी-
333
64
40 त्रिशतिका
1- संक्रिया का निरूपण → 83/16 पुराण के अंश और हर को
20 काकिणी का रूप देने के लिये दोनों का 4 से गुणन। साथ ही
1- अंश में 1 काकिणी का सम्मिलन→
5 83/16 × 4/4 + 1 = 333/64
पुनः उसी प्रकार सवर्णन करने पर–
6659 संक्रिया का निरूपण– 333/64 पुराण के अंश और हर को
1280 वराटक में बदलने के लिये दोनों का 20 से गुणन।
1- प्रश्नानुसार अंश से 1 वराटक कम करने पर–
5 333/64 × 20/20 - 1 = 6659/1280
पुनः अन्तिम का सवर्णन करने पर–
33294 = 16647 अंश और हर को 5 से गुणित करके प्रश्नानुसार
6400 = 3200 अंश से 1 कम करने पर– 6659/1280 × 5/5 - 1 = 33294/7400
इस प्रकार सवर्णित होने पर 16647/3200 पुराण = 5 647/3200 पुराण
इसकी उपपत्ति के लिये अन्य प्रकार से प्रश्न को हल करते हैं–
श्लोक के अनुसार प्रश्न का आकार
5/1 पुराण + 3/1 पण + {1/1 - 1/20 - (1/20 × 1/5) काकिणी}
नोट- 20 वराटक की 1 काकिणी
⇒ 5/1 पुराण + 3/1 पण + {1/1 - 1/20 - 1/100 काकिणी
⇒ 5/1 पुराण + (3/1 पण × 1/16) + (47/50 काकिणी × 1/64)
नोट- 16 पण का 1 पुराण, 4 काकिणी का 1 पण
अर्थात् 64 काकिणी का 1 पुराण। अतः–
⇒ 5/1 पुराण + 3/16 पुराण + 47/3200 पुराण = 16647/3200 पुराण
श्लोक की व्याख्या के अनुसार प्रश्न का आकार
5/1 पुराण + 3/16 पुराण + {1/4 - (1/4 × 1/20) - (1/4 × 1/20 × 1/5) पण}
नोट-20 वराटक की 1 काकिणी
4 काकिणी का 1 पण अतः 80 वराटक का 1 पण
⇒ 5/1 पुराण + 3/16 पुराण + (1/4 - 1/80 - 1/400 पण)
⇒ 5/1 पुराण + 3/16 पुराण + (94/400 पण × 1/16)
त्रिशतिका 41
नोट- 16 पण का 1 पुराण
⇒ 5/1 पुराण + 3/16 पुराण + 47/3200 पुराण = 16647/3200 पुराण (⇒×1½) -
16647/3200 पुराण = 5 पुराण + 647/3200 , 647/3200×16 = 10352/3200 = 3 पण + 752/3200 ,
752/3200×4= 3008/3200 स्पष्टतः पूर्णांक में काकिणी 0 है। अतः 3008/3200×20 = 60160/3200 = 18
वराटक+ 2560/3200 ÷ 640/640 = 4/5 अतः वराटक भाग 4/5
वास्तव में त्रिशतिकाकार द्वारा इस प्रश्न को इतने लम्बे उपाय से हल करने
की आवश्यकता नहीं। प्रश्न में स्वयं कहा है कि 5 पुराण तथा 3 पण हैं। अतः
इनके साथ अन्य संख्याओं को जोड़कर पुनः अन्त में इसी संख्या को प्राप्त करने
की आवश्यकता नहीं। काकिणी में से भी कुछ वराटक कम किये गए हैं। अतः
स्पष्ट ही पूर्णांक में काकिणी 0 ही होगी।
काकिणी में से 1 वराटक तथा उसका पाँचवाँ भाग अर्थात् 1+⅕ = 6/5
वराटक कम करना है। अतः 1 काकिणी को 20 वराटकों में बदलकर उक्त संख्या
घटाने से यह प्रश्न आसानी से समाहित है-
20 - 6/5 = 94/5 = 18 वराटक + 4/5 वराटक भाग
स्पष्टतः यह पूर्वोक्त हल के अनुरूप है।
अतः यहाँ त्रिशतिकाकार की विधि द्वारा केवल यह प्रदर्शित करना है कि
किसी सिक्के में से किसी अन्य मान वाले सिक्के को घटाने से पहले दोनों सिक्कों
के मान को समान बना लेना चाहिये। इस प्रक्रिया में यदि किसी हिस्से को घटाना
है तो उसे भिन्न का रूप देकर पहले हिस्सा प्राप्त कर लेना चाहिये।
ऊपर वाले प्रश्न में 1 काकिणी को वराटक में बदल दिया गया है। यह भी
हो सकता है घटाए जाने वाले वराटक को काकिणी का आकार देकर प्रश्न को
इस रूप में प्रस्तुत करें-
1 - 1/20 - (1/20×⅕) ⇒ 1 - 1/20 - 1/100 = 47/50 काकिणी
इसे वराटक में बदलने पर ⇒ 47/50×20 = 18⅘
स्पष्टतः दोनों ही प्रकार से एक ही उत्तर प्राप्त करते हैं।
स्तम्भोद्देशे करण-सूत्रम्
स्तम्भांशैक्यं त्यक्त्वा रूपाच्छेषेण सम्भजेद् दृश्यम्¹।
१. तुल. स्तम्भे शेषे च भजेत् दृश्यं रूपेण भागहीनेन। - पाटीगणित सूत्र 74
तथा तुल. ग.सा.सं. 4.4 में शेषजाति के अन्तर्गत सूत्र तथा अनेक उदाहरण म.सि. 15.20,
ग.ति.पृ. 44
42 त्रिशतिका
सुक्षेमा अनुवाद-रूप या पूर्ण 1 राशि में से स्तम्भ के अनेक अंशों के योग
को घटा कर शेष से दृश्य को भाग देने पर फल प्राप्त होता है।
अनुशीलन-यहाँ किसी अज्ञात राशि की कुछ भिन्न राशियाँ तथा एक पूर्ण
ज्ञात राशि का प्रयोग होने पर अज्ञात राशि को प्राप्त करने का नियम बताया गया
है। यह सर्वथा अंकगणित विधि है।
उदाहरणम्
अर्धषडंशद्वादशभागा जलपंकबालुकान्तःस्थाः।
दृश्यं हस्तद्वितयं कथय सखे स्तम्भपरिमाणम्॥ २३॥
सुक्षेमा अनुवाद-किसी खम्भे की कुल लम्बाई का ½, ⅙ तथा 1/12 भाग
क्रमशः जल, कीचड़ तथा बालू में हैं। साथ ही 2 हाथ ऊपर दिखाई पड़ रहा है।
खम्भे की कुल लम्बाई बताओ।
अनुशीलन-यहाँ पूर्वोक्त विधि अनुसार-
भिन्न संख्याओं का योग ⇒ ½ + ⅙ + 1/12 = 9/12 = ¾
1से योग को घटाना ⇒ 1- ¾ = ¼
शेष से दृश्य का भाग ⇒ 2 ÷ ¼ 2×4 = 8
इस प्रकार के प्रश्न बीजगणितीय समीकरण से भी भली प्रकार हल हो
सकते हैं। जैसे प्रस्तुत प्रश्न-
½ + ⅙ + 1/12 = ¾
⇒ ¾ x +2 = x
⇒ 3x + 8 = 4x
⇒ 4x -3x = 8
⇒ x = 8
अन्यदुदाहरणम्
स्तम्भस्य भागार्धनवाष्टषट्काः केदारपंकोदरशैवलेषु।
हस्तद्वयं दृश्यमथांगुलं च स्तम्भप्रमाणं वद शीघ्रमेतत्॥ २४॥
न्यासः ½ ⅑ ⅛ ⅙ दृश्यमंगुलात्मकम् 49, लब्धं स्तम्भ-प्रमाणं हस्ताः २१।
१. तुल. त्र्यंशषडंशा नद्याः जलपंकबालुकान्तःस्था।
स्तम्भस्य करत्रितयं दृश्यं तन्मानमाचक्ष्व।। - पाटीगणित उदा. 96
त्रिशतिका 43
सुक्षेमा अनुवाद-किसी खम्भे की कुल लम्बाई का ½, ⅑, ⅛, ⅙ क्रमशः
खेत, कीचड़, धरती के अन्दर तथा सेवार घास में छुपा हुआ है। केवल 2 हाथ
तथा एक अंगुल दिखाई पड़ रहा है। खम्भे की कुल लम्बाई जल्दी बताओ।
अनुशीलन-यहाँ भी पूर्वोक्तानुसार-
सभी हिस्सों का जोड़ ⇒ ½ + ⅑ + ⅛ + ⅙ = ⁶⁵/₇₂
1 से कुल योग को घटाना ⇒ 1 - ⁶⁵/₇₂ = ⁷/₇₂
शेष से दृश्य का भाग ⇒ 49 ÷ ⁷/₇₂ = (49×72)/7 = 3528/7 = 504 अंगुल
504 ÷ 24 = 21 हस्त
24 अंगुल का 1 हस्त होता है। अतः 2 हस्त 1 अंगुल = 49 अंगुल बनाकर
प्रश्न हल किया गया है।
इसे बीजगणितीय समीकरण से इस प्रकार हल करेंगे-
½ + ⅑ + ⅛ + ⅙ = ⁶⁵/₇₂
⇒ ⁶⁵/₇₂ x + 49 = x
⇒ 65x + 3528 = 72 x
⇒ 72x - 65x = 3528
⇒ 7x = 3528
x = 3528/7 = 504 अंगुल या 21 हस्त
अन्यदुदाहरणम्
अर्धं तोये कर्दमे द्वादशांशः षष्ठो भागो बालुकायां निमग्नः।
सार्धो हस्तो दृश्यते यस्य तस्य स्तम्भस्याशु ब्रूहि मानं विचिन्त्य॥ २५॥
न्यासः ½ ¹/₁₂ ⅙ दृश्यम् ³/₂ लब्धं हस्ताः 6
सुक्षेमा अनुवाद-किसी खम्भे की कुल लम्बाई का आधा या ½ पानी में,
बारहवाँ हिस्सा या ¹/₁₂ कीचड़ में तथा छठा हिस्सा या ⅙ बालू में धँसा हुआ है।
साथ ही उसका सार्ध या 1½ = ³/₂ हाथ ऊपर दिखाई पड़ रहा है। ऐसी खम्भे की
कुल लम्बाई जल्दी सोचकर बताओ।
अनुशीलन-यहाँ भी पूर्वोक्तानुसार-
खम्भे के सभी अंशों का योग ⇒ ½ + ¹/₁₂ + ⅙ = ⁹/₁₂ = ¾
44 त्रिशतिका
1 से कुल योग का व्यवकलन ⇒ 1 - 3/4 = 1/4
शेष से दृश्य का भाग 3/2 ÷ 1/4 = 3/2 × 4/1 = 12/2 = 6
बीजगणितीय समीकरण के अनुसार–
1/2 + 1/12 + 1/6 = 3/4
⇒ 3/4x + 3/2 = x
⇒ (3x+6) / 4 = x
⇒ 3x+6 = 4x
⇒ 4x -3x = 6
= x = 6
इस प्रकार के समीकरणों से सभी संक्रियाओं का कारण भी सर्वथा स्पष्ट
हो जाता है।
कामिन्या हारवत्याः सुरतकलहतो मौक्तिकानां त्रुटित्वा।
भूमौ यातस्त्रिभागः शयनतलगतः पञ्चमांशश्च दृष्टः।।
आत्तः षष्ठः सुकेश्या गणक दशमकः संगृहीतः प्रियेण।
दृष्टं षट्कं च सूत्रे कथय कतिपयैर्मौक्तिकैरेष हारः।। २६।।
सुक्षेमा अनुवाद-सुरत कलह के समय मोती के हार वाली किसी कामिनी
का हार टूट कर गिर पड़ा। उस हार के 1/3 मोती धरती पर, 1/5 बिस्तर पर देखे गए।
उसके 1/6 मोती सुन्दर केशों वाली को प्राप्त हो गए तथा 1/10 उसके प्रिय ने चुन
लिये। अब केवल शेष 6 मोती धागे में लगे हुए पाए गए। हे गणक! बताओ, वह
हार कुल कितने मोतियों का था।
अनुशीलन-परवर्ती गणित शास्त्र में इस प्रकार के श्लोक बहुत प्रसिद्ध हुए।
भास्कराचार्य ने ‘इष्ट कर्म’ के अन्तर्गत ‘त्रिशतिका’ का नाम लेकर इस प्रकार के
प्रश्न उद्धृत किये हैं। इन्हें ‘इष्ट कर्म’ नाम देने का कारण यह है कि इन प्रश्नों
के हल के लिये पहले किसी कल्पित इष्ट संख्या को स्वीकार करना पड़ता है।
श्रीधराचार्य ने श्लोक 27 में ऐसी इष्ट संख्या 1 को माना है।
इस प्रकार प्रस्तुत प्रश्न का हल–
मोती के सभी अंशों का योग ⇒ 1/3 + 1/5 + 1/6 + 1/10 = 24/30
कल्पित इष्ट संख्या 1 से व्यवकलन ⇒ 1 - 24/30 = 6/30 = 1/5
शेष से दृश्य का भाग ⇒ 6 ÷ 1/5 = 6× 5 = 30
त्रिशतिका 45
बीजगणितीय समीकरण के अनुसार-
1/3 + 1/5 + 1/6 + 1/10 = 24/30 = 4/5
⇒ 4/5x + 6 = x
⇒ 4x + 30 = 5x
⇒ 5x - 4x = 30
x = 30
जाँचें
30 × 1/3 = 10 धरती पर गिरे
30 × 1/5 = 6 बिस्तर पर गिरे
30 × 1/6 = 5 कामिनी को प्राप्त हुए
30 × 1/10 = 3 प्रिय ने उठाए
शेष = 6
= 30 कुल मोती
अन्यदुदाहरणम्
यूथार्धं सत्रिभागं गिरिशिखरगतं कुञ्जराणां च दृष्टं।
षट् भागश्चैव नद्यां पिबति च सलिलं सप्तभागेन युक्तः॥
पद्मिन्यामष्टभागः स्वनवकसहितः क्रीडते जातरागो।
नागेन्द्रो हस्तिनीभिस्तिसृभिरनुगतः का भवेद्यूथसंख्या१॥ २७॥
न्यासः 1/2 1/6 1/8 दृश्यम् 4, लब्धं यूथसंख्या 1008
1/3 1/7 1/9
सुक्षेमा अनुवाद-किसी जंगल में हाथियों का बहुत बड़ा झुण्ड देखा गया।
उस झुण्ड का 1/2 अपने 1/3 से युक्त होकर अर्थात् 1/2 का तृतीयांश उसी 1/2 से जुड़कर
जंगल की खोह में चला गया। झुण्ड का 1/6 अपने 1/7 से युक्त होकर नदी में पानी
पीने चला गया। उसी झुण्ड का 1/8 अपने 1/9 से युक्त होकर कमलिनीवन में चला
गया। शेष 3 हथिनियों के बीच 1 गजेन्द्र प्रेमक्रीडा करता हुआ देखा गया। हाथियों
की कुल संख्या बताओ।
१. तुल. ग.ति.पृ. 42
46 त्रिशतिका
अनुशीलन-इस प्रश्न में प्रत्येक भिन्न संख्याओं के साथ उसी संख्या का
कोई अंश भी सम्मिलित हैं। अतः यहाँ श्लोक 24 में कही गई भागानुबन्ध विधि
के पश्चात् पूर्वोक्त संक्रिया की जावेगी।
इस प्रकार भागानुबन्ध विधि से जोड़
{1 (3+1)} / (2×3) + {1 (7+1)} / (6×7) + {1 (9+1)} / (8×9) = 251 / 252
अथवा
½ + (½ × ⅓) + ⅙ + (⅙ × ⅐) + ⅛ + (⅛ × ⅑)
⇒ ½ + ⅙ + ⅙ + ¹/₄₂ + ⅛ + ¹/₇₂ = ⁵⁰²/₅₀₄ = ²⁵¹/₂₅₂
कल्पित राशि 1 से घटाएँ ⇒ 1- ²⁵¹/₂₅₂ = ¹/₂₅₂
शेष से दृश्य का भाग ⇒ 4 ÷ ¹/₂₅₂ = 4×252 = 1008 अभिमत राशि
बीजगणितीय समीकरण के अनुसार-
{ ½ (1+ ⅓) + ⅙ (1 + ⅐) + ⅛ (1 + ⅑)} x + 4 = x
⇒ { ½ × ⁴/₃ + ⅙ × ⁸/₇ + ⅛ × ¹⁰/₉ } x + 4 = x
⇒ ²⁵¹/₂₅₂ x + 4 = x,
⇒ 251 x + 1008 = 252x
⇒ 252 x - 251 x = 1008
⇒ x = 1008
जाँचें-
1008 × ⅔ = 672 जंगल की खोह में चले गए
1008 × ⁴/₂₁ = 192 नदी में पानी पीने गए
1008 × ⁵/₃₆ = 140 कमलिनीवन में चले गए
शेष = 4
─────
1008 कुल हाथियों की संख्या
─────
अन्यदुदाहरणम्
षड्भागः पाटलासु भ्रमति गणयुतः स्वत्रिभागः कदम्बे।
पादश्चूतद्रुमे च प्रदलितकुसुमे चम्पके पञ्चमांशः।
त्रिशतिका 47
प्रोत्फुल्लाम्भोजखण्डे रविकरदलिते त्रिंशदंशोऽभिरेमे।
तत्रैको मत्तभृंगो भ्रमति नभसि चेत् का भवेद् भृंगसंख्या¹॥ २८॥
न्यासः १/६ १/३ १/४ १/५ १/३० दृश्यम् 1 लब्धं भृंगाः 60
सुक्षेमा अनुवाद-भ्रमरसमूह का 1/6 भाग पाटल पर, 1/3 भाग कदम्ब पर, 1/4
भाग आम के वृक्ष पर, 1/5 भाग चम्पा पुष्पों पर, तथा 1/30 भाग सूर्य की किरणों से
खिले हुए कमल-पुष्पों पर रमण करने लगा। उनमें से केवल 1 मतवाला भौंरा
आकाश में उड़ रहा था। कुल भौंरों की संख्या बताओ।
अनुशीलन-यहाँ पूर्वोक्त विधि के अनुसार-
भौरों के सभी उपविभागों का योग⇒
1/6 + 1/3 + 1/4 + 1/5 + 1/30 = (10+20+15+12+2) / 60 = 59 / 60
[
48 त्रिशतिका
पादः पादेन संयुक्तस्त्र्यंशस्त्र्यंशेन संयुतः।
पञ्चांशः पञ्चमांशेन दृष्टश्चैकादशः पृथक्।। २९।।
न्यासः ¼ ⅓ ⅕ दृश्यम् 11, लब्धं हस्ताः 3600
¼ ⅓ ⅕
इति स्तम्भोद्देशकाः।
सुक्षेमा अनुवाद-किसी विशाल पहाड़ का पाद या एक चौथाई अपने
चौथाई के चौथाई से युक्त, इसी प्रकार एक तिहाई अपने तिहाई के एक तिहाई से
तथा ⅕ अंश अपने ⅕ के पाँचवें अंश से युक्त होने पर 11 हाथ अलग से दिखता
है, उसकी कुल कितनी लम्बाई है।
अनुशीलन-यहाँ प्रश्नानुसार-
¼ + (¼ × ¼) + ⅓ + (⅓ × ⅓) + ⅕ + (⅕ × ⅕)
⇒ ¼ + 1/16 + ⅓ + 1/9 + ⅕ + 1/25 = 900+225+1200+400+720+144 / 3600
= 3589 / 3600
कल्पित 1 राशि से घटाएँ ⇒ 1 - 3589/3600 = 11/3600
शेष से दृश्य का भाग (3600 × 11) / 11 = 3600 हाथ
बीजगणितीय समीकरण के अनुसार-
¼ + 1/16 + ⅓ + 1/9 + ⅕ + 1/25 = 3589/3600
⇒ 3589/3600 x + 11 = x
⇒ 3589 x + 39600 = 3600x
⇒ 3600 x - 3589 x = 39600
⇒ 11 x = 39600
⇒ x = 39600 / 11
= 3600 हाथ
त्रिशतिका 49
त्रैराशिके सूत्रम्
आद्यन्तयोस्त्रिराशावभिन्नजाती प्रमाणमिच्छा च।
फलमन्यजाति मध्ये तदन्त्यगुणमादिमेन भजेत्¹॥ २९॥
सुक्षेमा अनुवाद-त्रैराशिक में प्रमाण तथा इच्छा समान जाति वाले होते हैं।
इन्हें क्रमशः आदि तथा अन्त में रखना चाहिये। फल या प्रमाण-फल अन्य जाति
वाला है, इसे मध्य में रखें। इस प्रमाण-फल को अन्त्य या इच्छा से गुणित करके
आदिम अर्थात् प्रमाण से भाग देना चाहिये।
अनुशीलन-प्रस्तुत श्लोक में अनुपात तथा समानुपात के नियमों को
समझाया गया है। अनुपात में दो राशियों की आपस में तुलना की जाती है। प्रस्तुत
नियम में विभाजन द्वारा इन्हें तुलनीय बनाया गया है। अर्थात् किसी राशि का अन्य
राशि के साथ दूरी या सह सम्बन्ध को, वह कितनी बार अन्य राशि से विभाजनीय
है, इस रूप में प्रकट किया गया है।
इस उपाय से किन्हीं दो राशियों का जो अनुपात है, ठीक वही दूरी या
अनुपात अन्य दो राशियों का भी हो तो प्रथम दो राशियों के सापेक्ष अन्य दो
राशियाँ समानुपात में
50 त्रिशतिका
तीन राशियों से सम्बन्धित होने के कारण इस नियम को त्रैराशिक नाम
दिया गया है। आर्यभट ने स्पष्ट रूप से इसका उल्लेख किया है। गणितशास्त्र में
शताब्दियों तक इस नियम का बहुत सम्मान किया गया है। भास्कराचार्य की यह
उक्ति प्रसिद्ध है कि-
त्रैराशिकेनैव यदेतदुक्तं व्याप्तं स्वभेदैर्हरिणेव विश्वम्।
—लीलावती, छाया व्यवहार श्लोक ४
अर्थात् जिस प्रकार विष्णु अनेक भेदों से सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है, उसी
प्रकार सम्पूर्ण गणित त्रैराशिक के भेदों से परिपूर्ण है।
इस नियम को प्रस्तुत उदाहरण द्वारा आसानी से समझा जा सकता है-
चन्दनपलं सकर्ष सार्धैर्यदि लभ्यते पणैर्दशभिः।
तत् कियता लभ्यन्ते पलानि नव कर्ष युक्तानि¹।। ३०।।
न्यासः 1 10 09
1/4 1/2 1/4 लब्धं पुराणाः 4, पणाः 13
काकिण्यौ 2 । वराटकाः 16
सुक्षेमा अनुवाद-1 कर्ष या 1/4 पल सहित 1 पल अर्थात् 5/4 पल चन्दन 1/2
सहित 10 पण में अर्थात् 21/2 पण में प्राप्त होता है। तो 1 कर्ष या 1/4 पल सहित 9
पल अर्थात् 37/4 पल चन्दन कितने मूल्य में प्राप्त होगा।
अनुशीलन-यहाँ सुविधा के लिये पहले भिन्न संख्याओं को पूर्णांक में बदल
लेते हैं-
पूर्वोक्त विवरण के अनुसार 4 कर्ष का 1 पल तथा 4 काकिणी का 1 पण।
अतः-
5/4 × 4 = 5 कर्ष,
21/2 × 4 = 42 काकिणी
37/4 × 4 = 37 कर्ष
अब सूत्र के निर्देश के अनुसार प्रमाण (a) 5 कर्ष को पहले तथा प्रमाणफल
(b) 42 काकिणी को बाद में रखते हुए प्रश्न का यह आकार बनाते हैं-
5 कर्ष चन्दन (a) का मूल्य 42 काकिणी (b) है
37 कर्ष चन्दन (c) का मूल्य कितना (d) होगा।
१. तुल. पाटी-गणित उदा. 45
त्रिशतिका 51
सूत्र के अनुसार इस प्रश्न का हल—
(42 × 37) / 5 = 1554 / 5 अथवा 310 ⁴/₅ काकिणी
³¹⁰/₄ पण + ⁴/₅ काकिणी = 77 पण + 2 ⁴/₅ काकिणी
⇒ ⁷⁷/₁₆ पुराण + 2 ⁴/₅ काकिणी = 4 पुराण + 13 पण + 2 ⁴/₅ काकिणी
⇒ 4 पुराण + 13 पण + 2 काकिणी + (4 × 20) / 5 वराटक
= 4 पुराण + 13 पण + 2 काकिणी + 16 वराटक
इस कुल मूल्य से 37 कर्ष चन्दन प्राप्त होगा।
प्रस्तुत उदाहरण में प्रथम राशिद्वय प्रमाण तथा प्रमाणफल क्रमशः 5 कर्ष
तथा 42 में अनुपात स्थापित किया गया है। इन संख्याओं की विभाजन विधि से
तुलना के द्वारा कहा जा सकता है कि 1 कर्ष की तुलना में काकिणी ⁴²/₅ गुना
अधिक है। अतः अनुपात—
1 : ⁴²/₅
इस समानुपात को दोनों ओर एक ही प्रकार की संख्याओं से गुणित करके
अन्य अनेक समानुपात प्राप्त किये जा सकते हैं। जैसे—
1 : ⁴²/₅ :: 2 : ⁸⁴/₅ :: 3 : 126/5 :: 4 : 168/5 :: 5 : 210/5 = 5 : 42
यहाँ सभी संगत मानों में 1 : ⁴²/₅ का अनुपात बदलता नहीं है। अतः ये सभी
समानुपाती मान हैं। दोनों ओर एक ही प्रकार की संख्या से गुणित करके अनन्त
ऐसे मान प्राप्त किये जा सकते हैं।
प्रस्तुत प्रश्न तथा इसकी विधि में 1 : ⁴²/₅ का 37 के साथ संगत समानुपात
खोजा गया है। ऐकिक नियम में भी ठीक यही संक्रिया की जाती है। अतः वहाँ
भी इसी अनुपात को जानने का प्रयास किया गया है।
इस विवरण से समानुपात का यह रूप प्राप्त होता है—
प्रमाण (a) / प्रमाणफल (b) = इच्छा (c) / इच्छाफल (d)
इससे स्वभावतः यह समीकरण विकसित होता है—
प्रमाण (a) × इच्छाफल (d) = प्रमाणफल (b) × इच्छा (c)
इस समीकरण से समानुपात के लिये यह नियम स्थिर होता है कि
52 त्रिशतिका
समानुपात में संगत पदों का वज्रगुणन फल या व्युत्क्रम गुणनफल बराबर होता है।
इस समीकरण से पुनः वही सूत्र प्राप्त करने में सक्षम हो जाते हैं, जिसका
उल्लेख त्रिशतिकाकार ने किया है-
इच्छाफल (d) = [प्रमाणफल (b) × इच्छा (c)] / प्रमाण (a)
उपर्लिखित विवेचना का निष्कर्ष यह है कि-
I. त्रैराशिक नियम के सभी प्रश्न संगत समानुपात के प्रश्न हैं। इसमें संगत
समानुपात की एक अज्ञात राशि का पता लगाया जाता है।
II. इसमें दो राशियों को विभाजन की विधि से या 1 के सापेक्ष तुलना द्वारा
अनुपात स्थापित किया जाता है।
III. पुनः संगत समानुपात की एक राशि के ज्ञान होने पर दूसरी अज्ञात
समानुपातिक राशि को पहचाना जाता है।
IV. इसके लिये सीधे उपर्लिखित अंकगणितीय सूत्र का या ऐकिक नियम
का या बीजगणितीय समीकरण का उपयोग किया जाता है। प्रत्येक विधि से वही
सूत्र तथा ठीक वही परिणाम प्राप्त होता है।
अन्यदुदाहरणम्
मरिचपलं सत्र्यंशं पणेन यदि लभ्यते सपादेन।
तत् त्र्यंशोनैर्दशभिः पणैः कियत् कथ्यतामाशु।। ३१।।
न्यासः 1 1 10
1/4 1/3 1/3 लब्धं पलानि 10 । कर्षम् 1
माषा 3 । गुञ्जाः 4 । भागाश्च 4/9
सुक्षेमा अनुवाद-यदि 1 1/4 या 5/4 पण से 1 1/3 = 4/3 पल मरिच मिलती है तो
10 - 1/3 = 29/3 पण में कितनी प्राप्त होगी।
यहाँ 5/4 प्रमाण (a), 4/3 प्रमाणफल (b) तथा 29/3 इच्छा (c) है। अतः पूर्वोक्त
सूत्रानुसार-
इच्छा-फल (d) = [(4/3) × (29/3)] / (5/4) = [116 × (4/5)] / 9 = 464/45 पल मरिच
464/45 = 10 14/45 पल, 14/45 × 4 = 56/45 = 1 11/45 कर्ष
भिन्न-व्यवहार एवं त्रैराशिक, पञ्चराशिक नियम (श्लोक ३१-५५)
त्रिशतिका 53
11/45 × 16 = 176/45 = 3 41/45 माष, 41/45 × 5 = 205/45 = 4 25/45 गुंजा
25/45 = 5/9 गुंजा के भाग।
ऐकिक नियम द्वारा प्रश्न का हल-
5/4 पण में 4/3 पल
∴ 1 पण में 4/3 × 4/5 = 16/15 पल
∴ 29/3 पण में 29/3 × 16/15 = 464/45 पल
बीजगणितीय समीकरण द्वारा प्रश्न का हल-
a b c d
हम देखते हैं कि- 5/4 : 4/3 :: 29/3 : x
अतः-
a × d = b × c के अनुसार-
5/4 x = 4/3 × 29/3
⇒ x = 4/3 × 29/3 × 4/5 = 464/45
यह पूर्वोक्त सूत्र के सर्वथा समकक्ष है।
खारीषष्टिः सार्धा रूपशतेन त्रिभागयुक्तेन।
यदि कथय ततो धान्यं रूपस्यैकस्य किं भवति॑॥ ३२॥
न्यासः 60 100 1
1/2 1/3 1 लब्धं खारी 0। द्रोणाः 9
आढकौ 2। प्रस्थौ 2। कुडवः 1। कुडवभागश्च 139/301
सुक्षेमा अनुवाद-100 1/3 या 301/3 रूप से 60 1/2 या 121/2 खारी धान्य प्राप्त होता
है, तो 1 रूप से कितना धान्य प्राप्त होगा।
अनुशीलन-सूत्रानुसार-
121/2 × 3/301 = 363/602 खारी धान्य। पूर्णांक खारी
363/602 × 16 = 2904/301 = 9 195/301 द्रोण, 195/301 × 4 = 780/301 = 2 178/301 आढक
178/301 × 4 = 712/301 = 2 110/301 प्रस्थ, 110/301 × 4 = 440/301 = 1 139/301 कुडव
१. तुल. पाटी-गणित उदा. 28
54 त्रिशातिका
धान्यद्रोणः सार्धः कुडवत्रितयं च लभ्यतेऽष्टाभिः।
तद् द्रोणयुक्तखार्या किं मूल्यं कथ्यतामाशु१।। ३३।।
आद्यन्तयोः कुडवैन्यासः ९९/१ 8/१ 1088/१
लब्धानि रूपाणि 87 भागाश्च ९१/९९
सुक्षेमा अनुवाद-३/२ द्रोण तथा 3 कुडव अर्थात् 99 कुडव धान्य का मूल्य
8 रूप है तो 1 द्रोण से युक्त 1 खारी अर्थात् 1088 कुडव धान्य का मूल्य क्या
होगा।
अनुशीलन-यहाँ सूत्रानुसार-
8 × 1088/99 = 8704/99 = 87 ९१/९९ रूप मूल्य
अन्यदुदाहरणम्
यत्र सुवर्णो लभते रूपाणां सप्ततिं त्रिभागयुताम्।
तत्रैको माषः किं दशभागोनः सखे कथय।। ३४।।
न्यासः 16/1 70 1
1/3 1/10 लब्धानि रूपाणि 3, भागाश्च 153/160
सुक्षेमा अनुवाद-1 सुवर्ण या 16 माष से 70 1/3 या 211/3 रूप प्राप्त होते हैं।
तो 1- 1/10 अर्थात् 9/10 माष से कितने रूप प्राप्त होंगे।
अनुशीलन-यहाँ सूत्रानुसार-
(211/3 × 9/10) / 16 = 633/10 × 1/16 = 633/160 = 3 153/160 रूप
अन्यदुदाहरणम्
पंगुः प्रयाति कश्चिद् दिवसत्रितयेन योजनाष्टांशम्।
योजनशतं स यास्यति निगद्यतां केन कालेन२।। ३५।।
न्यासः 1/8 3/1 100 लब्धं वर्षाणि 6 मास 8
सुक्षेमा अनुवाद-कोई लंगड़ा 1/8 योजन 3 दिन में पार करता है तो वह 100
योजन कितने दिन में पहुँचेगा।
१. तुल. पाटी-गणित उदा. 27-28, ग.सा.सं. 5.2, म.सि. 15.24-25, ग.ति.पृ. 68, लीलावती
त्रैराशिक उदा. 3
२. उदा. 30, ग.सा.सं. 5.3.4, ग.ति.पृ. 72
6। 6। 1000। लब्धं Wait,106। 6। 1000।-> Yes,106। 6। 1000। लब्धं`
रूपाणि भाव्यके 56। रूपभागाश्च 32/53सुक्षेमा अनुवाद-यदि 100 में 6 मिलाने पर अर्थात् 106 मूल्य से 6 वस्तुएँप्राप्त होती हैं तो 1000 मूल्य से कितनी प्राप्त होंगी।अनुशीलन-सूत्रानुसार -6 × 1000 = 6000/106 = 56 + 64/106 या 32/53 भाग
Wait, under6 × 1000is106.अन्यदुदाहरणम्अष्टसेतिकहारेण मापिता हारविंशतिः।सा षट् सेतिकहारेण का संख्या भवितोच्यताम्।। ३८।।- Footnote:
१. त्रिशतिका श्लोक 7 के अनुसार 2000 दण्ड का एक कोस, 4 हस्त का 1 दण्ड, 24 अंगुल
`का 1 हस्त सिद्ध होता है।
56 त्रिशतिका
अत्र त्रैराशिकद्वयम्
यद्येकस्मिन् हारे अष्टौ सेतिकाः स्यु ततो हारविंशत्या कति सेतिकाः स्युरिति।
न्यासः।। 1। 8। 20।। लब्धं सेतिकाः 160
पुनस्त्रैराशिकम्
यदि सेतिकाषट्केनैको हारस्तत् सेतिकाशतेन षष्ट्यधिकेन कति हाराः स्युरिति
न्यासः।। 6। 1। 160। लब्धं हाराः 26 हारभागाश्च 2/3
सुक्षेमा अनुवाद-यदि एक हार में 8 सेतिका या गुरिया हों तो 20 हार में
कितनी गुरियाँ मापी जावेंगी।
श्लेष से अन्य प्रश्न- यदि 6 गुरिया से 1 हार बनता है तो 20×8 = 160
गुरिया से कितने हार बनेंगे।
अनुशीलन-सूत्रानुसार-
प्रथम प्रश्न-
8×20 = 160 गुरियाँ
द्वितीय प्रश्न-160/6 = 26 + 4/6 अर्थात् 26 पूर्ण हार, 2/3 भाग
अन्यदुदाहरणम्
षोडशवर्णककाञ्चनसुवर्णशतमष्टषष्टि-संयुक्तम्।
परिवर्त्य लभ्यते कियदेकादशवर्णकं कनकम्१॥ ३९॥
अत्रापि त्रैराशिकद्वयम्
यद्येकस्मिन् सुवर्णे षोडशवर्णकाः कल्याणसुवर्णस्य षोडशमाषका इत्यर्थः।
तत्सुवर्णशतेऽष्टषष्ट्यधिके कति वर्णकाः स्युरिति। न्यासः।। 1। 16। 168। लब्धं
वर्णकाः 2688
पुनस्त्रैराशिकम्
यद्येकादशभिर्वर्णकैरैकः सुवर्णस्ततः षड्विंशत्याष्टाशीत्यधिकया कियन्तः सुवर्णाः
स्युरिति न्यासः 11। 1। 2688। लब्धं सुवर्णाः 244। माषाः 5। गुञ्जाः 4।
गुञ्जाभागाश्च 1/11।।
१. तुल. पाटी-गणित उदा. 36, ग.सा.सं. 5.18, ग.ति.पृ. 74