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त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 208 में से

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पृष्ठ 69

त्रिशतिका 41
नोट- 16 पण का 1 पुराण
⇒ 5/1 पुराण + 3/16 पुराण + 47/3200 पुराण = 16647/3200 पुराण (⇒×1½) -
16647/3200 पुराण = 5 पुराण + 647/3200 , 647/3200×16 = 10352/3200 = 3 पण + 752/3200 ,
752/3200×4= 3008/3200 स्पष्टतः पूर्णांक में काकिणी 0 है। अतः 3008/3200×20 = 60160/3200 = 18
वराटक+ 2560/3200 ÷ 640/640 = 4/5 अतः वराटक भाग 4/5
वास्तव में त्रिशतिकाकार द्वारा इस प्रश्न को इतने लम्बे उपाय से हल करने
की आवश्यकता नहीं। प्रश्न में स्वयं कहा है कि 5 पुराण तथा 3 पण हैं। अतः
इनके साथ अन्य संख्याओं को जोड़कर पुनः अन्त में इसी संख्या को प्राप्त करने
की आवश्यकता नहीं। काकिणी में से भी कुछ वराटक कम किये गए हैं। अतः
स्पष्ट ही पूर्णांक में काकिणी 0 ही होगी।
काकिणी में से 1 वराटक तथा उसका पाँचवाँ भाग अर्थात् 1+⅕ = 6/5
वराटक कम करना है। अतः 1 काकिणी को 20 वराटकों में बदलकर उक्त संख्या
घटाने से यह प्रश्न आसानी से समाहित है-
20 - 6/5 = 94/5 = 18 वराटक + 4/5 वराटक भाग
स्पष्टतः यह पूर्वोक्त हल के अनुरूप है।
अतः यहाँ त्रिशतिकाकार की विधि द्वारा केवल यह प्रदर्शित करना है कि
किसी सिक्के में से किसी अन्य मान वाले सिक्के को घटाने से पहले दोनों सिक्कों
के मान को समान बना लेना चाहिये। इस प्रक्रिया में यदि किसी हिस्से को घटाना
है तो उसे भिन्न का रूप देकर पहले हिस्सा प्राप्त कर लेना चाहिये।
ऊपर वाले प्रश्न में 1 काकिणी को वराटक में बदल दिया गया है। यह भी
हो सकता है घटाए जाने वाले वराटक को काकिणी का आकार देकर प्रश्न को
इस रूप में प्रस्तुत करें-
1 - 1/20 - (1/20×⅕) ⇒ 1 - 1/20 - 1/100 = 47/50 काकिणी
इसे वराटक में बदलने पर ⇒ 47/50×20 = 18⅘
स्पष्टतः दोनों ही प्रकार से एक ही उत्तर प्राप्त करते हैं।
स्तम्भोद्देशे करण-सूत्रम्
स्तम्भांशैक्यं त्यक्त्वा रूपाच्छेषेण सम्भजेद् दृश्यम्¹।
१. तुल. स्तम्भे शेषे च भजेत् दृश्यं रूपेण भागहीनेन। - पाटीगणित सूत्र 74
तथा तुल. ग.सा.सं. 4.4 में शेषजाति के अन्तर्गत सूत्र तथा अनेक उदाहरण म.सि. 15.20,
ग.ति.पृ. 44