त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिशतिका ३९
पहले अंश में अधः स्थित या नीचे वाले अंश को यथावसर जोड़ने या घटाने पर
वल्ली-सवर्णन होता है।
पञ्च पुराणास्त्रिपणाः काकिण्येका वराटकेनोना।
तत्पञ्चमभागोना समासतः किं फलं भवति।। २२।।
५/१
३/१६
१/४
१/२०
१/५ न्यासः। सवर्णिते जातं १६६४७/३२०० , लब्धं पुराणाः 5, पणाः 3, काकिणी 0।
वराटकाः 18। वराटकभागांश्च ४/५। इति वल्ली-सवर्णनम्।
सुक्षेमा अनुवाद-5 पुराण, 3 पण तथा 1 काकिणी में 1 वराटक कम तथा
उसी काकिणी में से वराटक का १/५ कम होने की स्थिति में सबका जोड़ क्या
होगा।
अनुशीलन-इस प्रकार के प्रश्नों को हल करने के लिये वल्ली या सारिणी
बनाई जाती है। पश्चात् उपरिलिखित विधि से अलग-२ परिमाण के सिक्कों का
'सवर्णन' या एकरूप बनाया जाता है। इस प्रकार बनाकर जोड़ने या घटाने से
अभीष्ट परिणाम प्राप्त होता है।
प्रस्तुत उदाहरण की संस्कृत व्याख्या में इस प्रकार की वल्ली बनाई गई है।
इसमें क्रमशः उपरिलिखित विधि अन्वित करते हैं-
83
16
1
संक्रिया का निरूपण- 5 पुराण तथा
4
३/१६ पुराण को जोड़ने पर 5 + ३/१६ = ८३/१६
1-
20
1-
5
पुनः श्लोक का अनुगमन करते हुए अगली सारणी-
333
64