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त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

22 त्रिशतिका
अनुशीलन-संख्याओं के घन की यह विधि मूलतः ब्रह्मगुप्त ने विनिर्दिष्ट
की है¹।
घन की यह प्रथम प्राचीन विधि स्पष्टतः द्विपद के घन की इस सर्वसमिका
पर अवलम्बित है-
(a+b)³=a³+3a²b+3ab²+b³
घन की परिभाषा-घनोऽसौ समत्रिराशिहतिः- घन का अर्थ 3 समान
संख्याओं का आपस में गुणन करना है। इसमें वह (बाईं ओर) निर्दिष्ट संख्या
‘निर्युक्तराशि’ है।² इसे ‘अन्त्य’ नाम दिया गया है। इसके अनुसार घन का सूत्र इस
प्रकार है-
a³ = axaxa
घन का अन्य प्रकार-खैकादिचयेना--- घन की विधि यह है कि अन्त्य
या निर्दिष्ट राशि (a) में ‘खैकादिचय’ अर्थात् 0+1+2 = 3 से अथवा ‘त्र्यादि’
अर्थात् 3 तथा आदि अर्थात् निर्दिष्ट राशि वाले अंक से पहले वाले याने उपान्तिम
अंक (a-1) से गुणा करे, उसमें 1 जोड़े। पुनः उसमें ‘स्वाद्यंकघन’ (यह

त्रिशतिका 23
इस विधि से हमने पूर्वोक्त सूत्र पुनः प्राप्त कर लिया है। इससे (a+b)³ इस
द्विपद के घन के लिये भी समकक्ष सूत्र प्राप्त किया जा सकता है। पर वहाँ b का
अर्थ केवल 1 होगा। अतः a = कोई संख्या, b = 1 मानकर समकक्ष सूत्र इस प्रकार
है-
(a+b)³ = a³+3a (a+b) + b
[नोट ⇒ b = 1]
आगे चलकर भास्कराचार्य ने इस सूत्र के आधार पर b = किसी भी संख्या
मानते हुए (a+b)³ के लिये सूत्र विकसित किया¹, जिसके अनुरूप आधुनिक गणित
में (a+b)³ = a³+3ab (a+b) + b³ सूत्र पर्याप्त प्रसिद्ध है।
उदाहरणम्
एकस्य नवानां पञ्चदशानां को घनो भवति।
षट्पञ्चद्विकराशेस्त्रिखद्विराशेश्च कथयाशु²।। ६।।
न्यासः।। 1। 9। 15। 203। 256। जाता यथाक्रमं घनाः।। 1। 729। 3375।
8365427। 16777216। इति घनः।
सुक्षेमा अनुवाद-1, 9, 15 का तथा 203, 256 का घन क्या होता है, शीघ्र
बताओ।
अनुशीलन-प्राप्त सूत्र के अनुसार 9 संख्या का घन इस प्रकार प्राप्त होगा-
सूत्र उदाहरण
a³ = (a-1)³ + 3a (a-1) + 1 9³ = (9-1)³ + (3×9×8) + 1
⇒ 512+216+1 = 729
द्विपद के घन के सूत्र के अनुसार- (b=1)
(a+b)³ = a³ +3a (a+b) + b (8+1)³ = 8³+(3×8×9) + 1
⇒ 512+216+1 = 729
इससे यह भी स्पष्ट है कि 9³ = (7³) + (3×8×7) + 1+217 अर्थात्
343+169+217 = 729 अथवा 9³ = (6³) + (3×7×6) +1+217+169 = अर्थात्
216+127+217+169=729 इस प्रकार श्रेणी अनुक्रम से समीकरण प्राप्त होते हैं।
१. खण्डाभ्यां वा हतो राशिस्त्रिघ्नः खण्डघनैक्ययुक्। - लीलावती श्लोक 13
२. तुल. पाटी-गणित उदा. 5

24 त्रिशतिका
अन्य उदाहरणों का प्रथम सूत्र के अनुसार घन इस प्रकार है-
घन प्रस्तुत सूत्र के अनुसार संक्रिया प्राप्त परिणाम
15³ =(10+5)³=10³+3×10²×5+3×10×5²+5³
⇒1000+1500+750+125 =3375
203³ = (200+3)³=200³+3×200²×3+3×200×3²+3³
⇒8000000+360000+5400+27 =8365427
256³=(250+6)³=250³+3×250²×6+3×250×6²+6³
⇒15625000+1125000+27000+216=16777216
प्राचीन गणित में इस विधि को लिखने का प्रकार भिन्न था। उदाहरणतः
256³ के लिये इस विधि को इस प्रकार लिखा जाता था-
256³=25³ =15625
3×25²×6 = 11250
3×25×6² = 2700
6³ = 216
16777216
इन उदाहरणों का द्वितीय सूत्र के अनुसार घन इस प्रकार है-
15³ 14³+ (3×15×14) +1
= 2744+630+1 = 3375
203³ 202³+ (3×203×202) +1
= 8242408+123018+1 = 8365427
256³ = 255³+ (3×256×255) +1
= 16581375+195840+1 = 16777216
घनमूले करणसूत्रमार्यात्रयम्
घनपदमघनपदे द्वे घनपदतोऽपास्य घनमतो मूलम्।
संयोज्य तृतीयपदस्याधस्तदनष्टवर्गेण।। १६।।
एकस्थानेन तथा शेषं त्रिगुणेन सम्भजेत् तस्मात्।
लब्धिं निवेश्य पङ्क्त्यां तद्वर्गं त्रिगुणमन्त्यहतम्।। १७।।
जह्यादुपरिगराशेः प्राग्वद्घनमादिमस्य च स्वपदात्।
भूयस्तु तृतीयपदस्याथ इत्यादि विधि मूलम्।। १८।।
१. तुल. ब्रा.स्फु.सि. 12.7। पाटी-गणित सू. 29-31, ग.सा.सं. 2.53-54 म.सि. 15.9-10, सि.
शे. 13.6-7, ग.कौ.पृ. 8-9, लीलावती अभिन्नपरिकर्माष्टक श्लोक 14-15

त्रिशतिका 25
उदाहरणम्
प्राग्लब्धघनानां न्यासः 1।729।3375।16777216।8365427। लब्धानि
मूलानि 1।9।15।256।203। इति घनमूलम्।
सुक्षेमा अनुवाद-घनमूल के लिये पहले संख्या की इकाई में घन का चिह्न
(।) तथा उससे पहले दो अंकों में अघन का चिह्न (--) लगावें। पुनः अन्तिम
घन पद (सबसे बाईं ओर वाले) से अधिकतम सम्भव बड़े घन (a³) को घटावें
तथा उसे अन्तिम घन के नीचे रखें। पुनः आगे वाली शेष संख्या को त्रिगुणित
घनमूल के वर्ग (3a²) गुणित लब्धि (b) से भाग देवें। पश्चात् त्रिगुणित घनमूल
तथा उस लब्धि के वर्ग (3ab²) से भाग देवें तथा पूर्व के समान अन्तिम अघन
में से घटावें। यही संक्रिया इसके तृतीय पद के साथ तथा उसके आगे भी करने
से घनमूल प्राप्त होता है।
अनुशीलन-घनमूल की आधुनिक विधि में किसी संख्या के लघुतम संख्या
से भाग करके भाजकों के एक ही प्रकार के 3-3 अंकों वाले समूह बन जाते हैं।
इन समूहों में से एक-एक संख्या लेकर उनका गुणनफल ही उस संख्या का
घनमूल होता है। उदाहरण में पूर्वोक्त घन संख्याओं का ही घनमूल बताया गया है।
पूर्वोक्त विधि का अनुसरण करते हुए 16777216 का घनमूल सिद्ध करते
हैं-

  • । - - । - - ।
    1 6 7 7 7 2 1 6
    . 2³ 8
    ─────
    87
    3×2²×5 60
    ─────
    277
    3×2×5² 150
    ─────
    1277
    5³ 125
    ─────
    11522
    3×25²×6 11250
    ─────

26 त्रिशतिका
2721
3×25×6² 2700
――――――
216
6³ 216
――――――
×
यहाँ भी घन की पूर्वोक्त संक्रिया से विलोम संक्रिया द्वारा घनमूल प्राप्त
किया गया है। प्रस्तुत संक्रिया में घन की संख्याएँ ही घनमूल के अंक बनते हैं।
अतः इसका घनमूल 256 है।
भिन्नसंकलिते करणसूत्रमार्यापूर्वार्धम्।
सदृशच्छेदांशयुतिः छेदनमच्छेदनस्य रूपं स्यात्¹।
भिन्न के योग के सूत्र के लिये श्लोकार्ध—
सुक्षेमा अनुवाद—समान छेद या हर बनाने के पश्चात् भागफल को अंश
के साथ उतनी बार जोड़ने से भिन्न संख्याओं का योग होता है। इससे सम्पूर्ण
संख्याओं का एक हर बनता है।
उदाहरणम्
पादत्र्यंशषडंशान् द्वादशभागं च कथय संक्षिप्य।
सदलद्वि-पादवर्जितरूपत्रयं रूपषटकं च²॥ ७॥
न्यासः 1/4 1/3 1/6 1/12 अत्र छेदसादृश्यार्थं वक्ष्यमाणभागजातौ करणसूत्रम्।
छेदाभ्यामन्योन्यं हन्याच्छेदांशकौ समुच्छित्त्यै।
सदृशयोजनाल्लब्धम् 5/6।
द्वितीयोदाहरणे न्यासः 2 3
1/2 1̇/4 6/1 अत्रापि कलासवर्णनार्थं भागानुबन्धभागापवाहजातौ
च करण-सूत्रम्।
भागानुबन्धजातौ रूपगुणच्छेदसंगुणः सांशः।
भागापवाहजातौ शोध्योंशच्छेदगुणितरूपेभ्यः।
एवं सवर्णनं छेदसादृश्यं च कृत्वा अंशयोजनाल्लब्धम् 45/4 इति भिन्नसंकलितम्॥
――――――――――――――――――――――――――――――――――――――――――――――――――――――
१. तुल. ब्रा.स्फु.सि. 12.2, पाटी-गणित सू. 32, म.सि. 15.14 ग.ति.पृ. 15, सि.शे. 13.8
२. पाटी-गणित उदा. 6

त्रिशतिका 27
सुक्षेमा अनुवाद- ¼ ⅓ ⅙ तथा ¹/₁₂ का योग बताओ तथा दल या अर्धसहित
2 अर्थात् 2½ या ⁵/₂ पाद या चौथाई रहित 3 अर्थात् 3-¼ = 2¾ या ¹¹/₄ तथा 6 या ⁶/₁
का जोड़ क्या होगा, बताओ।
अनुशीलन- यहाँ भिन्न संख्याओं के योग की विधि बताई है। इसके लिये
पहला नियम यह है कि हर संख्याओं को समान बनाएं। इसका प्रकार
'छेदाभ्यामन्योन्यं'---द्वारा व्याख्या में तथा आगे सूत्र 23 पृ. 27 में वर्णित है।
इसके अनुसार छेद या हर को एक दूसरे से गुणा करने पर सदृशच्छेद बनता है।
इसके पश्चात् प्रत्येक हर का इस सदृशच्छेद से या पूर्वोक्त गुणनफल से भाग देने
पर तथा भागफल को अंश से गुणित करके प्राप्त संख्याओं के योग से भिन्न
संख्याओं का योग होता है। जैसे पूर्वोक्त उदाहरण में हर संख्याओं का आपस में
गुणन तथा प्रत्येक हर का गुणनफल से भाग तथा भागफल का अंश से गुणन से-
¼ + ⅓ + ⅙ + ¹/₁₂ = (216+288+144+72) / 86
(720 ÷ 144) / (864 ÷ 144) = ⅚
हम जानते हैं कि ल.स.प. के उपयोग द्वारा इसे आसानी से हल किया जा
सकता है। सर्वप्रथम महावीराचार्य ने ल.स.प. का 'निरुद्ध' नाम देते हुए इसकी
विधि बताई है। पर श्रीधराचार्य तथा आगे भास्कराचार्य ने भी इसका उपयोग नहीं
किया। इसका उपयोग करने पर-
¼ + ⅓ + ⅙ + ¹/₁₂ = (3+4+2+1) / 12 = ¹⁰/₁₂ = ⅚
द्वितीय उदाहरण-
⁵/₂ + ¹¹/₄ + ⁶/₁ = (20+22+48) / 8 = ⁹⁰/₈ = ⁴⁵/₄ या ल.स.प के द्वारा (10+11+24) / 4 = ⁴⁵/₄ = 11¼
व्यवकलितसूत्रं परार्धम्
तुल्यच्छेदाद्यान्यराश्योरंशान्तरं कुर्यात्॥ १९॥
भिन्न राशियों को घटाने के लिये श्लोक का उत्तरार्ध-
१. तुल्यच्छेदायव्यराश्यो....पाटी-गणित सूत्र 32 तथा तुल.ब्रा.स्फु.सि. 12.2 म.सि. 15.14, ग.
ति.पृ. 18 सि.शे. 13.8, लीलावती भिन्नपरिकर्माष्टक श्लोक 4

28 त्रिशतिका
सुक्षेमा अनुवाद-समान छेद या हर बनाकर उसके आय वाले अंश से दूसरे
व्यय वाले अंश को घटाने पर भिन्न संख्याओं का व्यवकलन होता है। (यह 'पाटी
गणित' में पाठान्तर की सहायता से अर्थ है।)
उदाहरणम्
अर्धत्र्यंशषडंशान् रूपात संशोध्य कथय शेषम्।
रूपत्रयमर्धोनं द्वे त्र्यंशयुते च कथय पञ्चभ्यः।। ८।।
न्यासः १/२ १/३ १/६ १/१ शेषं०। द्वितीयोदाहरणे न्यासः २ २ । ५ लब्धं शेषम्।
१/६ इति भिन्न-व्यवकलितम्। १/२ १/३
सुक्षेमा अनुवाद-१/२ १/३ तथा १/६ के योग को रूप या 1 से घटाने पर क्या
शेष बचेगा। 3 में से आधा कम तथा 2 तथा तीसरे अंश के योग को 5 से घटाने
पर क्या बचेगा।
अनुशीलन- प्रथम उदाहरण-
१/२+१/३+१/६ = १/१ - १/१ = 0
द्वितीय उदाहरण-
2½+2⅓ = 5/2+7/3 = 29/6 , 5/1 - 29/6 = (30-29)/6 = 1/6
भिन्नप्रत्युत्पन्ने सूत्रम्
प्रत्युत्पन्नफलं स्यादंशवधे छेदघातसंभक्ते१।
सुक्षेमा अनुवाद-छेद या हर का आपस में गुणा करके गुणनफल से अंश
के गुणनफल को विभाजित करने पर भिन्न का गुणन होता है।
उदाहरणम्
रूपत्रयमर्धफलं गुणितं, पादान्वितेन रूपेण।
अर्धं च पादगुणितं किं भवति धनं पृथक् कथय।। ९।।
न्यासः 3 1 ½ ¼ लब्धं यथाक्रमम् 35/8 ⅛ इति भिन्नप्रत्युत्पन्नः।
½ ¼
१. तुल. ब्रा.स्फु.सि. 12.3 पाटी-गणित सू. 33, ग.सा.सं.3.2, म.सि. 15.15. ग.ति.पृ. 19,
लीलावती भिन्नपरिकर्माष्टक श्लोक 4

त्रिशातिका 29
सुक्षेमा अनुवाद-3 रूप के साथ आधा फल अर्थात् 3½ को चतुर्थांश से
युक्त 1 अर्थात् 1¼ के साथ गुणनफल क्या होगा तथा आधा या ½ संख्या चौथाई
या ¼ से गुणित होने पर क्या उत्तर होगा, यह अलग बताओ।
अनुशीलन- पूर्वोक्तानुसार संक्रिया करने पर-
3½×1¼ = ⁷/₂×⁵/₄ = ³⁵/₈ = 4⅜ , ½×¼ = ⅛
भिन्नभागहारे सूत्रम्
छेदांशविपर्यासे हरस्य विहिते विधिः पूर्वः१॥ २०॥
सुक्षेमा अनुवाद-हर तथा अंश को विपर्यास क्रम से रखने पर अर्थात् हर
को अंश तथा अंश को हर बनाकर रखने पर पूर्वोक्त गुणन की रीति से विधि
करने पर भाग होता है।
उदाहरणम्
सार्धद्वयेन भक्ताः षट् पादयुतास्तथा त्रिभिः सार्धैः।
पादयुतरूपषष्टिः संभक्ता कथय भागाप्तम्॥ १०॥
2 6 3 60 लब्धं यथाक्रमम् ⁵⁰/₂₀ ⁴⁸²/₂₈ इति भिन्न-भागहारः
½ ¼ ½ ¼
सुक्षेमा अनुवाद-चौथाई सहित 6 अर्थात् 6¼ को आधा सहित 2 या 2½ से
भाग दीजिये। साथ ही चौथाई सहित 60 या 60¼ को आधे सहित 3 या 3½ से
भाग कर भागफल बताइये।
यहाँ पूर्वोक्त विधि अनुसार-
6¼ ÷ 2½ = ²⁵/₄ ÷ ⁵/₂ = ²⁵/₄ײ/₅ = ⁵⁰/₂₀ = ⁵/₂
60¼ ÷ 3½ = ²⁴¹/₄ ÷ ⁷/₂ = ²⁴¹/₄ײ/₇ = ⁴⁸²/₂₈ = ²⁴¹/₁₄
भिन्नवर्गे सूत्रम्
अंशकृतौ भक्तायां छेदनवर्गेण भिन्नवर्गफलम्२।
सुक्षेमा अनुवाद-अंश की कृति या वर्ग अर्थात् उसी संख्या से गुणन तथा
छेदन या हर का वर्ग करने पर भिन्न संख्याओं का वर्गफल प्राप्त होता है।
१. तुल. ब्र.स्फु.सि. 12.4, पाटी-गणित सू. 33, ग.सा.सं. 3.8, म.सि. 15.15. ग.ति.पृ. 21
लीलावती भिन्नपरिकर्माष्टक श्लोक 5
२. ब्रा.स्फु.सि. 12.5, पाटी-गणित सू. 34, ग.सा.सं. 3.13, म.सि. 15.16 लीलावती भिन्नपरिकर्माष्टक
श्लोक 5

30 त्रिशतिका
उदाहरणम्
सार्धद्वयस्य वर्गं पादयुतानां च कथय पञ्चानाम्।
अर्धस्य त्र्यंशस्य च यदि वर्गविधिं विजानासि¹।। १९।।
न्यासः 2 5 ½ ⅓ यथाक्रमं वर्गराशयः 25/4 441/16 1/4 1/9
½ ¼
सुक्षेमा अनुवाद-2 सहित आधा या 2½, चौथाई सहित 5 या 5¼, तथा
आधा या ½ तथा तिहाई या ⅓ का वर्ग बताओ, यदि इसकी विधि जानते हो।
अनुशीलन-यहाँ पूर्वोक्तानुसार-
2½ = 5/2 = 25/4, 5¼ = 21/4 = 441/16, ½ = 1/4, ⅓ = 1/9
भिन्नवर्गमूले सूत्रम्
अंशस्य वर्गमूले छेदनमूलोद्धृते मूलम्²।। २१।।
उदाहरणम्
प्राग्लब्धवर्णानां न्यासः 25/4 441/16 1/4 1/9 लब्धानि मूलानि 5/2 21/4 1/2 1/3
सुक्षेमा अनुवाद-अंश का वर्गमूल तथा इसी प्रकार छेद या हर का वर्गमूल
करने पर भिन्न संख्याओं का वर्गमूल प्राप्त होता है।
यहाँ पूर्वोक्तानुसार-
25/4 = 5/2, 441/16 = 21/4, 1/4 = 1/2, 1/9 = 1/3
घने करण-सूत्रम्
अंशस्य घनं विभजेच्छेदस्य घनेन घनफलं भवति³।
भिन्न संख्याओं का घन
सुक्षेमा अनुवाद-अंश का तथा छेद या हर का घन करने पर भिन्न
संख्याओं का घनफल प्राप्त होता है।
१. पाटी-गणित उदा. 12
२. तुल. ब्रा.स्फु.सि. 12.5। पाटी-गणित सू. 34, ग.सा.सं. 3.13, म.सि. 15.16, ग.कौ.पृ. 23
लीलावती भिन्नपरिकर्माष्टक श्लोक 5
३. तुल. पाटी-गणित सू. 35, ग.सा.सं. 3.13, म.सि. 15.17, ग.कौ.पृ. 25

त्रिशतिका 31
उदाहरणम्
सप्तानां सार्धानां पञ्चदशानां च पादयुक्तानाम्।
पादस्य त्र्यंशस्य च कथय घनं यदि विजानासि।। १२।।
न्यासः 15/2 61/4 1/4 1/3 लब्धा यथाक्रमं घना 3375/8 226981/64 1/64 1/27
सुक्षेमा अनुवाद-आधा सहित 6 या 6½, चौथाई से युक्त 15 या 15¼ तथा
एक चौथाई या ¼, एक तिहाई ⅓ का घन बताओ, यदि जानते हो।
यहाँ पूर्वोक्तानुसार-
7½ = 15/2 = (15×15×15)/(2×2×2) = 3375/8, 15¼ = 61/4 = (61×61×61)/(4×4×4) = 226981/64
¼ = 1/64, ⅓ = 1/27
घनमूले करण सूत्रम्
अंशघनमूलराशौ छेदनमूलोद्धृते मूलम्¹।
उदाहरणम्
प्राग्लब्धघनानां न्यासः 3375/8 226981/64 1/64 1/27
यथोक्तकरणेन लब्धानि घनमूलानि 15/2 61/4 1/4 1/3 इति घनमूलम्
भिन्न संख्याओं का घनमूल
सुक्षेमा अनुवाद-अंश की घनमूल राशि तथा छेदन या हर का घनमूल लेने
पर भिन्न संख्याओं का घनमूल प्राप्त होता है।
यहाँ पूर्वोक्तानुसार-
3375/8 = 15/2, 226981/64 = 61/4, 1/64 = 1/4, 1/27 = 1/3
कलासवर्णने सूत्रम्
छेदाभ्यामन्योन्यं हन्याच्छेदांशकौ समुच्चित्यै²।
भिन्न संख्याओं के योग आदि का सूत्र
सुक्षेमा अनुवाद-भिन्न संख्याओं के योग आदि के लिये हर संख्याओं का
एक दूसरे से गुणा कर लेना चाहिये। ताकि हर से अंश तदनुरूप बन जावें।
१. तुल. पाटी-गणित सू. 35, ग.सा.सं. 3.13, म.सि. 15.17, ग.ति. पृ. 26, लीलावती
भिन्नपरिकर्माष्टक श्लोक 5
२. अंशतः तुल. पाटी-गणित सू. 36, ब्रा.स्फु.सि. 12.2, म.सि. 15.13, ग.ति.पृ. 30, लीलावती

32 त्रिशतिका
उदाहरणम्
द्व्यादिषडन्तैश्छेदैरेकैकेनांशकेन को राशिः।
त्र्यादिनवान्तैश्च हरैर्द्व्यादिभिरंशैः समायोगे१।। १३।।
न्यासः 1/2 1/3 1/4 1/5 1/6 2/3 3/4 4/5 5/6 6/7 7/8 8/9 लब्धानि रूपाणि 7
भागाश्च 305/2020 इति भागजातिः
सुक्षेमा अनुवाद-ऐसी भिन्न संख्याएँ जिनके हर क्रमशः 2 से लेकर 6 हैं
तथा अंश सर्वत्र 1-1 हैं, इनका योग कौन राशि होगी। साथ ही 3 से लेकर 9 तक
हर संख्याओं वाली तथा 2 से लेकर 8 तक क्रमशः अंश संख्याओं वाली भिन्न
संख्याओं का योग क्या होगा।
यहाँ पूर्वोक्तानुसार-
1/2 + 1/3 + 1/4 + 1/5 + 1/6 = (360+240+180+144+120) / 720 = 1044/720 ÷ 12 = 87/60
अथवा ल.स.प. लेकर = (30+20+15+12+10) / 60 = 87/60
2/3 + 3/4 + 4/5 + 5/6 + 6/7 + 7/8 + 8/9 =
(120960 + 136080 + 145152 + 151200 + 155520 + 158760 + 161280) / 181440
⟹ (1028952 ÷ 72) / (181440 ÷ 72) = 14291/2520
अथवा ल.स.प लेकर = (1680+1890+2016+2100+2160+2205+2240) / 2520 = 14291/2520
दोनों भिन्न योगों का योग = 87/60 + 14291/2520 = (3654+14291) / 2520 = 17945/2520 = 7 305/2520
अथवा 7 (305 ÷ 5) / (2520 ÷ 5) = 7 61/504
प्रभागजातौ सूत्रम्
छेदानामभ्यासः प्रभागजातौ भवेत् तथांशानाम्२।। २३।।
१. तुल. पाटी-गणित उदा. 14
२. तुल. ब्रा.स्फु.सि. 12.8। पाटी-गणित सू. 38। ग.सा.सं. 3.99। म.सि. 15.13, लीलावती

त्रिशतिका 33
सुक्षेमा अनुवाद-प्रभागजाति में छेद या हर का तथा उसी प्रकार उसके
अंशों का भी गुणन होता है।
उदाहरणम्
काकिण्यर्ध तस्मात् तृतीयभागस्ततश्च पञ्चांशः।
योगे कियद् धनं वद यदि गणितविधिं विजानासि॥ १४॥
1/1 1/2 1/1 1/2 1/3 1/1 1/2 1/3 1/5 लब्धा वराटका: 14
सुक्षेमा अनुवाद-एक काकिणी का आधा या 1/2 उसका 1/3 तथा उसका 1/5
जोड़ने से कितना धन होता है, बताओ, यदि गणितविधि को जानते हो।
यहाँ विविध हिस्सों के हिस्से प्राप्त करने के लिये आपस में गुणन तथा
उसके पश्चात् जोड़ होगा। अतः –
(1/1×1/2) + (1/2×1/3) + (1/2×1/3×1/5) = 1/2 + 1/6 + 1/30 = 21/30 = 7/10 काकिणी
क्योंकि 20 वराटक की 1 काकिणी, अतः 20×7/10 = 140/10 = 14 वराटक
अन्यदुदाहरणम्
सार्धद्वयस्य पादो रूपत्रितयस्य षोडशोंऽशश्च।
अष्टांशस्य दशांशत्रितयं योगे किमाचक्ष्व॥ १५॥
न्यासः 5/2 1/4 3/1 1/16 1/8 3/10 लब्धं भागाः 68/80 इति प्रभागजातिः।
सुक्षेमा अनुवाद-आधा सहित 2 अर्थात् 2 1/2 का एक चौथाई या 1/4 तथा 3
का सोलहवाँ अंश या 1/16 तथा 1/8 का 3/10 के साथ योग क्या होगा, बताओ।
यहाँ पूर्वोक्तानुसार–
(5/2×1/4) + (3/1×1/16) + (1/8×3/10) = 68/80 = 17/20
भागानुबन्धजातौ सूत्रम्
भागानुबन्धजातौ रूपगुणच्छेदसंगुणः सांशः।
अथवान्यत् सूत्रम्
अधरहरच्छेदवधोऽधोंशयुतहरघ्न ऊर्ध्वांशः¹॥ २४॥
सुक्षेमा अनुवाद-भागानुबन्ध जाति में रूप या पूर्ण संख्या (a) से गुणित हर
(c) का अंश (b) के साथ जोड़ होता है।
१. अधरघ्नोर्ध्वहरेऽधोंशयुतहरघ्न आद्यंशः - पाटी-गणित सूत्र 39
तथा तुल. ब्रा.स्फु.सि. 12.9। ग.सा.सं. 3.113, म.सि. 15.11, लीलावती।

34 त्रिशतिका
अधरस्थ हर संख्या (b) का दूसरे छेद या हर (d) के साथ गुणन के
पश्चात् ऊर्ध्व या प्रथम अंश (a) का दूसरे छोटे अंश (c) तथा हर (d) के जोड़
के साथ गुणन करने से भी भागानुबन्ध जाति प्राप्त होती है।
अनुशीलन-यहाँ प्रथम सूत्र में पूर्ण संख्या का भिन्न संख्या के जोड़ की
विधि बताई है। इसके अनुसार-
a + b/c = (c×a+b) / c
इस प्रकार प्रत्येक को भिन्न संख्या का रूप देकर योग की पूर्वोक्त विधि
से ऐसी सभी संख्याओं का योग हो सकता है।
द्वितीय सूत्र में किसी भिन्न संख्या में उसी भिन्न संख्या के किसी हिस्से के
जोड़ की विधि बताई है। इसे भागानुबन्ध (fractional increase) का नाम दिया
गया है। इसके अनुसार हम यह सूत्र प्राप्त करते हैं-
a/b ± a/b × c/d = a (d±c) / bd
इस सूत्र की उपपत्ति इस प्रकार है-
a/b ± a/b × c/d = (a×1 / b) ± (a×c / bd)
⇒ a/b (1 ± c/d) वितरण गुण के अनुसार
⇒ a (d±c) / bd
पाटी-गणित श्लोक 40 में इसी रीति से भागापवाह (fractional de-
crease) की विधि बताई है। उसे सम्मिलित करने के लिये हमने प्रस्तुत सूत्र में
व्यवकलन के चिह्न को भी अंकित किया है।
प्रथमसूत्रे उदाहरणम्
अर्धेन सहितमेकं पादेन युतानि पञ्च रूपाणि।
त्र्यंशसहितानि चाष्टौ समासतः किं धनं भवति¹॥ १६॥
१. तुल. पाटी-गणित उदा. 18

त्रिशतिका 35
न्यासः 1 5 8
½ ¼ ⅓ लब्धं यथाक्रमं धनं ३/२ २१/४ २५/३ योगे कृते जातं 15
────
¹/₁₂ ।। .
सुक्षेमा अनुवाद-आधे से सहित 1 या 1½, चौथाई सहित 5 या 5¼, तिहाई
सहित 8 या 8⅓ का योग कुल कितना धन होता है।
यहाँ सूत्रानुसार-
1½ = ३/२, 5¼ = २१/४, 8⅓ = २५/३
३/२ + २१/४ + २५/३ = 36+126+200 / 24 = ³⁶²⁄₂₄ = 15¹/₁₂
अथवा ल.स.प. लेने पर ⇒ 18+63+100 / 12 = ¹⁸¹⁄₁₂ = 15¹/₁₂
द्वितीयसूत्रे उदाहरणम्
सार्धं रूपत्रितयस्य पादसहितं स्वषष्ठसंमिश्रम्।
अर्धं स्वत्र्यंशयुतं स्वपादयुक्तं च किं योगे।। १७।।
न्यासः 3
─
½ ½ लब्धं रूपाणि 5 भागाश्च ¹⁵⁄₁₆ इति भागानुबन्ध जातिः।
── ──
¼ ⅓
── ──
⅙ ¼
सुक्षेमा अनुवाद-आधे के साथ 3 संख्या या ⁷/₂ तथा इसी संख्या से युक्त
इसका ¼ तथा इस योगफल से प्राप्त संख्या का ⅙ उस पूर्व संख्या से युक्त हैं। इस
योगफल में आधा या ½ उस आधे के तीसरे हिस्से या ⅓ युक्त है तथा इस योगफल
से प्राप्त संख्या का ¼ भी इसमें युक्त है। कुल योगफल क्या है।
अनुशीलन-यहाँ पहले प्रश्न के प्रथम अंश को उपपत्ति के साथ हल करते
हैं-
7ᵃ 7 1ᶜ
─── + ─── × ─── = (⁷/₂×⁴/₄) + (⁷/₂×¹/₄) ⇒ ⁷/₂ (⁴/₄ + ¹/₄)
2ᵦ 2 4_d
⇒ 7 (4+1) / (2×4) = 7×5 / 8 = ³⁵⁄₈

36 त्रिशतिका
अथवा 7/2 + 7/8 = (28+7)/8 = 35/8
सम्पूर्ण प्रश्न के हल के लिये उसे अंकगणितीय भाषा में प्रस्तुत करते हैं-
7ᵃ/2_b + 7/2 × 1ᶜ/4_d + { 1ᶜ/6_d ( 7/2 + 7/2 × 1/4 ) } + 1ᵃ/2_b + 1/2 × 1ᶜ/3_d + { 1ᶜ/4_d ( 1/2 + 1/2 × 1/3 ) }
पूर्वोक्त सूत्रानुसार-
7 (4+1) (6+1) / (2×4×6) + (3+1) (4+1) / (2×3×4)
= 245/48 + 5/6 = (245+40)/48 = 285/48 = 95/16 = 5 15/16
अथवा
7/2 + 7/8 + { 1/6 ( 7/2 + 7/8 ) } + 1/2 + 1/6 + { 1/4 ( 1/2 + 1/6 ) }
⇒ 35/8 + ( 1/6 × 35/8 ) + 2/3 + ( 1/4 × 2/3 )
= 35/8 + 35/48 + 2/3 + 1/6
= 285/48 = 95/16 = 5 15/16
प्रभागजातौ सूत्रम्
रूपे छेदेन हते छेदगमो भवति भागभागविधिः।१।
सुक्षेमा अनुवाद-रूप या पूर्ण राशि का किसी भिन्न संख्या से भाग करने
के लिये रूप का छेद या हरके साथ गुणन करने पर उसका छेदगम अर्थात् उसके
छेद का विनाश हो जाता है तथा अंश छेद बन जाता है²। यह भागभाग विधि होती है।
अनुशीलन-यहाँ भिन्न संख्याओं के भाग का प्रकार बताया है। इसके लिये
भिन्न संख्या के हर को रूप या पूर्ण राशि से गुणन करना चाहिये तथा अंश को
हर बना लेना चाहिये। इस प्रकार यह परिणाम प्राप्त होता है-
a ÷ b/c = ac/b
उदाहरणम्
षड्भागभागो दशभागभागस्त्रिभागभागश्च नवांशभागः।
जानासि चेद् ब्रूहि सखे विचिन्त्य द्विभागभागश्च धनं किमैक्यम्॥ १८॥
१. तुल. ब्रा.स्फु.सि 12.9, पाटी-गणित सू. 38, ग.सा.सं. 3.99, म.सि. 15.19
२. यस्य भागेन भागस्तस्मिन् रूपे भागसम्बन्धिना छेदेन हते तस्य छेदस्य गमो विनाशः। अंश
इदानीं छेदो जातः, रूपराशिश्चांशः - पाटी-गणित सूत्र 38 पर व्याख्या

त्रिशतिका 37
1 1 1 1 1
1/6 1/10 1/3 1/9 1/2 लब्धं रूपाणि 30
सुक्षेमा अनुवाद-1 का उसी 1 के छठे भाग अर्थात् 1/6 से भाग, इसी प्रकार
1 का 1/10 1/3 1/9 1/2 से भाग करके प्राप्त संख्या का योग सोच कर बताओ, यदि
गणित विधि जानते हो।
अनुशीलन-यहाँ पूर्वोक्तानुसार-
1 ÷ 1/6 = 1×6 = 6 इसी प्रकार अगली संख्याएँ प्राप्त है।
अतः 6 + 10 + 3 + 9 + 2 = 30
अन्यदुदाहरणम्
त्र्यादिषदन्तैश्छेदैर्व्याद्यंशकभागराशिसम्भक्तम्।
रूपं पृथक् कियत् स्यात् संयोगे वित्तमाचक्ष्व।। १९।।
न्यासः 1 1 1 1
2/3 3/4 4/5 5/6 लब्धं रूपाणि 5, भागाश्च 17/60
सुक्षेमा अनुवाद-ऐसी भिन्न संख्याएँ जिनके हर क्रमशः 3 से 6 तक हैं
तथा उन्हीं के अंश क्रमशः 2 से 5 तक हैं। इनका 1 से भाग करने पर भाग तथा
उनके भागफल का योग करने पर कितना कुल धन होगा, बताओ।
अनुशीलन-यहाँ पूर्वोक्तानुसार-
1 ÷ 2/3 = 1 × 3/2, इसी प्रकार अन्य संख्याओं के भाग से प्राप्त संख्याओं का
योग → 3/2 + 4/3 + 5/4 + 6/5 = 317/60 = 5 17/60
भागमातृजातौ करणसूत्रम्
भागादीनां यस्यां सम्भूतिर्भवति भागमाता सा।
तस्यां यथोक्तकरणैः पृथक्-पृथक् फलविनिष्पत्तिः¹।। २५।।
सुक्षेमा अनुवाद-जिस संख्या में भाग आदि अनेक संक्रियाएँ की जाती हैं,
वह भागमाता कही जाती है। उसमें पूर्वोक्त अनुसार अलग-अलग संक्रियाओं के
प्रयोग से परिणाम प्राप्त होते हैं।
अर्ध पादात् पादस्त्रिभागभागोऽर्धमर्धसंयुक्तम्।
त्र्यंशोऽर्धेन विहीनः समासतः किं फलं भवति।। २०।।


१. तुल. पाटी-गणित सू. 42, ग.सा.सं. 3.138

38 ·त्रिशतिका
न्यासः ½ ¼ ¼ 1 ½ ⅓ लब्धं रूपाणि 4, भागाश्च 23/48
⅓ ½ ½
सुक्षेमा अनुवाद-आधा का आधा या ½×½ = ¼, चौथाई का चौथाई या
¼×¼= 1/16, 1 से एक तिहाई इस भिन्न संख्या का भाग या 1 ÷ ⅓ = 1×3 = 3 तथा,
आधा से युक्त आधा या ½ + ½=1 तथा आधे से एक तिहाई कम या ½ -⅓ = ⅙
इनका योग करने पर क्या फल होगा।
अनुशीलन-इस उदाहरण में ½ के साथ अनेक संक्रियाएँ की गई हैं। अतः
यही भागमाता है। उपरिलिखित का जोड़ निम्नानुसार-
4 पूर्ण तथा ¼ + 1/16 + ⅙ = (12 + 3 + 8)/48 = 23/48
अन्यदुदाहरणम्।
पादत्र्यंशस्य दलं द्विभागभागोऽर्धसंयुतान्यष्टौ।
योगे कियद्धनं वद यदि गणितविधिं विजानासि॥ २१॥
न्यासः ¼ ⅓ ½ 1 8
½ ½ लब्धम् 10 11/12 इति भागमातृजाततिः
इति षट्प्रकारकलासवर्णनम्।
सुक्षेमा अनुवाद-तीसरा हिस्सा या ⅓ तथा उसका पाद या एक चौथाई भाग
या ⅓×¼ = 1/12, 1 का द्विभाग इस भिन्न संख्या का भाग अर्थात् 1 ÷ ½ = 1×2/1 = 2
तथा आधे से युक्त 8 अर्थात् 8½ = 17/2 इनके जोड़ने पर बताओ कुल कितना धन
होता है, यदि गणित विधि को जानते हो।
अनुशीलन-यहाँ भी ½ भागमाता है। प्रश्नानुसार 2 पूर्ण तथा ⅓ + 1/12 + 17/2
= (4+1+102)/12 = 107/12 = 8 11/12 + 2 = 10 11/12
अथ वल्लीसवर्णने करणसूत्रम्
प्राक् छेदांशौ गुणयेच्छेदेनाधःस्थितेन पूर्वांशे।
धनमृणमधःस्थितांशं कुर्वीत सवर्णे वल्ल्या१॥ २६॥
सुक्षेमा अनुवाद-वल्ली के सवर्णन या एकरूप बनाने के लिये पहले कहे
गए छेद या हर तथा अंश को उससे नीचे स्थित हर के साथ गुणित करें। पुनः


१. तुल. पाटी-गणित सू. 41, म.सि. 15.18, ग.ति.पृ. 39

त्रिशतिका ३९
पहले अंश में अधः स्थित या नीचे वाले अंश को यथावसर जोड़ने या घटाने पर
वल्ली-सवर्णन होता है।
पञ्च पुराणास्त्रिपणाः काकिण्येका वराटकेनोना।
तत्पञ्चमभागोना समासतः किं फलं भवति।। २२।।
५/१
३/१६
१/४
१/२०
१/५ न्यासः। सवर्णिते जातं १६६४७/३२०० , लब्धं पुराणाः 5, पणाः 3, काकिणी 0।
वराटकाः 18। वराटकभागांश्च ४/५। इति वल्ली-सवर्णनम्।
सुक्षेमा अनुवाद-5 पुराण, 3 पण तथा 1 काकिणी में 1 वराटक कम तथा
उसी काकिणी में से वराटक का १/५ कम होने की स्थिति में सबका जोड़ क्या
होगा।
अनुशीलन-इस प्रकार के प्रश्नों को हल करने के लिये वल्ली या सारिणी
बनाई जाती है। पश्चात् उपरिलिखित विधि से अलग-२ परिमाण के सिक्कों का
'सवर्णन' या एकरूप बनाया जाता है। इस प्रकार बनाकर जोड़ने या घटाने से
अभीष्ट परिणाम प्राप्त होता है।
प्रस्तुत उदाहरण की संस्कृत व्याख्या में इस प्रकार की वल्ली बनाई गई है।
इसमें क्रमशः उपरिलिखित विधि अन्वित करते हैं-
83
16
1
संक्रिया का निरूपण- 5 पुराण तथा
4
३/१६ पुराण को जोड़ने पर 5 + ३/१६ = ८३/१६
1-
20
1-
5
पुनः श्लोक का अनुगमन करते हुए अगली सारणी-
333
64

40 त्रिशतिका
1- संक्रिया का निरूपण → 83/16 पुराण के अंश और हर को
20 काकिणी का रूप देने के लिये दोनों का 4 से गुणन। साथ ही
1- अंश में 1 काकिणी का सम्मिलन→
5 83/16 × 4/4 + 1 = 333/64
पुनः उसी प्रकार सवर्णन करने पर–
6659 संक्रिया का निरूपण– 333/64 पुराण के अंश और हर को
1280 वराटक में बदलने के लिये दोनों का 20 से गुणन।
1- प्रश्नानुसार अंश से 1 वराटक कम करने पर–
5 333/64 × 20/20 - 1 = 6659/1280
पुनः अन्तिम का सवर्णन करने पर–
33294 = 16647 अंश और हर को 5 से गुणित करके प्रश्नानुसार
6400 = 3200 अंश से 1 कम करने पर– 6659/1280 × 5/5 - 1 = 33294/7400
इस प्रकार सवर्णित होने पर 16647/3200 पुराण = 5 647/3200 पुराण
इसकी उपपत्ति के लिये अन्य प्रकार से प्रश्न को हल करते हैं–
श्लोक के अनुसार प्रश्न का आकार
5/1 पुराण + 3/1 पण + {1/1 - 1/20 - (1/20 × 1/5) काकिणी}
नोट- 20 वराटक की 1 काकिणी
⇒ 5/1 पुराण + 3/1 पण + {1/1 - 1/20 - 1/100 काकिणी
⇒ 5/1 पुराण + (3/1 पण × 1/16) + (47/50 काकिणी × 1/64)
नोट- 16 पण का 1 पुराण, 4 काकिणी का 1 पण
अर्थात् 64 काकिणी का 1 पुराण। अतः–
⇒ 5/1 पुराण + 3/16 पुराण + 47/3200 पुराण = 16647/3200 पुराण
श्लोक की व्याख्या के अनुसार प्रश्न का आकार
5/1 पुराण + 3/16 पुराण + {1/4 - (1/4 × 1/20) - (1/4 × 1/20 × 1/5) पण}
नोट-20 वराटक की 1 काकिणी
4 काकिणी का 1 पण अतः 80 वराटक का 1 पण
⇒ 5/1 पुराण + 3/16 पुराण + (1/4 - 1/80 - 1/400 पण)
⇒ 5/1 पुराण + 3/16 पुराण + (94/400 पण × 1/16)

त्रिशतिका 41
नोट- 16 पण का 1 पुराण
⇒ 5/1 पुराण + 3/16 पुराण + 47/3200 पुराण = 16647/3200 पुराण (⇒×1½) -
16647/3200 पुराण = 5 पुराण + 647/3200 , 647/3200×16 = 10352/3200 = 3 पण + 752/3200 ,
752/3200×4= 3008/3200 स्पष्टतः पूर्णांक में काकिणी 0 है। अतः 3008/3200×20 = 60160/3200 = 18
वराटक+ 2560/3200 ÷ 640/640 = 4/5 अतः वराटक भाग 4/5
वास्तव में त्रिशतिकाकार द्वारा इस प्रश्न को इतने लम्बे उपाय से हल करने
की आवश्यकता नहीं। प्रश्न में स्वयं कहा है कि 5 पुराण तथा 3 पण हैं। अतः
इनके साथ अन्य संख्याओं को जोड़कर पुनः अन्त में इसी संख्या को प्राप्त करने
की आवश्यकता नहीं। काकिणी में से भी कुछ वराटक कम किये गए हैं। अतः
स्पष्ट ही पूर्णांक में काकिणी 0 ही होगी।
काकिणी में से 1 वराटक तथा उसका पाँचवाँ भाग अर्थात् 1+⅕ = 6/5
वराटक कम करना है। अतः 1 काकिणी को 20 वराटकों में बदलकर उक्त संख्या
घटाने से यह प्रश्न आसानी से समाहित है-
20 - 6/5 = 94/5 = 18 वराटक + 4/5 वराटक भाग
स्पष्टतः यह पूर्वोक्त हल के अनुरूप है।
अतः यहाँ त्रिशतिकाकार की विधि द्वारा केवल यह प्रदर्शित करना है कि
किसी सिक्के में से किसी अन्य मान वाले सिक्के को घटाने से पहले दोनों सिक्कों
के मान को समान बना लेना चाहिये। इस प्रक्रिया में यदि किसी हिस्से को घटाना
है तो उसे भिन्न का रूप देकर पहले हिस्सा प्राप्त कर लेना चाहिये।
ऊपर वाले प्रश्न में 1 काकिणी को वराटक में बदल दिया गया है। यह भी
हो सकता है घटाए जाने वाले वराटक को काकिणी का आकार देकर प्रश्न को
इस रूप में प्रस्तुत करें-
1 - 1/20 - (1/20×⅕) ⇒ 1 - 1/20 - 1/100 = 47/50 काकिणी
इसे वराटक में बदलने पर ⇒ 47/50×20 = 18⅘
स्पष्टतः दोनों ही प्रकार से एक ही उत्तर प्राप्त करते हैं।
स्तम्भोद्देशे करण-सूत्रम्
स्तम्भांशैक्यं त्यक्त्वा रूपाच्छेषेण सम्भजेद् दृश्यम्¹।
१. तुल. स्तम्भे शेषे च भजेत् दृश्यं रूपेण भागहीनेन। - पाटीगणित सूत्र 74
तथा तुल. ग.सा.सं. 4.4 में शेषजाति के अन्तर्गत सूत्र तथा अनेक उदाहरण म.सि. 15.20,
ग.ति.पृ. 44