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त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

142 त्रिशतिका
इसे इस प्रकार भी प्रकट कर सकते हैं-
पूर्ण शंकु का आयतन = ⅓ × वृत्त का क्षेत्रफल × ऊँचाई।
पर आलोच्य प्रसंग में अपूर्ण शंकु वाले कूप का आयतन ज्ञात करना है।
वह कूप ऊपर वृत्ताकार है। वह धीरे-धीरे तिरछी गहराई (slant depth) वाला
होता गया है। पर वह अन्त में सूच्याकार नहीं बना है। अतः वहाँ तक गहराई नहीं,
अपितु छोटे वृत्त या तलज वृत्त तक का ही आयतन ज्ञात करना है। ऐसी दशा में
श्रीधराचार्य ने इस अपूर्ण शंकु के अलग-2 स्थानों के वृत्त के क्षेत्रफल को जोड़
कर तथा ६ से विभाजित करके इसका औसत क्षेत्रफल ज्ञात किया है। भास्कराचार्य
ने भी इस संक्रिया का उद्देश्य औसत क्षेत्रफल ज्ञात करना बताया है। (क्षेत्रफलं
सममेवम् - लीलावती, खातव्यवहार श्लोक 3) पुनः त्रिशतिका श्लोक सूत्र 57 के
अनुसार इस क्षेत्रफल को ऊँचाई से गुणा करके इसका आयतन ज्ञात किया गया
है।
इस सूत्र को समन्वित करने के लिए उदाहरण इस प्रकार है-
उदाहरणम्
कूपस्य मुखव्यासः षोडश हस्तास्तले च चत्वारः।
वेधो द्वादश विद्वन् तत् खातफलं समाचक्ष्व।। 91।।
अमूलराशेः शतवर्गगुणनादिना लब्धं खातफलं हस्ताः 1062²¹⁄₄₀ त्र्यस्रवृत्तादिखातेषु
प्राग्वत् क्षेत्रफलानि साधयेत्।
सुक्षेमा अनुवाद-किसी कूप के मुख का व्यास 16 हाथ तथा तल का
व्यास 4 हाथ है। इसकी वेध या ऊँचाई 12 हाथ है। हे विद्वन्, ऐसे कूप का
खातफल या आयतन बताओ।
प्रस्तुत उदाहरण में सूत्रानुसार संक्रियाएँ करने पर-
अपूर्ण शंकु का आयतन या कूप का खातफल =
√10 × ¹²⁄₂₄) (256 + 16 + 400)
⇒ 25500.60705 / 24 ⇒ 1062.525 या 1062 (525 ÷ 25) / (1000 ÷ 25) = 1062²¹⁄₄₀
आधुनिक गणित में इस अपूर्ण शंकु का आयतन ज्ञात करने के लिए पहले
इसे पूर्ण शंकु का आकार प्रदान करते हैं, जो इस प्रकार है-

त्रिशतिका 143
नापियाँ उल्लिखित संख्याओं का
¼ सेंटीमीटर हैं।
त्रिशतिकाकार ने अपूर्ण शंकु की ऊँचाई 12 हाथ बताई है। उपरिलिखित
चित्र के अनुसार इसे पूर्ण शंकु का रूप देने पर इसकी ऊँचाई अवश्य ही 16
होगी। यह समरूप त्रिभुज के इस समीकरण से भी प्रकट है-
△ OAB तथा △ OCD समरूप हैं। अतः-
OA / OC = AB / CD → (x + 12) / x = 8/2 या 4
⇒ 4x = x + 12
⇒ 4x - x = 12
⇒ 3x = 12
⇒ x = 12/3 = 4
इस प्रकार CO की ऊँचाई 4 हाथ है। उल्लिखितानुसार AC की ऊँचाई 12
है। अतः कुल ऊँचाई 16 हाथ है। इसमें शंकु के समकक्ष सूत्र को समन्वित करते
हुए तथा उसमें से OC से बनने वाले आकार को घटाते हुए-
⅓ × 3162/1000 (r₁² h₁ - r₂² h₂) → ⅓ × 3162/1000 (8² × 16 - 2² × 4)
⇒ 3162/3000 × (11024 - 16)
⇒ 1.054 × 1008 = 1062.432
अथवा 1062 54/125
इस प्रकार हमने आधुनिक रीति से पूर्णांक में वही परिणाम प्राप्त कर लिया
है, जिसका त्रिशतिकाकार ने उल्लेख किया है।
इसकी व्याख्या में कहा है कि त्रिभुज तथा वृत्त के क्षेत्रफल भी इसी उपाय
से प्राप्त करना चाहिये। अतः इस श्लोक से संकेतित सूत्र ऊपर लिख दिये गए हैं।

144 त्रिशतिका
पाषाणफलानयने सूत्रम्
दैर्घ्याङ्गुलानि विस्तृतिपिण्डाङ्गुलताडितानि विभजेत्।
द्विकृतिचतुरेकषड्भिर्भवन्ति पाषाणफलहस्ताः॥ 55॥
सुक्षेमा अनुवाद-किसी पिण्ड या पाषाण के लम्बाई × चौड़ाई × ऊँचाई
द्वारा अंगुल में प्राप्त घनफल को 2 की कृति या वर्ग, चार, एक तथा छह से प्राप्त
संख्या अर्थात् 6144 से विभाजित करने पर उसका 'पाषाणफल-हस्त' प्राप्त होता
है।
अनुशीलन-त्रिशतिकाकार के समय में 'अंकानां वामतो गतिः' इस नियम
के अनुसार अंकों को दाहिने से बाईं ओर पढ़ा जाता था। अतः सबसे पहले इकाई
की संख्या 2²=4, पुनः दहाई की संख्या→4 इस क्रम से पढ़ने पर 6144 संख्या
प्राप्त होती है। उनके समय में 32 अंगुल लम्बा, 24 अंगुल चौड़ा तथा 8 अंगुल
गहरा तथा इस प्रकार 32×24×8=6144 घन अंगुल पाषाण-पिण्ड का 1
'पाषाण-फल-हस्त' यह मानक परिमाण माना गया था¹। अतः इस श्लोक में
किसी भी पाषाण-पिण्ड के घन अंगुल में प्राप्त परिमाण को 6144 से विभाजित
करके 'पाषाण-फल-हस्त' इस मानक मान को जानने की विधि बताई गई है।
उदाहरणम्
सार्धत्रिकरव्यासा करार्धपिण्डा शिला सखे तस्याः।
आयामः पञ्च करास्त्रिभागयुक्ताः फलं किं स्यात्॥ 92॥
हस्तैरंगुलीकृतैर्न्यासः 84, 12, 128 लब्धं पाषाणहस्ताः 21
सुक्षेमा अनुवाद-हे मित्र, जिस शिला की लम्बाई 7/2 हाथ, ऊँचाई 1/2 हाथ
तथा चौड़ाई 5 1/3 या 16/3 हैं, उसका घनफल क्या होगा।
अनुशीलन-24 अंगुल का 1 हस्त होता है। अतः व्याख्या के अनुसार इन
नापियों को 24 से गुणित करके अंगुल में बदल लेते हैं। इसके अनुसार शिला के
क्रमशः 84, 12 तथा 128 अंगुल परिमाण प्राप्त होते हैं। अतः-
84 × 12 × 128 = 129024 घन अंगुल या अंगुल³
129024 ÷ 6144 = 21 'पाषाण फल हस्त'
१. यस्य पाषाणस्य विस्तृतिरंगुलचतुर्विंशतिः, दैर्घ्यमंगुलद्वात्रिंशत् पिण्डमितिश्चाष्टांगुलानि तदेव
पाषाणघनहस्ताख्यं प्रकल्पितमाचार्येणेतीह बोध्यम् - म.म.पं. सुधाकर चतुर्वेदमहाभागानां
टिप्पणी।
1

त्रिशतिका 145
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि ‘पाषाण-फल-हस्त’ यह एक पारिभाषिक
मानक मात्रक है, जो कि घन-हस्त से सर्वथा भिन्न है। प्रस्तुत उदाहरण में
7/2 × 1/2 × 16/3 = 112/12 = 9.3..... घन-हस्त प्राप्त होते हैं। उपरिलिखित विधि से इसके
21 पाषाणफलहस्त सिद्ध होते हैं।
गोल-पाषाणस्य करण-सूत्रम्
गोलव्यासघनार्धं स्वाष्टादशभागसंयुक्तं गणितम्।
घनहस्ता नवगुणिताश्चतुर्विभक्ता करा दृषदः॥ 56॥
सुक्षेमा अनुवाद-गोल पिण्ड के व्यास के घन के आधे को ‘स्व’ अर्थात्
उसके ही 18 वें भाग से संयुक्त करने पर गोले का घनफल या आयतन प्राप्त होता
है। इस प्रकार प्राप्त घनहस्त या घनफल को 9 से गुणित करके 4 से विभक्त करने
पर पाषाण फलहस्त प्राप्त होता है।
अनुशीलन-श्लोक के अनुसार किसी गोल पिण्ड के घनफल या आयतन
का सूत्र इस प्रकार है-
गोल पिण्ड का आयतन = व्यास³ / 2 + व्यास³ / (2 × 18)
⇒ (1/2 + 1/36) व्यास³ ⇒ 19/36 × व्यास³
π = √10 = 19/6 = 3.16 का अलग उल्लेख करने पर-
गोल पिण्ड का आयतन = (3.16 × व्यास³) / 6
⇒ 1/6 × 3.16 × 8 त्रिज्या³, ⇒ 4/3 × 3.16 त्रिज्या³
यह सूत्र आधुनिक गणित के π के मान को छोड़ कर सर्वथा समतुल्य
है।
यहाँ श्रीधर के सूत्र को इस प्रकार भी लिखा जा सकता है-
गोले का आयतन = (4 × 3.16 × त्रिज्या² × व्यास) / 6
4 × 3.16 × त्रिज्या² यह गोले के पृष्ठीय क्षेत्रफल का सूत्र है।
अतः भास्कराचार्य ने गोले के आयतन का यह सूत्र प्रदान किया है१-
१. गोलस्यैवं तदपि च फलं पृष्ठजं व्यासनिघ्नम्।
षड्भिर्भक्तं भवति नियतं गोलगर्भे घनाख्यम्॥ –लीलावती, क्षेत्रव्यवहार, श्लोक ४१

146 त्रिशतिका
गोल पिण्ड का आयतन = (गोले का पृष्ठीय क्षेत्रफल × व्यास) / 6
पूर्वोक्त श्लोक 55 में कहा है कि 32×24×8 = 6144 घन अंगुल = 1
पाषाण हस्त। इन अंगुल संख्याओं को 24 से विभाजित करके हस्त संख्याओं में
यह भी कह सकते हैं कि 4/3 ×1×1/3 = 4/9 घन हस्त = 1 पाषाणफलहस्त। यहाँ
श्रीधर ने इस पैमाने को मानते हुए किसी पाषाण-पिण्ड के घन हस्त में प्राप्त
परिमाण को 4/9 से विभाजित करके अर्थात् 9/4 से गुणित करके पाषाण--फल हस्त
प्राप्त करने का निर्देश दिया है।
उदाहरणम्
गोले पाषाणमये घनफलमध्यर्धविस्तारे।
गणयित्वा कथय ततः पाषाणफलं हि यदि वेत्सि॥ 93॥
न्यासः 3/2 लब्धं घनहस्ताः 1 25/32 अतः पाषाणफलहस्ताः 4। अंगुलभागाः 3/16॥
सुक्षेमा अनुवाद-कोई गोल पाषाण, जिसका व्यास 1 1/2 या 3/2 तक विस्तृत है,
उसका घनफल या आयतन गणना करके बताओ, यदि जानते हो।
अनुशीलन-यहाँ श्लोक से प्राप्त सूत्र के अनुसार-
19/36 × (3/2)³ = (513 ÷ 9) / (288 ÷ 9) = 57/32 = 1 25/32
घन हस्त या गोल पाषाण का आयतन
इसका पाषाणफल हस्त प्राप्त करने के लिये पूर्वोक्त संक्रिया करने पर
57/32 × 9/4 = 513/128 = 4 1/128 पाषाण फल हस्त
श्लोक 55 में पाषाणफलहस्त बनाने की विधि द्वारा भी हम यही परिणाम
प्राप्त करते हैं-
3/2 × 24 = 36
19/36 × 36³ = 24624
(24624 ÷ 12) / (6144 ÷ 12) = 2052 / 512 = 4 1/128 पाषाण फल हस्त
उदा-श्लोक 92 में कहे उदाहरण को इस विधि से हल करने पर भी हम
पूर्वोक्त परिणाम प्राप्त करते हैं-
7/2 × 1/2 × 16/3 × 9/4 = 21 पाषाण फल हस्त

त्रिशतिका 147
करणसूत्रम्
प्राग्वत् क्षेत्रस्य फलं वृत्तत्र्यस्त्रादिदृषदि पिण्डघ्नम्।
घनगणितमतो दृषदः फलं भवेत् पूर्वकरणेन।। 57।।
सुक्षेमा अनुवाद-वृत्त तथा त्र्यस्र या त्रिभुज का क्षेत्रफल पूर्वोक्त के समान
होता है। इस क्षेत्रफल में पिण्ड की ऊँचाई से पूर्वोक्त रीति से गुणन करने पर दृषत्
या प्रस्तर पिण्ड का घन गणित अथवा उसका आयतन प्राप्त होता है।
अनुशीलन-पूर्वोक्त श्लोक 43 में त्रिभुज का क्षेत्रफल तथा श्लोक 45 में
वृत्त के क्षेत्रफल की विधि बताई जा चुकी है। इसमें केवल ऊँचाई को गुणित करने
पर घन का या लम्ब वृत्तीय बेलन आकार के पिण्ड का घनफल का यह सूत्र
होगा-
पिण्ड का आयतन = आधार (वृत्त, त्रिभुज, चतुर्भुज आदि) का क्षेत्रफल
× ऊँचाई
उदाहरणम्
दशहस्तविस्तारे वृत्ते यदि वेत्सि गणक पाषाणे।
अध्यर्धहस्तपिण्डे गणयित्वा घनफलं कथय।। 94।।
न्यासः व्यासः 10 पिण्डः 3/2 लब्धं क्षेत्रफलम् 79 1/20 घनफलं हस्ता 118
भागाश्च 23/40 अतः पाषाणफलं हस्ताः 266 भागाश्च 127/160। एवं पाषाणत्र्यस्त्रादिष्वपि।
इति खातव्यवहारः।
सुक्षेमा अनुवाद-हे गणितज्ञ, 10 हाथ विस्तृत व्यास वाले तथा 1 ½ या 3/2
ऊँचाई वाले वृत्तीय बेलनाकार प्रस्तर-पिण्ड का घनफल गणना करके बताओ।
अनुशीलन-यहाँ पूर्वोक्त वृत्त के क्षेत्रफल के सूत्र-
⇒ 3.162 × (व्यास² / 4) के अनुसार इस पिण्ड के आधार का क्षेत्रफल-
(3.162 × 100) / 4 = 79 1/20 या 1581 / 20
पूर्वोक्त सूत्रानुसार इसका घनफल-
(1581 × 3/2) / 20 = 4743 / 40 = 118 23/40 घन हस्त

148 त्रिशतिका
पूर्वोक्तानुसार इसका पाषाणफलहस्त—
(4743 × 9/2) / 40 = 42687 / 160 = 266 127/160 पाषाण फलहस्त
चितौ सूत्रम्
चयने क्षेत्रस्य फलं समुच्छ्रयेणाहतं चितेर्भवति।
गणितं तदिष्टकायाः फलेन हृतमिष्टकासंख्या।। 58।।
सुक्षेमा अनुवाद—चिति के क्षेत्रफल को उसके समुच्छ्रय या ऊँचाई से गुणा
करने पर चिति का घनफल होता है। इस घनफल को इष्टका के घनफल से
विभाजित करने पर ईंटों की संख्या ज्ञात होती है।
उदाहरणम्
चतुरस्रायतवेदी चितेष्टकाभिः षडंगुलोन्नतिभिः।
हस्तार्धविस्तराभिः करदैर्ध्याभिर्भवेत् तस्याः।। 95।।
विस्तारे हस्तत्रयमायामे षट् समुच्छ्रये त्वर्धम्।
किं घनगणितं विद्वन् प्रकथय का चेष्टका संख्या।। 96।।
न्यासः इष्टकान्यासः
[न्यास रेखाचित्र: वेदी — विस्तार 3, आयाम 6, ऊँचाई 1/2] [इष्टकान्यास रेखाचित्र: ईंट — विस्तार 1/2, आयाम 1, ऊँचाई 1/4]
लब्धं वेदीघनहस्ताः 9। इष्टकानां घनफलम् 1/8 इष्टकासंख्या 72। एवं वृत्त-
त्र्यस्रादिचयनेष्वपि घनफलमिष्टकाश्च साधयेत्।
सुक्षेमा अनुवाद—कोई चतुष्कोण आयत वेदि जो 1 हाथ लम्बी 6 अंगुल
ऊँची या 6/24 अर्थात् 1/4 हाथ ऊँची तथा 1/2 हाथ चौड़ी ईंटों से चुनी गई है तथा जो
चौड़ाई में 3 हाथ, लम्बाई में 6 तथा ऊँचाई में 1/2 हाथ है, उस वेदि का घनफल तथा
उसकी ईंटों की संख्या क्या होगी।
अनुशीलन—यहाँ घनाभ के आयतन के सूत्र ⇒ लम्बाई × चौड़ाई × ऊँचाई
के अनुसार वेदि का घनफल—
3 × 6 × 1/2 = 18/2 = 9 हस्त³
इसी सूत्र के अनुसार ईंटों का घनफल—

त्रिशतिका 149
1 × ½ × ¼ = ⅛ हस्त³
ईंटों की संख्या-
9 ÷ ⅛ या 9 × 8 = 72 ईंटें।
उदाहरणम्
कुण्डे द्विहस्तविस्तरदशकरदैर्घ्ये चतुष्करोच्छ्राये।
वित्तं प्रदीयते किं कर्मकराणां सखे तत्र।। 97।।
हस्तद्वयविस्तारं दलयुतहस्तत्रयायतं कुण्डम्।
सार्धं त्रिकरोच्छ्रायं क्रियते चैकेन रूपेण।। 98।।
न्यासः [चित्र: विस्तार 2, दैर्घ्य 10, उच्छ्राय 4] लब्धं घनहस्ताः 80
पुनर्न्यासः [चित्र: विस्तार 2, दैर्घ्य 3½, उच्छ्राय 3½] लब्धं घनहस्ताः 24½
अथ त्रैराशिकम्
यद्येतावन्तो 24½ हस्ता रूपेण क्रियन्ते तदैतावन्तो 80 हस्ताः कियद्भिः क्रियन्त
इति लब्धं रूपाणि 3, भागश्च 13/49।। इति चितिव्यवहारः।
सुक्षेमा अनुवाद-हे मित्र, 2 हाथ चौड़े, 10 हाथ लम्बे तथा 4 हाथ ऊँचे
कुण्ड को बनाने के लिये कारीगरों को कितनी मजदूरी देनी होगी, यदि 2 हाथ
चौड़े, 3½ या 7/2 हाथ लम्बे तथा 7/2 हाथ ऊँचे कुण्ड के लिये 1 रूप मजदूरी दी जाती
है।
अनुशीलन-इसके लिये पहले दोनों प्रकार के कुण्डों के घन हस्त प्राप्त
करते हैं-
2 × 10 × 4 = 80 घन हस्त का प्रथम कुण्ड।
2 × 7/2 × 7/2 = 24½ घन हस्त का दूसरा कुण्ड।

150 त्रिशतिका
अब पूर्वोक्त त्रैराशिक या ऐकिक नियम के अनुसार–
यदि 24½ हस्त³ के कुण्ड की मजदूरी 1 रूप
तो 1 हस्त³ ,, ,, ,, 1 × 2/49 रूप
तो 80 हस्त³ ,, ,, ,, 80 × 2/49 = 3 13/49 रूप
काष्ठव्यवहारे सूत्रम्
पिण्डायामांगुलवधराशौ काष्ठस्य मार्गसंगुणिते।
द्विगुणद्वादशवर्गेणोर्ध्वच्छेदे फलं भक्ते॥ ५९॥
क्रकचक्षेत्रस्य फलं मार्गाहितमंगुलात्मकं विभजेत्।
षड्गुणचतुष्ककृत्या तिर्यक् छेदे फलं हस्ताः॥ 60॥
सुक्षेमा अनुवाद–कोई काष्ठ पिण्ड, जिसका अंगुल में वर्गफल प्राप्त किया
गया है, उस फल को दारण मार्ग की संख्या से संगुणित करके 12 के द्विगुणित
अर्थात् 24 के वर्ग अर्थात् 576 से विभाजित करने पर सम्पूर्ण काष्ठपिण्ड का हस्त
में वर्गफल प्राप्त होता है।
एक क्रकच या चीरी हुई लकड़ी के क्षेत्रफल को दारण मार्ग से संगुणित
करने से अंगुलात्मक वर्गफल निकलता है। उसे 6 × 4 = 24 के वर्ग अर्थात् 576
से विभाजित करने से सम्पूर्ण का हस्त में वर्गफल प्राप्त होता है।
अनुशीलन–इन श्लोकों में चीरी हुई लकड़ी के क्षेत्रफल का निरूपण
किया गया है। किसी लकड़ी को चीर कर समान लम्बाई चौड़ाई के अनेक पटरे
प्राप्त किये जा सकते हैं। ऐसे किसी पटरे की अंगुल में लम्बाई तथा चौड़ाई प्राप्त
करके उन दोनों को गुणित करने से अंगुल में क्षेत्रफल या वर्ग अंगुल प्राप्त होगा।
इस क्षेत्रफल को समान पटरों की कुल संख्या से गुणित करने पर सभी पटरों का
वर्ग अंगुल प्राप्त होगा।
प्राचीन गणित में 24 अंगुल का एक हस्त माना गया है। अतः 24² = 576
वर्ग अंगुल एक वर्ग हस्त के बराबर है। अतः सभी पटरों के वर्ग अंगुल में प्राप्त
क्षेत्रफल को 576 से विभाजित करने पर उन सभी पटरों का वर्ग हस्त में क्षेत्रफल
प्राप्त हो जावेगा।
उदाहरणम्
द्वादशहस्तायामे खादिरकाष्ठे करार्धदलपिण्डे।
मार्गेषु पञ्चसु भवेदूध्र्वच्छेदे कियद् गणितम्॥ 99॥

त्रिशतिका 151
न्यासः [चित्र]
आयामः 12। पिण्डः ¼ लब्धं काष्ठगणितं हस्ताः 15
सुक्षेमा अनुवाद-ऐसी खैर की लकड़ी, जिससे 12 हाथ लम्बे तथा ½ का
आधा अर्थात् ¼ हाथ चौड़े पटरे बनते हैं, इस लकड़ी को ऊपर से चीर कर इस
परिमाण के 5 पटरे तैयार किये गए हैं। इनका गणित या कुल क्षेत्रफल क्या होगा।
अनुशीलन-इसके प्रत्येक पटरे का क्षेत्रफल-
12 × ¼ = 12/4 = 3 वर्ग हस्त का एक पटरा
3 × 5 = 15 वर्ग हस्त के 5 पटरे
पिण्डेनैको हस्तः प्रपद्यते करशतं तु दैर्घ्येण।
षड्भिः खादिरदारोः पञ्च त्रिगुणाः कराः कियता।। 100।।
| 100
|
| 1 मार्गः 1। क्रकच गणितम् 100
अधुना त्रैराशिकम्
यदि खादिरकाष्ठहस्तशतं रूपैः षड्भिः प्रपद्यते तर्हि पञ्चदश कराः कियता
प्रपद्यन्ते 100। 6। 15। लब्धं रूपभागाः 9/10
सुक्षेमा अनुवाद-किसी चिरी हुई लकड़ी के पटरे की चौड़ाई 1 हाथ तथा
लम्बाई 100 हाथ है, तो इसका क्षेत्रफल क्या होगा।
ऐसे 100 वर्ग हस्त की लकड़ी के पटरे का मूल्य 6 रूप है तो 15 वर्ग हस्त
का पटरा कितने मूल्य में प्राप्त होगा।
अनुशीलन-पटरे का क्षेत्रफल = 1 × 100 = 100 वर्ग हस्त मूल्य प्राप्त
करने के लिये ऐकिक नियम-
100 वर्ग हस्त काष्ठ का मूल्य 6 रूप
1 ,, ,, ,, ,, 6/100
15 ,, ,, ,, ,, 6/100 × 15 = 90/100 = 9/10 रूप
अथवा समानुपात के नियम से समीकरण द्वारा-

152 त्रिशतिका
100 : 6 :: 15 : x
100x = 15 × 6
x = 15/100 × 6 = 9/10
पुनरुदाहरणम्
वृत्तस्य खदिरदारोः करविस्तारस्य दशसु मार्गेषु।
तिर्यक्छेदे गणितं करात्मकं किं भवेत् कथय।। 101।।
न्यासः [वृत्तम्: व्यासः = 24]
मार्गाः 10 अत्र व्यासार्धवर्गवर्गादित्यादिना दशशतगुणनादिकर्मणा लब्धं क्षेत्रफलम्
455 9/25 एतन्मार्गगुणं षड्गुणचतुष्ककृत्या विभज्य लब्धं हस्ताः 7 163/180 पूर्ववदनुपातेन
करपत्रैकस्य च पाटने रूपभागाः 1423/3000 एवमन्यकाष्ठेष्वपि। इति काष्ठव्यवहारः।
सुक्षेमा अनुवाद-कोई वृत्ताकार खैर की लकड़ी, जिसका व्यास 1 हाथ या
24 अंगुल है तथा जिसे 10 मार्ग में चीरा गया है, उसका क्षेत्रफल तथा सभी पटरों
का वर्ग हस्त में गणित या क्षेत्रफल क्या होगा।
अनुशीलन-यहाँ पूर्वोक्त श्लोक 45 द्वारा वृत्त के क्षेत्रफल का मूल सूत्र-
√[10 (व्यास / 2)⁴]
√[10 (24/2)⁴] ⇒ √[10 × (12)⁴]
⇒ √207360 ⇒ 455 36/100
⇒ 455 9/25 वर्ग अंगुल लकड़ी का क्षेत्रफल
उक्त क्षेत्रफल वाले 10 पटरे प्राप्त किये गए हैं। अतः सभी पटरों का कुल
क्षेत्रफल-
(11384 × 10) / 25 = 113840 / 25 वर्ग अंगुल
इसका वर्ग हस्त प्राप्त करने के लिए 24 × 24 = 576 से भाग-
113840 / (25 × 576) = 113840 / 14400 = 7 1304/1440 ÷ 8/8 = 7 163/180

त्रिशतिका 153
7 163/180 सभी पटरों का कुल वर्ग हस्त में क्षेत्रफल
राशिव्यवहारे सूत्रम्
समभुवि विकीर्णराशेः परिधिषडंशस्य यो भवेद् वर्गः।
सोऽभ्युदयहतो गणितं घनहस्तेऽवस्थितिः खार्याः॥ 61॥
मगधायामन्यत्र तु यावन्मात्रस्य घनकरो भवति।
यद्यस्यावस्थानं तावन्मात्रस्य निर्देशः॥ 62॥
सुक्षेमा अनुवाद-समपृष्ठ वाली जमीन पर फैलाई गई धान्य की राशि की
परिधि के छठे अंश का जो वर्ग हो, उसे अभ्युदय अर्थात् ऊँचाई से गुणित करने
पर घनहस्त प्राप्त होते हैं। मगध देश मे यह घन हस्त खारी का मान होता है। अन्य
देशों में जितने घन हस्त हों, उतने 'घन हस्त' के ही रूप में निर्देश होता है। यदि
वे खारी के मान के अनुरूप हों तो तदनुरूप, अन्यथा उससे भिन्न भी हो सकता
है।
अनुशीलन-इन श्लोकों में समतल धरती पर पड़े हुए धान के ढेर का मान
जानने का प्रकार बताया गया है। इस प्रकार का ढेर लगभग शंकु का आकार
धारण कर लेता है। अर्थात् सबसे ऊँचाई पर सूची सदृश सबसे कम, उसके
पश्चात् वृत्त में उसका क्षेत्रफल बढ़ता जाता है। ऐसी सूची की आकृति होने से इस
प्रकार के वृत्त के आयतन को 'सूचीघनफल' कहने की परम्परा है। इसे जानने के
लिये शंकु के घनफल या आयतन के सूत्र का उपयोग किया गया है। प्रस्तुत धान
के ढेर के घनफल का यह सूत्र शंकु के आयतन के सूत्र को उपलब्ध कराता है-
शंकु का घनफल या आयतन = (परिधि / 6)² × ऊँचाई
यह सूत्र π = 3 तथा इस प्रकार परिधि = 3 × व्यास मानकर विकसित है।
इस स्थिति में इस सूत्र से क्रमशः यह परिणाम प्राप्त करते हैं-
शंकु का आयतन = (परिधि / 6)² × ऊँचाई
(परिधि² × ऊँचाई) / 36 = (परिधि × 3 व्यास × ऊँचाई) / 36 = (परिधि × व्यास × ऊँचाई) / (3 × 4)
क्योंकि श्लोक 45 के सूत्र से यह परिणाम प्राप्त है कि वृत्त का क्षेत्रफल=
(परिधि × व्यास) / 4 अतः सिद्ध है कि-

154 त्रिशतिका
शंकु का आयतन = ⅓ × वृत्त का क्षेत्रफल × ऊँचाई।
स्पष्टतः यह आधुनिक सूत्र के समतुल्य है। श्लोक 57 में लम्ब वृत्तीय
बेलन आकार का आयतन = वृत्त का क्षेत्रफल × ऊँचाई यह सूत्र प्रदान किया है।
उसका अनुसरण करने पर-
शंकु का आयतन = ⅓ × लम्ब वृत्तीय बेलन का आयतन
भास्कराचार्य ने इसी रीति से इस सूत्र का उपयोग किया है। उन्होंने पहले
उपरिलिखित वृत्त का क्षेत्रफल प्राप्त किया। (वृत्तक्षेत्रे परिधिगुणित-व्यासपादः फलं
तत् - लीलावती-क्षेत्रव्यवहार श्लोक 41)। पुनः उस क्षेत्रफल को ऊँचाई से गुणन
करके वृत्तीय बेलन का घनफल या आयतन प्राप्त किया है। (क्षेत्रफलं सममेवं वेध
हतं घनफलं स्पष्टम् - लीलावती, खातव्यवहार, श्लोक 2)। इस घनफल को ⅓
से गुणा करके सूचीखात का घनफल या शंकु का आयतन बताया है। (समखातफल-
त्र्यंशः सूचीखाते फलं भवति। (लीलावती, खातव्यवहार श्लोक 3)
श्रीधराचार्य ने प्रस्तुत प्रसंग में सीधे शंकु का आयतन ज्ञात किया है।
उपरिलिखित विवरण से प्रकट है कि यह वृत्त के क्षेत्रफल, वृत्तीय बेलन के
आयतन के क्रम से इन सूत्रों को प्राप्त करना सम्भव है।
उदाहरणम्
षट्त्रिंशत् परिधाने राशौ धान्यस्य किं भवेद् गणितम्।
हस्तचतुष्काभ्युदये यदि वेत्सि तदुच्यतामाशु।। 102।।
न्यासः ④
इदं लब्धं घनहस्ताः 144। एतावत्य एव मागधाः खार्यः।।
सुक्षेमा अनुवाद-कोई ऐसा धान का ढेर जिसकी परिधान या परिधि 36
हाथ तथा अभ्युदय या ऊँचाई 4 हाथ है। उसका गणित या घन हस्त कितना होगा,
यदि जानते हो तो शीघ्र बताओ।
अनुशीलन-यह ढेर शंकु के आकार का है। अतः शंकु के पूर्वोक्त सूत्र को
समन्वित करने पर-
( ³⁶⁄₆ )² × 4 = 6 × 6 × 4 = 144 घन हस्त या मागध खारी

त्रिशतिका 155
अन्यदुदाहरणम्
अपवरको धान्यभृतः समाष्टकरबाहुको दशोच्छ्रायः।
का तत्र धान्य-संख्या वदतु भवान् यदि विजानाति॥ 103॥
न्यासः [चित्र: घनाभ, लम्बाई = 8, चौड़ाई = 8, ऊँचाई = 10]
लब्धं गणितं हस्ताः 640। एतावत्य एव मागधा खार्यः।
सुक्षेमा अनुवाद-कोई धान का कुठार, जिसकी लम्बाई तथा चौड़ाई 8-8
हाथ तथा ऊँचाई 10 हाथ है, वह कितने घन हस्त होगा तथा उसमें कितने मागध
खारी धान्य समाएगा। यदि जान सको तो बताओ।
अनुशीलन-यहाँ समतल पृष्ठ में चतुष्कोण कुठार के घनफल का उदाहरण
दिया गया है। इसके सूत्र को 57 श्लोक तथा अग्रिम सूत्र में भी बताया गया है।
इसके अनुसार--
8 × 8 × 10 = 640 घन हस्त अथवा 640 मागध खारी
अन्यत्र सूत्रम्
प्राग्वत् क्षेत्रस्य फलं चतुरस्रत्र्यस्रचापवृत्तेषु।
तुल्योदयेन गुणितं संख्यानं भवति धान्यस्य॥ 63॥
एव त्र्यस्रादिस्थानेष्वपि घनफलाद् धान्यसंख्यानं कथयेत्।
सुक्षेमा अनुवाद-चतुरस्र या त्र्यस्र अर्थात् चतुर्भुज या त्रिभुज तथा चाप
वाले वृत्त के क्षेत्रफल को पहले ही बता दिया गया है। इस क्षेत्रफल को उदय या
ऊँचाई से गुणित करने पर इनका घनफल या आयतन तथा इस प्रकार खारी धान्य
की गणना प्राप्त होती है।
अनुशीलन-यह सूत्र तथा इसका उदाहरण पिछले श्लोक में वर्णित कर
दिया गया है।
भित्त्याश्चितादिराशिज्ञानाय सूत्रम्
द्विचतुःसप्त्यशहस्ते भित्यन्तरबाह्यकोणगतपरिधौ।
प्राग्वत् फलं भवेत् तत् स्वगुणहतं जायते गणितम्॥ 64॥
सुक्षेमा अनुवाद-कमरे की दीवाल के भीतर या भीतर के किसी कोने में

156 त्रिशतिका
अथवा बाहर के कोने में लगे हुए धान के ढेर की परिधि को क्रमशः 2, 4 तथा
⁴/₃ से गुणित करके पूर्वोक्त संक्रिया करने के पश्चात् अपने-अपने गुणक से
विभाजित करने से उनका गणित या घनहस्त प्राप्त होता है।
अनुशीलन-यदि धान का ढेर कमरे की दीवाल के किनारे है तो वह बनने
वाले वृत्त का ½ स्थान घेरता है। दो दीवारों के अन्दर के कोने में रखा ढेर वृत्त
का ¼ तथा बाहर के कोने में रखे होने पर वह ¾ स्थान घेरता है। इस प्रकार वृत्त
के ½ स्थान घेरने से बनने वाली परिधि की पूर्ण परिधि उससे ²/₁ गुणित होगी। अतः
एवं इनमें उन-उन से गुणित करके पहले पूर्ण परिधि प्राप्त कर ली गई है। पुनः
उससे घनफल की पूर्वोक्त संक्रिया करके उस अंश वाले क्षेत्रफल का घनफल
प्राप्त करने के लिये उससे भाग दिया गया है।
उदाहरणम्
भित्त्याश्रितस्य राशेस्त्रिषट्कपरिधेश्चतुष्कराभ्युदये।
का भवति धान्यसंख्या गणयित्वा कथ्यतामाशु।। 104।।
न्यासः [चित्र: अर्धवृत्ताकार परिधि = 18]
लब्धं गणितं हस्ताः 72। एतावतयो मागधा खार्यः 72।।
सुक्षेमा अनुवाद-किसी दीवाल के किनारे पड़ा हुआ धान का ढेर, जिसकी
परिधि 3 × 6 अर्थात् 18 हस्त उपलब्ध है तथा ऊँचाई 4 हाथ है। वहाँ कितना घन
हस्त या कितने मागध खारी धान होगा, गिनकर बताओ।
परिशीलन-यहाँ सम्पूर्ण वृत्त के ½ परिधि बताई गई है। अतः पूर्वोक्तानुसार
सम्पूर्ण संक्रियाएँ करने पर–
½ ((18 × 2) / 6)² × 4 = ½ × 36 × 4 = 144 / 2 = 72 घनहस्त या 72 मागध खारी
अन्यदुदाहरणम्
अपवरकमध्यकोणे राशेर्धान्यस्य नवकरे परिधौ।
चतुरुदये च फलं किं त्रिनवकपरिधौ बहिः कोणे।। 105।।

त्रिशतिका 157
न्यासः [चित्र: कोण में 9]
लब्धं घनहस्ता मागधाः खार्यः 36
द्वितीये घनहस्ताः 108 एतावत्यो मागधा खार्यः। इति राशिव्यवहारः।
सुक्षेमा अनुवाद-किन्हीं दो दीवालों के मध्य के कोण में रखे हुए धान के
ढेर जिसकी परिधि 9 हाथ तथा ऊँचाई 4 हाथ है, उसका फल क्या होगा तथा दो
दीवालों के बाहर के कोने में रखे धान की 9 × 3 = 27 हाथ परिधि तथा उतनी
ही 4 हस्त ऊँचाई में उसका घन हस्त या मागध खारी क्या होगी।
अनुशीलन-अन्दर की दीवाल के कोण में रखा हुआ धान बनने वाले वृत्त
का ¼ है। अतः उसे 4 से गुणित करके पूर्ण 1 परिधि प्राप्त करते हुए पूर्वोक्त
संक्रिया करते हैं-
¼ ((9 × 4) / 6)² × 4 = ¼ × 36 × 4 = 144 / 4 = 36 घनहस्त या मागध खारी
इसी प्रकार अगले उदाहरण में-
¾ ((27 × 4) / (6 × 3))² × 4 = ¾ × 36 × 4 = 432 / 4 = 108 घन हस्त या मागध खारी
छायाव्यवहारे करणसूत्रम्
द्विगुणसशंकुच्छायाभक्ते शंकौ भवेद् द्युगतशेषम्।
छाया तं शंकुहीने दिनगतशेषे हृते च शंकुदले।। 65।।
सुक्षेमा अनुवाद-शंकु या किसी सीधी डण्डी के दैर्घ्य सहित छाया को
द्विगुणित करके उससे शंकु के दैर्घ्य को विभक्त करने पर दिन का कितना भाग
बीत गया तथा कितना शेष रह गया, यह ज्ञात होता है।
साथ ही शंकु के दैर्घ्य से दिनगत शेष को विभाजित करके उसमें से शंकु
के द्विगुणित को हीन करके या घटा कर प्राप्त राशि को शंकु के दल अर्थात् 2
संख्या से विभाजित करने पर छाया का मान ज्ञात होता है।
अनुशीलन-यहाँ समतल भूमि पर किसी सीधी खड़े काष्ठ की छाया से
दिन मान जानने का प्रयास किया गया है। यहाँ ठीक मध्याह्न में शून्य छाया मानी
गई है। उसके पश्चात् किसी भी विशेष समय में निर्मित छाया के परिज्ञान के
आधार पर इस श्लोक के सूत्र के द्वारा प्रत्येक छाया के दिन मान को निर्धारित

158 त्रिशतिका
किया गया है। यह सूत्र इस प्रकार है-
दिन मान = शंकु का दैर्घ्य / [2 (शंकु का दैर्घ्य + उससे निर्मित छाया)]
श्लोक के द्वितीय चरण में कहा गया है कि इससे विपरीत क्रिया से दिन
मान ज्ञात होने पर उसके आधार पर काष्ठ की छाया जानी जा सकती है। इससे
यह सूत्र प्राप्त होता है-
छाया का मान = [(शंकु का दैर्घ्य / दिन-शेष-मान) -- 2 शंकु का दैर्घ्य] / 2
पूर्वार्धोदाहरणम्
द्वादशांगुलदैर्घ्यस्य शंकोरष्टांगुलस्य वा।
छाया पश्चिमतो दृष्टा त्रिगुणाह्नः कियद् गतम्।। 106।।
12। 8 शंकोश्छाया यथाक्रमम् 36। 24। लब्धं दिनगतशेषम् 1/8। पूर्वापरच्छायामेवं
दिनसिद्धिः।।
सुक्षेमा अनुवाद-12 अंगुल या 8 अंगुल ऊँचे शंकु या सम ऊर्ध्व स्थित
काष्ठ की तिगुनी छाया पश्चिम की ओर पड़ रही है। तो बताओ कितना दिन बीत
गया।
अनुशीलन-यहाँ पूर्वोक्त सूत्रानुसार-
12 / [2(12 + 36)] = 12/96 = 1/8, 8 / [2(8 + 24)] = 8/64 = 1/8
छाया पश्चिम की ओर पड़ने से स्पष्ट है कि प्रातः काल का समय है। यहाँ
सूत्रानुसार 1/8 दिन बीतने का अर्थ 1- 1/8 = 7/8 दिन शेष है। यदि सूर्योदय प्रातः 6
बजे तथा सूर्यास्त सायं 6 बजे हो तथा इस प्रकार 12 घण्टे का दिन हो तो शेष
दिन = 12 × 7/8 = 21/2 = 10½ घण्टा है। अर्थात् प्रातःकाल 7.30 का समय है।
उत्तरार्धोदाहरणम्
अष्टभागदिनस्यैते शेषे चापि निगद्यताम्।
शंकोः पूर्वोक्तयोरेव छायां पूर्वा

त्रिशतिका 159
सुक्षेमा अनुवाद-शंकु की पूर्वोक्त स्थिति में अर्थात् 12 अंगुल या 8 अंगुल
ऊँचा स्थित होने पर तथा 1/8 दिन के शेष रहने की दशा में कितनी बड़ी छाया
बनेगी, बताओ।
अनुशीलन-65 वें श्लोक के द्वितीय चरण में कहा है कि पूर्वोक्त से
विपरीत क्रिया करने पर छाया का मान प्राप्त होता है। अतः पूर्वोक्तानुसार-
[(8 × 12) - (12 × 2)] / 2 = (96 - 24) / 2 = 72/2 = 36 अंगुल की लम्बाई
तथा-
[(8 × 8) - (8 × 2)] / 2 = (64 - 16) / 2 = 48/2 = 24 अंगुल की लम्बाई
इसकी उपपत्ति को बीजगणितीय समीकरण की संक्रिया से आसानी से
स्पष्ट किया जा सकता है-
12 / [2(12 + x)] = 1/8 ⇒ [2(12 + x)] / 12 = 8
⇒ 24 + 2x = 12 × 8 = 96
⇒ 2x = 96 - 24 = 72
⇒ x = 72/2 = 36
भारत में प्राचीन काल से धूप-घड़ी का प्रयोग होता रहा है। इसके लिये
किसी समतल भूभाग पर याम्योत्तर अर्थात् दक्षिण से उत्तर एक सीधी रेखा खींची
जाती थी। उसके केन्द्र-बिन्दु के आधार पर एक वृत्त की रचना की जाती थी। इस
रेखा पर किसी त्रिभुजाकार काष्ठ या धातु की पत्ती को खड़ा करके दृढ़ता से
स्थापित कर दिया जाता था। जिसका एक कोण स्थानीय अक्षांश के तुल्य होता
था। इससे मध्याह्न में सूर्य की छाया ठीक याम्योत्तर रेखा पर पड़ती थी। इस समय
दिन के १२ बजते थे। इसके पश्चात् प्रस्तुत गणितीय नियम के अनुसार छाया बढ़ने
पर दिन के घण्टे बीतते जाते थे। इसके अनुसार छाया के उसर स्थान पर उस २
घण्टे का चिह्न अंकित कर दिया जाता था। इस प्रकार काष्ठ के ऊपरी छोर की
छाया जिस अंकित घण्टे पर पड़ती थी, वही दृष्ट समय माना जाता था।
श्रीधराचार्य विरचित त्रिशतिका पाटी की 'सुक्षेमा' व्याख्या समाप्त।

160 त्रिशतिका
परिशिष्ट नं.1
त्रिशतिका के विशिष्ट गणितीय शब्द
आयत (rectangle)—
प्राचीन प्रयोग- ‘आयत चतुरस्र’ (ऐ. ब्रा. 5.5)
इस अर्थ में केवल ‘आयत’ का प्रयोग-
समचतुरस्रायतयोर्भुजकोटिहतिः प्रजायते गणितम्-त्रिशतिका सू. 42 पृ. 110
स्पष्टतः यहाँ ‘आयत’ शब्द समचतुरस्र का विपरीत ‘विषम चतुर्भुज’ का
वाचक है। इस प्रकार जिस चतुर्भुज की आसन्न भुजाएँ नहीं, अपितु आमने सामने
की भुजाँ बराबर हों, वह आयत है।
समश्रुतौ तुल्यचतुर्भुजे च तथायते तद् भुजकोटिघातः-लीलावती पृ. 225
आयाम = लम्बाई (length)
प्राग्वंशः षोडशप्रक्रमायामः बौ. शु. सू. 1.88
-त्रिशतिका - उदा. 83 इत्यादि, पृ. 121
इच्छा- त्रैराशिक की तृतीय राशि (Third quantity of त्रैराशिक - scale)
त्रैराशिक-फल-राशि तमथेच्छाराशिना हतं कृत्वा।
लब्धं प्रमाणभजितं तस्मादिच्छाफलमिदं स्यात् - आर्यभटीय 1.26
त्रिशतिका सू. 29 पृ. 49
प्रमाणमिच्छा च समानजातिः आद्यन्तयोस्तत् फलमन्यजातिः - लीलावती
त्रैराशिक श्लोक 7 पृ. 100
एकपत्रीकरण- ब्याज का विवरण (chart of interest)
त्रिशतिका सू. 35, पृ. 84
कपाट-सन्धि- गुणन की एक विधि (A method of multiplication)
त्रिशतिका सू. 5, पृ. 13
कर्ण- (hypotenues) कर्णस्तु पार्श्वभुजः - त्रिशतिका सूत्र 50, पृ. 131
कला-सवर्णन- भिन्न संख्याओं पर संक्रियाएँ
परिकम्मं ववहारो रज्जु-रासी कलासवन्नेय।
जावन्तावति वग्गो घनो ततह वग्गवग्गो विकप्पोत-स्थानांग सूत्र 747

त्रिशतिका 161

त्रिशतिका सूत्र 22 पृ. 31 में भिन्न-संक्रियाओं के 6 प्रकार
कु = मुख के समानान्तर आधार भुजा (base, parallel to मुख)
त्रिशतिका सूत्र 42 पृ. 111
चतुर्भुजेऽन्यत्र समानलम्बे लम्बेन निघ्नं कुमुखैक्यखण्डम् लीलावती श्लोक
23, पृ. 225
कार्मुक (पर्याय-चाप, धनुः) = परिधि-खण्ड (arc) इसके धनुष-आकार
का होने से यह नाम विकसित है।
त्रिशतिका सूत्र 47, पृ. 126
पर्याय धनुः का प्रयोग- इषुवर्गस्य षड्गुणस्य ज्यावर्गयुतस्य मूलं धनुःकाष्ठम्

  • तत्त्वार्थाधिगम-सूत्र भाष्य 3.71
    आप्ते पदे वृतिदलात् पतिते धनुः स्यात् - लीलावती श्लोक 49, पृ. 301
    कृति = वर्ग (square)
    अर्थ- सदृशद्विराशिघातः- त्रिशतिका सूत्र 11, पृ. 17
    सवर्णितांशवर्गश्छेदकृतिविभाजितो भवति वर्गः - ब्रा. स्फु. सि. 12.5
    कोटि = लम्ब (perpendicular) त्रिशतिका सूत्र 50 पृ. 131 त्र्यस्रे
    चतुरस्रे वा सा कोटिः कीर्तिता तज्ज्ञैः - लीलावती क्षेत्रव्यवहार श्लोक 1 पृ. 172
    क्रकचफल = चीरी हुई लकड़ी का क्षेत्रफल (area of wooden pieces)
    त्रिशतिका सूत्र 60, पृ. 150
    लीलावती - क्रकचव्यवहार श्लोक 3, पृ. 313
    सामान्य अर्थ- दारुदारणपथ (लीलावती पृ. 312)
    ख = शून्य (cipher)
    त्रिशतिका सूत्र 8, पृ. 14
    धनयोर्धनमृणमृणयोर्धनर्णयोरन्तरं समैक्यं खम्।। ब्रा.स्फु.सि. 18.30
    खात फल = खोदे गए घनाभ गड्ढे का घनफल (the volume of a
    ditch) त्रिशतिका उदा. 87, पृ. 138
    क्षेत्रफलं वेधगुणं खाते घनहस्तसंख्या स्यात्। लीलावती खातव्यवहार श्लोक
    1, पृ. 303
    घन (cube) -