त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 187, कुल 208 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिशतिका 159
सुक्षेमा अनुवाद-शंकु की पूर्वोक्त स्थिति में अर्थात् 12 अंगुल या 8 अंगुल
ऊँचा स्थित होने पर तथा 1/8 दिन के शेष रहने की दशा में कितनी बड़ी छाया
बनेगी, बताओ।
अनुशीलन-65 वें श्लोक के द्वितीय चरण में कहा है कि पूर्वोक्त से
विपरीत क्रिया करने पर छाया का मान प्राप्त होता है। अतः पूर्वोक्तानुसार-
[(8 × 12) - (12 × 2)] / 2 = (96 - 24) / 2 = 72/2 = 36 अंगुल की लम्बाई
तथा-
[(8 × 8) - (8 × 2)] / 2 = (64 - 16) / 2 = 48/2 = 24 अंगुल की लम्बाई
इसकी उपपत्ति को बीजगणितीय समीकरण की संक्रिया से आसानी से
स्पष्ट किया जा सकता है-
12 / [2(12 + x)] = 1/8 ⇒ [2(12 + x)] / 12 = 8
⇒ 24 + 2x = 12 × 8 = 96
⇒ 2x = 96 - 24 = 72
⇒ x = 72/2 = 36
भारत में प्राचीन काल से धूप-घड़ी का प्रयोग होता रहा है। इसके लिये
किसी समतल भूभाग पर याम्योत्तर अर्थात् दक्षिण से उत्तर एक सीधी रेखा खींची
जाती थी। उसके केन्द्र-बिन्दु के आधार पर एक वृत्त की रचना की जाती थी। इस
रेखा पर किसी त्रिभुजाकार काष्ठ या धातु की पत्ती को खड़ा करके दृढ़ता से
स्थापित कर दिया जाता था। जिसका एक कोण स्थानीय अक्षांश के तुल्य होता
था। इससे मध्याह्न में सूर्य की छाया ठीक याम्योत्तर रेखा पर पड़ती थी। इस समय
दिन के १२ बजते थे। इसके पश्चात् प्रस्तुत गणितीय नियम के अनुसार छाया बढ़ने
पर दिन के घण्टे बीतते जाते थे। इसके अनुसार छाया के उसर स्थान पर उस २
घण्टे का चिह्न अंकित कर दिया जाता था। इस प्रकार काष्ठ के ऊपरी छोर की
छाया जिस अंकित घण्टे पर पड़ती थी, वही दृष्ट समय माना जाता था।
श्रीधराचार्य विरचित त्रिशतिका पाटी की 'सुक्षेमा' व्याख्या समाप्त।