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सर्वकोश
त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 185, कुल 208 में से

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पृष्ठ 185

त्रिशतिका 157
न्यासः [चित्र: कोण में 9]
लब्धं घनहस्ता मागधाः खार्यः 36
द्वितीये घनहस्ताः 108 एतावत्यो मागधा खार्यः। इति राशिव्यवहारः।
सुक्षेमा अनुवाद-किन्हीं दो दीवालों के मध्य के कोण में रखे हुए धान के
ढेर जिसकी परिधि 9 हाथ तथा ऊँचाई 4 हाथ है, उसका फल क्या होगा तथा दो
दीवालों के बाहर के कोने में रखे धान की 9 × 3 = 27 हाथ परिधि तथा उतनी
ही 4 हस्त ऊँचाई में उसका घन हस्त या मागध खारी क्या होगी।
अनुशीलन-अन्दर की दीवाल के कोण में रखा हुआ धान बनने वाले वृत्त
का ¼ है। अतः उसे 4 से गुणित करके पूर्ण 1 परिधि प्राप्त करते हुए पूर्वोक्त
संक्रिया करते हैं-
¼ ((9 × 4) / 6)² × 4 = ¼ × 36 × 4 = 144 / 4 = 36 घनहस्त या मागध खारी
इसी प्रकार अगले उदाहरण में-
¾ ((27 × 4) / (6 × 3))² × 4 = ¾ × 36 × 4 = 432 / 4 = 108 घन हस्त या मागध खारी
छायाव्यवहारे करणसूत्रम्
द्विगुणसशंकुच्छायाभक्ते शंकौ भवेद् द्युगतशेषम्।
छाया तं शंकुहीने दिनगतशेषे हृते च शंकुदले।। 65।।
सुक्षेमा अनुवाद-शंकु या किसी सीधी डण्डी के दैर्घ्य सहित छाया को
द्विगुणित करके उससे शंकु के दैर्घ्य को विभक्त करने पर दिन का कितना भाग
बीत गया तथा कितना शेष रह गया, यह ज्ञात होता है।
साथ ही शंकु के दैर्घ्य से दिनगत शेष को विभाजित करके उसमें से शंकु
के द्विगुणित को हीन करके या घटा कर प्राप्त राशि को शंकु के दल अर्थात् 2
संख्या से विभाजित करने पर छाया का मान ज्ञात होता है।
अनुशीलन-यहाँ समतल भूमि पर किसी सीधी खड़े काष्ठ की छाया से
दिन मान जानने का प्रयास किया गया है। यहाँ ठीक मध्याह्न में शून्य छाया मानी
गई है। उसके पश्चात् किसी भी विशेष समय में निर्मित छाया के परिज्ञान के
आधार पर इस श्लोक के सूत्र के द्वारा प्रत्येक छाया के दिन मान को निर्धारित