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सर्वकोश
त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 173, कुल 208 में से

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पृष्ठ 173

त्रिशतिका 145
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि ‘पाषाण-फल-हस्त’ यह एक पारिभाषिक
मानक मात्रक है, जो कि घन-हस्त से सर्वथा भिन्न है। प्रस्तुत उदाहरण में
7/2 × 1/2 × 16/3 = 112/12 = 9.3..... घन-हस्त प्राप्त होते हैं। उपरिलिखित विधि से इसके
21 पाषाणफलहस्त सिद्ध होते हैं।
गोल-पाषाणस्य करण-सूत्रम्
गोलव्यासघनार्धं स्वाष्टादशभागसंयुक्तं गणितम्।
घनहस्ता नवगुणिताश्चतुर्विभक्ता करा दृषदः॥ 56॥
सुक्षेमा अनुवाद-गोल पिण्ड के व्यास के घन के आधे को ‘स्व’ अर्थात्
उसके ही 18 वें भाग से संयुक्त करने पर गोले का घनफल या आयतन प्राप्त होता
है। इस प्रकार प्राप्त घनहस्त या घनफल को 9 से गुणित करके 4 से विभक्त करने
पर पाषाण फलहस्त प्राप्त होता है।
अनुशीलन-श्लोक के अनुसार किसी गोल पिण्ड के घनफल या आयतन
का सूत्र इस प्रकार है-
गोल पिण्ड का आयतन = व्यास³ / 2 + व्यास³ / (2 × 18)
⇒ (1/2 + 1/36) व्यास³ ⇒ 19/36 × व्यास³
π = √10 = 19/6 = 3.16 का अलग उल्लेख करने पर-
गोल पिण्ड का आयतन = (3.16 × व्यास³) / 6
⇒ 1/6 × 3.16 × 8 त्रिज्या³, ⇒ 4/3 × 3.16 त्रिज्या³
यह सूत्र आधुनिक गणित के π के मान को छोड़ कर सर्वथा समतुल्य
है।
यहाँ श्रीधर के सूत्र को इस प्रकार भी लिखा जा सकता है-
गोले का आयतन = (4 × 3.16 × त्रिज्या² × व्यास) / 6
4 × 3.16 × त्रिज्या² यह गोले के पृष्ठीय क्षेत्रफल का सूत्र है।
अतः भास्कराचार्य ने गोले के आयतन का यह सूत्र प्रदान किया है१-
१. गोलस्यैवं तदपि च फलं पृष्ठजं व्यासनिघ्नम्।
षड्भिर्भक्तं भवति नियतं गोलगर्भे घनाख्यम्॥ –लीलावती, क्षेत्रव्यवहार, श्लोक ४१